Thursday, September 27, 2012
Friday, September 7, 2012
इंजीनियरिंग की ढाई लाख सीटें खाली क्यों
शशांक द्विवेदी ॥
देश
में इंजीनियरिंग का नया सत्र शुरू हो चुका है। इस सत्र में भी सभी राज्यों
में बड़े पैमाने पर सीटें खाली रह गई है । इस बार पूरे देश में लगभग साढ़े
तीन लाख से ज्यादा सीटें खाली रहीं। राजस्थान में तो 50 प्रतिशत से ज्यादा,
लगभग 35 हजार सीटें खाली रह गईं । यही हाल उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश
जैसे बड़े राज्यों में भी है। पिछले इंजीनियरिंग सत्र में पूरे देश में ढाई
लाख से ज्यादा सीटें खाली रह गई थीं। हालात ऐसे हो गए हंै कि पिछले दिनों
देश के चौदह राज्यों से 143 तकनीकी शिक्षण संस्थानों को एआईसीटीई से अपने
पाठ्यक्त्रम बंद करने की इजाजत मांगनी पड़ी। सीटें न भर पाने से देश के कई
कॉलेजों में जीरो सेशन का खतरा पैदा हो गया है। कुछ साल पहले तक निजी
तकनीकी शिक्षण संस्थान खोलने होड़ थी लेकिन अब इन्हें बंद करने की इजाजत
मांगने वालों की लाइन लगी हुई है। अकेले आंध्र प्रदेश से ही 56 संस्थानों
ने अपने पाठ्यक्रम बंद करने की इजाजत मांगी है।
बेकारी की मार
भारत में तकनीकी शिक्षा के हालात साल दर साल खराब होते जा रहे हैं। तकनीकी
शिक्षा की यह स्थिति सीधे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी। इस बात
पर राष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए कि लोगों का रुझान
इंजीनियरिंग में कम क्यों हो रहा है और इतनी सीटें खाली क्यों छूट रही हैं।
इंजीनियरिंग के दाखिलों में आ रही गिरावट के पीछे कुछ कारण पहली नजर में
भी देखे जा सकते हैं। अपनी तकनीकी शिक्षा को हमने विस्तार तो दिया है, पर
उसे व्यवहारिक और रोजगारपरक नहीं बना पाए हैं। ज्यादातर अभिभावक
इंजीनियरिंग में अपने बच्चों का दाखिला इसलिए कराते हंै कि उनको डिग्री के
बाद नौकरी मिले। छात्र भी इंजीनियर बनने के लिए नहीं, नौकरी पाने के लिए
इंजीनियरिंग पढ़ते हैं। नौकरी की गारंटी पर ही लोगों का रुझान इस तरफ बना
था लेकिन आज इंजीनियरिंग स्नातकों की एक पूरी फौज बेकार खड़ी है। लोगों में
यह आम धारणा बन रही है कि जब बेरोजगार ही रहना है तो इतने पैसे खर्च करके
इंजीनियरिंग क्यों करें। अधिकांश इंजीनियरिंग कालेजों में डिग्री के बाद
प्लेसमेंट की गारंटी न होना मोहभंग का प्रमुख कारण है।
मंदी में भारी फीस
आर्थिक मंदी का भी प्रभाव इंजीनियरिंग के दाखिले पर पड़ा है। मंदी की वजह
से बाजार में लिक्विड मनी कम हो रही है। जो अभिभावक पहले आराम से
इंजीनियरिंग की फीस भर देते थे, वे अब ऐसा नहीं कर पा रहे हंै। मय के साथ
इंजीनियरिंग की फीस भी पिछले पांच सालों में देश के कई हिस्सों में दो से
तीन गुना तक बढ़ गई। उत्तर प्रदेश में 2001 से 2005 तक बी. टेक. की फीस 20
हजार रुपये सालाना थी, जो अभी लगभग एक लाख रुपये सालाना हो गई है। फीस
वृद्धि और आर्थिक मंदी के साथ-साथ इस स्थिति के लिए कुछ हद तक कालेजों के
संचालक भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने गुणवत्ता की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं
दिया और इंजीनियरिंग कालेज खोलने को एक कमाऊ उपक्रम का हिस्सा मान लिया।
अधिकांश निजी तकनीकी शिक्षा संस्थान बड़े व्यापारिक घरानों, नेताओं और
ठेकेदारों के व्यापार का हिस्सा बन गए। वे इसके जरिए सिर्फ रुपया बनाना
चाहते हैं। गुणवत्ता और छात्रों के प्रति जवाबदेही उनकी प्राथमिकता में
नहीं है। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में रुझान इसके चलते भी नकारात्मक हुआ है ।
