Saturday, January 21, 2012

इंडियन नेशनल आर्मी की सभा में दिया गया उनका महत्वपूर्ण भाषण


इंडियन नेशनल आर्मी की सभा में दिया गया उनका महत्वपूर्ण भाषण

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, आजाद हिन्द फौज के संस्थापक और जय हिन्द का नारा देने वाले सुभाष चंद्र बोस (जन्म-23 जनवरी, 1897 कटक, उड़ीसा) के अतिरिक्त हमारे देश के इतिहास में ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं हुआ जो एक साथ महान सेनापति, वीर सैनिक, राजनीति का अद्भुत खिलाड़ी और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरुषों, नेताओं के समकक्ष साधिकार बैठकर कूटनीतिज्ञ तथा चर्चा करने वाला हो। भारत की स्वतंत्रता के लिए सुभाष चंद्र बोस ने क़रीब-क़रीब पूरे यूरोप में अलख जगाया।
सन् 1941 में कोलकाता से अपनी नजरबंदी से भागकर ठोस स्थल मार्ग से जर्मनी पहुंचे, जहां उन्होंने भारत सेना का गठन किया। जर्मनी में कुछ कठिनाइयां सामने आने पर जुलाई 1943 में वे पनडुब्बी के जरिए सिंगापुर पहुंचे। सिंगापुर में उन्होंने आजाद हिंद सरकार (जिसे नौ धुरी राष्ट्रों ने मान्यता प्रदान की) और इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया।
मार्च एवं जून 1944 के बीच इस सेना ने जापानी सेना के साथ भारत-भूमि पर ब्रिटिश सेनाओं का मुकाबला किया। यह अभियान अंत में विफल रहा, परंतु बोस ने आशा का दामन नहीं छोड़ा। जैसा कि यह भाषण उद्घाटित करता है, उनका विश्वास था कि ब्रिटिश युद्ध में पीछे हट रहे थे और भारतीयों के लिए आजादी हासिल करने का यही एक सुनहरा अवसर था। यह शायद बोस का सबसे प्रसिद्ध भाषण है। इंडियन नेशनल आर्मी के सैनिकों को प्रेरित करने के लिए आयोजित सभा में यह भाषण दिया गया, जो अपने अंतिम शक्तिशाली कथन के लिए प्रसिद्ध है।

यहां पेश है इंडियन नेशनल आर्मी की सभा में दिया गया उनका महत्वपूर्ण भाषणः-

दोस्तों! बारह महीने पहले पूर्वी एशिया में भारतीयों के सामने सम्पूर्ण सैन्य संगठन या अधिकतम बलिदान का कार्यक्रम पेश किया गया था। आज मैं आपको पिछले साल की हमारी उपलब्धियों का ब्योरा दूंगा तथा आने वाले साल की हमारी मांगें आपके सामने रखूंगा। परंतु ऐसा करने से पहले मैं आपको एक बार फिर यह एहसास कराना चाहता हूं कि हमारे पास आजादी हासिल करने का कितना सुनहरा अवसर है।
अंग्रेज एक विश्वव्यापी संघर्ष में उलझे हुए हैं और इस संघर्ष के दौरान उन्होंने कई मोर्चाे पर मात खाई है। इस तरह शत्रु के काफी कमजोर हो जाने से आजादी के लिए हमारी लड़ाई उससे बहुत आसान हो गई है, जितनी वह पांच वर्ष पहले थी। इस तरह का अनूठा और ईश्वर-प्रदत्त अवसर सौ वर्षाे में एक बार आता है। इसीलिए अपनी मातृभूमि को ब्रिटिश दासता से छुड़ाने के लिए हमने इस अवसर का पूरा लाभ उठाने की कसम खाई है।
हमारे संघर्ष की सफलता के लिए मैं इतना अधिक आशावान हूं, क्योंकि मैं केवल पूर्व एशिया के 30 लाख भारतीयों के प्रयासों पर निर्भर नहीं हूं। भारत के अंदर एक विराट आंदोलन चल रहा है तथा हमारे लाखों देशवासी आजादी हासिल करने के लिए अधिकतम दुरूख सहने और बलिदान देने के लिए तैयार हैं।
दुर्भाग्यवश, सन् 1857 के महान् संघर्ष के बाद से हमारे देशवासी निहत्थे हैं, जबकि दुश्मन हथियारों से लदा हुआ है। आज के इस आधुनिक युग में निहत्थे लोगों के लिए हथियारों और एक आधुनिक सेना के बिना आजादी हासिल करना नामुमकिन है। ईश्वर की कृपा और उदार नियम की सहायता से पूर्वी एशिया के भारतीयों के लिए यह संभव हो गया है कि एक आधुनिक सेना के निर्माण के लिए हथियार हासिल कर सकें।
इसके अतिरिक्त, आजादी हासिल करने के प्रयासों में पूर्वी एशिया के भारतीय एकसूत्र में बंधे हुए हैं तथा धार्मिक और अन्य भिन्नताओं का, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत के अंदर हवा देने की कोशिश की, यहां पूर्वी एशिया में नामोनिशान नहीं है। इसी के परिणामस्वरूप आज परिस्थितियों का ऐसा आदर्श संयोजन हमारे पास है, जो हमारे संघर्ष की सफलता के पक्ष में है - अब जरूरत सिर्फ इस बात की है कि अपनी आजादी की कीमत चुकाने के लिए भारती स्वयं आगे आएं।

