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Saturday, July 13, 2019

सही खाना क्या है?भोजन और पोषण दोनों अलग चीजें हैं !!

खाना सही तो बीमारी नहीं
Complete Nutrition Guide

तनदुरुस्त रहने के लिए हमारे भोजन में विटामिन्स और मिनरल्स का सही मात्रा में सेवन बहुत जरूरी है। इनकी कमी जहां कई तरह की बीमारियों को जन्म दे सकती है, वहीं इनकी अधिकता भी समस्या की वजह बन सकती है। विटामिन्स और मिनरल्स की जरूरत, सही मात्रा, इनके सोर्स और इनसे जुड़ी समस्याओं पर एक्सपर्ट्स से बात करके पूरी जानकारी दे रही हैं अनु जैन रोहतगी

केस 1
32 साल के आनंद पिछले काफी समय से कमर के निचले हिस्से में दर्द से परेशान थे। दर्द कमर से शुरू होकर घुटनों तक पहुंच जाता था। उन्हें चलने में भी दिक्कत आने लगी। आनंद को खून की भी कमी बताई गई। डॉक्टरों ने कई तरह की जांच करवाईं। किसी ने मांसपेशियों में खिंचाव बताकर तमाम टेस्ट करवा दिए, तो किसी डॉक्टर ने स्लिप डिस्क की समस्या बताकर सर्जरी कराने की सलाह दे डाली, लेकिन किसी को भी उनकी असल समस्या का पता नहीं चला। महीनों बाद आखिरकार एक डॉक्टर को लगा कि उनकी समस्या कुछ और है। उन्होंने विटामिन्स का लेवल चेक करने के लिए टेस्ट करवाए। रिजल्ट चौंकाने वाला था। आनंद विटामिन बी-12 की जबरदस्त कमी से जूझ रहे थे। इससे उनके शरीर में खून कम बन रहा था और न्यूरोलॉजिकल समस्या भी पैदा हो गई थी। डॉक्टर ने आनंद को पहले विटामिन बी-12 के इंजेक्शन दिए, फिर गोलियां खाने को दीं। 2 महीने में ही आनंद का दर्द और एनीमिया बिलकुल ठीक हो गया।

केस 2
35 साल की रेखा की सेहत पिछले काफी समय से खराब चल रही थी। उनके शरीर, खासकर जोड़ों में बहुत दर्द रहने लगा था। वह हमेशा थकान महसूस करती थीं और उन्हें चलने में भी परेशानी होती थी। काफी जांच और इलाज के बाद भी रेखा की हालत में कोई सुधार नहीं आया। आखिरकार इलाज के लिए उन्हें दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में लाया गया। लक्षणों के आधार पर डॉक्टरों ने हड्डियों, मांसपेशियों से संबंधित कई टेस्ट के साथ विटामिन-डी की कमी का भी टेस्ट करवाया। पता चला कि रेखा के अंदर विटामिन-डी की कमी थी। रेखा को विटामिन-डी के साथ कैल्शियम की गोलियां दी गईं और सही डायट लेने को कहा गया। 2 महीने में ही उनकी हालत में 70 फीसदी तक सुधार आ गया। विटामिन-डी की खुराक लंबी चली और वह पूरी तरह से ठीक हो गईं।

केस 3
12 साल का रमन लगातार थकावट, भूख कम लगने और वजन कम होने की समस्या से परेशान था। डॉक्टर ने टेस्ट कराए। रमन के खून में विटामिन-डी की मात्रा बहुत ज्यादा पाईं। रमन को पहले विटामिन-डी की कमी थी इसलिए डॉक्टर ने उसे विटामिन-डी का सप्लिमेंट लेने को कहा था। पैरंट्स ने उसे फिर डॉक्टर को नहीं दिखाया और विटामिन-डी की खुराक चलती रही, जो रमन के लिए घातक बन गई। दरअसल, विटामिन-डी पानी में घुलता नहीं है। अगर यह ज्यादा मात्रा में शरीर में आने लगे तो टिशू में जमा होने लगता है और फिर समस्याएं पैदा करता है। डॉक्टरों ने रमन की विटामिन-डी की डोज बंद करा दी। लगभग 2 महीने में रमन के खून में विटामिन-डी की मात्रा सामान्य हुई और वह नॉर्मल हो पाया। गनीमत थी कि विटामिन-डी के ज्यादा होने की वजह से रमन के दिल और किडनी में कैल्शियम ज्यादा जमा नहीं हुआ। अगर ऐसा हुआ होता तो बड़ी परेशानी पैदा हो सकती थी।

इन तीनों मामलों से साफ है कि विटामिन्स की कमी अगर आपको परेशान कर सकती है तो इसकी अधिकता भी कम खतरनाक नहीं है। दरअसल, हमारे शरीर को सही और संतुलित मात्रा में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फैट के अलावा विटामिन्स और मिनरल्स की जरूरत होती है। संतुलित खाने के अलावा रेग्युलर एक्सरसाइज भी जरूरी है क्योंकि इससे भी शरीर को खाने से मिलने वाले पोषण को जज्ब करने में मदद मिलती है।

शरीर के लिए जरूरी हैं ये
- कार्बोहाइड्रेट हमारे शरीर को एनर्जी देते हैं जिसकी बदौलत हम कोई भी काम कर पाते हैं। ये हमारे खाने का सबसे अहम हिस्सा हैं। सब्जियों और फलों से मिलने वाले कार्ब को सबसे बेहतर माना जाता है।

- प्रोटीन को बॉडी बिल्डिंग ब्लॉक्स भी कहा जाता है। ये हमारे शरीर में टिश्यूज को बनने में मदद करते हैं। हमारी हड्डियों और दांतों का मुख्य स्रोत प्रोटीन ही है।

- फैट शरीर को एनर्जी देने के साथ-साथ शरीर में कुछ विटामिन्स को जज्ब करने में भी मदद करते हैं। हमारा शरीर फैट तैयार नहीं करता इसलिए हमें इन्हें बाहर से लेना होता है। मोनोसैचुरेटिफ फैट्स को गुड फैट्स भी कह सकते हैं। इन्हें लेना बेहतर है जबकि ट्रांस फैट्स (फ्रोजन पित्जा, मार्गरिन, बेकरी आइटम, समोसा, छोले-भटूरे आदि) से पूरी तरह तौबा करना बेहतर है। सैचुरेटिड फैट्स (देसी घी, बटर, कोकोनट ऑयल आदि) कम मात्रा में ले सकते हैं।

- विटामिन्स और मिनरल्स को माइक्रो न्यूट्रिएंट कहा जाता है क्योंकि इनकी जरूरत सीमित मात्रा में होती है लेकिन ये अनिवार्य हैं। मिनरल्स पौधों, जानवरों, मछली और तरल चीजों के जरिए हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं लेकिन विटामिन्स हवा, गर्मी, धूप आदि के संपर्क में आने पर निष्क्रिय हो सकते हैं। ऐसे में इन्हें अलग से लेना जरूरी है।

- हमारे शरीर को 13 तरह के विटामिन्स की जरूरत होती है। ये विटामिन A, D, E और पानी में नहीं घुल पाते और इन्हें जज्ब करने के लिए फैट की जरूरत होती है। शरीर में ज्यादा मात्रा होने पर ये टिश्यूज़ में जमा होने लगते हैं, जबकि विटामिन C और विटामिन B-1, B-2, B-3, B-5, B-6, B-7, B-9 और B-12 पानी में घुलनशील होते हैं और इनकी अतिरिक्त मात्रा यूरीन के रास्ते बाहर निकल जाती है।
- शरीर के लिए कई तरह के जरूरी मिनरल्स होते हैं, जिनमें मुख्य हैं- कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, आयोडीन आदि भी हैं।
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*** यहां लेख में जगह-जगह RDA का इस्तेमाल किया गया है। इसका मतलब रेकमेंडेड डायटरी अलाउंसेस है यानी इस जरूरी तत्व को एक दिन में कितनी मात्रा में खाया जाए। यहां एक वयस्क महिला और एक वयस्क पुरुष की RDA दी गई है। उम्र और सेहत के मुताबिक इसे कम-ज्यादा किया जाता है।

कार्बोहाइड्रेट
शरीर में क्या काम: शरीर की एनर्जी का मुख्य जरिया, जो शरीर को तमाम काम करने में मददगार

RDA: 130 ग्राम रोजाना
कमी के लक्षण और बीमारियां: बेहद कमजोरी, दुबलापन, मुंह का सूखना, सिरदर्द, पेट में भारीपन, कीटोसिस बीमारी
टेस्ट: आमतौर पर लक्षणों और डाइट से कमी का पता लगाया जाता है
खाने के सोर्स: अनाज (गेहूं, चावल, सूजी, मैदा, बाजरा आदि), मीठी चीजें (शुगर, गुड़, शहद आदि), फल (चीकू, केला, आम आदि), सब्जियां (आलू, शकरकंद आदि), दालें आदि
ज्यादा सेवन से नुकसानः मोटापा, शुगर और दिल की बीमारी की आशंका
विशेष: खाने का 45-60% हिस्सा कार्ब से आना चाहिए। कार्ब 2 तरह के होते हैंः सिंपल और कॉम्प्लेक्स। सिंपल में शुगर, वाइट ब्रेड, वाइट राइस, मैदा आदि आता है और ये फौरन ग्लूकोज़ में बदल जाते हैं इसलिए अच्छे नहीं माने जाते, जबकि कॉम्प्लेक्स कार्ब में साबुत अनाज, दालें, फल-सब्जियां, ब्राउन राइस आदि आते हैं। इन्हें खाना बेहतर है। हाई ग्लाइसिमिक इंडेक्स के मुकाबले लो ग्लाइसिमिक इंडेक्स वाले कार्ब खाना बेहतर है क्योंकि ये धीरे-धीरे ग्लूकोज़ में बदलते हैं।