इंजीनियरिंग स्नातकों में बेरोजगारी बढ़ने की मुख्य वजह इंडस्ट्री और इंस्टीट्यूट्स के बीच दूरी बढ़ना है। पिछले दिनों आईटी दिग्गज नारायणमूर्ति ने कहा था कि सूचना प्रौद्योगिकी इंडस्ट्री को प्रशिक्षित इंजिनियर नहीं मिलते। कॉलेज इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से इंजीनियर पैदा नहीं कर पा रहे हैं , जबकि इंडस्ट्रीज में कुशल मानव संसाधन की कमी है। देश के 13 राज्यों के 198 इंजीनियरिंग कॉलेजों में फाइनल ईयर के 34 हजार विद्यार्थियों पर हुए एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक देश के सिर्फ 12 फीसदी इंजीनियर नौकरी करने के काबिल हैं। इस सर्वे ने भारत में उच्च शिक्षा की शर्मनाक तस्वीर पेश की है। यह आंकड़ा चिंता बढ़ाने वाला भी है , क्योंकि स्थिति सुधरने के बजाय दिनोंदिन खराब ही होती जा रही है ।
दरअसल , इंडस्ट्री की जरूरत और छात्रों के ज्ञान में कोई तालमेल ही नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि आज भी हमारे शैक्षिक कोर्स 20 साल पुराने हैं। पाठ्यक्रमों में सालोंसाल कोई बदलाव न होना उच्च शिक्षा की एक बड़ी कमी है। खासतौर पर इंजीनियरिंग में , क्योंकि इस क्षेत्र में नई - नई तकनीकें विकसित होती हैं। यही वजह है कि इंडस्ट्री के हिसाब से छात्रों को अपडेटेड थ्योरी नहीं मिल पाती। अभी छात्रों का सारा ध्यान थ्योरी रटकर परीक्षा पास करने पर होता है। घिसे - पिटे कोर्स से जो शिक्षा दी जाती है , उससे तैयार होने वाले ग्रेजुएट हर दिन बदलती तकनीकी दुनिया से तालमेल नहीं बिठा पाते। ऐसे में उन्हें डिग्री के बाद तुरंत जॉब मिलने की उम्मीद बहुत कम होती है।
सिर्फ आईआईटी की चिंता
चार साल इंजीनियरिंग करने के बाद उन्हें फिर अपना नॉलेज अपडेट करने के लिए विभिन्न प्रशिक्षण कोर्सेस में दाखिला लेना पड़ता है। तब जाकर उन्हें कंपनियों में एक प्रशिक्षु ( ट्रेनी ) के रूप में नौकरी मिल पाती है। दुर्भाग्य से देश में आम तकनीकी शिक्षा का स्तर सुधारने की कोई पहल भी नहीं हो रही है। इंजीनियरिंग कॉलेजों में इतने बड़े पैमाने पर सीटें खाली रहना बहुत बड़ा मामला है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो देश को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। सरकार का सारा ध्यान आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों पर रहता है जबकि देश के विकास में निजी इंजीनियरिंग कालेजों का योगदान कहीं ज्यादा है। 95 प्रतिशत इंजीनियर यही कॉलेज पैदा करते है। अगर इनकी दशा खराब होगी तो इसका असर पूरे देश पर पड़ ेगा ।
दरअसल , इंडस्ट्री की जरूरत और छात्रों के ज्ञान में कोई तालमेल ही नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि आज भी हमारे शैक्षिक कोर्स 20 साल पुराने हैं। पाठ्यक्रमों में सालोंसाल कोई बदलाव न होना उच्च शिक्षा की एक बड़ी कमी है। खासतौर पर इंजीनियरिंग में , क्योंकि इस क्षेत्र में नई - नई तकनीकें विकसित होती हैं। यही वजह है कि इंडस्ट्री के हिसाब से छात्रों को अपडेटेड थ्योरी नहीं मिल पाती। अभी छात्रों का सारा ध्यान थ्योरी रटकर परीक्षा पास करने पर होता है। घिसे - पिटे कोर्स से जो शिक्षा दी जाती है , उससे तैयार होने वाले ग्रेजुएट हर दिन बदलती तकनीकी दुनिया से तालमेल नहीं बिठा पाते। ऐसे में उन्हें डिग्री के बाद तुरंत जॉब मिलने की उम्मीद बहुत कम होती है।
सिर्फ आईआईटी की चिंता
चार साल इंजीनियरिंग करने के बाद उन्हें फिर अपना नॉलेज अपडेट करने के लिए विभिन्न प्रशिक्षण कोर्सेस में दाखिला लेना पड़ता है। तब जाकर उन्हें कंपनियों में एक प्रशिक्षु ( ट्रेनी ) के रूप में नौकरी मिल पाती है। दुर्भाग्य से देश में आम तकनीकी शिक्षा का स्तर सुधारने की कोई पहल भी नहीं हो रही है। इंजीनियरिंग कॉलेजों में इतने बड़े पैमाने पर सीटें खाली रहना बहुत बड़ा मामला है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो देश को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। सरकार का सारा ध्यान आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों पर रहता है जबकि देश के विकास में निजी इंजीनियरिंग कालेजों का योगदान कहीं ज्यादा है। 95 प्रतिशत इंजीनियर यही कॉलेज पैदा करते है। अगर इनकी दशा खराब होगी तो इसका असर पूरे देश पर पड़ ेगा ।