सम्पूर्ण सैन्य संगठन के कार्यक्रम के अनुसार मैंने आपसे जवानों, धन और सामग्री की मांग की थी। जहां तक जवानों का संबंध है, मुझे आपको बताने में खुशी हो रही है कि हमें पर्याप्त संख्या में रंगरूट मिल गए हैं। हमारे पास पूर्वी एशिया के हर कोने से रंगरूट आए हैं - चीन, जापान, इंडोचीन, फिलीपींस, जावा, बोर्नियो, सेलेबस, सुमात्रा, मलाया, थाईलैंड और बर्मा से।
आपको और अधिक उत्साह एवं ऊर्जा के साथ जवानों, धन तथा सामग्री की व्यवस्था करते रहना चाहिए, विशेष रूप से आपूर्ति और परिवहन की समस्याओं का संतोषजनक समाधान होना चाहिए।
हमें मुक्त किए गए क्षेत्रों के प्रशासन और पुनर्निर्माण के लिए सभी श्रेणियों के पुरुषों और महिलाओं की जरूरत होगी। हमें उस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए, जिसमें शत्रु किसी विशेष क्षेत्र से पीछे हटने से पहले निर्दयता से घर-फूंक नीति अपनाएगा तथा नागरिक आबादी को अपने शहर या गांव खाली करने के लिए मजबूर करेगा, जैसा उन्होंने बर्मा में किया था।
सबसे बड़ी समस्या युद्धभूमि में जवानों और सामग्री की कुमुक पहुंचाने की है। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम मोर्चाे पर अपनी कामयाबी को जारी रखने की आशा नहीं कर सकते, न ही हम भारत के आंतरिक भागों तक पहुंचने में कामयाब हो सकते हैं।
आपमें से उन लोगों को, जिन्हें आजादी के बाद देश के लिए काम जारी रखना है, यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि पूर्वी एशिया - विशेष रूप से बर्मा - हमारे स्वातंत्र्य संघर्ष का आधार है। यदि यह आधार मजबूत नहीं है तो हमारी लड़ाकू सेनाएं कभी विजयी नहीं होंगी। याद रखिए कि यह एक संपूर्ण युद्ध है - केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध नहीं है। इसलिए, पिछले पूरे एक वर्ष से मैंने पूर्व में संपूर्ण सैन्य संगठन पर इतना जोर दिया है।
मेरे यह कहने के पीछे कि आप घरेलू मोर्चे पर और अधिक ध्यान दें, एक और भी कारण है। आने वाले महीनों में मैं और मंत्रिमंडल की युद्ध समिति के मेरे सहयोगी युद्ध के मोरचे पर-और भारत के अंदर क्रांति लाने के लिए भी - अपना सारा ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। इसीलिए हम इस बात को पूरी तरह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आधार पर हमारा कार्य हमारी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से और निर्बाध चलता रहे।
साथियों एक वर्ष पहले, जब मैंने आपके सामने कुछ मांगें रखी थीं, तब मैंने कहा था कि यदि आप मुझे सम्पूर्ण सैन्य संगठनष दें तो मैं आपको एक एक दूसरा मोरचा दूंगा। मैंने अपना वह वचन निभाया है। हमारे अभियान का पहला चरण पूरा हो गया है। हमारी विजयी सेनाओं ने निप्योनीज सेनाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शत्रु को पीछे धकेल दिया है और अब वे हमारी प्रिय मातृभूमि की पवित्र धरती पर बहादुरी से लड़ रही हैं।

