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Monday, August 26, 2013

प्रियंका द्विवेदी की कवितायें नेशनल दुनियाँ अखबार में

बेटियाँ ही क्यूं
जला दी जाती हैं बेटियाँमार दी जाती हैं बेटियाँ
पैदा होने से पहले और बाद में भी मार दी जाती हैं बेटियाँ
आखिर क्यूं
शादी के लिए और शादी के बाद भी मार दी जाती हैं बेटियां
आखिर क्यूं
हर घंटे हिंसा का शिकार होती है बेटियाँ
घर हो या दफतर या हो कोई भी चैराहा
सरेआम बेपर्दा की जाती हैं बेटियाँ
गरीब हो या अमीर फिर रोती हैं बेटियाँ
सिसकियां भरती हैं बेटियाँ
आखिर क्यूं
क्या नारी होना ही अभिशाप है इस धरा पर
अरे मत भूलों जगत जननी भी होती हंै बेटियाँ
तुम्हारें घर को संभालती हैं बेटियाँ
तुम्हारें घर में चिराग जलाती हैं बेटियाँ
तुम्हारें वंश को आगे बढाती हैं बेटियाँ
तुम्हारें रिश्ते बनाती, तुम्हें मान भी दिलाती हैं बेटियाँ
अपना घर छोड दूसरों की जिंदगी संवारती हैं बेटियाँ

     बचपन 

नटखट और नादान है बचपन
बेखौफ और बेधडक है बचपन
न किसी से डरना और ना धमकना है बचपन
बेखौफ शरारते करता है बचपन
हंसना और बस हंसना है बचपन
मनमरजी शरारतें करता है बचपन
अपनी बातें मनवाता है बचपन
रो रोकर चिल्लाता है बचपन 
अपनी बात पहंुचाता बचपन
नन्हें पैरों से चलना, गिरना फिर गिर कर संभलना है बचपन
गिरकर भी चोट, दर्द का एहसास न होना है बचपन
बस उठो और फिर से करो वही
आखिर क्यूं गिरे न सोचो यही तो है बचपन
कभी पानी तो कभी मिटटी में खेलना यही तो है बचपन
न धूल और ना धूप की गर्मी की चिंता, यही तो है बचपन
पानी में भीगना, अपने को और दूसरों को भीगोना यही तो है बचपन
न ठंड की परवाह न गर्मी का एहसास यही तो है बचपन
कभी रोना और आंखों में आंसू भरना
गले से आवाज निकालना और चिल्लाना यहीं तो है बचपन
न अपने और न पराए का भेद यही तो है बचपन
सब कुछ देना सब कुछ लेना है बचपन
न जात, न पात की समझ, यही तो है नादान बचपन
लेखिका
प्रियंका द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार

वर्तमान में देश की प्रमुख पत्र पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन
कविता link 

Sunday, May 6, 2012

गरीब की कौन सुनेगा ?


