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Sunday, April 22, 2012

पृथ्वी दिवस पर प्रभातखबर में

प्रभातखबर लेख -शशांक

समय धरती बचाने का
पिछले कुछ महीनों में दुनिया के विभित्र हिस्सों में प्राकृतिक आपदाओं का आना हमें बार बार चेतावनी दे रहा है कि हमारी धरती हमारे ही क्रियाकलापों से विनाश की तरफ बढ. रही है. विकास की अंधी दौर के दुष्परिणामों से धरती को बचाने के लिए 22 अप्रैल 1970 से धरती को बचाने की मुहिम अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन द्वारा पृथ्वी दिवस के रूप में शुरू की गयी थी, लेकिन वर्तमान में धरती बचाने की हो रही कोशिशों को देखें, तो लगता है कि यह दिवस सिर्फ आयोजनों तक ही सीमित रह गया है.

पर्यावरण असंतुलन दशकों से मानवजाति के लिए चिंता का सबब है. वास्तव में पर्यावरण संरक्षण हमारे राजनीतिक एजेंडे में शामिल ही नहीं है. पिछले कई वर्षों से दुनियाभर के ताकतवर देशों के कद्दावर नेता हर साल पर्यावरण संबंधित सम्मेलनों में भाग लेते रहे हैं, लेकिन आज तक कोई ठोस लक्ष्य हासिल नहीं हुआ है. इस कथित विकास की बेहोशी से जगने का बस एक ही मूल मंत्र है कि विश्‍व में सह-अस्तित्व की संस्कृति का निर्वहन हो. सह-अस्तित्व का मतलब प्रकृति के अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए मानव विकास करे. इस सिद्धांत को पूरे विश्‍व ने खासतौर पर विकसित देशों ने विकासवाद की अंधी दौड़ में भुला रखा है. वास्तविकता तो यह है कि पिछले 18 वर्ष में जैविक ईंधन के जलने की वजह से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 40 प्रतिशत तक बढ. चुका है. पृथ्वी का तापमान 0.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ.ा है. अगर यही स्थिति रही तो वर्ष 2030 तक पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 90 प्रतिशत तक बढ. जायेगी. हिमालय और दूसरे ग्लेशियरों के पिघलने की चिंता जताई जा रही है. वर्ष 1870 के बाद से समुद्री जल स्तर 1.7 मिमी की दर से बढ. रहा है. समुद्री जल स्तर अब तक 20 सेमी के लगभग बढ. चुका है. यदि ऐसा ही होता रहा तो एक दिन मॉरीशस जैसे कुछ देश और कई तटीय शहर डूब जाएंगे.

जलवायु परिवर्तन दुनिया में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है. चेतावनी दी जा रही है कि आने वाले समय में जीवन के लिए आवश्यक चीजें इतनी महंगी हो जायेंगी कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे. यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है. विकासशील देशों में जलवायु चक्र में हो रहे बदलावों का खतरा खाद्यात्र उत्पादन पर पड़ रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे हैं कब बुआई करें और कब फसल काटें. आशंका जताई जा रही है कि तापमान में बढ.ोतरी जारी रही तो खाद्यात्र उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जायेगा. एक नये अमेरिकी अध्ययन में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा साल 2030 तक अफ्रीका में गृह युद्ध होने का खतरा 55 प्रतिशत तक बढ.ा सकता है और अफ्रीका के उप सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती है.

भारतीय पंरपरा में प्रकृति के सह-अस्तित्व पर जोर था, लेकिन, हर कीमत पर विकास की पश्‍चिमी प्रवृत्ति ने हमारे यहां भी ब.डे पैमाने पर पर्यावरण असंतुलन को जन्म दिया है. हमें अपने मॉडल को पुराने सह-अस्तित्व वाले मॉडल की ओर ले जाना होगा. भारत सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह आगामी वर्षों में कार्बन उत्सर्जन में 25 प्रतिशत तक की कमी लाने का प्रयास करेगी. हालांकि यह बेहद मुश्किल लक्ष्य है, लेकिन सामूहिक जिम्मेदारी से इसे जरूर हासिल किया जा सकता है. दरअसल हमें अपनी दिनचर्या में पर्यावरण संरक्षण को शामिल करना होगा. हमें यह संकल्प लेना होगा कि पृथ्वी के संरक्षण के लिए हम जो कर सकतेह हैं, वह करेंगे.