अब जो काम हमारे सामने हैं, उन्हें पूरा करने के लिए कमर कस लें। मैंने आपसे जवानों, धन और सामग्री की व्यवस्था करने के लिए कहा था। मुझे वे सब भरपूर मात्रा में मिल गए हैं। अब मैं आपसे कुछ और चाहता हूं। जवान, धन और सामग्री अपने आप विजय या स्वतंत्रता नहीं दिला सकते। हमारे पास ऐसी प्रेरक शक्ति होनी चाहिए, जो हमें बहादुर व नायकोचित कार्याे के लिए प्रेरित करें।

सिर्फ इस कारण कि अब विजय हमारी पहुंच में दिखाई देती है, आपका यह सोचना कि आप जीते-जी भारत को स्वतंत्र देख ही पाएंगे, आपके लिए एक घातक गलती होगी। यहां मौजूद लोगों में से किसी के मन में स्वतंत्रता के मीठे फलों का आनंद लेने की इच्छा नहीं होनी चाहिए। एक लंबी लड़ाई अब भी हमारे सामने है।
आज हमारी केवल एक ही इच्छा होनी चाहिए - मरने की इच्छा, ताकि भारत जी सके; एक शहीद की मौत करने की इच्छा, जिससे स्वतंत्रता की राह शहीदों के खून बनाई जा सके।

साथियों, स्वतंत्रता के युद्ध में मेरे साथियो! आज मैं आपसे एक ही चीज मांगता हूं, सबसे ऊपर मैं आपसे अपना खून मांगता हूं। यह खून ही उस खून का बदला लेगा, जो शत्रु ने बहाया है। खून से ही आजादी की कीमत चुकाई जा सकती है। तुम मुझे खून दो और मैं तुम से आजादी का वादा करता हूं ।

(प्रभात प्रकाशन प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित पुस्तक भारत के महान भाषण से साभार)

प्रस्तुति
शशांक द्विवेदी


Tuesday, January 17, 2012

Check out एक शक्तिहीन संकल्प « जागरण मेहमान कोना

Check out एक शक्तिहीन संकल्प « जागरण मेहमान कोना
this is my article which is published in dainik jagran on 13jan12