गरीबों की बढ़ती संख्या
शशांक द्विवेदी ,दैनिक जागरण में 6/05/12 को प्रकाशित
राष्ट्रीय नमूना सर्वे संगठन की ताजा रिपोर्ट ने देश के कथित विकास पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। वास्तव में इस देश में विकास कौन कर रहा है? अमीर और अमीर होते जा रहें है जबकि महंगाई ने तो गरीब की कमर ही तोड़ दी है। इस वजह से उसके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मुश्किल हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में आठ करोड़ लोग रोजाना पंद्रह रुपये या उससे कम पर गुजारा करने को मजबूर हैं। देश की 60 फीसद ग्रामीण आबादी महज 35 रुपये रोजाना पर, जबकि 60 फीसद शहरी आबादी 66 रुपये रोजाना पर गुजारा कर रही है। सरकार और योजना आयोग किन कागजी आंकड़ों के जरिये विकास के दावे करता है यह तो वही जानें, लेकिन असल तस्वीर कुछ और ही है। देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद एक तबके का जबर्दस्त विकास हुआ है, जबकि दूसरा तबका पिछड़ता गया। पहले देश में गिने-चुने ही करोड़पति होते थे, लेकिन अब आंकड़ों की मानें तो एक लाख 53 हजार लोग करोड़पति हैं। देश का सारा पैसा और संसाधन अब इन्हीं लोगों के कब्जे में है, जबकि बाकी लोग किसी तरह अपनी जिंदगी गुजार पा रहें हैं। सबसे खास बात यह है कि यही पैसे वाले लोग इस देश के नीति नियंता हैं। देश और समाज के नीतियों के निर्धारण में गरीबों का कोई योगदान नहीं है। गरीब सिर्फ आंकड़े बनाने या बनने के लिए ही हैं। देश की सड़कों पर नई दौड़ती कारें, लगातार खुलते मॉल और ऐसी ही दूसरी गतिविधियां निश्चित तौर पर विकास की सूचक हैं। पर यह भी सच है कि एक बड़े वर्ग के लिए लिए दो जून की रोटी जुटा पाना अब भी उसके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है। गरीबों और गरीबी का मजाक तो सदियों से उड़ाया जाता रहा है, लेकिन बाकायदा तर्क देकर गरीबी का मजाक उड़ाना तो कोई इस सरकार से सीखे। सरकार के अनुसार देश में गरीबी कम हो रही है। पिछले दिनों योजना आयोग ने इससे संबंधित नए आंकड़े भी जारी किए, जिसके मुताबिक रोजाना 28.65 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है और साल 2009-10 में देश में गरीबी का अनुपात घटकर 29.8 प्रतिशत हो गया है। व्यावहारिक तो यही होगा कि इस तरह की रिपोर्ट बनाने वाले सभी योजना आयोग के सदस्यों को 860 रुपये देकर कहा जाए कि आप सब लोग इन रुपयों पर कम से कम एक महीना गुजर-बसर करके दिखाएं। अगर संभव हो तो इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष को भी ऐसा करने को कहा जाए। तब इन लोगों को समझ में आएगा कि रिपोर्ट बनाना और वास्तविक जीवन जीने में कितना फर्क है। इस पर क्यों कोई आयोग रिपोर्ट नहीं देता कि हमारे देश का कितना काला धन देश के बाहर है और उसे कैसे देश में लाएं? सिर्फ गरीब और गरीबी के आंकड़ो के लिए ही क्यों इस तरह के आयोग बनते हैं जो सही रिपोर्ट तक नहीं देते। आज भारत विश्व की चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था है जो लगभग हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा है। हमारी क्षमता का लोहा सारी दुनिया मान रही है, लेकिन इसके बावजूद भारत गरीब देशों में शुमार है। भारत जैसे विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है कि इसका उन्मूलन किया जाए। देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस गंभीर समस्या की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित हो। विश्व की कई संस्थाएं, विश्व बैंक आदि भी निर्धनता दूर करने के लिए काफी मदद करती हैं, लेकिन वह मदद भ्रष्टाचार के कारण गरीबों तक नहीं पहुंचती। भारत के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है कि इसका उन्मूलन किया जाए
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) राष्ट्रीय नमूना सर्वे की रिपोर्ट पर शशांक द्विवेदी की टिप्पणी
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Sunday, April 22, 2012