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प्रोटीन
शरीर में क्या काम: हड्डियों, मांसपेशियों, स्किन, बाल और जरूरी अंगों का अहम हिस्सा है प्रोटीन। इससे शरीर ठीक तरह से काम करता है।

RDA: 45 से 60 ग्राम रोजाना, 2.5 ग्राम प्रति किलो से ज्यादा खाना नुकसानदेह

कमी के लक्षण और बीमारियां: बहुत ज्यादा थकान, शरीर के हिस्सों में दर्द, बाल झड़ना, झुंझलाहट, बार-बार इन्फेक्शन आदि

टेस्ट: टोटल प्रोटीन टेस्ट

खाने के सोर्स: दूध और दूध से बनी चीजें, सोयाबीन, दालें, अंडा, मीट, मछली, टोफू, मखाना आदि

ज्यादा सेवन से नुकसानः वजन बढ़ना, कब्ज, डीहाइड्रेशन, थकान आदि

विशेष: हमें वजन के अनुसार 0.8 ग्राम प्रति किलो प्रोटीन लेना चाहिए। औसतन फैट की तरह शरीर प्रोटीन को आगे के लिए जमा कर नहीं रख पाता इसलिए हमें रोजाना जरूरत अनुसार प्रोटीन लेना ही चाहिए।
थोड़ा गुड फैट लेना जरूरी है।
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फैट
शरीर में क्या काम: एनर्जी देता है, शरीर के तापमान को संतुलित रखता है, अंगों के सुरक्षा कवच का काम करता है, जोड़ों में लचीलापन बनाए रखता है और शरीर के कई फंक्शन में मदद करता है।

RDA: 45 से 75 ग्राम फैट रोजाना

कमी के लक्षण और बीमारियां: बदरंग, सूखी और खुश्क स्किन, बांह के ऊपरी हिस्से में गांठें आदि

टेस्ट: मशीनों के अलावा ऑनलाइन भी टेस्ट कर सकते हैं

खाने के सोर्स: फैट 3 तरह के होते हैं सैचुरेटिड (बटर, बीफ, कोकोनट, घी आदि), अनसैचुरेटिड (कनोला, ऑलिव, पीनट, सनफ्लार, सोयाबीन, कॉर्न, सरसों आदि) और ट्रांस फैट (फ्रोजन पित्जा, मार्गरिन, नमकीन, बिस्किट, बार-बार तली जानेवाली चीजें समोसा, छोले-भठूरे आदि)। रोजाना 2-3 छोटे चम्मच तक फैट लेना चाहिए, जिसमें एक चम्मच सैचुरेटिड फैड और 1 या 2 चम्मच अनसैचुरेटिड फैट लेना चाहिए। ट्रांस-फैट से तौबा करें।

ज्यादा सेवन से नुकसानः मोटापा, डायबीटीज़, दिल की बीमारी होने की आशंका

विशेष: पुरुषों में शरीर के वजन का 8-19% और महिलाओं में 21-33 % नॉर्मल फैट रेंज है। आमतौर पर शरीर में फैट की कमी नहीं होती क्योंकि अगर घी-तेल बंद भी कर देते हैं तो भी दूध-दही, फल, सब्जियों आदि से काफी हद तक फैट की जरूरत पूरी हो जाती है। फिर भी थोड़ा गुड फैट लेना जरूरी है।
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फैट में घुलने वाले विटामिन

विटामिन A................
शरीर में क्या काम: शरीर के विकास, आंखों की रोशनी और इम्यून सिस्टम की बेहतरी के अलावा दिल, फेफड़ों और किडनी आदि के फंक्शन में मदद करना

RDA: 700 से 900 माइक्रोग्राम रोजाना, 3000 माइक्रोग्राम से ज्यादा शरीर के लिए खतरनाक

कमी के लक्षण और बीमारियां: रात में दिखाई न देना (Night Blindness), खून न बनना, इम्यून सिस्टम का कमजोर होना, गले, सीने और पेट में बार-बार इन्फेक्शन होना, बच्चों की ग्रोथ कम होना, फर्टिलिटी पर असर पड़ना, स्किन का खुरदुरा होना और बाल झड़ना

टेस्ट: विटामिन A सिरम टेस्ट, इसे रेटिनॉल (Retinol) टेस्ट भी कहते हैं

खाने के सोर्स: बीफ, अंडा, फिश, बटर, दूध, चीज़ चकुंदर, गाजर, ब्रोकली, पालक, लाल-पीली सब्जियां शिमला मिर्च, गाजर, सीताफल, पपीता, आम आदि

ज्यादा सेवन से नुकसान: थकान, हड्डियों में दर्द, चक्कर और उलटी आना, बाल झड़ना, नाखूनों का कमजोर होना, स्किन का बेहद संवेदनशील हो जाना, सिर में पानी जमा हो जाना आदि
विशेष: यह इम्यून सिस्टम को सुधारता है और कुछ तरह के कैंसर से भी बचाव में मददगार है।

विटामिन D................
शरीर में क्या काम: हड्डियों, दांतों और शरीर के तमाम जोड़ों को मजबूत बनाने, नर्व्स और मसल्स के तालमेल को बेहतर करने, इन्फेक्शन से बचाने और किडनी, फेफड़ों, लिवर और हार्ट की बीमारियों की आशंका कम करने में मददगार

RDA: 400–800 इंटरनैशनल यूनिट या 10–20 माइक्रोग्राम रोजाना, हालांकि कुछ एक्सपर्ट 1000-4000 यूनिट या 25-100 माइक्रोग्राम रोजाना की सलाह भी देते हैं

कमी के लक्षण और बीमारियां: हड्डियों, जोड़ों और मसल्स का कमजोर और खोखला होना, कमर और शरीर के निचले हिस्सों में दर्द होना खासकर पिंडलियों में, इम्युनिटी कम होना, बाल झड़ना, बहुत थकान और सुस्ती रहना, ऑस्टियोपोरोसिस, रिकेट्स (पैरों का टेढ़ा होना)

टेस्ट: 25-हाइड्रॉक्सी विटामिन-D ब्लड टेस्ट, इसे विटामिन डी डिफिसिएंशी टेस्ट भी कहते हैं

खाने के सोर्स: मीट, मछली, अंडे, मशरूम और फॉर्टिफाइड दूध, जिसमें विटामिन्स-मिनरल्स ऊपर से डाले जाते हैं
ज्यादा सेवन से नुकसान: किडनी फंक्शन से लेकर मेटाबॉलिजम तक पर बुरा असर
विशेष: 20 नैनोग्राम/मिली से ऊपर नॉर्मल रेंज है लेकिन 50 नैनोग्राम/मिली या ज्यादा को बेहतर माना जाता है। लेवल 800-900 नैनोग्राम/मिली तक पहुंच जाए तो खतरनाक हो जाता है। इसका सबसे अच्छा जरिया है सूरज की किरणें। साल भर में औसतन 45-50 दिन 45 मिनट धूप में निकलने या बैठने से पर्याप्त विटामिन डी मिल जाता है। ऐसा मुमकिन नहीं है तो डॉक्टर की सलाह पर हर महीने एक बार 60,000 यूनिट का सैशे ले सकते हैं।

विटामिन E................
शरीर में क्या काम: रेड ब्लड सेल बनाने और विटामिन-K को जज्ब करने में मददगार। एंटी-ऑक्सिडेंट है यानी बुढ़ापे की रफ्तार कम करता है और इन्फेक्शन से बचाने में मदद करता है। दिल, लिवर से जुड़ी बीमारियों के अलावा स्ट्रोक्स और डिमेंशिया से बचाव में मददगार

RDA: 15 मिलीग्राम रोजाना

कमी के लक्षण और बीमारियां: मसल्स का कमजोर होना, चलने-फिरने और तालमेल बिठाने में दिक्कत, शरीर के हिस्सों का सुन्न पड़ना, देखने में दिक्कत होना और इम्युनिटी कमजोर होना

टेस्ट: विटामिन E सिरम टेस्ट, इसे टोकोफेरॉल (Tocopherol) टेस्ट भी कहते हैं

खाने के सोर्स: बादाम, नट्स, अनाज, दूध, खाने के तेल जैसे कि सूरजमुखी, मूंगफली या ऑलिव ऑयल, सब्जियां जैसे कि पालक, लाल शिमला मिर्च, एवोकाडो आदि

ज्यादा सेवन से नुकसान: ब्लीडिंग, मसल्स में दर्द, डायरिया, उलटी से लेकर स्ट्रोक तक का खतरा, ब्लड थिनर के इस्तेमाल में भी रुकावट पैदा करता है
विशेष: इसकी नॉमर्ल रेंज 5.5-17 मिलीग्राम/लीटर है। यह फैट में घुलने वाला विटामिन है इसलिए यह शरीर में सही से जज्ब हो, इसके लिए गुड फैट (ऑलिव ऑयल, सरसों का तेल, कनोला ऑयल आदि) लेना जरूरी है। प्रेग्नेंट और दूध पिलानेवाली महिलाओं को ज्यादा विटामिन-E की जरूरत होती है।

विटामिन K................
शरीर में क्या काम: ब्लड क्लॉटिंग यानी खून को गाढ़ा रखने के अलावा हड्डियों और दिल की सेहत दुरुस्त रखने में मदद
RDA: 90-120 माइक्रोग्राम रोजाना

कमी के लक्षण और बीमारियां: जरा-सी चोट लगने पर भी खून का बंद न होना

टेस्ट: PT (Prothrombin Time) टेस्ट, जिसमें ब्लड क्लॉटिंग में लगने वाले वक्त का पता लगाया जाता है

खाने के सोर्स: हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे कि पालक, पार्सले, लेट्यूस, गोभी, ब्रोकली, अंडा, बटर, दूध, लिवर आदि