हमें कब तक शर्म आती रहेगी


हमें कब तक शर्म आती रहेगी
स्वीकार करने से ही काम चलेगा क्या !!
पिछले दिनों प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म बताया। तेजी से प्रगति कर रहे भारत में  इतने विकास के बावजूद यदि देश में ४२ प्रतिशत से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं तो यह निश्चित ही शर्म की बात है। आजकल प्रधानमंत्री जी लगातार गंभीर मुद्दों पर देश की वर्तमान दशा कि सही स्वीकरोक्ति कर रहे है। लेकिन अब सवाल समस्याओं का नहीं बल्कि समाधान का है, कार्यक्रमों और नीतियों के जमीनी स्तर पर सही क्रियान्वयन का है। सरकार इस मुद्दे के समाधान के लिए सिर्फ एकीकृत बाल विकास योजनाओं (आईसीडीएस) पर निर्भर नहीं रह सकती है। आईसीडीएस शिशुओं के विकास के लिए संचालित कार्यक्रम है। प्रधानमंत्री ने भूख और कुपोषण (हंगामा) पर रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि  हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेजी से वृद्धि के बावजूद पोषण का स्तर सामान्य से इतना कम होना अस्वीकार्य है। उन्होंने इस बात को माना कि भारत ने कुपोषण के स्तर में कमी लाने में पर्याप्त प्रगति नहीं की है।
आज के समय में कुपोषण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये चिंता का विषय बन गया है। यहां तक की विश्व बैंक ने इसकी तुलना ब्लेक डेथ नामक महामारी से की है। जिसने 18 वीं सदीं में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। कुपोषण को क्यों इतना महत्वपूर्ण माना जा रहा हैं? विश्व बैंक जैसी संस्थायें क्यों इसके प्रति इतनी चिंतित है? सामान्य रूप में कुपोषण को चिकित्सीय मामला माना जाता है और हममें से अधिकतर सोचते हैं कि यह चिकित्सा का विषय है। वास्तव में कुपोषण बहुत सारे सामाजिक-राजनैतिक कारणों का परिणाम है। जब भूख और गरीबी राजनैतिक एजेडा की प्राथमिकता नहीं होती तो बड़ी तादाद में कुपोषण सतह पर उभरता है। भारत का उदाहरण ले जहां कुपोषण उसके पड़ोसी अधिक गरीब और कम विकसित पड़ोसीयों जैसे बांगलादेश और नेपाल से भी अधिक है। बंगलादेश में शिशु मृत्युदर 48 प्रति हजार है जबकि इसकी तुलना में भारत में यह 67 प्रति हजार है। यहां तक की यह उप सहारा अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण का दर लगभग 55 प्रतिशत है जबकि उप सहारीय अफ्रीका में यह 27 प्रतिशत के आसपास है।
जिस देश का बचपन कुपोषण का शिकार है, उसका भविष्य क्या होगा? अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। आज देश का हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है और उम्र के हिसाब से उसकी लंबाई नहीं बढ़ रही है। यह आंकड़ा देश में बढ़ती आर्थिक विषमता की असलियत भी बयां करता है। यह आंकड़े बताते हैं कि बाल स्वास्थ्य के मामले में हमारी स्थिति अफ्रीका के गरीब मुल्कों से भी बदतर है। देश के 100 जनपदों में पांच साल से अधिक उम्र के एक लाख से ज्यादा बच्चों पर कराये गये हंगामा के सर्वेक्षण में यह तथ्य भी सामने आया कि तकरीबन साठ फीसदी बच्चों का कद उनकी उम्र के हिसाब से काफी कम है। कुपोषण का यह आंकड़ा गरीबी के प्रतीक माने जाने वाले सहारा अफ्रीकी गरीब देशों की तुलना में दुगना है। चूँकि यह सर्वेक्षण देश के महज नौ राज्यों के ११२ जिलों में ७३ हजार परिवारों को आधार बनाकर किया गया है, लिहाजा इसे देश में कुपोषण की मुकम्मिल तस्वीर नहीं माना जा सकता, जो कि और भी भयावह हो सकती है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स २०११ में (दुनिया के ८१ विकासशील और पिछड़े मुल्कों में) भारत का स्थान ६७वाँ है, जबकि बांग्लादेश का ६८ वाँ। दुनिया के महज १४ देश ही हमसे पीछे हैं। चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, वियतनाम जैसे एशियाई देशों के अलावा रवांडा और सूडान जैसे देश भी इस मामले में भारत से बेहतर स्थिति में नजर आते हैं, जबकि भारत की छवि तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था की बनी हुई है।
पिछले एक साल के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई बार भुखमरी, गरीबी और कुपोषण पर अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। एक ओर देश में हर साल उचित भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ जाता है जबकि दूसरी ओर करोड़ों भारतीयों को भूखे पेट सोना पड़ता है। यह कहते हुए कोई एक साल सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई थी लेकिन उसके बाद भी हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। भंडारण की बदइंतजामी के चलते अनाज के सड़ने और लोगों के भूख से मरने का सिलसिला लगातार जारी है। कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के जरिए भारत में कुपोषण की व्यापकता सामने आ चुकी है और अब एक अन्य सर्वेक्षण ने भी इस भयावह हकीकत की तसदीक की है। पर केंद्र सरकार ने कभी भी शीर्ष अदालत की चिंता को गंभीरता से नहीं लिया। यही वजह है कि एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को आड़े हाथों लेते हुए उसे आदेश दिया है कि देश में कोई भी मौत भुखमरी और कुपोषण की वजह से नहीं होनी चाहिए। यह जिम्मेदारी सरकार की है कि वह गरीबों को भोजन उपलब्ध कराए। कोर्ट ने यह निर्देश पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) द्वारा एक जनहित याचिका पर दिया है। यह याचिका सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में भ्रष्टाचार और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के गोदामों में सड़ रहे अनाज के मुद्दे पर दायर की गई थी। याचिका में कहा गया है कि देश में एक तरफ हजारों लोग भूखे रह रहे हैं तो दूसरी तरफ अनाज गोदामों में सड़ रहा है। सचमुच देश में गरीबी और भुखमरी का यह आलम है कि देश में आधे से अधिक बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में है। ऐसे में अनाजों को गोदामों में बंद रखना बेहद ही निर्मम सरकारी व्यवस्था को दर्शाता है। इस दिशा में जो भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, वह देश में गरीबी को देखते हुए अच्छा कदम है। यदि बात अनाजों की सड़ने की करें तो अनाजों के सड़ने में बड़ी समस्या गोदामों की कमी भी है। जस्टिस दलवीर भंडारी और जस्टिस दीपक वर्मा की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को भ्रष्टाचार और हेराफेरी से बचाने के लिए इसका कंप्यूटरीकरण जरूरी है, ताकि पीडीएस में हो रहे बड़े स्तर पर चोरी और भ्रष्टाचार को कम किया जा सके। क्योंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तरह बंटने वाले अनाज की कालाबाजारी बहुत अधिक है। इस पर अंकुश लगाने के लिए समूची प्रणाली की कंप्यूटरीकरण जरूरी है।

