Monday, October 3, 2011

परमाणु ऊर्जा कितनी सुरक्षित


परमाणु ऊर्जा कितनी सुरक्षित 
तमिलनाड़ु के कुडनकुलम में बनने वाले परमाणु ऊर्जा सयंत्र को लेकर सरकार और वहॉं के स्थानीय लोगों में काफी मतभेद है । रूस के सहयोग से १५००० करोड़ की लागत से बनने वाले इस सयंत्र के खिलाफ स्थानीय लोगो ने आन्दोलन, आमरण अनशन  भी किया । बाद में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के अनुरोध और प्रधानमंत्री कार्यालय  के हस्तक्षेप के बाद १२७ परिवार के लोगो का  आमरण अनशन  तोडा गया । खास बात यह है कि यह आन्दोलन तब शुरू हुआ जब इसका ९० प्रतिशत काम पूरा हो चुका है ।  पर जिस तरह से कुडनकुलम  के स्थानीय लोग इस संयंत्र से डरे हुए है उसको देखकर लगता नहीं कि है की  यह संयंत्र जल्दी  शुरू हो पायेगा ।
                यह बात शायद कई लोगों को अजीब लग रही होगीं कि जापान में आए भूकंप के कारण परमाणु उर्जा संयंत्रों में हुए विस्फोटों के बाद भी दुनिया में बड़े पैमाने पर नए परमाणु सयंत्रों का निर्माण करने की बात की जा रही है । निश्चित रूप से इस काम में हमेशा से ही जोखिम रहा है । लेकिन भारत, चीन, तुर्की, पाकिस्तान, वियतनाम और दुनिया के कई ऐसे देश क्या करें जिनके पास प्राकृतिक उर्जा संसाथन बहुत कम है । यह देश परमाणु उर्जा पैदा करके ही बिजली के क्षेत्र में अपनी आवश्यकताआंे की पूर्ति कर सकते हैं । परमाणु उर्जा शान्तिपूर्ण और कल्याणकारी भी हो सकती है । जापान उन देशों के बीच अगुवा रहा है, जिन्होंने 1970 वाले दशक के तेल संकट की रामबाण दवा परमाणु उर्जा को राष्ट्रीय प्राथमिकता देने की पहल की । आज उसके पास पच्पन परमाणु बिजली घर हैं । देश की एक तिहाई बिजली वे ही पैदा करते हैं । मित्सुबिशी, तोसीबा और हिताची जैसी जापानी कम्पनियां दुनियाभर में परमाणु बिजली घर बनाती हैं । जलवायु परिवर्तन को थामने के लिए कार्बनडाई आक्साइड उतसर्जन घटाने का तर्क परमाणु उर्जा के पक्ष में इस बीच एक नया नारा बन गया है । इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रथमदृष्टया कोयले पर आधारित थरमल पावर की जगह परमाणु उर्जा ज्यादा साफ-सुधरी और कोयले व उड़न राख से निजात दिलाने वाली नजर आती है ।
तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु परियोजना को लेकर चल रहे विवाद के बीच परमाणु ऊर्जा आयोग ख्एईसी, के पूर्व प्रमुख एम आर श्रीनिवासन ने कहा है कि इस परियोजना के खिलाफ चलाए जा रहे दुष्प्रचार अभियान को रोकने के लिए एक सशक्त जनसंपर्क की जरूरत है। भारतीय परमाणु उर्जा एजेन्सी के पूर्व अध्यक्ष डा0 अनिल काकोदकर कुडनकुलम एजैतापुर परमाणु उर्जा परियोजना को जरूरी ठहरा रहें हैं । उनका कहना है कि देश की उर्जा जरूरतों की पूर्ति करने के लिए परमाणु उर्जा एक बेहतर विकल्प है । आधुनिक टेक्नोलाजी काफी विकसित और सुरक्षित बनती जा रही है । इसकी बदौलत परमाणु बिजली घरों में दुर्घटनाओं के जोेेेखिम बहुत कम हो गये है । और भविष्य में और भी कम हो जायेंगे । रूस के प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन ने इसी बात की ओर ध्यान आकर्षित किया है । उन्होंने कहा कि जापान के फुकुशिमा ने रियक्टर बहुत पुरानी तकनीक और डिजाइन के थे और भविष्य में एहतियात बरतते हुए ऐसे न्यूक्लियर प्लांट बनाये जा सकते हैं, जो भूकंपों और सुनामी को झेल पायें ।