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Wednesday, September 5, 2012
शिक्षक दिवस पर अखबारों में मेरे लेख
आज मै जो कुछ भी हू जैसा भी हूँ ,अपने शिक्षकों की वजह से हूँ .उनके योगदान के बिना मै अपने जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता .आज शिक्षक दिवस पर उन सभी गुरुओं को सादर प्रणाम करते हुए शत शत नमन ,जिन्होंने मेरी जिंदगी इतनी सुन्दर बनाई .
..
| डी एन ए लेख |
for
nicely read pls click on given article link
Monday, September 3, 2012
Thursday, August 23, 2012
Tuesday, August 21, 2012
Sunday, August 19, 2012
कब थमेगा कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला
प्रियंका शर्मा द्विवेदी
21may12 को राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित
कन्या भ्रूण हत्या का मुद्दा एक बार फिर पूरे देश में सुर्खियों में है। आमिर खान के टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ को देखकर लगने लगा है कि गर्भस्थ कन्या हत्या का वास्तविक सत्य पूरे देश में अलख जगा रहा है। ये सत्य देश के लोगों और सरकार की बरसों से बंद आंखें खोलने के लिये पर्याप्त है। इतनी गंभीर समस्या पर सरकार भी अभी तक ठोस और सार्थक कदम नहीं उठा पाई और समाज भी उदासीन रहा। सिर्फ बेटे की चाह में अनगिनत मांओं की कोख उजाड़ दी गई। लेकिन आमिर के प्रयास से इस मुद्दे पर समाज और देश में हलचल होने लगी है। सरकार और न्यायपालिका भी इस जघन्य अपराध पर सख्त होने को मजबूर हो गई है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा राज्य में हर हाल में कन्या भ्रूण हत्या रोकने के निर्देश देना, इलाहाबाद में चिकित्सा विभाग की टीम द्वारा स्टिंग आपरेशन करके महज 1500 रुपये में कन्या भ्रूण हत्या करने वाले दोषी डाक्टर को पकड़ना और पूरे देश में राजनेताओं सहित समाज के प्रबुद्ध वर्ग का आगे आना इसकी प्रतिक्रिया के साक्षी हैं। पिछले दिनों जयपुर हाईकोर्ट ने भ्रूण लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या पर सख्ती दिखाते हुए जिला न्यायालयों को तीन माह में आरोप तय करने और पुलिस को लंबित मामलें में दो माह में चार्जशीट पेश करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही दोषी डॉक्टरों व जांच केंद्रों पर कार्रवाई करने को कहा है। सुखद स्थिति है कि राजस्थान में कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए ये कदम उठाया गया, लेकिन यदि सभी राज्य की सरकारें एकजुट होकर कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम करें तभी सही मायने में यह प्रयास सार्थक होगा। यह विडंबना ही है कि जिस देश में कभी नारी को गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं के रूप में सम्मान प्राप्त हुआ, वहीं अब कन्या के जन्म पर परिवार और समाज में दुख व्याप्त हो जाता है। जरूरत है कि लोग अपनी गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली ऐसी सोच से बचें और कन्या के जन्म को अपने परिवार में देवी अवतरण के समान माने। पिछले दशक में गर्भ में लिंग जांच और कन्या भ्रूण हत्या का चलन सबसे ज्यादा रहा है। एक नए अनुसंधान के मुताबिक भारत में पिछले 20 सालों में कम से कम सवा करोड़ बच्चियों की भ्रूण हत्या की गई है। अगर इन बच्चियों को नहीं बचाया गया तो लड़कों के समक्ष भी संकट खड़ा हो जाएगा। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द लैंसेट में हाल ही में छपे इस शोध में दावा किया गया है कि भ्रूण में मारी गई बच्चियों की तादाद 1 करोड़ 50 लाख तक भी हो सकती है। सेंटर फार ग्लोबल हेल्थ रिसर्च के साथ किए गए इस शोध में वर्ष 1991 से 2011 तक के जनगणना आंकड़ों को नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के साथ जोड़कर निष्कर्ष निकाले गए हैं। इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का सिलसिला तब शुरू हुआ जब देश के गर्भ में भ्रूण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल, पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य रोगियों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। लेकिन भारत में जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रूण हत्या का चलन आरंभ हुआ उसने समाज की स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। गौरतलब है कि भारत सरकार ने 17 साल पहले ही एक कानून पारित किया था, जिसके मुताबिक पैदा होने से पहले बच्चे का लिंग मालूम करना गैरकानूनी है। लेकिन राष्ट्रीय जनसंख्या स्थिरता कोष की पूर्व कार्यकारी निदेशक शैलजा चंद्रा के मुताबिक इस कानून को लागू करना बेहद मुश्किल है। चंद्रा कहती हैं कि कानून को लागू करने वाले जिला स्वास्थ्य अफसर के लिए लिंग जांच करने वाले डॉक्टर पर नकेल कसना बहुत मुश्किल है, क्योंकि डाक्टरों के पास नवीनतम तकनीक उपलब्ध है। उनके मुताबिक कानून को लागू करने के लिए राज्य स्तर पर मुख्यमंत्रियों को ये बीड़ा उठाना होगा और इसे प्राथमिकता देनी होगी, तभी अफसर हरकत में आएंगे और डॉक्टरों को पकड़ने के तरीके निकालेंगे। फिलहाल तो स्थिति यह है कि लोगों में पुत्र की बढ़ती लालसा और खतरनाक गति से लगातार घटता स्त्री-पुरुष अनुपात समाजशास्त्रियों, जनसंख्या विशेषज्ञों और योजनाकारों के लिए चिंता का विषय बन गया है। यूनिसेफ के अनुसार दस प्रतिशत महिलाएं विश्व जनसंख्या से लुप्त हो चुकी हैं। स्त्रियों के इस विलोपन के पीछे कन्या भ्रूण हत्या ही मुख्य कारण है। भ्रूण हत्या का कारण है कि हमारे समाज में व्याप्त रुढ़िवादिता और लोगों की संकीर्ण सोच। संकीर्ण मानसिकता और समाज में कायम अंधविश्वास के कारण लोग बेटा-बेटी में भेद करते हैं। ज्यादातर मां-बाप सोचते हैं कि बेटा तो जीवनपर्यत उनके साथ रहेगा और बुढ़ापे में उनका सहारा बनेगा। समाज में वंश परंपरा का पोषक लड़कों को ही माना जाता है। इस पुत्र कामना के चलते ही लोग अपने घर में बेटी के जन्म की कामना नहीं करते। बड़े शहरों के कुछ पढ़े-लिखे परिवारों में यह सोच थोड़ी बदली है, लेकिन गांव-देहात और छोटे शहरों में आज भी बेटियों को लेकर पुराना रवैया कायम है। मदर टेरेसा ने कहा था, हम ममता के तोहफे को मिटा नहीं सकते। स्त्री और पुरुष के बीच कुदरती समानता खत्म करने के लिए हिंसक हथकंडे अपनाने से समाज पराभव की ओर बढ़ता है। नारी मानव शरीर की निर्माता है, फिर भी उसी की अवहेलना की जा रही है। नारी अपने रक्त और मांस के कण-कण से संतान का निर्माण करती है। नर और नारी जीवनरूपी रथ के ऐसे दो पहिए हैं, जिनके बिना यह रथ आगे नहीं बढ़ सकता। समाज में पुरुषत्व का अहंकार कन्या के प्रति हिंसक है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराधों को कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है। हम नारीवादी बुद्धिमान, नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं बैठ सकते क्योंकि जब नारी के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।
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