सचमुच हमारे देश में रख-रखाव और भंडारण की पर्याप्त सुविधा न होने से हरेक साल 50000 करोड़ से ज्यादा का खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है। जरा सोचिए, इतने खाद्यान्न से कितने भूखे लोगों व उनके परिवार का पेट भरा जा सकता है। यह एक ऐसे देश की शर्मसार करने वाली तस्वीर है, जहां आज भी प्रतिदिन 26 करोड़ लोग एक वक्त बिना खाए भूखे सोने के लिए मजबूर है। यह सही है कि गरीबों को खाना देने की कई योजनाएं अरसे से हमारे यहां चल रही हैं। घटी दरों पर खाद्यान्न देने के कार्यक्रम भी होते रहते हैं। कहने के लिए राशन की व्यवस्था भी है, लेकिन इन सबके बावजूद हकीकत यह है कि लोग भूख से मरते हैं। भंडारगृहों में खाद्यान्न है, लेकिन वह न तो जरूरमंदों तक पहुंचता है और न ही जरूरतमंद उस तक पहुंच पाते हैं।
कुपोषण इस समय देश में  एक जटिल समस्या है। घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब गरीब समर्थक नीतियां बनाई जाए जो कुपोषण और भूख को समाप्त करने के प्रति लक्षित हों। हम ब्राजील से सीख सकते हैं जहां भूख और कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा माना जाता है। वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में जहां गरीबों के कल्याण को नजर अंदाज किया जाता है, खाद्य असरुक्षा बढ़ने के आसार नजर आते हैं। हम किस प्रकार सरकार के निर्णय को स्वीकार कर सकते है जब वह लाखों टन अनाज पशु आहार के लिए निर्यात करती है और महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में कुपोषण से मौतों की मूक दर्शक बनी रहती है। आज के समय में किसानों को खाद्यान्न से हटकर नगदी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के कारण खाद्य संकट और गहरा सकता है और देश को फिर से खाद्यान्नों के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ सकता है। हाल ही में जनवितरण प्रणाली को समाप्त करने के सरकार के प्रयास इस ओर इशारा करते हैं।
भारत में समेकित बाल विकास सेवा एक मात्र कार्यक्रम है जो सीधे कुपोषण निवारण के लिये जिम्मेदार है। यह आंगनवाड़ियों के एक विस्तृत नेटवर्क द्वारा संचालित होता है जिसमें पूरक पोषण, स्कूल पूर्व शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बच्चों, गर्भवति एवं धात्री महिलाओं और कुपोषित बालिकाओं तक पहुंचाना अपेक्षित है। किन्तु आंगनवाड़ियों की प्रभाविता कई कारणों से बाधित होती है। केन्द्रों की अपर्याप्त संख्या, कम मानदेय प्राप्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, 3 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये झूलाघर की अनउपलब्धता जैसी समस्यायें धरातल पर नजर आती है। वृहद स्तर पर राजनैतिक इच्छा शक्ति और बजट प्रावधान में कम प्राथमिकता इसे प्रभावित करती है। वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद का 3000 करोड़ रूपयों का प्रावधान सकल घरेलू उत्पाद का 1/10वां हिस्सा भी नहीं हैं। यह तथ्य और स्पष्ट होता है जब हम इसकी तुलना रक्षा के लिये किये गये आवंटन से करते हैं। यदि संसद में बच्चों के लिए उठाये जाने वाले प्रश्नों को देखे तो तो यह दोनों सदनों में उठाये गए प्रश्नों का मात्र 3 प्रतिशत होता है। आश्चर्य की बात नहीं है-बच्चें मतदाता नहीं होते!
कुपोषण कार्यक्रमों और गतिविधियों से नहीं रूक सकता है। एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है। जब तक खाद्य सुरक्षा के लिये दूरगामी नीतियां निर्धारित न हो और बच्चों को नीति निर्धारण तथा बजट आवंटन में प्राथमिकता न दी जाए तो कुपोषण के निवारण में अधिक प्रगति संभव नहीं है।
अमर्त्य सेन की 1981 में लिखी गई किताब पॉवर्टी एंड फैमीन एंड एम्से आन इनटाइटिलमेंट एंड डिप्राइजेशन में दलील दी गई है कि ज्यादातर मामलों में भुखमरी और अकाल का कारण अनाज की उपलब्धता की कमी नहीं, बल्कि असमानता और वितरण व्यवस्था की कमी है। सभी को कम से कम दो जून की रोटी नसीब हो, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि आधुनिकता व भूमंडलीकरण के बावजूद स्थिति में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो पा रहा है।