पृथ्वी दिवस पर विशेष


पृथ्वी पर गहराता खतरा

हाल के दिनों में इंडोनेशिया में 8.7 तीव्रता का भूकंप आया और भारत में भी सुनामी आने की चेतावनी दी गई थी। पर सौभाग्य से ये बड़ा खतरा टल गया, लेकिन पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस तरह के बड़े खतरे मसलन भूकंप, बाढ़, बर्फबारी, सुनामी आदि कब तक टलते रहेंगे। पूरी दुनियां जिस तरह कथित विकास की दौड़ में अंधी हो चुकी है उसे देखकर तो यही लगता है कि आज नहीं तो कल मानव सभ्यता का विनाश निश्चित है। प्राकृतिक आपदाओं का आना और उनका टलना हमें बार-बार चेतावनी दे रहा है कि अभी भी समय है और हम अपनी बेहोशी से जाग जाएं अन्यथा बड़ा विनाश सुनिश्चित है। इस संदर्भ में 22 अप्रैल, 1970 में धरती को बचाने की मुहिम अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन द्वारा पृथ्वी दिवस के रूप में शुरू की गई, लेकिन वर्तमान में यह दिवस सिर्फ आयोजनों तक सीमित रह गया है। जलवायु परिवर्तन दुनिया में अन्न के पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है। अब जलवायु चक्र का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ रहा है। किसान तय नहीं कर पा रहे हैं कि कब बुवाई करें और कब फसल काटें। तापमान में बढ़ोतरी जारी रही तो खाद्य उत्पादन 40 प्रतिशत तक घट जाएगा जिसे दुनिया में खाद्यान्नों की भारी कमी हो जाएगी। ऐसी स्थिति विश्व युद्ध से कम खतरनाक नहीं होगी। एक अमेरिकी अध्ययन में दावा किया गया है कि तापमान में एक डिग्री तक का इजाफा वर्ष 2030 तक अफ्रीकी सिविल वार के खतरे को 55 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है। इससे अकेले अफ्रीका के उप-सहारा इलाके में युद्ध भड़कने से 3 लाख 90 हजार मौतें हो सकती हैं। आइपीसीसी की मानें तो1950 के बाद से हिमालय के करीब 2000 ग्लेशियर पिघल चुके हैं। परंतु इन मुद्दों पर सरकार द्वारा कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है। वास्तव में पर्यावरण सरंक्षण का मुद्दा पार्टियों के राजनीतिक एजेंडे में ही शामिल नहीं है, जबकि यह हमारे अस्तित्व का सवाल है। जलवायु परिवर्तन पलायन की बडी वजह भी बनने जा रहा है। इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन की मानें तो 2050 तक तकरीबन 20 करोड लोगों का पलायन जलवायु परिवर्तन की वजह से होगा। वहीं कुछ और संगठनों का मानना है कि 2050 तक यह संख्या 70 करोड तक हो सकती है, क्योंकि 2050 तक दुनिया की आबादी बढ़कर 9 अरब तक पहुंचने का अनुमान है। जाहिर है दुनिया की कुल आबादी में से आठ फीसदी लोग प्रदूषण की वजह से पलायन की मार झेल रहे होंगे। एशियाई विकास बैंक के मुताबिक अगले 25 वर्षो में एशिया में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तीन गुना बढ़ सकता है। इसके अलावा भारत और चीन के ग्लेशियर पिघलने से इनके सामने पीने के पानी का संकट खड़ा हो सकता है। अब हर साल औसतन 500 आपदाएं आती हैं जिनकी सख्या 20 साल पहले 120 के आसपास थी। दुनिया पूंजीवाद के पीछे इस तरह से भाग रही है कि उसे तथाकथित विकास के अलावा कुछ और दिख नही रहा है। वास्तव में जिसे विकास समझा जा रहा है वह विकास है ही नहीं? क्या सिर्फ औद्योगिक उत्पादन में बढ़ोतरी को विकास माना जा सकता है? वास्तव में प्रकृति का संरक्षण ऐसा ही है जैसे अपने जीवन की रक्षा करने का संकल्प। पर्यावरण सुरक्षा तो हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर होना चाहिए। यह सामुदायिक के साथ-साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी है। इस कथित विकास की बेहोशी से जगने का बस एक ही मूल मंत्र है कि विश्व में सह अस्तित्व की संस्कृति का निर्वहन हो। सह अस्तित्व का मतलब प्रकृति के अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए मानव विकास करे। प्रकृति और मानव दोनों का ही अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का क्षय न हो ऐसा संकल्प किया जाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं पर शशांक द्विवेदी के विचार पृथ्वी पर गहराता खतरा,दैनिक जागरण 22/04/12 को प्रकाशित 

dainik jagran artilce link (पृथ्वी पर गहराता खतरा )