बेमौसम बरसात, गहराता पेयजल संकट, बढ.ती प्राकृतिक आपदाएं, विलुप्त होती प्रजातियां एक बेहद खतरनाक भविष्य की ओर इशारा कर रही हैं. इन दिनों न तो हमें चिड़ियों की चहचहाट सुनाई देती है और न ही हमारे घर के आसपास आसमान में धवल पक्षियों की पंक्तियां ही नजर आती हैं. क्या आपको नहीं लगता कि पिछले दो दशक में हमने अपने पर्यावरण को नाश की ओर धकेला है. तो क्यों न कुछ ऐसा किया जाये कि स्थानीय पक्षियों की आबादी को प्रोत्साहित करने के लिए अपनी छत पर उनके लिए घोंसला बनाये या उनके दाने चुगने और पानी पीने का इंतजाम किया जाये.

प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है उतना ही हमारी भावी पीढयों का भी, जब हम अपने पूर्वजों के लगाये वृक्षों के फल खाते हैं, उनकी संजोई धरोहर का उपभोग करते हैं, तो हमारा नैतिक दायित्व है कि हम भविष्य के लिए भी नैसर्गिक संसाधनों को सुरक्षित छोड़ जायें, कम-से-कम अपने निहित स्वाथरें के लिए उनका दुरुपयोग तो न करें. अन्यथा भावी पीढ.ी और प्रकृति हमें कभी माफ नहीं करेगी. इसलिए आज ही और इसी वक्त संकल्प लें कि पृथ्वी को संरक्षण देने के लिए जो हम कर सकेंगे करेंगे और जो नहीं जानते उन्हें इससे अवगत कराएंगे या फिर अपने परिवेश में इसके विषय में जागरूकता फैलाने के लिए प्रयास करेंगे.
प्रभातखबर में 22/04/12 को प्रकाशित 


