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Tuesday, May 1, 2012

तकनीकी शिक्षा


तकनीकी शिक्षा के लक्ष्य का क्या होगा
हिन्दुस्तान लेख 
शशांक द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर, सेंट मार्गरेट इंजीनियरिंग कॉलेज

यह पहला मौका है, जब देश के 14 राज्यों के 143 तकनीकी शिक्षण संस्थानों ने अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी एआईसीटीई से अपने पाठय़क्रम बंद करने की इजाजत मांगी है। इस बार देश में तकनीकी शिक्षा के मौजूदा सत्र में कॉलेजों में बड़े पैमाने पर सीटें खाली रह गई थीं। जहां कुछ साल पहले तक तकनीकी शिक्षण संस्थान खोलने की होड़-सी मची थी, वहीं अब इन्हें बंद करने की इजाजत मांगने वालों की लाइन लगी हुई है। शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान रखे बगैर जिस तरह से पूरे देश में तकनीकी कॉलेजों की बाढ़-सी आ गई थी, ऐसे में एक दिन यह तो होना ही था।
देश में यह पहली बार हो रहा है कि एक तरफ तो सरकार उच्च शिक्षा के व्यापारीकरण पर जुटी है, वहीं दूसरी तरफ, लोगों का रुझान इस ओर कम हो रहा है। पिछले दिनों इस पर योजना आयोग ने अपना दृष्टिकोण-पत्र जारी किया था। उस दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक आयोग चाहता है कि ऐसे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना के लिए अनुमति दी जाए, जिनका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो। दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक, 12वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा, खासकर  तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने की जरूरत है। यह सुझाव पिछले वर्षों के दौरान उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में चली चर्चा के अनुरूप ही है, क्योंकि विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखा खोलने की इजाजत के साथ भी यह बात जुड़ी हुई है कि वे मुनाफे की संभावना दिखने पर ही यहां आएंगे।
शिक्षा के अधिकार के बाद से सरकार और उसके संसाधनों पर प्राथमिक शिक्षा के लिए दबाव बढ़ा है, इसीलिए न सिर्फ केंद्र सरकार, बल्कि राज्यों की सरकारें भी उच्च शिक्षा के निजीकरण की बातें करने लगी हैं। यह उम्मीद की जाती रही है कि निजीकरण के बाद गुणवत्ता नियामक संगठन इन संस्थानों की गुणवत्ता पर नजर रखेंगे। एआईसीटीई जैसे संगठन इसी सोच के साथ बने थे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया जैसे कई संगठन तभी से यह काम कर रहे थे, जब उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थान आए भी नहीं थे। निजीकरण के बाद ज्यादातर कॉलेज और ये संगठन उम्मीद पर खरे नहीं उतर सके। मोटी फीस लेकर तरह-तरह की तकनीकी शिक्षा देने वाले कॉलेजों की बाढ़ आ गई। देश भर में इनकी रंगी-पुती भव्य इमारतें तो दिखने लगीं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता कहीं नजर नहीं आई। पोल खुलने के बाद अब ये कॉलेज पाठय़क्रम बंद करना चाहते हैं।
अगर ये पाठय़क्रम बंद होते हैं, तो तकनीकी शिक्षा के हमारे लक्ष्य का क्या होगा? सरकार निजीकरण तो चाहती है, लेकिन जो व्यवस्था बनी है, उसमें भारी खर्च के बावजूद गुणवत्ता वाली शिक्षा लोगों को मिल सके, इसकी कोई गारंटी नहीं है। पर हमारा लक्ष्य तो यही है। हिन्दुस्तान में 01/05/2012 को प्रकाशित 
article link"http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-230613.html"

Thursday, April 19, 2012

शोध और अनुसंधान

हिन्दुस्तान लेख 


वैज्ञानिक अनुसंधान की जरूरत ही किसे है
शशांक द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर, सेंट मार्गरेट इंजीनियरिंग कॉलेज