                आजकल दुनियाभर में परमाणु उर्जा संयंत्रों के लिए अलग-अलग चरणों पर 62 परमाणु रियक्टरों का निर्माण किया जा रहा है । इसके अलावा भविष्य में 300 से अधिक नए रियक्टरों के निर्माण के लिए परियोजनाओं पर चर्चा की जा रही है । रूस , चीन, भारत और दुनिया के कुछ अन्य देशों में राष्ट्रीय परमाणु उर्जा व्यवस्था के आधुनिकीकरण के कार्यक्रमों को अमलीजामा पहनाया जा रहा है । भारत, यितनाम, तुर्की और गुलगारिया में जो परमाणु बिजली घर बनाये जा रहे हैं, रूस उनके निर्माण में सहायता कर रहा है । चीन और रूस जैसे अग्रणी देशों ने इस बात की स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि वे जापान में घटी दुर्घटना के बावजूद नयी पीढी के परमाणु उर्जा संयंत्रों के निर्माण के अपने कार्यक्रमों का त्याग नहीं करेंगे ।
                देश में उर्जा की बढ़ती मांग के हिसाब से उत्पादन का बढ़ना भी जरूरी हो गया है । जहाँ सन् 2000-01 में भारत में प्रति व्यक्ति उर्जा खपत 374 किलोवाट प्रतिवर्ष थी  वहीं वर्तमान में 652 किलोवाट हो गयी है । हमारे योजनाकार वर्ष 2013 तक प्रति व्यक्ति उर्जा की खपत 1000 किलोवाट का अनुमान लगा रहे हैं तथा इस हिसाब से उर्जा उत्पादन को बढ़ाने वाली परियोजनाओं पर काम कर रहें हैं । विकसित देशों में प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष लगभग 10,000 किलोवाट उर्जा खपत है । विकास का जो मॉडल हम अपनाते जा रहे है । उस दृष्टि से अगली प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में हमें उर्जा उत्पादन को लगभग 2 गुना करते जाना होगा ।
                योजना आयोग ने 2006 में ‘‘ संमग्र उर्जा नीति ’’ प्रकाशित की । इस नीति में कोयले से उत्पन्न उर्जा (थर्मल पावर) को सबसे खराब बताया गया क्योंकि इस प्रक्रिया में जहरीली गैसें, राख व गंदा पानी निकलता है । जंगल व वनस्पति की हानि भी साथ में होती ही है, खनन से निस्थापन भी होता है । परमाणु उर्जा इसकी तुलना में श्रेष्ठतम है लेकिन देश में वर्तमान उर्जा की स्थिति देखने से पता चलता है कि थर्मल पावर कुल उर्जा उत्पादन में 64.6 प्रतिशत योगदान देता है, जल विद्युत 24.6 प्रतिशत, परमाणु उर्जा 2.8 प्रतिशत और पवन उर्जा एक प्रतिशत योगदान रहता है। देश में उत्पादित कुल उर्जा की मात्रा का लगभग 23 प्रतिशत वितरण में ही नष्ट हो जाता है । हालांकि वास्तविक क्षति इससे भी अधिक हे । तेल की बढ़ती कीमतों से परमाणु उर्जा व जल-विद्युत के प्रति आकर्षण और बढ़ गया है । भारत अमेरिका के साथ परमाणु समझौता कर चुका है । न्यूक्लियर उर्जा को गैर कार्बन उत्सर्जक मानते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं । न्यूक्लियर उर्जा उत्पादन के लिए हमें गुणवत्तायुक्त कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी । जिससे हमारे परमाणु संयत्र सुचारू रूप से काम करते रहे ।
                वर्तमान में भारत में 14 परमाणु बिजलीघर जिनके माध्यम से 2550 मेगावाट उर्जा का उत्पादन हो रहा है तथा 9 अन्य रियेक्टर निर्माणाधीन है । इन निर्माणाधीन रियेक्टरों के द्वारा अतिरिक्त 4092 मेगावाट उर्जा का उत्पादन होगा ।  देश की उर्जा आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर हमें एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है । अत्यधिक उपभोग और बढ़ती जनसंख्या से देश की उर्जा जरूरतों की पूर्ति के लिए कुडनकुलम एजैतापुर जैसे परमाणु सयंत्रों का लगना आवश्यक है । बशर्ते इन सयंत्रों में उच्चस्तर के सुरक्षा मानकों का कडाई से पालन किया जाए । जिससे भविष्य में आने वाली किसी भी प्राकृतिक आपदा से इन्हें बचाया जा सके और जन हानि न हो । सुरक्षा मानक इतने कडे हो कि संयत्र भूकंप और सुनामी को झेल पाए ।
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Friday, September 30, 2011