यह स्पष्ट है कि दीर्घकालिक हल आर्थिक नीतियों की पुनरर्चना व ग्रामीण विकास और रोजगार को बढ़ावा जैसी प्रक्रिया बिना नहीं निकल सकते। समग्रता से खाद्यान सुरक्षा, छोटे किसान, भूमिहीन मजदूर व कारीगरों के रोजगार, स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल खेती, और दामों पर नियन्त्रण की नीतियों को अपनानी होंगी। परन्तु इस सब के लिये बहुसंख्य जनता इन्तजार करती रही तो तात्कालिक संकट से कैसे जूझेगी ?
सम्भव तात्कालिक कारगर उपाय

1. सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा महीने का बी.पी.एल. परिवारों को 35 किलो. बेचने का प्रावधान था जिसको हाल में 45 किलो. किया गया। परन्तु यह अभी भी अपर्याप्त है और आवश्यकता है कि 100 किलो. अनाज दिया जाए ताकि 5 व्यक्तियों के परिवार को बाजार से खरीदना न पड़े। गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के अलावा अन्य के लिये भी यह प्रावधान खोल दिया जाय। राजस्थान सरकार के एक सर्वेक्षण ने दिखाया था कि कुपोषण ग्रसित बच्चों में एक तिहाई ही बी.पी.एल. थे और दो तिहाई तो गरीबी रेखा के ऊपर वाले थे। (ए.पी.एल.) हालांकि बी.पी.एल. में 80 प्रतिशत कुपोषित थे और ए.पी.एल. में लगभग 20 प्रतिशत ही।

२. जिला का प्रशासन भुखमरी से हुई मौत के प्रमाणित होने पर मृतक के परिवार को मुआवजा, खाद्यान अथवा रोजगार देता है। हालांकि प्रमाण इकट्ठे करना जो प्रशासन को मान्य हो, यह अक्सर विवादित रहता है।

