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Thursday, December 19, 2013

कितने दूर -कितने पास

  
हम कितने दूर है ,कितने पास है
इसका न तुम्हे एहसास है ,न मुझे एहसास है ,
किसी क्षण में तो हम इतना दूर चले जाते है ,
कि लगता है पास ही न आ पायेंगे
और किसी क्षण में हम इतना पास हो जाते है
कि लगता है कभी दूर ही न जा पायेगें,
प्रति क्षण बदलता रहता है इस नजदीकी और दूरी का एहसास
कभी –कभी कितना दूर होकर भी पास होतें है हम ,
और कभी –कभी कितना पास होकर भी दूर रहतें है हम ,
नजदीकी और दूरी के इस पेंडुलम में हम झूलते ही रहते है
कभी नजदीकी ज्यादा होती है कभी दूरी ज्यादा होती है

 प्यार और नफरत की पूरकता

जिंदगी किताब नहीं होती
जिंदगी “जिंदगी “होती है
तभी तो प्यार में नफरत
और नफरत में प्यार
दोनों का एहसास साथ रहता है
कोई एक हमेशा ही प्रभावी रहता है
तभी तो जिंदगी की दूरी में भी नजदीकी
और नजदीकी में भी दूरी का एहसास साथ रहता है हमेशा
दोनों पूरक है एक दूसरे के
एक के न होने का मतलब दूसरे का होना है
हम कितनी भी दूर हो लें
फिर भी पास आ जातें है
और कितना भी पास हो ले दूर चले जाते है
स्वरचित -शशांक द्विवेदी 

(संपादक ,विज्ञानपीडिया डाट  कॉम)

स्वराज्य और रामराज्य !!!

हम स्वराज्य लायेंगे ,
हम रामराज्य लायेंगे ,
लेकिन जब वो आये थे तो न स्वराज्य दिखा ,न रामराज्य दिखा
तब सिर्फ स्वार्थ राज्य दिखा
“सौगंध राम की खातें है हम मंदिर वहीं बनायेंगें “,
नारा लगता था उस समय
लेकिन जब सत्ता मिली तब न सौगंध याद आयी न मंदिर याद आया
अब चुनाव आने वाले है
अब सौगंध भी याद आ गयी
मंदिर भी याद आ गया ,
अब नारे भी याद आने लगे ,
सारी याददाश्त वापस आ गयी चुनाव में ,
राम मंदिर और राम राज्य याद आ जाते है चुनाव में ,
चुनाव तक “राम “ का नाम ही चलता है ,
मुँह से राम का नाम ही निकलता है
गरीब और अमीर सबको “राम “ की याद दिलाएंगे
गरीब को बताएँगे कि “राम “ बड़ा है रोटी से
“राम “ को ही लायेंगे
तब सिर्फ “राम “ ही पहनना और “राम “ ही खाना
सब कुछ “राम मय“ हो जाएगा
अमीर तो राम की सौगंध पहले ही खाते थे
अब गरीब भी खाने लगा ,
“राम “ पहले अमीर के ही थे
अब गरीब के भी हो गये
रोटी से पहले “राम “ आ गया
चुनाव आ गया ....


स्वरचित -शशांक द्विवेदी 

Thursday, November 14, 2013

शैतानी करना अच्छा लगता है ...

