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Monday, January 30, 2012

गाँधी जी को किसने मारा !!


गाँधी जी को किसने मारा ?
आज  महात्मा गाँधी को राष्ट्र आज उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दे रहा है । गांधी की चौक-चौराहों पर लगी प्रतिमाओं पर जी भरकर श्रद्धासुमन अर्पित किये जा रहे हैं, देश गांधी मय हो गया है । पर एक प्रश्न सबके सामने आज भी खड़ा है कि गाँधी जी को किसने मारा ,नाथूराम गोडसे ने तो गाँधी जी को सिर्फ एक बार शारीरिक रूप से मारा लेकिन आज देश में गाँधी जी की हत्या तो हर रोज हो रही है ।गाँधी जी के विचारों को तो आजादी मिलते ही मार दिया गया था । जिस सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए  गाँधी जी ने पूरे विश्व को एक नई दिशा दी आज उन्ही के विचारों को हमने लगभग भुला दिया । गाँधी जी के नाम पर राजनीति करने वालों,वोट मागने वालों ने तो उन्हें कब का भुला दिया । अब वो सिर्फ सरकारी दफ्तरों में टंगी तस्वीरों में ही रह गए है । आजाद भारत ने तो कभी उनके विचारों को स्थान दिया ही नहीं ।
मगर उनका क्या जो अब गांधी का चित्र केवल करारी करेंसी में ही देखने के आदी हो चुके हैं । यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिस गांधी ने देश की आज़ादी के लिए अपने शरीर के सारे वस्त्रों का त्याग कर महज़ एक लंगोटी को अपनाया, जिनकी सच्चाई की कसमें खाईं जाती हों उसी बापू के चित्र वाले नोटों ने आज इंसानियत खत्म कर दी है ।
2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर (गुजरात) में जन्मे और भारतीय जनसमुदाय में बापू के नाम से पुकारे जाने वालेमोहनदास करमचंद गांधी की नृशंस हत्या इसी दिन देश के स्वातंत्र्य-प्राप्ति के चंद महीनों के भीतर30 जनवरी 1948 में हुयी थी । तब नाथूराम गोडसे ने भारत विभाजन के नाम पर उत्पन्न आक्रोश के वशीभूत होकर उन पर जानलेवा गोली चलाई थी । जिन गाँधी जो को अंग्रेजो ने आजादी तक बचाए रखा उन्ही को हम आजादी के कुछ साल भी जीवित न रख सके .कैसी विडम्बना है ये इस देश की । मुझे तो अब देश के भीतर हर उनका रोज का मारा जाना अधिक विचलित करता है ।  उनके नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले इस देश में अनेकों लोग उनकी शिक्षाओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं, अपने कुकृत्यों से उनके देश को रसातल में धकेल रहे हैं ।
इस देश में क्या कुछ नहीं हो रहा है जो महात्मा गांधी के यशःशरीर पर आघात करने जैसा नहीं है?आज की राजनीति आपराधिक वृत्तियों वालों का अखाड़ा बनता जा रहा है । साफ-सुथरेपन का मुखौटा पहने हुए राजनेता अपराधियों के बल पर सत्ता हथियाने और उससे चिपके रहने के जुगाड़ में लगे हैं । वे हर प्रकार के समझौतों को स्वीकारने को तैयार हैं । अपने को साफ दिखाते हैं, लेकिन अपराधियों को संरक्षण देने का कुत्सित कार्य करते आ रहे हैं । यह ठीक है उनमें से बहुत से नेता स्वयं घूस नहीं लेते, देश का पैसा नहीं लूटते हैं, किसी की जमीन-जायदाद नहीं छीनते हैं, लेकिन ऐसा करने की छूट वे अपने सहयोगियों को तो देते ही हैं । जो चाहो करो भैया, बस मेरी कुर्सी बचाये रखोका मूक वचन उनके चरित्र का हिस्सा बन चुका है । अनर्गल बातें करना, दूसरों पर सही-गलत आरोप लगाना, कुछ भी बोलकर उसे नकारने कृत्य उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हो चुके हैं । क्या ये सब गांधी की वैचारिक हत्या करना नहीं है?
देश का प्रशासन संवेदनशून्य, अकर्मण्य, मुफ्तखोर और गैरजिम्मेदार बन चुका है । शर्माे-हया और आत्मग्लानि को जैसे देश-निकाला मिल गया है । वह तब तक सोता रहता है जब तक जनता धरना, चक्काजाम, आगजनी एवं हिंसक प्रदर्शन पर उतर नहीं उतर आती । पुलिस बल अपराधियों की नकेल कसने के बजाय निरपराध लोगों को जेल की सलाखों के पीछे करने से नहीं हिचकती है । एफआईआर दर्ज करने के लिए तक अदालत की शरण लेनी पड़ रही है । यह सब गांधी की हत्या से बदतर है ! और अदालतों का भी भरोसा है क्या? न्यायाधीशों पर भी गंभीर आरोप लगने लगे हैं । फिर भी जनता असहाय होकर उनको अपने पदों पर देख रही है । कोई कुछ नहीं कर पा रहा है । अवैधानिक या आपत्तिजनक कार्य कर चुकने पर भी किसी के चेहरे पर सिकन नहीं दिखती, तनाव का चिह्न नहीं उभरता, शर्म से गर्दन नहीं झुकती । क्या गांधी यही देखना चाहते थे? क्या उनके स्वप्नों की हत्या नहीं हो रही है?