इसमें कोई नई बात नहीं हुई। हमेशा की तरह इस बार भी विज्ञान कांग्रेस में चिंता का विषय यही रहा कि हमारे यहां विज्ञान पर शोध ज्यादा नहीं हो रहा है। चीन हमसे काफी आगे निकल गया है, वगैरह-वगैरह। यही बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्घाटन के समय कही और इसी की गूंज पूरे सम्मेलन में सुनाई देती रही। वैज्ञानिक शोध पर होने वाले खर्च को बढ़ाना, जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना, छात्रों को इसके लिए प्रोत्साहन देना, समाज में वैज्ञानिकों को महत्व दिया जाना, ये तमाम बातें इस संदर्भ में अक्सर कही जाती हैं, लेकिन बात कभी इससे आगे नहीं बढ़ती।
हमारे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान कम हो रहे हैं, इससे ज्यादा चिंता की बात है कि वे लगातार घटते जा रहे हैं। कभी दुनिया भर में होने वाले शोधकार्यों में भारत का नौ फीसदी योगदान था, आज यह घटकर महज 2.3 फीसदी रह गया है। यह भी सच है कि वैज्ञानिक अनुसंधान की जरूरत ही किसे महसूस हो रही है। देश में इस्तेमाल की जाने वाली ज्यादातर तकनीक पूरी तरह से आयातित है। इनमें 55 फीसदी तो बिना किसी बदलाव के ज्यों की त्यों इस्तेमाल होती है और 45 फीसदी थोड़ा-बहुत परिवर्तन के साथ इस्तेमाल होती है। विकसित तकनीक के लिए आयात पर निर्भरता के कारण उद्योग जगत की भी देसी अनुसंधानों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उद्योग जगत ऐसे अनुसंधानों में न तो कोई दिलचस्पी रखता है और न ही इसमें निवेश करना चाहता है। यही वजह है कि भारतीय प्रतिभाएं व वैज्ञानिक विदशों में जाकर शोध करना ही बेहतर मानते हैं।
जब हम वैज्ञानिक शोध की बात करते हैं, तो हमें एक नजर उच्च शिक्षा पर भी डाल लेनी चाहिए। देश की आबादी का मात्र 10-11 फीसदी हिस्सा ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाता है। इसके विपरीत जापान में 70-80 प्रतिशत, यूरोप में 45-50 फीसदी, कनाडा और अमेरिका में 80-90 प्रतिशत लोग उच्च शिक्षा लेते हैं। हमारे देश की हर 10 लाख आबादी पर सिर्फ 112 लोग वैज्ञानिक शोध में लगे हुए हैं। इस संख्या को बढ़ाने के लिए उच्च शिक्षा और उसकी गुणवत्ता को बढ़ाना सबसे जरूरी काम है। इसके अलावा दुनिया के ज्यादातर विकसित देश वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के लिए अपने रिसर्च फंड का 30 फीसदी तक हिस्सा विश्वविद्यालयों को देते हैं, मगर अपने देश में यह अंश सिर्फ छह प्रतिशत है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों के अंदरूनी हालात ऐसे हो गए हैं कि वहां शोध के लिए स्पेस काफी कम रह गया है। पिछले कुछ समय में शिक्षा पर हमने काफी काम किया है, लेकिन यह काम मूल रूप से व्यावसायिक शिक्षा तक ही सीमित है। आईआईटी जैसे संस्थानों की दुनिया भर में ख्याति व्यावसायिक कारणों से ही है। यही हालांकि चीन में भी हुआ है,पर चीन ने फंडामेंटल रिसर्च को नजरअंदाज नहीं किया है। दरअसल, अब इसी पर ध्यान देने का समय है।  हिन्दुस्तान में 10/01/12 को प्रकाशित 
लेख लिंक
http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-211014.html

बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है ऊर्जा संरक्षण

हिन्दुस्तान लेख 
बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है ऊर्जा संरक्षण
शशांक द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर, सेंट मार्गरेट इंजीनियरिंग कॉलेज
ऊर्जा किसी राष्ट्र की प्रगति, विकास व खुशहाली का प्रतीक होती है और खुशहाली की यह राह ही ऊर्जा संकट तक भी जाती है। आज ऊर्जा के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग के कारण जहां एक ओर ऊर्जा खत्म होने  की आशंका प्रकट हो गई है, वहीं दूसरी ओर मानव जीवन, पर्यावरण, भूमिगत जल, हवा, पानी, वन, वर्षा सभी के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता बाल्टर कान का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले तेल और प्राकृतिक गैस का कुल उत्पादन 10 से 30 साल बाद चरम पर होगा, उसके बाद उनमें तीव्र गिरावट आएगी। यानी इनके विकल्प तलाशने का समय आ गया है।
भारत की दिक्कत यह है कि वह जीवाश्म ईंधन यानी पेट्रोल, डीजल, गैस, कोयले आदि में आत्मनिर्भर नहीं है। बाकी दुनिया में भी यह ईंधन काफी तेजी से कम होता जा रहा है। वह भी उस दौर में, जब ऊर्जा की हमारी जरूरतें बहुत तेजी से बढ रही हैं। दूसरी तरफ, 10वीं पंचवर्षीय योजना में 41,000 मेगावाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन के लक्ष्य के मुकाबले मात्र 21,200 मेगावाट उत्पादन ही हो पाया। 11वीं योजना में 78,577 मेगावाट अतिरिक्त उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था, जिसे संशोधित कर 62,375 मेगावाट कर दिया गया। हर अगली पंचवर्षीय योजना में हमें ऊर्जा उत्पादन को लगभग दोगुना करते जाना होगा। मांग और आपूर्ति में जो अतंर है, वह कभी घटेगा, ऐसा संभव नहीं लगता।
ऐसे में, ऊर्जा उत्पादन, उपलब्ध ऊर्जा का संरक्षण और ऊर्जा को सही दिशा देना जरूरी है। ऊर्जा को बचाने के लिए हमेशा छोटे कदमों की जरूरत होती है, जिनके असर बड़े होते हैं। मसलन, पूरे प्रदेश में बिजली की बचत वाले सीएफएल बल्ब लगाने के केरल सरकार के अभियान से ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल होने का अनुमान है। इसके तहत पूरे प्रदेश में सीएफएल बल्ब वितरित किए गए हैं। 95 करोड़ रुपये की इस प्रदेशव्यापी योजना से 520 मेगावाट बिजली की बचत की उम्मीद है। योजना पर अमल से केरल में इस बार बिजली की अधिकतम मांग वाले समय में भी कोई लोड शेडिंग नहीं हुई। कुछ ऐसा ही प्रयोग हिमाचल प्रदेश में भी हुआ है। वहां परंपरागत बल्ब के बदले सीएफएल वितरित करने की योजना बनी और आप को दूर-दराज के गांवों में भी सीएफएल जलते दिख जाएंगे। हिमाचल एक पावर सरप्लस राज्य है। यानी ऐसा राज्य, जो अपनी जरूरतों से ज्यादा बिजली पैदा करता है और उस बिजली को वह दूसरे प्रदेशों को बेचता है। इसीलिए सीएफएल योजना से प्रदेश को दोहरा लाभ हुआ है। केरल और हिमाचल की इन कोशिशों से बाकी राज्य भी सबक ले सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा संरक्षण उपायों से देश भर में 25,000 मेगावाट बिजली की बचत की जा सकती है। हिन्दुस्तान में 14/12/11 को प्रकाशित