शशांक द्विवेदी
मेरी बेटी आन्या जबर्दस्त शैतान है ,तोड़ -फोड़ उथल पुथल मचाये रहती है .कल रात में मैंने उससे कहा कि इतनी शैतानी क्यों करती हो तो उसने कहा शैतानी करना अच्छा लगता है ...फिर बोली कि पापा आप गंदे हो आप मुझे मारते हो (जबकि मैं रेयर ही उसे मारता हूँ ) ,उसकी बात सुनकर मै चौक गया क्योंकि मैंने उस समय या कई  दिन पहले तक तो उसे मारा भी नहीं था ..उसकी बात मुझे दिल में लग गयी ,कल रात में ठीक से नींद नहीं आयी ,बेचैनी बनी रही ,उसके शब्द मेरे दिमाग में चलते रहें फिर मैंने इन्ही पर एक कविता लिख डाली ...
मेरी प्यारी सी बेटी आन्या को समर्पित
शैतानी करोगी ?
हाँ करूंगी
क्यों करोगी
क्योंकि शैतानी करना अच्छा लगता है ,
खेलना -कूदना ,गिरना और उठना अच्छा लगता है ,
पानी में भीगना ,पानी से खेलना अच्छा लगता है ,
मिट्टी खाना ,मिट्टी से खेलना और मिट्टी के घर बनाना अच्छा लगता है,
रोज नयें कपडें पहनना ,फिर उन्हें गंदा करना
उन पर खूब धूल मिट्टी लगाना अच्छा लगता है,
सामान तोडना ,फोड़ना,गिराना अच्छा लगता है ,
किसी भी काम के लिए ,किसी भी चीज के लिए जिद करना और उसे मनवाना अच्छा लगता है,
रोना और खूब रोना ,जम कर रोना ,हंगामा करना अच्छा लगता है,
खाने से ज्यादा दूध ,आइसक्रीम ,टॉफी,चॉकलेट ,चिप्स ,कुरकुरे अच्छा लगता है,
ठंडी में भी आइसक्रीम की जिद करना अच्छा लगता है ,
खिलौनों के साथ थोड़ी देर खेलना फिर उन्हें तोड़ -फोड़ देना अच्छा लगता है,
मम्मी -पापा को खूब छकाना ,चिढ़ाना और परेशान करना अच्छा लगता है ,
पड़ोस के बच्चों के साथ खेलना और हुडदंग मचाना अच्छा लगता है ,
हर समय ,हर हाल में खुश रहना अच्छा लगता है ,
नई चीज को छूना ,उसके बारे में जानने की जिज्ञासा रखना अच्छा लगता है ,
हँसना भी अच्छा लगता है और रोना भी अच्छा लगता है ,
मम्मी -पापा की पिटाई के बाद भी शैतानी करना अच्छा लगता है ,
ये दुनियाँ बच्चों को जो कुछ भी नहीं करने देना चाहती
वो सब कुछ करना अच्छा लगता है ,
हजारों बंदिशों के बाद भी शैतानी करना अच्छा लगता है...





Saturday, November 9, 2013

नेशनल दुनियाँ के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरी कविता .

नेशनल दुनियाँ के संपादकीय पेज पर आज मेरी कविता ...जब भी मेरी कवियायें प्रकाशित होती है बहुत ज्यादा खुशी महसूस होती है क्योंकि कवितायेँ मेरे दिल के ज्यादा करीब लगती है ....
1 "जीवन "

न खुद को जान सका 
न पहचान सका                     
बस बहता ही रहा 
जीवन की इस अविरल धारा में 
जीवन को देखा बहुत 
समझा बहुत 
पर बदल न सका 
अपने आप को 
बहता ही रहा 
पर किनारा न मिला 
पर मिलता भी कैसे ?
जब कोई किनारा ही न था 
बहते हुए भी 
सँभल न सका 
बस डूबता ही गया 
जीवन के इस अंतर्मन में 
पर ,जब डूबा तो ऐसा डूबा 
इस अंतर्मन में 
इस चेतना में कि 
फिर लगा कि 
डूबना ही जीवन है 
क्योंकि फिर कोई ,
आस नहीं ,साँस नहीं 
बस जीवन ही जीवन 
जो अनंत है 
अविकार है 
वहाँ न तुम हो 
न "मैं "हूँ 
सब एक है ....

2 अकेलापन 

दो पाटों के बीच
पिसता है आदमी
एक तरफ है
उसका परिवार यानि वो और उसकी पत्नी
दुसरी तरफ है
बूढ़े माँ –बाप का परिवार
उम्मीदें बहुत है दोनों तरफ
आवश्यकताएं बहुत है दोनों तरफ
आदमी सिर्फ एक है
बीच में
अंतर्द्वंद है मन में क्या करें
और क्या न करें
कैसे संतुलन बैठाएं
पत्नी और माता –पिता के बीच
क्योंकि एक के साथ
होनें का मतलब
दूसरें के साथ न होना है
वो बेटा बनें या पति
दोनों भूमिकाएं विपरीत है
एक दूसरे के
परिवारों के साथ इस द्वन्द में
उसकी भावनाओं को
उसकी सोच को
कौन समझेगा ?
वो तो सिर्फ बेचारा है
अकेला है
और लगता है कि
अकेला ही रहेगा ..