3. सूखा ग्रस्त जिलों को चिन्हित कर प्रशासन उनमें रिलीफ का काम चालू करता है। परन्तु यह खाद्यानों के दाम बढ़ने पर लागू नहीं होता, जब तक भुखमरी से मौत का प्रमाण न मिलें।

4. आमतौर पर भी पर्याप्त खानों के दाम 30-40 प्रतिशत आबादी की क्रय शक्ति के बाहर रहते हैं। ऐसे में करोड़ों भारतीय भूखे ही सो जाते है, बहुसंख्य बचपन से ही छोटे कद के व दुर्बल रह जाते है। ऐसे दुर्बल बच्चे व बुजुर्ग बढ़ती खाद्यान की कमी के सबसे पहले शिकार बनते हैं। इस समस्या के हल के लिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा खाद्यान्न का प्रावधान है, और बच्चों व गर्भवती माँओं के लिये आँगनवाड़ी पर पोषण की व्यवस्था है।
कुपोषण की जटिल समस्या के समाधान के लिए कोई भूखा न सोएअभियान की सम्भावना

- नागरिक प्रशासन को 9 प्रतिशत की आर्थिक बढ़ोतरी के फल को बांटना पड़ेगा, कम से कम हर परिवार को न्यूनतम भोजन मौहयया कराने के लिये।

- कुपोषण और भुखमरी बढ़ाने के संकेत शुरू में ही पहचानने की व्यवस्था बनानी होगी, ताकि कारगर कदम उठाकर भूख की व्यापकता कम की जा सके।

- चिन्हित इलाकों, समुदायों व परिवारों के लिये, परिस्थिति अनुरूप, कम दरों पर खाद्यान्न, रिलीफ के लिये मजदूरी के काम और समुदायिक रसोई जैसी व्यवस्थाऐं करी जाये।