Sunday, April 15, 2012

जल संकट की आहट

जल संकट की आहट
जल संबंधी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए जल संसाधन मंत्रालय ने इस वर्ष से भारत जल सप्ताह को अंतरराष्ट्रीय आयोजन के रूप में मनाने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य जल संबंधी मुद्दों को वैश्विक समस्या के रूप में मंच दिलाना है। यह कार्यक्रम इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सभी संबंधित मंत्रालय जैसे कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, उद्योग मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, पर्यावरण और वन मंत्रालय तथा योजना आयोग के साथ-साथ राच्य सरकारें तथा जल संसाधन परियोजना संभालने वाले इकाइयों के प्रतिनिधि भी इसमें भाग ले रहे हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मुताबिक जल संसाधनों की योजना, विकास और प्रबंधन का बहुत महत्व है। देश में इस समय जो सांस्थानिक और वैधानिक ढांचा मौजूद है वह पर्याप्त नहीं है जिसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है पर सवाल उठता है कि ये सुधार कब और कैसे होंगे? प्रधानमंत्री ने जल संकट से संबंधित जितनी भी गंभीर समस्याए बताई उनके समाधान के लिए सरकार तत्काल क्या कदम उठाने जा रही है इस पर कोई घोषणा नहीं की गई। जल संसाधन मंत्री पवन बंसल अब कह रहें है कि राष्ट्रीय जल नीति इसी माह तैयार हो जाएगी। आखिर अभी तक देश के लिए ठोस और सार्थक जल नीति क्यों नहीं तैयार कर पाए जबकि पिछले दिनों ही जल संकट पर फ्रांस में संपन्न हुए सम्मलेन में संयुक्त राष्ट्र संघ ने गंभीर चेतावनी देते हुए कहा था कि विश्व के अनेक हिस्सों में पानी की भारी समस्या है और इसकी बर्बादी नहीं रोकी गई तो स्थिति और विकराल हो जाएगी, क्योंकि भोजन की मांग और जलवायु परिवर्तन की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक कृषि की बढ़ती जरूरतों, खाद्यान्न उत्पादन, ऊर्जा उपभोग, प्रदूषण और जल प्रबंधन की कमजोरियों की वजह से स्वच्छ जल पर दबाव बढ़ रहा है। दुनिया में तकरीबन 20 फीसदी लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है और 40 फीसदी लोग सफाई की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। इन वंचितों में से आधे से ज्यादा लोग चीन या भारत में हैं। एक अरब 10 करोड़ लोग पीने के साफ पानी से वंचित हैं। इसके अलावा दो अरब 60 करोड़ लोगों को साफ-सफाई की मूलभूत सुविधाएं हासिल नहीं हैं। वास्तव में भूजल के अंधाधुंध दोहन से जल की उपलब्धता में भारी कमी आई है। जिसे देखते हुए मनचाहा भूजल निकालने की छूट को नियंत्रित करना होगा। विश्व की 17 प्रतिशत आबादी भारत में है, लेकिन पीने योग्य पेयजल मात्र चार प्रतिशत है। भारत में बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण ने जल की आपूर्ति और मांग के अंतर को बढ़ा दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण भी देश के जल चक्र को खतरा पैदा हो सकता है। बेंगलूरू, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई आदि में अभी से पानी की किल्लत होने लगी है। दूसरी तरफ गांवों में 90 प्रतिशत आबादी पेयजल के लिए भूजल पर आश्रित है। कृषि के लिए भूजल के बढ़ते दोहन से भी गांवों में पीने के पानी का संकट बढ़ रहा है। दुनिया के ज्यादातर इलाकों में पानी की गुणवत्ता में कमी आ रही है और साफ पानी में रहने वाले जीवों की प्रजातियों की विविधता और पारिस्थितिकी को तेजी से नुकसान पहुंच रहा है। वन क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने, नदियों-जलाशयों के प्रदूषित होने और बिगड़ते पारिस्थितिकी संतुलन को लेकर काफी समय से चिंता जताई जा रही है। कई बड़े शहरों में तालाबों के सूख जाने की स्थिति में उनके रखरखाव की पहल करने की बजाय उन पर रिहाइशी कालोनियां या व्यावसायिक परिसर बना दिए गए हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ वर्षा जल संचयन पर बल दे रहे हैं। अगर तालाबों और झीलों जैसे पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण-संवर्धन की बजाय उन पर कंक्रीट के जंगल खड़े होते गए तो इस संकट से निपटने की उम्मीद हम कैसे कर सकते हैं? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) भारत में पेयजल की गहराती समस्या पर शशांक द्विवेदी के विचार जल संकट की आहट दैनिक जागरण (राष्ट्रीय ) में 15/04/2012 को प्रकाशित 
Article link is
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-04-15&pageno=8#id=111738048571170136_49_2012-04-15