ज्यादा सेवन से नुकसान: विटामिन K की ऊपरी लिमिट और इसकी अधिकता से होने वाली समस्याओं के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है
विशेष: 0.2-3.2 नैनोग्राम/मिलीलीटर नॉर्मल रेंज है। आमतौर पर विटामिन K की कमी बहुत कम पाई जाती है क्योंकि इसकी शरीर में बेहद कम मात्रा में जरूरत होती है।
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पानी में घुलने वाले विटामिन
विटामिन C................
शरीर में क्या काम: इंफेक्शन से बचाव है और इम्यून को मजबूत करना, दांतों और मसूड़ों के साथ-साथ बाल और स्किन के लिए जरूरी, आयरन को जज्ब करने के लिए भी जरूरी

RDA: 65-90 मिलीग्राम रोजाना, 2000 मिलीग्राम रोजाना से ज्यादा लेने पर नुकसानदेह

कमी के लक्षण और बीमारियां: एनीमिया, बाल झड़ना, स्किन का रूखा होना, घाव भरने में देरी होना, दांतों और मसूढ़ों की समस्याएं, स्कर्वी

टेस्ट: विटामिन C सीरम टेस्ट, टोटल ब्लड काउंट टेस्ट

खाने के सोर्स: खट्टे फल (संतरा, नीबू, मौसमी आदि), आलू, ब्रोकली, पालक, लाल-पीली शिमला मिर्च, स्ट्रॉबरी, टमाटर आदि
ज्यादा सेवन से नुकसानः आमतौर पर विटामिन सी की अधिकता नहीं होती लेकिन अगर बहुत ज्यादा मात्रा में ले लिया जाए तो उलटी, चक्कर, सिरदर्द, पेट दर्द और नींद न आना जैसी समस्याएं होती हैं
विशेष: 0.6-2 मिलीग्राम/डेसीलीटर नॉमर्ल रेंज है। शरीर को सबसे ज्यादा विटामिन C की जरूरत होती है। यह एंटी-ऑक्सिडेंट का काम कर बुढ़ापे की रफ्तार भी कम करता है।

विटामिन B................
शरीर में क्या काम: विटामिन B आठ तरह के होते हैंः B-1, B-2, B-3, B-5, B-6, B-7, B-9 और B-12

शरीर में क्या कामः B-1 मेटाबॉलिजम में मददगार है, B-2 फूड को एनर्जी में बदलता है और एंटी-ऑक्सिडेंट का काम करता है, B-3 डीएनए की देखभाल करता है, B-5 हॉर्मोन और कॉलेस्ट्रॉल बनाने में मददगार, B-6 रेड ब्लड सेल बनाता है, B-7 मेटाबॉलिजम में सपोर्ट, B-9 सेल ग्रोथ में मदद, B-12 न्यूरोलॉजिकल फंक्शन, डीएनए और रेड ब्लड सेल डिवेलपमेंट का काम

RDA: B-1 1.2 माइक्रोग्राम, B-2 1.3 माइक्रोग्राम, B-3 16 माइक्रोग्राम, B-5 5 माइक्रोग्राम, B-6 1.3 माइक्रोग्राम, B-7 30 माइक्रोग्राम, B-9 400 माइक्रोग्राम और B-12 2.5 माइक्रोग्राम जरूरी

कमी के लक्षण और बीमारियां: विटामिन B-1, B-2, B-3 की कमी से उलटी, चक्कर, पेट में दर्द, मुंह के कोने फटना आदि, B-6 की कमी से अनीमिया, स्किन रैशेज, उलटी, डिप्रेशन आदि, B-9 की कमी से डायरिया या अनीमिया, B-12 की कमी से याद्दाश्त में कमी, हाथ-पैरों में झनझनाहट, डिप्रेशन आदि समस्याएं हो सकती हैं

टेस्ट: आमतौर पर विटामिन B-12 का टेस्ट कराया जाता है, जो विटामिन B-12 नाम से ही होता है।

खाने के सोर्स: विटामिन B-1: सोयामिल्क, तरबूज, सूरजमुखी के बीज, पोर्क आदि, विटामिन B-2: ऑर्गन मीट, बीफ, मशरूम, लो-फैट मिल्क आदि, विटामिन B-3: मीट, अंडा, टूना और साल्मन फिश, मसूर की दाल, बीज, हरी पत्तेदार सब्जियां आदि B-5: लिवर, फिश, एवोकाडो, ब्रोकली, मूंगफली, मशरूम आदि, B-6: मीट, फिश, अंडा, टोफू, केला, आलू, सोया प्रोडक्ट्स आदि, B-7: अंडा, चीज़, सोयाबीन आदि, B-9: लिवर मीटर, ब्रोकली, संतरे का जूस, मूंगफली, सीड्स, पालक, शकरकंद आदि, विटामिन-B 12: मीट, अंडा, सी-फूड, साल्मन फिश, दूध और इससे बनी चीजें, सोया मिल्क आदि

ज्यादा सेवन के नुकसानः आमतौर पर विटामिन B की अधिकता नहीं होती। अगर बहुत ज्यादा सप्लिमेंट ले लेते हैं तो सिरदर्द, चक्कर, उलटी, डायरिया, सुन्नपन जैसी समस्याएं होती हैं।

विशेष: सभी विटामिन B खाने को एनर्जी में बदलने में मदद करते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा अहम विटामिन B-12 है, जोकि न्यूरो से लेकर इम्युनिटी तक से जुड़े कई काम करता है। वेजिटेरियन और वेगन लोगों में इसकी कमी खासतौर पर पाई जाती है और इनके लिए सप्लिमेंट लेना जरूरी हो जाता है।
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मिनरल्स

कैल्शियम................
शरीर में क्या काम: हड्डियों, दांतों और नाखूनों को मजबूत बनाना, न्यूरो सिस्टम को दुरुस्त रखना

RDA: 1000 mg यानी 1 ग्राम रोजाना

कमी के लक्षण और बीमारियां: हड्डियों में दर्द, बहुत ज्यादा थकान होना, बाल झड़ना, रिकेट्स आदि

टेस्ट: डेक्सास्कैन, इसे बोन मिनरल डेंसिटी टेस्ट भी कहते हैं। यह हड्डियों में मौजूद कैल्शियम के लेवल की जांच करता है

खाने के सोर्स: दूध और दूध से बनी चीजें, हरी पत्तेदार सब्जियां, साल्मन फिश, मशरूम, बीन्स, ब्रोकली, चुकंदर, कमल ककड़ी, केला, संतरा, शहतूत, सिंघाड़ा, ड्राई-फ्रूट्स, तिल, राजमा, मूंगफली आदि

ज्यादा सेवन से नुकसानः दिल और किडनी में कैल्शियम जमना, कब्ज, डायरिया, हड्डियों में दर्द आदि
विशेष: मिनरल्स में सबसे ज्यादा कैल्शियम की जरूरत होती है हमारे शरीर को। इसकी नॉर्मल रेंज 8.8 से 10.6 मिलीग्राम/डेसीलीटर है। कैल्शियम का फायदा शरीर को मिले, इसके लिए जरूर है कि शरीर में विटामिन-D का लेवल सही हो।

आयरन................
शरीर में क्या कामः रेड ब्लड सेल बनाने और खून को हेल्दी रखने में मददगार

RDA: 8-18 मिलीग्राम रोजाना

कमी के लक्षण और बीमारियांः कमजोरी, त्वचा का पीला पड़ना, बाल झड़ना, अनीमिया आदि

टेस्टः टोटल ब्लड काउंट
खाने के सोर्सः लिवर, बीफ, टर्की, अंडा, अनार, पालक, साबुत अनाज, मसूर दाल, बीन्स, चुकंदर आदि

मैग्नीशियम................
शरीर में क्या कामः मसल्स और नर्व्स के सही से काम करने और हड्डियों के लिए जरूरी

RDA: 310 से 400 मिलीग्राम

कमी के लक्षण और बीमारियांः शरीर में दर्द, ग्रोथ कम होना, अजीबोगरीब बर्ताव करना आदि

टेस्टः टोटल सीरम मैग्नीशियम टेस्ट
खाने के सोर्सः हरी पत्तेदार सब्जियां, ब्रोकली, सीड्स, होल वीट ब्रेड, सोयाबीन, डेयरी प्रोडक्ट्स आदि

फॉस्फोरस................
शरीर में क्या कामः खाने को एनर्जी में बदलता है, सेल्स के काम करने और शरीर की ग्रोथ में मदद

RDA: 700 मिलीग्राम रोजाना

कमी के लक्षण और बीमारियांः कमजोरी, हड्डियों में दर्द और कमजोरी, कैल्शियम की कमी

टेस्टः फॉस्फोरस टेस्ट
खाने के सोर्सः दूध और दूध से बनी चीजें, मटर, अनाज, अंडे, नट्स आदि

पोटैशियम................
शरीर में क्या कामः नर्व्स के कामकाज और पानी का संतुलन बनाने में भूमिका, ब्लड प्रेशर कंट्रोल और पथरी की आशंका कम करना

RDA: 4700 मिलीग्राम रोजाना

कमी के लक्षण और बीमारियांः कमजोरी, पैरालेसिस

टेस्टः पोटैशियम टेस्ट
खाने के सोर्सः दही, दूध, टूना मछली, सोयाबीन, पीले फल और सब्जियां जैसे कि आलू, केला आदि

सोडियम................
शरीर में क्या कामः यह ब्लड प्रेशर ठीक रखता है और मांसपेशियों के साथ-साथ दिमागी संतुलन भी सही बनाए रखता है

RDA: 1500 मिलीग्राम रोजाना

कमी के लक्षण और बीमारियांः भूख कम लगना, मसल्स में जकड़न (क्रैम्प), दौरे पड़ना

टेस्टः सोडियम ब्लड टेस्ट
खाने के सोर्सः नमक, सोया सॉस, प्रोसेस्ड फूड, सब्जियां आदि