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Tuesday, April 17, 2012

जल संकट -संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट

प्रभात खबर लेख 
जल संकट की बड़ी आहट

।। शशांक द्विवेदी ।।
(
एसएमइ कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर)
पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने विश्व के सभी देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि पानी की बर्बादी को जल्द नहीं रोका गया तो जल्दी ही विश्व गंभीर जलसंकट से गुजरेगा. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य में अनेक बड़ी चुनौतियां, मसलन गरीब तबके को स्वच्छ जल और साफ-सफाई की सुविधा मुहैया कराना, विश्व आबादी को खाद्यान्न उपलब्ध कराना, भूमंडलीय तापमान में वृद्धि के दुष्प्रभाव आदि पूरे विश्व के सामने खड़ी हैं.
इन समस्याओं और चुनौतियों से निपटना हर देश की प्राथमिकता में सबसे ऊपर होना चाहिए, क्योंकि वर्ष 2050 तक विश्व की आबादी मौजूदा सात अरब से बढ़कर नौ अरब हो जाने की उम्मीद है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने इस रिपोर्ट में कहा है, कृषि की बढ़ती जरूरतों, खाद्यान उत्पादन, उर्जा उपभोग, प्रदूषण और जल प्रबंधन की कमजोरियों की वजह से स्वच्छ जल पर दबाव बढ़ रहा है.पर्यावरणीय प्रदूषण आज विश्वव्यापी समस्या बन चुका है और भारत भी उससे अछूता नहीं है. इस क्रम में जल प्रदूषण को लेकर सबसे ज्यादा चिंता जतायी जा रही है. आने वाले समय में जहां स्वच्छ पेय जल की कमी को लेकर विश्वयुद्ध की संभावना जतायी जा रही है, तो दूसरी ओर जो जल हमारे पास उपलब्ध है, उसे प्रदूषित किया जा रहा है.
दुनिया में तकरीबन 20 फीसदी लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है और 40 फीसदी लोग सफाई की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. इन वंचितों में से आधे से ज्यादा लोग चीन या भारत में हैं. दुनिया में एक अरब 10 करोड़ लोग पीने के साफ पानी से अब भी वंचित हैं.इसके अलावा दो अरब 60 करोड़ लोगों को साफ-सफाई की मूलभूत सुविधाएं हासिल नहीं हैं. भारत में विश्व की लगभग 16 प्रतिशत आबादी निवास करती है. लेकिन, उसके लिए 4 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है. जल संकट आज देश के कई हिस्सों में विकराल रूप धारण कर चुका है. जल संरक्षण से हम इस समस्या से काफी हद तक निजात पा सकते है. कहावत है बूंद-बूंद से सागर भरता है, यदि इस कहावत को अक्षरश: सत्य माना जाए तो छोटे-छोटे प्रयास एक दिन काफी बड़े समाधान में परिवर्तित हो सकते हैं. वर्षा जल संग्रहण इस दृष्टि से पानी संरक्षण का सबसे नायाब और असरदार तरीका है. यदि पानी का संरक्षण एक दिन शहरी नागरिकों के लिए अहम मुद्दा बनता है, तो निश्चित ही इसमें तमिलनाडु का नाम सबसे आगे होगा. लंबे समय से तमिलनाडु में नए मकानों की छतों पर वर्षा जल के संरक्षण के लिए इंतजाम करना आवश्यक है, पर पिछले कुछ सालों से गंभीर सूखे से जूझने के बाद अब तीन महीनों के अंदर सारे शहरी मकानों और भवनों की छतों पर वर्षा जल संरक्षण संयंत्रों (वजस) को लगाना अनिवार्य कर दिया गया है.
नौकरशाहों को वर्षा जल संरक्षण संयंत्रो को प्राथमिकता बनाने के लिए कहा गया. कई ऐसे उदाहरण है जिनसे आम आदमी को थोड़ा पैसा और थोड़ा प्रयास लगा कर इस काम को करने की प्रेरणा मिलती है. इन कामों के लिए किसी भी सहायता या निगरानी की जरूरत नहीं है और न ही नदियों को जोड़ने जैसी बृहद परियोजनाओं की.
इन बड़ी परियोजनाओं को पूरा करने में समय लगता है, पैसा लगता है और साथ में भारी पर्यावरणीय, राजनीतिक और तकनीकी क्षतियां हो सकती हैं. इन सब कामों में ठेकेदारों के मिले होने की वजह से भ्रष्टाचार फैलता है. नयी पीढ़ी को ये अहसास नहीं कि पानी हमारे लिए प्रकृति की एक अमूल्य भेंट है.
सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे हर नागरिक को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराए, लेकिन वे इसके लिए सजग नहीं. भारत में पेयजल संकट बढ़ती आबादी और कृषि की जरूरतों के कारण भी गंभीर होता जा रहा है. करीब 65-70 प्रतिशत जल कृषि कार्यो में खप जाता है.
इसके अतिरिक्त उद्योगों के संचालन में भी जल का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. विडंबना यह है कि न तो उद्योग एवं कृषि क्षेत्र को अपनी आवश्यकता भर पानी उपलब्ध हो पा रहा है और न ही आम आदमी को.
आज जब जल संकट का विकट दौर चल रहा है, तो हमें यह समझना होगा कि जल का कोई विकल्प नहीं है, मानव का अस्तित्व जल पर ही निर्भर है, जल सृष्टि का मूल आधार है, जल है तो खाद्यान्न है, जल है तो वनस्पतियां हैं, जल का कोई विकल्प नहीं है, जल संरक्षण से ही पर्यावरण संरक्षण है, जल का पुर्भरण करना ही जल का उत्पादन करना है . इसलिए हमें जल संकट ही इस आहट को पहचानना होगा और इसके लिए सतत प्रयास करने होंगे.
प्रभातखबर में 14/04/12 को प्रकाशित 
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