Monday, April 9, 2012

अर्थ आवर


पृथ्वी को बचाने का संकल्प

अर्थ ऑवर यानी दुनिया में पृथ्वी को बचाने की एक छोटी-सी कोशिश, जिसमें लगभग 100 देश और 6000 शहर जुड़ चुके हैं। 2007 में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर से अर्थ ऑवर की शुरुआत हुई। कुछ लोगों को ख्याल आया कि कम से कम एक घंटे के लिए ही हम ऊर्जा की बेतहाशा खपत पर लगाम लगाएं। कुछ लोगों की यह कोशिश आज पूरे विश्व में एक सकारात्मक अभियान का हिस्सा है। पहली बार 2007 में 22 लाख घरों और उद्योगों ने एक घंटे के लिए अपनी लाइटें बंद कर दीं। जब हम घरों की बत्ती बुझाते हैं तो हम समाज और दुनिया को बेहतर बनाने के आंदोलन का अहम हिस्सा बन जाते हैं। व‌र्ल्डवाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) द्वारा शुरू किए गए अर्थ ऑवर अभियान में दुनिया के पांच करोड़ से ज्यादा लोग पर्यावरण के प्रति चिंता जाहिर करते हुए एक घंटे के लिए इसका हिस्सा बन रहे हैं। तबसे हर साल मार्च के आखिरी शनिवार को अर्थ ऑवर मनाया जाता है। एक शहर से शुरू हुई इस अनोखी पहल में शनिवार को दुनिया के सैकड़ों शहर शामिल होंगे। एक घंटे के लिए ये शहर इस उम्मीद में अंधेरे में डूब जाते हैं कि आने वाली पीढि़यों को उर्जा संकट और ग्लोबल वार्मिंग का कहर न झेलना पड़े। अपने देश को पूर्ण रूप से विकसित करने के लिए हमें विकसित देशों से सीख लेने की आवश्योकता है। उर्जा बचत में हम सबका सहयोग अत्यंत आवश्यरक है? यदि उर्जा का उपयोग सोचसमझ कर नहीं किया गया तो इसका भंडार जल्द ही समाप्त हो सकता है। अपना भविष्य उज्जवल बनाए रखने के लिए वर्तमान परिस्थितियों में सभी तरह की ऊर्जाओं तथा ईंधन की बचत बेहद आवश्यक है, क्योंकि आज हम बचत करेंगे तो ही भविष्य सुविधाजनक रह पाएगा। बचत चाहे छोटे स्तर पर क्यों न हो, जरूर कारगर होगी क्योंकि बूंद-बूंद से ही सागर भरता है। आज हम संभल कर ऊर्जा के साधनों का इस्तेमाल करेंगे तो ही इनके भंडार भविष्य में बचे रह पाएंगे। वैश्वीकरण के दौर में आज हमारी जीवनशैली में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। ये बदलाव हम इस रूप में भी देख सकते हैं कि जो काम दिन के उजाले में सरलता से हो सकता है, उसे भी हम देर रात तक करते हैं। उदाहरण के लिए क्रिकेट का खेल, विभिन्न सामाजिक समारोह आदि। नियमित व संतुलित दिनचर्या छोड़कर हम ऐसा जीवन जीने के आदी होते जा रहे हैं जो हमें अस्पताल, एक्सरे, ईसीजी, आइसीयू के माध्यम से भयंकर ऊर्जा व्यय में उलझा रहा है। हमारी दिनचर्या दिन प्रतिदिन अधिकाधिक ऊर्जा की मांग करती जा रही है। विकास का जो मॉडल हम अपनाते जा रहे हैं उस दृष्टि से अगली प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में हमें ऊर्जा उत्पादन को लगभग दोगुना करते जाना होगा। पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधन निश्चित हैं। आज प्रकृति के मिट्टी, पत्थर, पानी, खनिज, धातु को भौतिक सुख साधनों में बदलकर उससे विकसित होने का सपना देखा जा रहा है, जिससे अंधाधुंध ऊर्जा खपत बढ़ रही है। इस कथित विकास में इस बात की अनदेखी हो रही है कि प्रकृति में पदार्थ की मात्रा निश्चित है, जो बढ़ाई नहीं जा सकती। फिर भी पदार्थ का रूप बदलकर, सुख साधनों में परिवर्तन करके, खपत बढ़ाकर विकास का रंगीन सपना देखा जा रहा है। इस विकास के चलते संसाधनों का संकट, प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिंग, पानी की कमी, ऊर्जा की व्यापक कमी आदि मुश्किलें सिर पर मंडरा रही हैं। प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है उतना ही हमारी भावी पीढि़यों का भी। जब हम अपने पूर्वजों के लगाए वृक्षों के फल खाते हैं, उनकी संजोई धरोहर का उपभोग करते हैं तो हमारा नैतिक दायित्व है कि हम भविष्य के लिए भी नैसर्गिक संसाधनो को सुरक्षित छोड़ जाएं, अन्यथा भावी पीढ़ी और प्रकृति हमें कभी माफ नहीं करेंगी। इस लिए आज ही और इसी वक्त संकल्प लें कि पृथ्वी को संरक्षण देने के लिए जो हम कर सकेंगे करेंगे और जो नहीं जानते उन्हें इससे अवगत कराएंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) अर्थ ऑवर के प्रयोजन पर शशांक द्विवेदी की टिप्पणी पृथ्वी को बचाने का संकल्प,दैनिक जागरण (राष्ट्रीय ) में 31/03/2012 को प्रकाशित 