आयोडीन................
शरीर में क्या कामः थायरॉयड हॉर्मोन बनाता है जोकि दिमाग और हड्डियों के विकास के लिए जरूरी है। मेटाबॉलिज़म भी कंट्रोल करता है

RDA: 150 माइक्रोग्राम रोजाना

कमी के लक्षण और बीमारियांः मेटाबॉलिक रेट कम होना, गॉयटर बीमारी होना, जिसमें गला फूल जाता है और बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास नहीं होता

टेस्टः ब्लड टेस्ट, यूरीन टेस्ट और आयोडीन पैच टेस्ट
खाने के सोर्सः सी-फूड, डेयरी प्रोडक्ट्स, आयोडाइज्ड नमक आदि
नोटः इनके अलावा भी कॉपर, क्रोमियम, जिंक, क्लोराइड, सल्फर, फ्लोराइड जैसे कई और मिनरल्स भी शरीर के लिए जरूरी हैं।
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क्या है बैलेंस्ड डायट
बैलेंस्ड डायट वह है जिसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फैट, फाइबर, विटामिन्स, मिनरल्स और पानी का सही संतुलन हो। हमारे शरीर को रोजाना 50-55 फीसदी कार्ब (रोटी, चावल, ओट्स, नूडल्स, आलू, मीठे फल, कॉर्न आदि), 25-30 फीसदी प्रोटीन (मीट, फिश, अंडा, सोयाबीन, दाल, दूध और दूध से बनी चीजें आदि) और 15-20 फीसदी फैट्स (घी, तेल, नट्स, चीज़ आदि) की जरूरत होती है। साथ ही, मिनरल्स और विटामिन्स की भी जरूरत होती है, जोकि सब्जी, फल, बीज, नट्स, आदि से मिलते हैं।
खाना पकाने और खाने का सही तरीका
सब्जियों को न ज्यादा पकाएं और न ही ज्यादा मसालेदार बनाएं। वरना उनमें मौजूद तमाम विटामिन्स और मिनरल्स लगभग खत्म हो जाते हैं। अगर दाल रात में भिगों दें और सुबह उसे बस थोड़ा उबाल लें तो बहुत जल्दी गल जाएगी और इसमें मौजूद पौष्टिक तत्व भी नष्ट नहीं होंगे। कच्ची सब्जियों जैसे खीरा, ककड़ी, प्याज, टमामट, पत्तागोभी आदि को बहुत अच्छी तरह धोकर सलाद के रूप में खाएं। शरीर को पानी, फाइबर, विटामिन्स और मिनरल्स भरपूर मिलेंगे। खाने खासकर अनाज से बनी चीजों को चबा-चबा कर खाएं। अगर आप रोटी, चावल या कोई और अनाज खाते हैं तो तब तक चबाएं जब तक कि उसका स्वाद जीभ पर ना आ जाए। जैसे ज्यादा चबाने पर रोटी का मीठापन महसूस करेंगे।
फलों को खाली पेट खाना बेहतर है। सुबह नाश्ते में ले सकते हैं या शाम को खाली पेट। खाने के बाद लेना है तो लगभग दो घंटे बाद फल खाएं। खाने के साथ या फौरन बाद खाने से ये ठीक से पच नहीं पाते और इनका फायदा नहीं मिल पाता। जूस के बजाय फलों का सेवन बेहतर है क्योंकि फलों से फाइबर भी मिलता है। उठते ही खाली पेट पानी पिएं। खाने के साथ पानी न पिएं। इससे खाने को पचाने के लिए शरीर में बनने वाले जूस पानी के साथ निकल जाते हैं। हमेशा खाने के आधा या एक घंटे बाद पानी पिएं।
एक्सपर्ट पैनल
डॉ. के. के. अग्रवाल, इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट
डॉ. आर. हेमलता, डायरेक्टर, नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन
डॉ. महिपाल सचदेव, डायरेक्टर, सेंटर फॉर साइट
डॉ. के. के. मिश्रा, सीनियर ऑर्थोपीडिक सर्जन, प्राइमस हॉस्पिटल
डॉ. प्रियंका रोहतगी, सीनियर न्यूट्रिशनिस्ट, अपोलो हॉस्पिटल
सोनिया नारंग, डायट एक्सपर्ट

संडे नवभारत टाइम्स 

Friday, August 21, 2015

प्रेम बनाम विवाह

रचना त्रिपाठी
स्त्री हो या पुरुष- दोनों के जीवन में प्रेम का होना बहुत जरुरी है! प्रेम- यह वो संजीवनी है जिसे पाने की चाह शायद हर प्राणी में होती है। पर प्रेम में पागल होकर प्रेमी के साथ विवाह कर लेना बहुत समझदारी नहीं होती। क्योंकि प्रेम और विवाह दोनों की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए प्रेम को विवाह के खाके में फिट करना थोड़ा कठिन हो जाता है। तो जरुरी नहीं है कि जिससे प्रेम करें उससे विवाह भी करें। क्यों कि प्रेमविवाह में विवाह के बाद पवित्र प्रेम की जैसी आशा होती है वह कहीं न कहीं विवाह के पश्चात क्षीण होने लगती है।
देश की अदालत ने लिव-इन को क़ानूनी मान्यता भले ही दे दी हो, लेकिन हमारी सामाजिक बनावट ऐसी नहीं है जहाँ प्रेम करने वालों को शादी किये बिना विशुद्ध प्रेम की मंजूरी मिलती हो। इसलिए प्रेमीयुगल इस संजीवनी को पाने की चाह में प्रेम की परिणति विवाह के रूप में करने को मजबूर हो जाते हैं; और विवाह हो जाने के बाद वैसा प्रेम बना नहीं रह पाता। दूसरी तरफ हमारे समाज में ऐसे युगलों की भी बहुत बड़ी संख्या है जिनके जीवन में प्रेम का आविर्भाव ही शादी के बाद होता है। अरेंज्ड मैरिज की इस व्यवस्था को समाज में व्यापक मान्यता प्राप्त है। इसमें साथ-साथ पूरा जीवन बिताने के लिए ऐसे दो व्यक्तियों का गठबंधन करा दिया जाता है जो उससे पहले एक दूसरे को जानते तक नहीं होते। फिर भी अधिकांशतः इनके भीतर ठीक-ठाक आकर्षण, प्रेम और समर्पण का भाव पैदा हो जाता है। गृहस्थ जीवन की चुनौतियों का मुकाबला भी कंधे से कंधा मिलाकर करते हैं। संबंध ऐसा हो जाता है कि इसके विच्छेद की बात प्रायः कल्पना में भी नहीं आती। ऐसी आश्वस्ति डेटिंग करने वाले प्रेमी जोड़ों में शायद ही पायी जाती हो। वहाँ तो कौन जाने किस मामूली बात पर रास्ते अलग हो जाँय कह नहीं सकते। प्रेम उस मृगनयनी के समान है जिसे पाकर कोई भी फूला न समाये लेकिन शादीशुदा व्यक्ति के लिए है यह अत्यंत दुर्लभ है। यह मत भूलिए कि विवाह उस लक्ष्मण रेखा से कम नहीं जिससे बाहर जाने की तो छोड़िये ऐसा सोचना भी भीतर से हिलाहकर रख देता है।
विवाह के पश्चात् स्त्री पुरुष के बीच प्रेम का अस्तित्व वैसा नहीं रह जाता जैसा कि विवाह से पहले रहता है। प्रेम का स्वभाव उन्मुक्त होता है और विवाह एक गोल लकीर के भीतर गड़े खूंटे से बँधी वह परम्परा है जिसके इर्द गिर्द ही उस जोड़े की सारी दुनिया सिमट कर रह जाती है। फिर विवाह के साथ प्रेम का निर्वाह उसके मौलिक रूप में सम्भव नहीं रह जाता। प्रेम का विवाह के बाद रूपांतरण सौ प्रतिशत अवश्यम्भावी है। विवाह और प्रेम को एक में गड्डमड्ड कर प्रेमविवाह कर लेने वालों की स्थिति वेंटिलेटर पर पड़े उस मरीज की भाँति हो जाती है जिसकी नाक में हर वक्त ऑक्सीजन सिलिंडर से लगी हुई एक लंबी पाइप से बंधा हुआ मास्क लगा रहता है। यह प्रेम-विवाह में प्रेम-रस का वह पाइप होता है जिसपर यह संबंध जिन्दा रहता है। जिसके बिना चाहकर भी दूर जाने की सोचना खतरे को दावत देने जैसा है। सिलिंडर से लगी वह पाइप सांस लेने में सहायक तो जरूर बन जाती है पर वह स्वाभाविक जिंदगी नहीं दे पाती। अगर जिंदगी बची भी रह जाय तो शायद उसे उन्मुक्त होकर जीने की इजाजत न दे।

Monday, March 23, 2015

अच्छी लड़कियाँ बुरे लड़कों को क्यों पसंद करती है

मोनिका जैन 
ज्यादातर लड़कियाँ बुरे लड़कों की तरफ आकर्षित होती है. इस फैक्ट ने अच्छाई को खत्म करने में कहीं ना कहीं अपना योगदान दिया है. इसलिए लड़कियों गौर फरमाओं. एक अच्छा लड़का तुमसे बहुत ज्यादा रोमांटिक और फ़्लर्टी बातें ना कर पाए पर वह प्यार तुम्हें बड़ी शिद्दत से करेगा. वह तुम्हें ठहाकों वाली हँसी भले ही ना दे पाए पर कभी रुलाएगा भी नहीं. हो सकता है वह बड़े-बड़े गिफ्ट्स और सरप्राइज पार्टी के दिखावे ना कर पाए पर वह तुम्हें जो भी देगा वह ओरिजिनल होगा...और ओरिजिनल तो ओरिजिनल ही होता है 

Thursday, February 19, 2015

तुम्हे देखा है बहुत ,फिर भी बहुत कम देखा ..

