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Sunday, October 9, 2011


प्रभातखबर 5-OCT-2011
स्तरीय तकनीकी शिक्षा वक्त की जरूरत

तकनीकी शिक्षा के मौजूदा सत्र में देश में बड़े पैमाने पर सीटें खाली रह गयीं. अकेले यूपी में 70,000 जबकि राजस्थान में 17,000 सीटें खाली रह गयीं. ऐसे ही आंकड़े लगभग हर राज्य के हैं. यह पहली बार हो रहा है कि एक तरफ़ सरकार उच्च शिक्षा के बाजारीकरण पर जुटी है, दूसरी तरफ़ लोगों का रुझान इस तरफ़ कम हो रहा है.
देश की उन्नति और विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का ढांचा और मजबूत होना चाहिए, लेकिन सरकार सिर्फ़ इसे व्यावसायिक बनाने में जुटी है. देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी के बिना लगातार कॉलेज खुल रहे हैं. लोगों को यह एक अच्छा व्यवसाय नजर आने लगा है. पिछले दिनों इस पर योजना आयोग ने अपना दृष्टिकोण-पत्र जारी किया है. आयोग चाहता है कि ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना के लिए अनुमति दे दी जानी चाहिए, जिनका उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना हो.
दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक 1 अप्रैल 2012 से शु हो रही 12वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा, खासकर तकनीकी शिक्षा, के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाने की जरूरत है. अभी इस दृष्टिकोण-पत्र पर सरकार की मुहर नहीं लगी है. इसके बावजूद यह सुझाव पिछले वर्षो में उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में चली चर्चा के अनुरूप ही है. विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखा खोलने की इजाजत के साथ भी यह बात जुड़ी हुई है कि वे सिर्फ़ मुनाफ़े की संभावना दिखने पर ही यहां आयेंगे.
व्यापारीकरण, व्यावसायीकरण तथा निजीकरण ने शिक्षा क्षेत्र को अपनी जकड़ में ले लिया है. मंडी में शिक्षा क्रय-विक्रय की वस्तु बनती जा रही है. इसे बाजार में निश्चित शुल्क से अधिक धन देकर खरीदा जा सकता है. परिणाम: शिक्षा में भिन्न प्रकार की जाति प्रथा जन्म ले रही है, जो धन के आधार पर आइआइटी, एमबीए, सीए, एमबीबीएस आदि उपाधियों के लिए प्रवेश पाकर उच्च भावना से ग्रस्त और धनाभाव के कारण प्रवेश से वंचित हीनभावना से ग्रस्त रहते हैं.
दोनों ही श्रेणियों के छात्र ग्रस्त हैं. सामाजिक असंतुलन और विषमता इसका ही परिणाम है. शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था एवं शिक्षकों का उद्देश्य व्यावसायिक हितों के अनुरूप शिक्षा का बाजारीकरण करना हो गया है. वहीं शिक्षा ग्रहण करने वाले शिक्षार्थी का एकमात्र लक्ष्य अधिक नंबर लाकर ऊंचे वेतन वाले पदों को प्राप्त करना रह गया है. इससे व्यावसायिक एवं स्वार्थपरक व्यक्ति‍त्व युक्त युवा पीढ़ी का निर्माण हो रहा है.
गांधी जी ने कहा था कि देश की समग्र उन्नति और ओर्थक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का गुणवत्ता पूर्ण होना जरूरी है. उन्होंने इसे प्रभावी बनाने के लिए कहा था कि कॉलेज में हाफ़-हाफ़ सिस्टम हो, यानी आधे समय में किताबी ज्ञान दिया जाये और आधे समय में व्यावहारिक पक्ष बताकर उसका प्रयोग सामान्य जिंदगी में कराया जाये. भारत में तो गांधी जी की बातें ज्यादा नहीं सुनी गयी, लेकिन चीन ने इसे पूरी तरह से अपनाया. आज स्थिति यह है कि उत्पादन की दृष्टि में चीन भारत से बहुत आगे है.
भारतीय बाजार चीनी सामानों से भरे-पड़े हैं. दिवाली और रक्षाबंधन जैसे भारतीय त्योहारों पर भी बाजार में सबसे ज्यादा पटाखे और राखियां चीन की ही बनी हुई मिलती है. वास्तव में हम अपने ज्ञान को ज्यादा व्यावहारिक नहीं बना पाये हैं. देश के विकास के लिए हमें अधिक से अधिक योग्य इंजिनियर चाहिए. आज कोरिया में 95, चीन व जर्मनी में 80, ऑस्ट्रेलिया में 70, ब्रिटेन में 60 फ़ीसदी युवक तकनीकी शिक्षा से लैस हैं, जबकि भारत में तकनीकी शिक्षा पाने वाले युवाओं का प्रतिशत महज 4.8 है. देश की आबादी में प्रतिवर्ष 2.8 करोड़ युवा जुड़ जाते हैं तथा 1.28 करोड़ युवाओं की लेबर फ़ोर्स में एंट्री होती है, लेकिन इनमें से सिर्फ़ 25 लाख ट्रेंड होते हैं. जबकि जो रोजगार पैदा हो रहे हैं, उनमें 90 फ़ीसदी ऐसे रोजगार हैं, जिसमें तकनीकी शिक्षा की जरूरत होती है.
सरकार तकनीकी शिक्षा प्रणाली में बदलाव के लिए जो कदम उठा रही हैं, मसलन प्रवेश परीक्षाओं से लेकर सिलेबस तक में जो बदलाव किये जा रहे हैं, उनका एक ही मकसद है कि कैसे भारत में दुनिया के बाजार के लिए पेशेवर लोगों की फ़ौज तैयार की जाये. इसके जरिये हम अपनी समस्याओं को नहीं तलाश रहे हैं, बल्कि दुनिया के लिए प्रशिक्षित नौकर तैयार कर रहे हैं. इससे हमारे नौजवान सिर्फ़ तकनीकी डिग्रियां हासिल कर वैश्विक बाजार में दोयम दर्जे की नौकरी कर रहे होंगे. तकनीकी क्षेत्र में कुछ नया नहीं कर पायेंगे.
हां, हमारे नौजवानों को नौकरी मिल जायेगी और इस सस्ती फ़ौज की बदौलत दुनिया मुनाफ़ा कमायेगी. इसलिए ऐसे प्रस्ताव से सिर्फ़ विदेशी कंपनियों को फ़ायदा होगा. आज जरूरत है ऐसे तकनीकी ज्ञान की, जो वास्तविकता के धरातल पर हो और व्यावहारिक भी हो, जो कुछ सकारात्मक कर पाने के लिए नौजवानों में समझ और उत्साह पैदा करे.
(शशांक द्विवेदी : इंजीनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.)