विज्ञान और अनुसंधान


                              
विज्ञान की उपेक्षा

मनमोहन सिंह ने 99वें भारतीय विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन अवसर पर कहा था कि विज्ञान को मजबूत बनाना होगा और इसके लिए सरकार शोध और विकास कार्य पर खर्च बढ़ाएगी। इसके लिए अनुसंधान कार्यो पर जीडीपी का दो प्रतिशत खर्च करने का वायदा किया गया, जो फिलहाल 0.9 प्रतिशत है। पिछले दिनों वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा पेश किए गए केंद्रीय बजट में पुरस्कारों सहित वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए 200 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है जो उम्मीद से काफी कम है। पिछले कुछ दशकों में विज्ञान के क्षेत्र में भारत की स्थिति में लगातार गिरावट आई है और चीन जैसे देश आगे निकल रहे हैं। चीन लगातार विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में बजट बढ़ाता रहा है जबकि हमारे यहां सरकार केवल घोषणाओं तक सीमित है। हमारे देश में विज्ञान और अनुसंधान पर चर्चा तभी होती है जब कोई नेता, मंत्री या प्रधानमंत्री उसकी बदहाली पर बोलते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा सालों से होता आ रहा है। विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में आज तक कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बन पाई है। सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए अब इस क्षेत्र को भी निजी क्षेत्र के हवाले करने की सोच रही है, जहां मुनाफाखोरी ही एकमात्र सिद्धांत है। ऐसे में आप विज्ञान और शोध में कितने गुणात्मक सुधार की उम्मीद कर सकते है। देश में वैज्ञानिक अनुसंधान और शोध की दशा व दिशा ठीक नहीं है। आजादी के बाद ऐसा कोई बुनियादी ढांचा विकसित नहीं हो पाया जिससे देश में बड़े पैमाने पर अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जा सके। अधिकांश युवा शोध और अनुसंधान की बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों में जाना चाहते हैं, क्योंकि वहां ज्यादा पैसा मिलता है। स्थिति यह है कि देश में विज्ञान में पीएचडी करने वाली दो हजार महिलाओं में से 60 फीसदी बेरोजगार हैं। इसका परिणाम है कि विज्ञान संकाय के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले में 80 फीसदी तक की कमी आई है। पिछले 50 सालों में देश एक भी ऐसा वैज्ञानिक पैदा नहीं कर पाया जिसकी पूरी दुनिया में पहचान हो। 82 साल पहले सीवी रमन को वर्ष 1930 में भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला था। तब से हम भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों द्वारा अर्जित नोबेल पर ही खुशी मनाते आए हैं। यहां पर एक और प्रश्न महत्वपूर्ण है कि आजादी के समय जब देश में संसाधन कम थे तब हमारे यहां जगदीश चंद्र बोस, नोबल पुरस्कार विजेता सर सीवी रमन, मेघनाद साहा, सत्येंद्र बोस जैसे महान वैज्ञानिक हुए, लेकिन आज जब संसाधनों की कमी नहीं है तो हमारे देश में विज्ञान की स्थिति दयनीय बनी हुई है। देश में जन्मे वैज्ञानिक डॉ. हरगोबिंद खुराना , एस. चंद्रशेखर, अम‌र्त्य सेन और डॉ. वेंकटरामन रामकृष्णन विदेशों में जाकर उत्कृष्ट कार्य के लिए नोबल पुरस्कार प्राप्त करते हैं, लेकिन यहां रहकर नहीं। यहां पर उन्हें बुनियादी सुविधाए उपलब्ध नहीं कराई गई जिस कारण उन्हें बाहर जाना पड़ता है। सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संविदा या लेक्चर के हिसाब से एक पीएचडीधारी शिक्षक को काफी कम वेतन में काम करने को मजबूर होना पड़ता है। शोध छात्रों को सेमीनारों में जाने के लिए छुट्टी या आर्थिक सहायता शायद ही मिल पाती है जिस कारण अंतत: वह अपनी पीएचडी थीसिस बंद करने को मजबूर होते हैं। चढ्ढा कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार कर केंद्र और राज्य सरकारों ने शिक्षकों के वेतन में भारी वृद्धि की है, लेकिन अपने उच्च शिक्षा संस्थानों में कार्यरत गेस्ट शिक्षकों के शोषण को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया। वास्तव में एक युवा पीएचडी का रास्ता या तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जाने के लिए चुनता है या फिर शोध संस्थानों में प्रवेश के लिए। अगर ये दोनों ही रास्ते बंद हों तो फिर शोध की संभावनाएं कैसे बनेंगी? एक तरफ तो हम अपने योग्य शोधार्थियों को लगभग दुत्कार रहे हैं, उनका शोषण कर रहे हैं तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री इसका रोना रो रहे हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) देश में विज्ञान की दयनीय होती स्थिति पर शशांक द्विवेदी के विचार दैनिक जागरण (राष्ट्रीय ) में 8/04/2012 प्रकाशित 