शशांक द्विवेदी 
6 year of togetherness ... आज शादी को 6 साल पूरे हो गये ,लेकिन प्रियंका से दोस्ती -प्रेम को तो 11 साल हो गये ..इतना वक्त गुजर गया पता ही नहीं चला ..आगरा आया था इंजीनियरिंग की पढाई करने उसी दौरान पहले "प्रेम" हुआ फिर "विवाह " मतलब प्रेम -विवाह हो गया...काफी मुश्किलें आई लेकिन हो गया ...वैसे मेरा स्पष्ट मानना है कि संघर्ष के ,प्रेम के ,रोमांस के वे 5 साल काफी जबर्दस्त थे...काश वो दिन फिर से वापस आ जाए ... मेरी जिंदगी की कहानी पूरी फ़िल्मी है फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ के सभी पात्र वास्तविक है ....प्रियंका के प्रेम ने ही मुझे "लेखक "भी बना दिया ..सच कहूँ तो मै पत्थर था उसने ही मुझे तराश कर किसी काम का बना दिया ...मै जो कुछ भी हूँ उसमें उसका बहुत ज्यादा योगदान है .. .अमर उजाला ,आगरा से चली ये प्रेम कहानी तो फिलहाल जबर्दस्त तरीके से चल रही है ,उम्मीद करता हूँ कि आगे भी चलती रहेगी ..क्योंकि मुझे हमेशा से यही लगता है कि सिर्फ "प्रेम "ही आपको जोड़े रख सकता है ,विवाह तो एक पड़ाव भर है ..
प्रिया के लिए तो यही पंक्तियाँ याद आ रहीं है कि 

"तुमसा ना कोई हमदम देखा ,उड़ गये होश जवानी का वो आलम देखा ,तुम्हे देखकर जी भरता ही नहीं ,तुम्हे देखा है बहुत ,फिर भी बहुत कम देखा ..."

मै बहुत खुश नसीब हूँ कि मुझे प्रिया जैसी प्रेमिका और जीवन संगिनी मिली ,उसने मुझे बहुत खुशी और प्यार दिया ,हर कदम पर मेरा साथ देते हुए मेरा हौसला भी बढ़ाया ...प्रियंका को शादी की सालगिरह पर ढेरों शुभकामनाएँ.....ईश्वर से प्रार्थना है कि हमारे संबंधों की मजबूत डोर ऐसे ही बंधी रहें ...












हमारी भी लड़ाई होती है ...

कल किसी ने मेरी मैरिज एनिवर्सरी की पोस्ट पढ़ने के बाद एक सवाल किया कि क्या आपके और आपकी पत्नी के बीच भी लड़ाई होती है तो मैंने जवाब में कहा कि दुनियाँ में पति –पत्नी की शायद ही ऐसी कोई जोड़ी होती होगी जिनके बीच कभी भी लड़ाई –झगड़ा ,नोक झोंक ना होती हो .खैर मेरे और प्रिया के बीच भी कभी कभार यह सब हो जाता है . आखिर हम दोनों भी इंसान है ,आदर्श स्तिथि तो सिर्फ देवी –देवताओं में ही होती होगी .
हम दोनों के विचार बहुत भिन्न है कई मुद्दों पर मतभेद भी रहता है लेकिन विचारों की यही भिन्नता मुझे कई बार बहुत ठीक लगती है इससे किसी भी चीज के हर पहलू को समझने में मदत मिलती है .वैसे भी मेरा मानना है कि पति –पत्नी होने का मतलब यह नहीं है कि एक दूसरे की जी –हुजूरी करने लग जाएँ या गुलामी जैसा महसूस करें .सीधी सी बात है व्यक्तित्व भिन्न है तो विचार भी भिन्न ही होंगे .इसलिए बेहतर आपसी समझ बनाने की जरुरत होती है .
खाने के मामले में प्रियंका जहाँ बेहद सात्विक है मतलब वो लहसुन और प्याज बिल्कुल नहीं खाती ना ही उसके परिवार में कोई खाता वहीं मुझे ये बेहद पसंद है .प्रियंका के होते हुए घर में सभी सब्जियां बिना लहसुन और प्याज के ही बनती है ,सबसे खास बात यह है कि सब्जियां बेहद शानदार और टेस्टी बनती है और अब तो मुझे भी खूब पसंद आने लगी ..हाँ अब मै अलग से प्याज सलाद के साथ  में खा लेता हूँ . कई मामले ऐसे भी है जहाँ वो मेरी बात मानती है .करियर के मामले में जहाँ मै पूर्णकालिक तौर पर मीडिया में जाना चाहता था /चाहता हूँ लेकिन प्रियंका ने कभी जाने नहीं दिया उसने कहा पढाने के साथ लेखन करो वही ठीक है मीडिया में जाने की जरुरत नहीं है.. प्रिया ने अमर उजाला में कई साल काम किया इसलिए उसे मीडिया का अनुभव मुझसे कहीं ज्यादा है फिलहाल उसकी बात मानना ही मुझे ठीक लगा .मेरे अंदर ड्रेसिंग सेंस नहीं है प्रिया में है और आज की डेट में मेरे ८० फीसदी कपड़े प्रियंका ही खरीदती है .प्रियंका आम ठेठ भारतीय पत्नियों की तरह सिर्फ “यस मैन “ नहीं है बल्कि मेरे  अंदर या फिर मेरे किसी काम में उसे जो ठीक नहीं लगता उस पर वो बिना झिझक कर बोलती है .चाहे वो मुझे बुरा ही क्यों ना लगे ..बहुत मामलों में मेरी पहली आलोचक मेरी पत्नी ही है ..एक बात जरुर है कि मुझे कई बार शादी एक बंधन के रूप में भी दिखती है क्योंकि शादी के पहले भी मै ५ साल प्रिया के साथ रहा वहाँ मुझे बड़ी स्वतंत्रता महसूस होती थी लेकिन शादी के बाद बिना वजह बहुत सारे झंझट आ जाते है मसलन परिवार ,समाज ,रिश्तेदार..इन्हें खुश करो ,उन्हें खुश करो ...ज्यादातर नोंकझोक भी इन्ही बातों से होती है ..बेवजह के ढकोसलों से भी बहुत खीज और परेशानी होती है ...लेकिन फिर भी ये सब तो झेलना ही पड़ेगा भाई क्योंकि प्रेम विवाह की  कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है. लेकिन विचारों में थोड़ा बहुत मतभेद होते हुए भी हमारे बीच “प्रेम “ का गहरा अहसास है जो हमें हमेशा जोड़े रहता है और सच्चाई है कि सिर्फ “प्रेम “ में ही इतना सामर्थ्य है जो आपको जिंदगी भर जोड़े रख सकता है ...

Sunday, February 8, 2015

अब तो बहाना ही पड़ेगी उल्टी गंगा!!