@शशांक द्विवेदी 
Poem Link







Monday, August 12, 2013

नेशनल दुनिया के संपादकीय पेज पर मेरी कवितायेँ ..

आज के नेशनल दुनिया के संपादकीय पेज पर मेरी कवितायेँ .. लेख लिखने और छपने से कई गुना ज्यादा ख़ुशी होती है कवितायेँ लिखते और छपते समय .कवितायेँ मेरे दिल के बहुत ज्यादा करीब है ..आज काफी ख़ुशी हो रही है ..

poem link
http://www.nationalduniya.com/Admin/data/2013/08/10/Delhi/Delhi/images/page10_07.gif

Monday, April 29, 2013

दो पाटों के बीच पिसता है "आदमी"

अधिकांश लोगों के जिंदगी से जुड़ी मेरी यह कविता 

दो पाटों के बीच 
पिसता है आदमी 
एक तरफ है 
उसका परिवार यानि वो और उसकी पत्नी 
दुसरी तरफ है 
बूढ़े माँ –बाप का परिवार 
उम्मीदें बहुत है दोनों तरफ 
आवश्यकताएं बहुत है दोनों तरफ 
आदमी सिर्फ एक है 
बीच में
अंतर्द्वंद है मन में क्या करें
और क्या न करें
कैसे संतुलन बैठाएं
पत्नी और माता –पिता के बीच
क्योंकि एक के साथ
होनें का मतलब
दूसरें के साथ न होना है
वो बेटा बनें या पति
दोनों भूमिकाएं विपरीत है
एक दूसरे के
परिवारों के साथ इस द्वन्द में
उसकी भावनाओं को
उसकी सोच को
कौन समझेगा ?
वो तो सिर्फ बेचारा है
अकेला है
और लगता है कि
अकेला ही रहेगा ..
स्वरचित – © शशांक द्विवेदी