Tuesday, February 14, 2012

कायदा तोड़ने वाले कानून मंत्री


कायदा तोड़ने वाले कानून मंत्री
केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद लगातार चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन कर रहे हैं। आयोग की ताकीद के बावजूद खुर्शीद अल्पसंख्यक आरक्षण संबंधी बयान देते रहे। हद तो तब हो गई, जब उन्होंने कहा कि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जीतती है तो पिछड़े वर्ग के 27 प्रतिशत आरक्षण कोटे में अल्पसंख्यकों का उप-कोटा 4.5 प्रतिशत से बढ़ाकर नौ प्रतिशत कर देगी। इस तरह जब पानी सिर से ऊपर होने लगा तो चुनाव आयोग ने सख्ती दिखाते हुए शनिवार को कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के खिलाफ कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति को पत्र लिखा और तत्काल उनके निर्णायक हस्तक्षेप की मांग की। संभवत: देश के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि कानून मंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति लगातार कानून तोड़ रहा है। शायद यह भी पहली बार ही है, जब चुनाव आयोग को किसी केंद्रीय मंत्री के खिलाफ कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति के पास जाना पड़ा है। इस पूरे प्रकरण को गहराई से देखें तो समझ में आता है कि बिना आलाकमान की मर्जी के कम से कम सलमान खुर्शीद से इस कदर बेलगाम होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वैसे भी जब राष्ट्रपति ने आयोग की शिकायत पर कार्रवाई के लिए गेंद प्रधानमंत्री के पाले में डाल दी है तो वहां से भी कार्रवाई के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। अलबत्ता, कांग्रेस पार्टी ने खुर्शीद के बयानों से यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि किसी को भी संवैधानिक संस्था के नियम-कायदों को दरकिनार नहीं करना चाहिए। जिस तरह से प्रधानमंत्री इस पूरे मसले पर खामोश हैं, इससे तो यही मतलब निकाला जाएगा कि सरकार में अहम पदों पर बैठा आदमी कुछ भी बोले, लेकिन सरकार कुछ नहीं करेगी। सलमान खुर्शीद के बयानों से तो ऐसा लगने लगा है कि वह चुनाव आयोग को कुछ समझते ही नहीं हैं। वह संवैधानिक संस्था की दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं और सरकार तथा कांग्रेस पार्टी उन्हें लगातार सह दे रही है। क्या यह लोकतांत्रिक देश के लिए ठीक है? वास्तव में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की केंद्रीय मंत्री द्वारा अवज्ञा अप्रत्याशित है। उनके अनुचित और गैरकानूनी कृत्य से संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज के बीच नाजुक संतुलन पर दबाव बन गया है। दूसरी ओर पूरा देश इस बात से स्तब्ध है कि आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन पर अफसोस जताने के बजाय कानून मंत्री खुर्शीद ने आक्रामक रुख अपनाया। वास्तव में यह अप्रत्याशित और दुर्भाग्यपूर्ण है। आदर्श आचार संहिता पर सभी राजनीतिक दलों की सहमति है और सुप्रीमकोर्ट की भी मुहर लगी हुई है। बहरहाल, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को लिखे पत्र में आयोग ने कहा है कि इस मोड़ पर तत्काल और निर्णायक हस्तक्षेप के लिए चुनाव आयोग का आपके पास आना आवश्यक और अपरिहार्य है, ताकि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव निष्पक्ष ढंग से संपन्न कराए जा सकें। एक तरह से देश का निर्वाचन आयोग राष्ट्रपति से न्याय की भीख मांग रहा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति कि पहल पर केंद्र सरकार क्या कदम उठाती है। कानून मंत्री सलमान खुर्शीद सिर्फ चुनाव आचार संहिता का ही उल्लंघन नहीं कर रहे हैं, बल्कि अल्पसंख्यक मुस्लिमों और बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच दरार डालने का भी काम कर रहे हैं। पिछले दिनों आजमगढ़ में चुनाव प्रचार के दौरान सलमान खुर्शीद ने कहा कि बाटला हाउस मुठभेड़ की तस्वीरें देखकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की आंखों से आंसू फूट पड़े थे। सवाल यह नहीं है कि सोनिया गांधी रोई थीं या नहीं, बल्कि प्रश्न यह है कि इस मुद्दे को लेकर लोगों की भावनाएं कितनी बार भड़काई जाएंगी। जबकि