अनुराधा बेनीवाल
उत्तर भारत में एक गाँव था. कहने को तो गाँव में काफी खुशहाली थी लेकिन कुछ समय से वहां एक विचित्र समस्या घर कर गयी थी. वहां दिन ढलने के बाद लड़को का निकलना मुश्किल हो गया था. हर गली नुक्कड़ पे आवारा लड़कियाँ खड़ी रहती, आते जाते लड़को पर फब्तियाँ कसती, उन्हें भद्दे इशारे करती, और मौक़ा लगने पर चोंटी तक काट लेती. गांव के बस स्टॉप, पान कि दुकान, चाय कि दुकान, पंसारी यहाँ तक के पंचयात तक में उन्होंने अपना कब्ज़ा जमा लिया था. जब देखो, जहाँ देखो लड़कियां ही खड़ी दिखती. एक-आध लड़का भूले-बिसरे वहां से चल गुजरता तो बस, सब उसपर लपक पड़ती.
लड़को ने अकेले घर से निकलना तक बंद कर दिया था. खासकर के शाम के वक़्त तो हर जगह सिर्फ लड़कियां ही लड़कियां दिखाई पड़ती. जब लड़को का पूरा समय अंदर बैठ कर दम घुटने लगा तो कुछ हिम्मत वाले लड़को बाहर जाने की कोशिश की. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, लड़कियों ने लड़को को ऐसा सबक सिखाया कि लड़के और भी भयभीत हो गए. आख़िरकार लड़को के माँ-बाप और कुछ शुभचिंतको ने पंचायत के सामने अपनी समस्या रखी, लेकिन ये क्या, पंचायत (जिसमे सब लड़कियां ही थी) ने लड़को का मोबाइल और टी-वी बंद करा दिया.
गांव में एक ही कॉलेज था, उस कॉलेज के गेट पर लड़कियां सुबह सुबह दादी बन के खड़ी हो जाती, और आते जाते लड़को को परेशान करती. लड़को का गेट पे खड़े रहना तो दूर, कॉलेज के अंदर जाना तक दुर्भर हो गया था. लड़को के टाइट कपड़े देख लड़कियां और भी उत्तेजित हो जाती, और उनकी फिगर तो लेकर भद्दी बाते कहती थी. जब लड़को ने कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन से शिकायत की तो, लड़को को ढंग के कपड़े पहनने के लिए कहा गया और एक ड्रेस कोड जरुरी कर दिया. अब कोई लड़का गर्मियों में छोटी बाजू का टी-शर्ट पहन के आता तो उसे वापस घर भेज दिया जाता. बात भी सही थी, माहौल ही इतना ख़राब था, सोच समझ के कपड़े पहनने चाहिए.
लड़को के माँ-बाप ने उन्हें सख्त हिदायत दे रखी थी कि वो आँखे नीची कर के सीधा कॉलेज जाए और वापस घर आएं. कैंटीन में मस्ती करने की, खाली गेट पे तफरी करने की या दोस्ती-यारी में जोर से हंसने या खिलखिलाने की उन्हें बिलकुल मनाई थी. जोर से हंसता या गाना गाता लड़का लड़कियों को आकर्षित कर सकता था, और फिर तो आप सब जानते ही हैं के जमाना ख़राब हो चला था. जो लड़का इन बातो को नहीं मानता उसे तेज और बुरे करैक्टर के सर्टिफिकेट दिए जाने लगे.
अब हर तरफ लड़को कि इज़्ज़त को खतरा था. और चूँकि घर की इज़्ज़त लड़को के हाथ में होती है, लड़को के घरवालों ने अपनी नाक की खातिर लड़को को घर में रखना शुरू कर दिया. यहाँ तक कि शादी तक जल्दी कराने लगे. लड़को को सिखाया जाने लगा कि लड़के खुली तिज़ोरी कि तरह होते हैं, अगर अपने को ढक के नही रखेंगे तो चोर की तो नज़र तो खराब होगी ही, जमाने को सुधारने से अच्छा है खुद को सुधारो. लड़के या आदमी को अपना शरीर ढक कर रखना चाहिए अगर इस हवसी दुनिया से बचना है. और भी ऐसी अनेको बाते लड़को को समझाई जाने लगी, और सख्त नियम बनाये जाने लगे, कि कैसे लड़कियों का शिकार होने से बचा जाए. शायद लड़कियों को समझाने का किसी ने सोचा ही नहीं, और छोटी लड़कियां बड़ो के देखा देखी में उन्ही जैसे बनने कि कोशिश करती.
यहाँ तक कि फिल्मों और नाटको में ऐसी ही लड़की को हीरोइन बताया जाने लगा, जो लड़के के पीछे पड़ जाए, सीटी बजाये, आँख मारे, भद्दे कमेंट करे, और उसकी ना में भी हाँ ही सुने. और लड़के ऐसे ही अच्छे बताए जाने लगे जो अपने काम-से-काम रखें, आँख नीची कर के चले और आख़िरकार अपने घरवालों की नाक की खातिर अग्नि-परीक्षा दे डाले. अब छोटी लड़कियां टीवी पर ही अपने आइडियलस ढूंढ़ती और उनकी नक़ल करती, और क्यूंकि सीधे-सीधे लड़को से बात करना समाज ने बैन कर रखा था, वो फिल्मों से ही लड़को के बारे में जानकारी पाती.
जब भी कोई लड़की किसी लड़के को तंग करती या उठा ले जाती और उसके साथ बतमीज़ी करती तो लड़को पर ही लड़कियों को अट्रेक्ट करने का इलज़ाम लगाया जाता. पुलिस (जोकि लड़कियां ही थी) उनसे भद्दे सवाल पूछती और अकेले शाम को उनके निकलने के मकसद पर सवाल करती. मीडिया लड़को के चेहरे को ब्लर कर के बार बार उनके अकेले घर से निकलने के कारण पूछती. अब लड़के खुद भी समझने लगे थे, अब उन्होंने खुद ही बाहर जाना बंद कर दिया था, अब वो सोच समझ कर कपड़े पहनते और अपने दोस्तों को भी समझाते.
लेकिन जब छोटे लड़को को भी परेशान किया जाने लगा और दो-तीन साल के लड़को के साथ भी कुकर्म होने लगे तब पानी सर से गुजर गया. और उन्हें पूरे सिस्टम पर शक होने लगा. जब ऐसी ऐसी घटनाएँ सामने आने लगी कि सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो जाते, तब लड़को ने एक जुट हो धरने करने का फैंसला किया. अब एक दो घटनाएँ नहीं पूरा सिस्टम ही गड़बड़ लगने लगा था. अब वो और नहीं सह सकते थे और सड़को पे उतर आये.
अब उन्हें अपनी इज़्ज़त से प्यारी आज़ादी थी. एक बार रात को अकेले घूमने का सुख देखा तो उन्हें भी लड़कियों के जैसे आज़ादी का मन करने लगा था. अब वो भी अकेले रात को बाइक चलाना चाहते थे. अब उन्हें भी रात को खेत की ठंडी हवा में घूमना था. अब उन्हें पता चल गया था, कि खुद कैसे ही कपड़े पहन लें, जब तक लड़कियाँ उन्हें अपने बराबर का इंसान नहीं समझेंगी, उन्हें अकेले देख हमेशा झपट ही पड़ेंगी. और अपने बराबर तब तक नहीं समझेंगी, जब तक उन्हें हर तरफ उतनी ही गिनती में लड़के नहीं दिखाई देंगे जितनी के लड़कियां. जब ड्रेस कोड सिर्फ लड़को पर नहीं लगाया जायेगा. जब मोबाइल फ़ोन की गलती ना बता लड़कियों की गलती बताई जायेगी. जब इलज़ाम चाउमिन पर नहीं सीधे सीधे गुनहगार को दिया जाएगा. जब वो घर की इज़्ज़त का टोकरा ढोना बंद कर देंगे. जब घरवाले लड़को को घर में बंद ना कर, लड़कियों को लड़को कि इज़्ज़त करना सिखाएंगे. अब वो सब समझ गयी थी, लेकिन समस्या समाज की नसों में फ़ैल गयी थी और उन्हें पता था कि अब तो उलट-फेर ही उपाय है. एक-दो टहनियाँ नहीं अब तो जड़ो को काटना था.
और जब जड़े कटती हैं तो कुछ घोंसले भी टूटते हैं, और बेगुनाह पंछी भी बेघर होते हैं. लेकिन बदलाव तो लाना था, क्यूंकि और कोई चारा बचा ही नहीं था. गौर करें सब लड़कियां बुरी नहीं थी, कुछ लड़कियां तो लड़को के साथ उनकी लड़ाई तक में खड़ी थी. लेकिन सदियों से परेशान होते लड़को को लड़की जात पे ही शक होने लगा था. एक लड़के पर अत्याचार होता तो गालियां पूरे लड़की समाज को पड़ती. अब लड़ाई बड़ी थी तो इक्की दुक्की शरीफ लड़कियां भी लपेट में आई. लेकिन लड़ाई तो जायज़ थी और जारी रहेगी.
(ref -palpalindia.com)

Saturday, August 23, 2014

मंदिर और हम मुसलमान

मेहनाज खान 
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अगर कहीं मस्जिद का आधार था और भूलवश उसपर मंदिर बनी तो हिन्दुओं को चाहिए की वो मुसलामनों को उसका मस्ज़िद धरोहर की तरह दें और मंदिर अन्य जगह बना लें। मुसलमानों को चाहिए की हर उस मस्ज़िद को अन्यत्र बना लें जो ठीक मंदिर ऊपर बना हो। और सबसे बड़ी बात जिस 'बाबर' को पूरा हिन्दोस्तान आक्रमणकारी, आततायी, विध्वंसकारी, भारतीय सभ्यता को नष्ट करनेवाला और अपनी व्यवस्था थोपने वाला मानता हो .. हम मुसलमान कैसे फिर उसके विरासत और अवशेषों को सहेजने का काम कर सकते हैं .... ??? बाबरी का विध्वंस 'हिन्दुओं' ने किया यह बहुत ही दुखद है … यह काम तो हम मुसलमानों को ही कर देना चाहिए था।
सरकार और सुप्रीमकोर्ट
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सरकार कोई भी हो यदि इन मुद्दों से संवेदनशील कहकर बचना चाहती है तो तो शर्मनाक है साथ ही इसे ठंढे बस्ते में गुसेड़े रखना सुप्रीम कोर्ट का एक बहुत बड़ा भूल है। क्यों ? क्योंकि इसतरह वे और हम अपने आने वाले पीढ़ी को क्या दे रहे हैं --- एक विवाद ! जरा सोचिये क्या इस विवाद के रहते हमारा भारत स्थिर रह सकता है ??? क्या भाईचारे और संविधान के धार्मिक निष्पक्षता का पाठ बरक़रार रह सकता है ? जरा सोचिये …
ऐतिहासिक दृष्टिकोण
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मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, किलिमंजारो, लोथल और भी कई जगहों पर खुदाई हुई और दुनिया साक्षी है और हम मुसलमान भी मानते हैं की भारत मानवीय सभ्यता के विकास का प्रथम क्षेत्र है और साथ ही खुदाई के बाद इन जगहों से जो अवशेष मिले हैं वो हिन्दू देवी-देवताओं के ही मिले हैं। न तो कहीं इस मशीह की मूर्ती या क्रूस मिला न ही कोई इस्लामिक मजार या कब्रगाह .... इतिहास साफ कहता है भारत में मुसलमानों का आगमन ठीक उसी तरह हुआ जिसतरह पुर्तगाली और ब्रिटिस आये .... हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए हिन्दू सनातनियों का जिन्होंने हमें गले लगा लिया और हम भी हिंदुस्तानी सरजमीं में घुल गए।

Wednesday, April 30, 2014

देश के साथ गद्दारी करने से बेहतर है अपनी कौम के साथ गद्दारी करना

मेरे एक मुस्लिम मित्र है ,बेहद सज्जन व्यक्ति है राजनीतिक विषयों पर उनसे कभी ज्यादा चर्चा नहीं हुई ,न वो करना पसंद करते लेकिन इस बार उन्होंने अपने मतदान के विषय में दिलचस्प वाकया बताया ..