तकनीकी शिक्षा में बड़े सुधार की जरुरत


तकनीकी शिक्षा में बड़े सुधार की जरुरत
भारत में तकनीकी शिक्षा के वर्तमान स्वरूप को देखकर यह प्रतीत होता है कि हम अभी तक उसे व्यावहारिक और रोजगारपरक नहीं बना पाए हैं। पिछले 25 साल में उच्च शिक्षा और तकनीकी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काफी विस्तार हुआ है| हजारों इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए है और लगातार खुल भी रहे है | पर क्या इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी दी  जा सकती है | यही वजह है आज लोगो का रुझान तकनीकी शिक्षा  की तरफ कम होने लगा है और पूरे देश में तकनीकी शिक्षा के मौजूदा सत्र में बड़े पैमाने पर सीटे खाली रह गई  | वास्तव में इस स्थिति के जिम्मेदार भी कालेज संचालक है जिन्होनें गुणवत्ता की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया और इंजीनियरिंग कालेज खोलने को एक कमाउ उपक्रम का हिस्सा मान लिया | प्रदेश के अधिकांश निजी तकनीकी   शिक्षा संस्थान बड़े व्यापारिक घरानों, नेताओं और ठेकेदारों के व्यापार का एक हिस्सा हैं। जो तकनीकी   शिक्षा के जरिए रूपया बनाना चाहते हैं।इन्होनें अपनी पूॅजी के बल पर बडे बड़े अलीशान भवन खड़े कर दिए। कार्पोरेट और शिक्षा जगत के नामी लोगों के बायोडाटा जुगाड़ कर मान्यता भी ले ली। मगर शैक्षिणिक गुणवत्ता के नाम पर फिसड्डी ही बने रहें। आज तक प्रदेश का कोई भी निजी इंजीनिरिंग कालेज देश के प्रतिष्ठित इंजीनिरिंग कालेजों की सूची में जगह नहीं बना पाया है।

निजी क्षेत्र की संस्थाएं सस्ते वेतनमान पर किसी को भी शिक्षक बनाकर विद्यार्थियों को धोखा देने का काम कर रही हैं। इनका नतीजा शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट के रूप में सामने आ रहा है।पाठय़क्रमों में सालोंसाल कोई बदलाव न होना, उच्च शिक्षा की एक बड़ी कमी है। खासतौर पर इंजीनियरिंग और मेडिकल में, क्योंकि इन क्षेत्रों में नई-नई तकनीकें विकसित होती हैं, नए विभाग, नए पाठय़क्रम शुरू होते हैं। पर हमारे देश में यह सब दिखावे के लिए एक मुखौटा बन जाता है। घिसे-पिटे कोर्स से जो शिक्षा दी जाती है, उससे तैयार होने वाले ग्रेजुएट से न तो हम मेधा और न हुनर की उम्मीद कर सकते हैं।
शिक्षा संस्थान धड़ाधड़ खोले जा रहे हैं। भड़कीले रंगों की पुताई कर बिल्डिंगें तो बना दी जाती है। मगर एक अच्छे शिक्षण संस्थान के लिए पुस्तकालय, वर्कशॉप, कंप्यूटर सेंटर और प्रयोगशालाएं स्तरीय होनी चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश में इन्हें छोड़कर ही बाकी सब दिखावटी चीजों के बलबूते शिक्षण संस्थान खड़े किए जाते रहे हैं। यह सिलसिला चलता रहा, तो आने वाले समय में हमारे समाज में घटिया दर्जे के स्नातकों की बड़ी फौज खड़ी हो जाएगी। ये सभी युवा रोजगार के लिए इधर-उधर ठोकरें खाते फिरेंगे और उनकी ऊर्जा को समाज ने सही दिशा नहीं दी, तो उनका क्रोध किसी बड़े आंदोलन की शक्ल लेगा।
अभी कुछ दिनों पहले पूर्व महामहिम राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा है कि स्नातक विद्यार्थियों को सरकारी नौकरियों का इंतजार करने के बजाय अपना उद्यम शुरू करने का साहस दिखाना चाहिए।