गांधी का मत था कि हमारे समाज में सबसे निचले तबके के आदमी को सर्वाधिक महत्त्व मिलना चाहिए । वे इस पक्ष के थे कि संपन्न और अभिजात वर्ग को उनके लिए त्याग करना चाहिए । कृषि को प्राथमिकता मिलनी चाहिए । इस गरीब देश के तमाम लोगों के हित में श्रमसाध्य छोटे-मोटे उद्योगधंधों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । सभी को सादगी का मंत्र अपनाना चाहिए । लेकिन हो उल्टा रहा है । हाल की सरकारों का ध्यान कृषि से हटकर बड़े उद्योगों की ओर जा चुका है, ताकि संपन्न वर्ग अधिक संपन्न हो सके । आज हालात यह हैं कि दुनिया के सबसे अमीर लोगों में यहां के उद्योगपति हैं तो सबसे दरिद्र आदमी भी यहीं पर देखने को मिल रहे हैं । संपन्नता और विपन्नता की नित चौढ़ी हो रही खाई इसी देश की खासियत बन चुकी है । आज का आर्थिक मॉडल गांधी के विचारों के विपरीत है । किसानों की हालत बिगड़ती जा रही है और वे आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं । देश को ऐसी व्यवस्था की ओर धकेलना गांधी की हत्या करने के समान ही तो है।
हत्या, बलात्कार, लूट, अपहरण और आर्थिक भ्रष्टाचार के रूप में गांधी की हत्या हर दिन हो रही है । देश के शासनकर्ता और प्रशासन-तंत्र मूक बने हुए हैं । हाल के समय में अपराधियों का मनोबल तेजी से बढ़ा है । उन्हें राजनेताओं और शीर्षस्थ प्रशासनिक अधिकारियों का संरक्षण मिला रहता है इस बात में कोई शक नहीं है । गांधीजी ने स्वतंत्रता संग्राम में तो देश की अगुवाई की और भारत को दासता की बेड़ियों से आजाद करवाया लेकिन जब आजादी मिल गई तब वह अपनों के आगे हारते नजर आए । जिस सिपाही ने बिना हथियार उठाए देश को आजादी दिलाई उसे आज ऐसी जगह स्थान मिला है जिसके लिए लोग कभी भी और किसी भी हद तक हिंसा कर सकते हैं यानि पैसे के लिए । गांधीजी की फोटो के नीचे आज सभी नेता शान से रिश्वत लेते हैं । उनकी कल्पना के स्वराज्य का आधार आध्यात्मिक समाज ही हो सकता था और आध्यात्मिक समाज की रचना का माध्यम राज्य द्वारा स्थापित संस्थाएं या कानून नहीं होते अपितु आध्यत्मिक शक्ति से सम्पन्न व्यक्ति ही हो सकते हैं। इसलिए द.अफ्रीका में रहते हुए गांधी जी ने सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह व ब्राहृचर्य का व्रत पहले अपने जीवन में अपनाया और फिर फोनिक्स व टालस्टाय आश्रमों की स्थापना कर उस जीवन को अन्य आश्रमवासियों में उतारने का प्रयास किया।
गांधी जी की महानता को स्वीकार करते हुए भी यह प्रश्न तो हमारे मन में उठना ही चाहिए कि उनके जैसे प्रभावशाली आध्यात्मिक पुंज के भारत के सार्वजनिक जीवन का प्रेरणास्रोत बन जाने के बाद भी भारत हिन्द स्वराज में प्रस्तुत समाज निर्माण की दिशा में आगे क्यों नहीं बढ़ सका? जो लोग सोचते हैं कि हिन्द स्वराज को शब्द रूप में जन-जन तक पहुंचाकर भारत को पुन उस समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ा सकेंगे, वे भूल जाते हैं कि भारतीय मानस पर गांधी जी के प्रभाव का कारण हिन्द स्वराज नामक पुस्तक नहीं बल्कि गांधी जी का अपना जीवन था। इसीलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा को मेरे सत्य के प्रयोग जैसा नाम दिया। अब लोग गांधी जी के जीवन को तिलांजलि देकर उनके शब्दों का व्यायाम करके ही उनके सपनों का भारत बनाने का सपना देख रहे हैं। गांधी जी का जीवन तो उनके द्वारा प्रवर्तित रचनात्मक संस्थाओं में से भी विदा हो चुका है।
आज के दौर में जब देश में  राजनीति अपनी मर्यादा खोती जा रही है और भ्रष्टाचार अपने चरम पर है गाँधी जी के विचार और अधिक प्रासंगिक हो गए है । आज देश को उनके विचारों की ,उनकी नीतियों की बहुत ज्यादा जरुरत है । तभी हम असली आजादी महसूस कर सकेगे ।
लेखक
शशांक द्विवेदी