Tuesday, April 16, 2013

“पुत्रीवती भव” का आशीर्वाद !!!- एक कविता


1 “पुत्रीवती भव” का आशीर्वाद !!!
“पुत्रीवती भव” का आशीर्वाद क्या कोई देता है ?
या किसी ने दिया है पुरातन ,सनातन समाज में
क्या “पुत्रीवती भव” शब्द चलन में है या पहले कभी था ,
पुत्र की श्रेष्ठता का ज्ञान बघारते
धर्मों ने ग्रंथो ने
जितना नुकसान किया है
अन्याय किया है
बेटी के साथ
पुत्री के साथ
उतना शायद किसी ने नहीं किया
“देवी “ सिर्फ मंदिरों में पूजी जाती है
लेकिन घरों में नही
घर में तो “देवी “
एक बोझ है
पुत्री की श्रेष्ठता हमेशा
सवालों में थी और है
जबकि पुत्र तो
जन्म से ही श्रेष्ठ है
वंश बढ़ाने वाला है
मोक्ष भी दिलाने वाला है
यही सार तत्व है
ग्रंथो का धर्मों का
यही सत्य सदियों से
चला आ रहा है
इस समाज में जहाँ
सिर्फ “पुत्रवती भाव “
की परंपरा रही है
और शायद रहेगी भी
क्योंकि देवी तो चाँद मंदिरों में है
जबकि घर में तो पुत्र ही श्रेष्ठ है ...
काश ! लड़का हो जाता
“पुत्रवती भव”
के आशीर्वाद के बीच
जब पुत्री का जन्म होता है
एक सन्नाटा सा पसर जाता है
मन के भीतर
और मन के बाहर भी
लगता है जैसे
सर पर कोई बोझ आ गिरा
या कोई “पराया “
जबरन परिवार में घुस आया
जिसे निकाल नहीं सकते
पालना ही होगा मजबूरी में
चेहरे पर कृत्रिम हँसी
भी दिखानी है परिवार को ,समाज को
लेकिन दिल तो रो रहा है
एक टीस है
दिल में दिमाग में
कि ये क्या हो गया
काश ! आशीर्वाद लग जाता
काश ! लड़का हो जाता
ये दर्द संभलता नहीं है
छलकता है कई बार
मन में ,चेहरे पर
लेकिन फिर विकल्प दिखता है
अगले प्रयास में
कि शायद
अब “पुत्रवती भव” का आशीर्वाद फलेगा ...  
 क्या बेटी माँगा है
क्या ‘ भगवान ’ से बेटी माँगा है
क्या मंदिरों में बेटी माँगा है
क्या बेटी पाने के लिए अनुष्ठान किये है 
“ नही ”...कभी नहीं
क्योंकि बेटी तो आती है बिन माँगें
और “ बेटे “के सौभाग्य के लिए
करना पड़ता है भगवान से फ़रियाद
लड़का कीमती है तभी तो उसके लिए
मंदिर जाते है ,अनुष्ठान करतें है
जो करना पड़े वो सब कुछ करते है ,
क्योंकि वो तो वंश चलाएगा
वही तो वंश बढ़ाएगा
परिवार का अस्तित्व सुरक्षित रखेगा
इसीलिये तो लड़का सौभाग्य
और लड़की दुर्भाग्य !!
बोझ और पुरस्कार
बाप का दर्द बढ़ता है
जब बेटी बढ़ती है ,जवान होती है
लेकिन उसी बाप की
खुशी बढ़ती है
जब बेटा बढ़ता है
जवान होता है
ये दो मनोदशाएँ है एक बाप की
और समाज की भी
बेटी बोझ और
बेटा पुरस्कार नजर आता है
बेटी की जवानी बोझिल
और वर्जनाओं से भरी हुई
बेटे की जवानी
वर्जनाओं को तोडती हुई
कितना फर्क है सोच का
संस्कार का ,कर्तव्यों का
अपनी ही संतानों के बीच
ये सोच सदियों से है
और शायद सदियों तक रहेगी
लड़की कल भी बोझ थी
और शायद आगे भी बोझ रहेगी !!
बेटे की इच्छा
बेटे की इच्छा होना ठीक है
लेकिन जूनून होना अपराध
ये अन्याय है
उस बेटी के प्रति
जो जन्मी है
बेटे की चाह के बावजूद
वो तो जन्मी है
नियति से ,प्रकृति से
उसका क्या सरोकार
किसी की इच्छाओं से
किसी के जूनून से
वो तो न्याय चाहती है
अपने लिए
अपने अस्तित्व के लिए
अपने जीवन के लिए
पर क्या उसे न्याय मिलेगा
इस दुनियाँ में
जहाँ  सदियों से
पुत्र ही श्रेष्ठ है!!
......
ये जो फर्क दिखता है
बेटे और बेटी के लिए इच्छाओं में
ये फर्क सोच का है
सदियों की सोच का है
पुत्रों की श्रेष्ठता का है
सदैव “पुत्रवती “भव के
आशीर्वाद का है   
जो दिखता है वेदों में ,ग्रंथो में ,धर्मों में भी
जहाँ पुत्र ही श्रेष्ठ है
पुत्र ही विकल्प है
वंश का ,परिवार का
“पुत्रीवती “ का आशीर्वाद
सदियों से चलन में ही नहीं था
नहीं है और शायद आगे भी नहीं होगा ,
इसी इच्छा को सोच को
परिष्कृत किया है हमने
समाज ने
सदियों से
तो आज कैसे बदलेगी
ये परंपरा ,ये सोच
बेटे की इच्छा की
जब तक यही इच्छा
पुष्पित ,पल्लवित होगी
बेटी के साथ
तो अन्याय ही होगा
विचारों के स्तर पर भी
और जीवन के स्तर पर भी !!
 स्वरचित –शशांक द्विवेदी