उन्होंने कहा कि मतदान की पूर्व संध्या पर हमारे मुस्लिम बहुल मोहल्ले में  और घर में यह निश्चित हो गया था कि भाजपा को हराने के लिए वोट करना है ,जो प्रत्याशी भाजपा को मजबूत टक्कर दे रहा है सिर्फ उसी को वोट देना है चाहे वो किसी भी दल का हो ,मतलब हर हाल में भाजपा को हराने के लिए वोट देना है इसलिए काँग्रेस को वोट देना तय हुआ लेकिन घर /समाज के इस निर्णय से मेरे मन में पूरी रात भारी उथल पुथल रही कि हम किसी को जिताने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ भाजपा को हराने के लिए वोट करने वाले है .बचपन से यह देखता आ रहा हूँ कि मुस्लिम कौम (95  फीसदी) भाजपा के हमेशा खिलाफ रही है कभी  90 के दशक में मंदिर -मस्जिद के नाम पर मुस्लिम खौफजदा थे /या किये जा रहें थे  और अब  2002 के बाद गुजरात दंगो के नाम पर ..कुल मिलाकर दूसरी पार्टी के नेताओं ने अपनी चुनावी कैम्पेन में हमेशा मुस्लिमों को भाजपा से जम कर डराया ... खैर माहौल का असर मुझ पर भी था और मै भी भाजपा को पसंद नहीं करता था ..इन सब के बीच मतदान करने की बारी आयी तो पिछले कई घंटो से मेरे मन ने काँग्रेस को लेकर भारी उथल -पुथल भी थी ,मै "काँग्रेस "को किसी भी हालत में दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहा था ,मेरी नजर में काँग्रेस को वोट देने का मतलब अपनी आत्मा और अपने देश के साथ गद्दारी करना था क्योंकि कांग्रेस ने अपने महा भ्रष्टाचार से इस देश को लूट लिया था  ,काँग्रेस ने सिवाए वादों के हमारी कौम को भी क्या दिया है ?सभी पार्टियों ने हमें सिर एक ही चीज दी है वो है सिर्फ  भाजपा से डर /भाजपा से नफरत ,नोटा का बटन मै दबाना नहीं चाहता था ..इसी उहापोह में मैंने सोचा कि हर बार भाजपा के खिलाफ वोट देते है चलो  इस बार भाजपा को वोट दे कर देखते है ,मोदी को भी आजमा कर देखते है ,मोदी हमें देश से थोड़ी निकाल देगा ,देखते है वो क्या करता है ?क्या करेगा ..इसी बात को सोचते सोचते मैंने ईवीएम मशीन में कमल का बटन दबा दिया ..वोट देने के बाद भी सोचता रहा/समझता रहा /खुद को समझाता रहा कि क्या कर दिया लेकिन बाद में मैंने अपने आप को दृढ करते हुए सोचा कि देश के साथ गद्दारी करने से बेहतर है अपनी कौम के साथ गद्दारी करना ..मैंने तो अपना वोट दे दिया अब जिसे जो सोचना है सोचे या कहे ...vote for change

Monday, February 24, 2014

मनोविज्ञान की किताब में पत्नी ,प्रेमिका ...

किसी ने अपनी मनोविज्ञान की किताब में लिखा है की हर आदमी की जिंदगी में एक पत्नी आती है ,,दो प्रेमिकायें आती है और तीन औरतो से वो बाजार में पैसा देकर सबंध बनाता है ।(कहीं पढ़ा )

Tuesday, February 18, 2014

कश्मीर में भारत विरोध का स्वर

शशांक द्विवेदी
पिछले हफ्ते जम्मू -कश्मीर प्रवास के दौरान मैंने कई हिंदू -मुस्लिम युवाओं से विभिन्न मुद्दों पर लंबी  बात की ,उनसे बात करके कई बातें ऐसी आई जो मै पहली बार सुन रहा था .एक मुस्लिम नवयुवक(काफी पढ़ा -लिखा और ३ सरकारी नौकरी छोड़कर अब एक स्कूल का मालिक ) ने बातचीत के दौरान कहा कि कश्मीर के अधिकांश लोग अपना अलग देश चाहते है ,भारत और यहाँ की आर्मी के बारे में उसकी राय काफी खराब थी , भारत को हिंदू बहुल देश मानने की वजह से उसने कहा कि इस्लामिक  आधार पर पाकिस्तान हमारे दिल के ज्यादा नजदीक है..उस युवा ने बिना किसी लागलपेट के मेरे हर सवाल का जवाब बिना कोई झूठ बोले बहुत संजीदगी से  दिया मसलन उसने कहा कि अधिकांश कश्मीरी आर्मी से बेहद नफरत करते है और अलगाववादी आतंकवादियों का समर्थन करते है उन्हें खाना देते है ,पनाह देते है यहाँ तक कि मरने के बाद उनसे सहानुभूति भी जताते है ,अधिकांश कश्मीरी हमेशा पाकिस्तान से लगाव महसूस करते हुए उसे हर जगह जीतते हुए देखना चाहते है ,उसने खुद कहा कि खेल के मैदान में भी हम पाकिस्तान को ही जीतते देखना चाहते है .उस युवा ने अपने दिल की हर बात बहुत ईमानदारी से रखी ,उसने ये नहीं सोचा कि मुझे उसकी बात अच्छी लगेगी या बुरी बल्कि उसने वही कहा जो उसे सच लग रहा था .देश के नेताओं पर उसकी पसंद के बारे में पूछने पर उसने कहा कि अरविंद केजरीवाल उसे बहुत पसंद है .मैंने चौक्तें हुए इसका कारण पुछा तो उसने कहा कि केजरीवाल के प्रधानमंत्री बनते ही हमारा अलग देश बन जाएगा या हम पाकिस्तान में मिल जायेगें क्योंकि उनकी पार्टी के नेता जनमत संग्रह का समर्थन करते है .इस बात पर मैंने उससे कहा कि ऐसा नहीं है केजरीवाल ऐसा नहीं सोचते है और ये संभव नहीं है ,ये कभी नहीं होगा तो उसने कहा कि जरुर होगा !! उसने कहा कि अधिकांश कश्मीरी नरेंद्र मोदी से सख्त नफरत करते है क्योंकि वो हिंदू वादी नेता है ..नवयुवकों से बातचीत के दौरान मुझे जम्मू –कश्मीर में हिंदू –मुस्लिम खाई साफ़ तौर पर नजर आई जम्मू का लगभग हर हिंदू नरेंद्र मोदी के पक्ष में लामबंद दिख वहीं मुस्लिम इसके जबर्दस्त विरोध में दिखे ...

खैर बातचीत के दौरान जिसने जो भी कहा लेकिन सबने हम जैसे टूरिस्ट को भगवान कहा ,सब लोगों ने कहा कि आप लोगों की वजह से ही हम जिंदा है ..लगभग सभी लोगों ने तहेदिल से मेरा स्वागत किया ,अच्छे से बात की ,सम्मान किया ,यात्रा के दौरान खूब मदत की ...लेकिन जम्मू –कश्मीर यात्रा के दौरान की गई बातचीत ने मेरे मन –मष्तिष्क में काफी गहरा असर डाला ,सोचता रहा कि क्यों कश्मीर के लोग आज भी भारत को अपना नहीं पाए ,क्यों आज तक भारत को अपना देश नहीं मान पायें ...

वर्जिनिटी का मुकुट

 मनीषा पांडे
अगर मुझे अपने परिवेश से इस बात के लिए भयानक गुस्‍सा है कि बचपन में उन्‍होंने मुझे एक मूर्ख, डरपोक और वर्जिनिटी का मुकुट गर्व से भरकर अपने माथे पर सजाने वाली लड़की की तरह पालने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो मुझे थोड़ा दुख अपने भाइयों के लिए भी मना लेना चाहिए क्‍योंकि उनको भी कठोर ताड़ का पेड़, प्रेमरहित ठूंठ बनाने में इस सिस्‍टम ने कोई कसर नहीं छोड़ी। मुझे सिखाने की कोशिश की कि तुमको अपने जीवन की कोई जिम्‍मेदारी लेनी की जरूरत नहीं। बाप पालेंगे, बियाह कर देंगे और उसके बाद पति जिंदगी भर पालता रहेगा। तुम्‍हें सोचने की क्‍या जरूरत कि तुम कैसे सर्वाइव करोगी। और मेरे भाइयों के दिमाग में बचपन से ठूंस दिया गया कि शादी के बाद बीवी-बच्‍चों को पालना है, बुढ़ापे में मां-बाप को पालना है। बेचारा, जिंदगी भर सबको पालता ही रहे। मैं कमजोर और भावुक हो सकती थी, रो सकती थी, चंचल हो सकती थी, लेकिन बेचारे मर्दानगी से भरे भाइयों को रोना अलाउ नहीं था। वो मर्द के पट्ठे हैं। छाती तानकर लाठी भाजेंगे, खून बहाएंगे, लड़के के सीने में सिर छुपाकर रोएंगे थोड़े न। मुझे सिखाने की कोशिश हुई कि अच्‍छी, चरित्रवान लड़कियों को शादी के पहले किसी मर्द को हथेली की सबसे छोटी उंगली का पोर भी छूने की इजाजत नहीं देनी चाहिए और भाई के लिए नो वर्जिनिटी टैग। बेचारे भाई, खून से खत लिखते फिरते, अपनी बहनों की वर्जिनिटी को सात तालों में, सात पर्दों में रखते और खुद बेचैन फिरते कि कोई तो मिल जाए। भाई खुद किस करना चाहते थे और बहनों को किस से वंचित रखना चाहते थे। अब कैसे करेंगे किस क्‍योंकि तुम्‍हारी बहन पर निगाह टिकाए आदमी ने भी तो अपनी बहन को बंद कर रखा है। कैसा दुखद कुचक्र है। बहनें किस कर नहीं पाती थीं और भाइयों को किस करने के लिए कोई मिलती नहीं थी। वर्जिन तो रह गए दोनों ही।
नॉउ कुकिंग इज सच ए फन, बेचारे भाई जानते ही नहीं। किसी को प्‍यार करना, उसके लिए अपने हाथों से कुछ बनाना कितने मजे की बात है। दिल भीग-भीग जाता है प्‍यार से। लेकिन भाइयों को क्‍या मालूम, उन्‍हें तो सिर्फ ऑर्डर लगाना सिखाया गया। बच्‍चे की नैपी चेंज करना भी फन है। मुझे तो मजा आता है। "ओ लिटिल मंकी, ज्‍यादा कूदो मत। इतना हिलोगी तो नैपी कैसे बदलूंगी। यार प्‍लीज, मुझे मजा आ रहा है क्‍या तुम्‍हारी गीली नैपी बदलने में। दो मिनट, हिलना बंद करो। अरे वाह, हो गया। अब फिर सूसू कर देना दस मिनट में।" भाई लोग ऐसे प्‍यार में भीगे-नहाए नन्‍ही परी से बात करते हुए उसकी नैपी नहीं चेंज करते। ठूंठ हो गए हैं सब, मर्दानगी में। बेचारे, जानते ही नहीं कि उनकी परवरिश ने उन्‍हें किन नाचुक चीजों से वंचित कर दिया। सबके सिर पर बहन-बीवी की इज्‍जत बचाने का बोझ लदा हुआ है। अब बहन-बीवी खुद की इतनी सक्षम हो तो उनका बोझ कम होगा। लेकिन नहीं, लादे रहो अपने सिर पर। अपनी पत्नियों-प्रेमिकाओं के साथ बिस्‍तर पर ऐसे अहंकारी गुंडे। अपना काम किया, कट लिए। उफ, लड़कियां थोड़ा उनके लिए भी दुख मनाएं क्‍योंकि बिलीव मी, दे आर डिप्राइव्‍ड ऑफ द जॉय ऑफ रीअल लव मेकिंग। बेचारे बहुत-बहुत वंचित हैं। नहीं जानते, सचमुच प्‍यार क्‍या होता है।
इस समाज के पुरुष भी बहुत वंचित हैं। प्‍यार से वंचित हैं, घर के कामों में शेयरिंग के सुख से वंचित हैं, स्‍त्री की दोस्‍ती से वंचित हैं, बच्‍चे का टिफिन तैयार करने के सुख से वंचित हैं।
चलो, थोड़ा दुख उनके लिए भी मनाएं।