पिछले दिनों गृहमंत्री पी चिदंबरम ने साफ कर दिया था कि बाटला हाउस मुठभेड़ फर्जी नहीं थी और उसकी दोबारा जांच का सवाल ही नहीं है। फिर भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के मंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह लगातार भड़काऊ बयान दे रहे हैं। कांग्रेस के नेता, मंत्री आजमगढ़ जाकर बार-बार इस मुद्दे पर अल्पसंख्यक मुस्लिमों को जिस प्रकार से गुमराह कर रहे हैं, वह स्तब्ध करने वाला है। क्या इन नेताओं ने कभी शहीद इंस्पेक्टर मोहन शर्मा के घर जाना जरूरी समझा या उनके बारे में कभी कोई सकारात्मक बात की, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी। उनकी इन बातों से देश की सुरक्षा में लगे जवानों का मनोबल तो टूटता ही है, आतंकवादियों के हौसले भी बुलंद होते हैं। एक सवाल और उठता है कि क्या सोनिया गांधी कभी कश्मीरी पंडितों के लिए रोई थीं, जो आज अपने ही कश्मीर में पराए हो गए हैं? क्या संसद पर हमले में शहीद हुए जवानों की तस्वीरों को देखकर उनकी आंखों से आंसू फूटे थे? सच तो यह है कि संसद पर हुए हमले शहीद हुए जवानों के परिजन आज भी दर-दर भटक रहे हैं। उनकी पीड़ा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शहीदों के मेडल तक वापस कर दिए। कांग्रेस अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच भावनाएं भड़काने का जो खेल खेल रही है, वह इस देश के लिए भारी पड़ने वाला है। बार-बार आजमगढ़ जाकर मुस्लिम वोटों की खातिर भावनाएं भड़काना ठीक नहीं है। कांग्रेस आग से खेल रही है, जिसकी बड़ी कीमत इस देश को चुकानी पड़ेगी, क्योंकि इन्ही सब कारणों से ही देश का विभाजन हुआ था। उस समय भी कांग्रेस के ही एक धड़े ने हिंदू और मुसलमानों के बीच भावनाएं भड़काने का काम किया था। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कुख्यात आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन को ओसामा जी और संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को अफजल जी कहकर बुलाते हैं। वह तो यह भी कहते हैं कि मुंबई हमले में संघ का हाथ है और बाटला हाउस मुठभेड़ फर्जी थी। यह सब बातें क्या साबित करती हैं? क्या यह मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति नहीं है? क्या यह मुस्लिम वोटों की खातिर देश को बांटने कि राजनीति नहीं है। देश की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर सोनिया गांधी को देश को जवाब देना होगा कि क्या वह बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद रोई थीं। अगर हां, तो क्यों? अगर नहीं, सलमान खुर्शीद पर शिकंजा क्यों नहीं कसा गया? हालांकि केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद अब अपनी बात से पीछे हटने लगे हैं, लेकिन उनका यह बयान और भाषण तो रिकॉर्ड हो चुका है। कई बार न्यूज चैनलों ने दिखाया और सुनाया है। तब वह पीछे कैसे हट सकते हैं? अपनी ही बात को गलत साबित कैसे कर सकते हैं? सलमान खुर्शीद जो बार-बार अपना बयान बदल रहे हैं, इसमें भी बड़ी साजिश और दबाव नजर आता है, जबकि इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री शरद पवार भी कह रहे हैं कि सरकार के दो मंत्रियों के बीच इस मुद्दे पर मतभेद और अलग-अलग बयानबाजी चिंताजनक है। सियासी रणनीति के तहत बाटला हाउस घटना को लेकर कांग्रेस और सरकार दोमुंही बातें कर रही है, जो देश को अस्वीकार्य है। ऐसा खेल बंद होना चाहिए। अगर सलमान खुर्शीद या दिग्विजय राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ कर रहे हैं तो प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी को चाहिए कि वे उन्हें मंत्री और पार्टी के महत्वपूर्ण पद से तुरंत इस्तीफा देने कहें या बर्खास्त करें। कांग्रेस पार्टी बार-बार इस मुद्दे को उछालकर क्या साबित करना चाहती है। देश में पंथनिरपेक्षता का डंका पीटने वाली कांग्रेस पार्टी क्या वास्तव में पंथनिरपेक्ष है या यह सिर्फ महज दिखावा है। देश की सुरक्षा से जुड़े इतने संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को देश को जवाब देना होगा। शशांक द्विवेदी  (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण )में १४ /०२/२०१२ को प्रकाशित