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर किस दिशा में रोजगार के विकल्प तलाशे जाएं, जबकि भारत की बेरोजगारी कृषि व्यवसाय, परंपरागत व्यापार, जाति व्यवस्था, पूंजी प्रधान विकास की अवधारणा, सरकारी नौकरियों की तरफ अधिक झुकाव तथा उद्यमशीलता और जोखिम उठाने की क्षमता के अभाव के साथ जुड़ी हुई है। हमें समाधान खोजना होगा, तभी स्नातक छात्र इस दिशा में आगे बढ़ सकेंगे। भारत में तकनीकी संस्थानों की संख्या कुकुरमुत्ते की तरह लगातार बढ़ रही है। इनमें अधिकांश संस्थानों का अपना कोई मानक और स्तर नहीं है। इन तकनीकी संस्थानों में सिर्फ पाठ्यक्रम से संबन्घित चीजें पढ़ा दी जाती हैं, लेकिन इनके पास छात्रों के भविष्य के लिए कोई योजना नहीं है।
तकनीकी शिक्षा संस्थानों के लिए शिक्षा व्यापार का साधन हो गई है।
भारत में भी स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए हमें शैक्षणिक व्यवस्था में उद्यमिता के महत्व को रेखांकित करना चाहिए और तकनीकी छात्रों को कॉलेज शिक्षा के स्तर से ही उद्यम स्थापित करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, जो उनमें रचनात्मकता और स्वतंत्रता की भावना का विकास करे। सबसे पहले हमें उन क्षेत्रों की पहचान करना होगी, जिन क्षेत्रों में रोजगार की प्रबल संभावनाएं मौजूद हैं। उचित प्रशिक्षण तथा वित्तीय उद्यम के खतरे उठाने के बाद ही रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। हमें विकास की नई सृजनात्मक नीति अपनानी होगी, जिसमें पूंजी आधारित तकनीकों की बजाय श्रम आधारित तकनीकों पर अधिक बल दिया जाए। कृषि आधारित उद्योगों और लघु उद्योगों को कुशल तकनीकी प्रबंधन के आधार पर बढ़ावा दिया जाए। महानगरों के साथ-साथ छोटे शहरों में भी आधारभूत ढांचा विकसित किया जाए, ताकि लोग महानगरों की बजाय अपने-अपने शहरों में ही रहकर विकास कर सकें।

भूमंडलीकरण के दौर में विकसित तथा विकासशील देशों के बीच "तकनीक" को लेकर प्रतिस्पर्घा बनी हुई है। विकसित देश अपनी नवीनतम तकनीक किसी अन्य देश को देना नहीं चाहते, केवल अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते हैं।
 ऎसे समय में भारत जैसे विकासशील देश को अपनी तकनीक खुद ही विकसित करना होगी और इस दिशा में युवा वैज्ञानिक एवं शासन स्तर पर संयुक्त रणनीति बनाने की भी आवश्यकता है।
देश में रोजगार पैदा करने वाले तंत्रों की क्षमता बढ़ाना चाहिए और उद्योग जगत व सरकारी तंत्र की तरफ से इस दिशा में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम चलना चाहिए। नई तकनीक के विकास में जो मौलिक काम हो रहे हैं, उन्हें बढ़ावा देना होगा। देश में बड़ी संख्या में छोटे-छोटे, लेकिन उपयोगी आविष्कार हुए हैं, उन्हें बढ़ावा देने की जरूरत है। ऎसे आविष्कारों के बारे में अकसर छपता रहता है, लेकिन उस ओर सरकार कम ध्यान देती है, जिससे नई तकनीक के विकास को ज्यादा बल नहीं मिलता है। भारतीय समाज में आज तकनीकी विकास के अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत है, तभी हम गली-गली में रोजगार पैदा कर पाएंगे।
आज जरुरत है ऐसे तकनीकी ज्ञान की जो वास्तविकता की धरातल पर हो  साथ में व्यावहारिक भी हो जिससे हम  उसे अपने देश की परिस्थितियों के हिसाब से प्रयोग कर सके | देश के नौजवानों में इसे सिर्फ डिग्री लेने तक ही सीमित रख पाए बल्कि उनके अन्दर इसे लेकर एक उत्साह हो ,समझ हो ,विश्वास हो कुछ सकारात्मक कर पाने के लिए |
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