Tuesday, January 21, 2014

मोरल फोबिया मिटाने के नाम पर

देखते-देखते हमारा समाज ग्लोबल सेक्स इंडस्ट्री के चक्रव्यूह में जा फंसा है 
प्रभु जोशी 
एड्स को लगभग मृत्यु का पर्याय बताते हुए उससे बचने के लिए जिस तरह कंडोम-प्रमोशन कार्यक्रम भारत में चलाया गया, उसने भारतीय समाज में सेक्स को इतना पारदर्शी बना दिया कि यौन-उद्योग के भारत में पदार्पण की संभावनाएं खड़ी हो गईं। आज दुनिया भर में पोर्न के पंसारी फैल चुके हैं और हमारी युवा पीढ़ी में तो पोर्न क्लिप्स एक किस्म का सांस्कृतिक आदान-प्रदान बन गई हैं। यह बदलाव अचानक और अपने आप नहीं आया है। हमारे देखते-देखते विज्ञापनों में एक नया नाको-निर्मित टेलीजेनिक बाप पैदा हो गया जो अपने आधुनिक बेटे की जींस की जेब में कंडोम रखते हुए एक महान पैतृक दायित्व की पूर्णता में मुस्कुराने लगा। क्लोज शॉट में मांएं भी अपनी स्मार्ट पुत्री को सुरक्षा की सलाह देती हुई बरामद होने लगीं। युवा की छवि में जींस, गॉगल्स, मोबाइल के साथ अब कंडोम का होना भी अनिवार्य हो गया। कंडोम को काउंटर पर खरीदने में सांस्कृतिक-संकोच वाला प्रौढ़ मूर्ख सिद्ध हुआ और धड़ल्ले से बेधड़क होकर मनचाहा ब्रांड मांगने वाला युवक अग्रगामी। 
कुल मिलाकर कंडोम प्रमोशन अभियान ने भारतीय परंपरागत समाज में सेक्स को इतना खुला बना दिया कि क्लासमेट सेक्समेट में बदलने लगे। युवाओं से पूछे जाने पर कि क्या वे सेक्स पर बात कर रहे हैं- 'डू यू टॉक अबाउट सेक्स'- उत्तर आया 'नो, वी डू नॉट... वी डू इट।' इस पर टेलीविजन केंद्र पर आमंत्रित युवाओं ने तालियां दीं। उनकी इन तालियों को तमाचों की तरह व्याख्यायित किया जाने लगा, जो सामाजिक निषेधों के गाल पर पड़ रहे थे। लक्ष्मण रेखा शब्द का हवाला देने वाला हवाला कांड का सा अपराधी हुआ। उसके हलक में हाथ डालकर उसकी जीभ बाहर निकालने के लिए, युवाओं में आक्रामकता भरी जाने लगी। परिवार में युवा, स्वतंत्र नहीं स्वच्छंद हुआ। वह घर का सदस्य नहीं बल्कि एक ही छत के नीचे अन्य सदस्यों के साथ रहने वाला मार्केट-फ्रेंडली इंडिविजुअल में बदल गया। उसका मोबाइल उसका टॉप उसकी जींस उसकी लिबर्टी उसकी प्रायवेसी। कुल मिलाकर निजता की मांग परिवार-विरोधी बनी। 
कहना न होगा कि 'डांसिंग नेकेड इन द माइंड फील्ड' का सच अब भारतीय युवा पीढ़ी का सच है, क्योंकि कंडोम ने भारतीय सांस्कृतिक तलघर का ताला तोड़ दिया है। यह शीर्षक नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक कैरी म्युलिस की दस साल पहले आई किताब का है, जिन्होंने वायरस का परीक्षण कर पहचानने की पीसीएमआर पद्धति खोजी थी और कहा था कि एचआईवी से एड्स होना असत्यापित और गलत है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने जो प्रचारित कर दिया, वही सत्य मान लिया जाता है जबकि यह केंद्र कोई प्रयोगशाला नहीं है। एड्स के प्रकरण पर कई विश्वविख्यात वैज्ञानिकों ने अफसोस प्रकट करते हुए कहा भी कि साइंस कैन डिसीव होल वर्ल्ड ईजिली। अकादमिक स्तर पर एड्स को लेकर सैकड़ों विज्ञान-सम्मत असहमतियां प्रकट की गई लेकिन अमेरिका के औषध-व्यापार की कुटिलता ने सबको दबाकर रख दिया। जाहिर है, एड्स नियंत्रण में मुक्त यौनिक जीवन शैली को प्रश्नांकित किए बगैर केवल कंडोम प्रमोशन' कार्यक्रम पर जोर देना, एक किस्म का 'मोरली डिस्ट्रक्टिव फ्रॉड' है। हकीकत यह है कि इस मुहिम का इस्तेमाल ' सेक्सोनोमिक्स ' ( यौन अर्थव्यवस्था ) को आगे बढ़ाने में किया जारहा है , जिसकी रुचि फिलहाल सबसे ज्यादा स्त्री समलैंगिकता में है। क्रिस्टीन ल्यूकर की पुस्तक ' इंडस्ट्रियलवैजाइना -  पॉलिटिकल इकॉनमी ' के पन्ने पलटें तो हमें इस बात का अंदाज आसानी से लगेगा कि जितनीविदेशी मुद्रा के लिए हमने अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोले , उसकी तुलना में कई गुना हम केवल सेक्स -टॉयज के उत्पादन से अर्जित कर सकते हैं। इसलिए शिकागो स्कूल के शातिर अपनी वित्त बुद्धि से भारत मेंयौनिकता के खुले खेल का मैदान तैयार कर रहे हैं। इसीलिए हमारे कई ' यौनानंदी ' चिंतक समलैंगिकता कोवरेण्य बनाने के लिए तर्कों का बारीक जाल बुना रहे हैं। वे लेस्बियनिज्म को बहनापा जैसे सम्मानजनक नाम सेपुकारते रहे हैं , ताकि एक निर्विघ्न यौन - उद्योग भारत में अपनी पकड़ बना सके। 
कंडोम क्रांति ने निश्चय ही सेक्स व्यापार के लिए दरवाजा बनाया। संसद और सत्ता उसे सिंहद्वार में बदलने कीप्रतिज्ञा प्रकट कर रही है। पोर्न की सर्वांग नग्नता अब युवा पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बना दी गई है। नैतिकता अबमोरल - फोबिया जैसे नाम से अभिषिक्त होकर किसी रोग का दर्जा हासिल कर चुकी है। वे ठीक ही कहते हैं कि 'इंडियन सोसाइटी इज विक्टिम ऑफ मोरल फोबिया '  बेशक , इस भारतीय नैतिक - व्याधि या कि इसपरंपरागत - रोग से निवृत्ति में कंडोम - प्रमोशन कार्यक्रम ने एकमात्र अचूक औषधि का काम किया है। उसकेप्रचार - प्रसार की प्रविधि और दृष्टि ने विवाह को फक - फेस्ट की तरह व्याख्यायित करना शुरू कर दिया है तोनिश्चय ही समलैंगिक - विवाह को भी वैधता मिल ही जाएगी। ' नाज ' उनके पास है , जिसके पास अमेरिकी पूंजीका परनाला है। लेकिन , ' जिन्हें नाज है हिंद पर ' वे गूंगों की जमात में शामिल हो चुके हैं। समलैंगिकता केसवाल पर उनकी घिग्घी बंध चुकी है , गले में जा फंसी जीभ को पक्षाघात हो चुका है। जिनके पास शक्ति औरसत्ता है वे अपना मकसद पूरा करने के लिए न्यायालय को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रहे हैं , उनका हाथपकड़ने वाला कोई नहीं है।