- स्वास्थ्य विभाग एवं आंगनवाड़ी (आई.सी.डी.एस.) के कार्यकर्ता लगभग हर गाँव व कस्बे में तैनात हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के तहत हर 1000 या उससे भी कम की आबादी पर एक आशाहै-आठवीं पास गाँव की बहू जिसकों ट्रेनिंग देकर स्वास्थ्य के मुद्दों पर जागरूकता बढ़ानें एवं प्राथमिक उपचार देने के लिये तैयार किया गया है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व आशा को मिलकर माह में एक दिन ग्रामीण स्वास्थ्य पोषण दिवस मनाना होता है। वहीं बच्चों का वजन मापा जाता है। ए.एन.एम. (डेढ़ साल की ट्रेनिंग पाई नर्स) गर्भवती महिलाओं की जाँच और माँओं व बच्चों का टीकाकरण भी करती है। खेद की बात है कि पोषण पर ध्यान घटता जा रहा है। बच्चों के वजन द्वारा कुपोषण मापने पर कारगर कदम उठाना तो दूर, कुपोषण दर्ज करने पर ही पाबन्दी हैं। अब स्वास्थ्य मंत्रालय व महिला व बाल विकास डिपार्टमेंट के अफसर और नीतिनिर्थाक भी इससे चिन्तित है, और कुछ कारगर उपाय खोज रहे हैं। पोषण व स्वास्थ्य के काम में तालमेंल बढ़ाना इसका एक तरीका है।
- इस संयुक्त काम को इस साल अगर मुहिम के तौर पर उठाया जाए तो प्रशासन, स्वास्थ्य सेवा व आई.सी.डी.एस. तीनों को कुपोषण की समस्या पर फिर ध्यान केन्द्रित करना होगा। सरकार व राजनैतिक पार्टियां लोगों की एक प्रमुख समस्या पर कुछ ठोस काम करती नजर आएंगी।
- बच्चों के वजन पर महीनेवार सख्त निगरानी रखने से पता लगाया जा सकता है कि किस इलाके या आबादी में 20 प्रतिशत से अधिक बच्चों का वजन घटा है। इसकों समुदाय में बिगड़ती खाद्य परिस्थिति और सम्भावित भुखमरी का द्योतक माना जा सकता है। ऐसी स्थिति की रिपोर्ट तुरन्त पंचायत व जिला कलेक्टर को दी जाए, और वह उपरोक्त कदम लेने के लिये तैयार रहें, तो भुखमरी के कारण मौतों की रोकथाम हो सकती है।
-जहाँ अब तक आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ज्यादा कुपोषण रिपोर्ट न करने की मौखिक हिदायत दी जाती है, जरूरी है कि अब कुपोषित बच्चे चिन्हित करने पर उन्हें (व आशा को) इनाम दिया जाए।
- ग्राम स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समिति व पंचायत मिलकर इसका ध्यान रखे कि क्या गाँव के परिवारों में खाने का अभाव है, और यदि हाँ तो कौन भूख का शिकार हैं। इसका वह प्रशासन से उपाय मांगें। इससे आगे, वह सरकार द्वारा दिया सालाना रू.  10000/- व अन्य चन्दा इकट्ठा करके कोई भूखा न सोएअभियान चला सकते हैं।
- स्वयंसेवी व विभिन्न आंदोलन समूह भी इस काम में जुड़े। सरकारी कार्यक्रमों में उन्हें जोड़ा जाए ताकि ग्राम स्वास्थ्य एवं स्वच्छा समिति कारगर बनें, आशा व आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के काम में मजबूती लाएं। परन्तु सरकारी कार्यक्रम हो या न हो, स्वयंसेवी आन्दोलन समूह अगर अपने-अपने क्षेत्र में अपने ही कार्यकर्ताओं के माध्यम से यह कार्य शुरू कर दें और गाँव व मौहल्ले के स्तर पर कोई भूखा न सोएअभियान चालू कर दें तो उसका कुछ तो असर होगा।
- मन्दिर-मस्जिद-गुरूद्वारे, व्यापारी मण्डल और कॉर्पाेरेट सोशल रिस्पोंन्सिबिलिटि निभाने वाले समूह सभी इस बुनियादी अभाव को दूर कर देश को इस कलंक से मुक्ति दिलाने के लिये एक लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
इसके लिये राजनैतिक संकल्प की आवश्यकता है और ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों की जो समाज की त्रासदी और लोगों की पीड़ा के कारगर निदान के लिये कदम लेने को तत्पर हो। अगर हम अभी बड़े पैमाने पर ऐसे कदम नही उठाएंगे तो देश मिलेनियम डिवेल्पमेन्ट गोल्जव राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लक्ष्यों की चुनौती से और दूर चला जाएगा।
आज हमारा देश और समाज जिस चौराहे पर खड़ा है, हमारे भविष्य की शक्ल ऐसी चुनौतियों से ही निर्णायक रूप लेगी। हम सब एक जुट होकर कैसे इस चुनौती का सामना करते है, उससे तय होगा कि हमारा समाज एक जिंदा, मजबूत, संवेदनशील और मानव अधिकारों को मानवीयता और जरूरतमंद की सेवा से जोड़ने वाले समाज के रूप में उभरेगा, या अपने सदस्यों को भूख से तड़पने को छोड़ बेमुरव्वत, गैरजिम्मेवार, बंटा हुआ व संवेदनशून्य समाज बनेगा।
लेखक 
शशांक द्विवेदी 

कब सुलझेगा काले धन का मुद्दा



कब सुलझेगा काले धन का मुद्दा
काला धन एक बड़ी चुनौती
काले धन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है इसकी दो प्रमुख वजह है एक तो पिछले दिनों  अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने चेतावनी दी है कि भारत को मनी लॉन्डरिंग यानी काले धन को वैध बनाने और चरमपंथियों को आर्थिक सहायता का ख़तरा सबसे बड़ी चुनौती है । दूसरी यह कि देश में काले धन पर आवाज उठाने वाले और आंदोलन करने वाले बाबा रामदेव पर दिल्ल्ली में स्याही फेक दी गयी तब से लगातार इस पर राजनीतिक बयानबाजियो का दौर जारी है । कौन सही है कौन गलत है यह तो जाँच का विषय है लेकिन विरोध का यह तरीका ठीक नहीं है । लेकिन व्यक्ति विशेष को छोड़कर काले धन के मुद्दे पर ध्यान दे तो पता चलता है अभी तक इस विषय में सरकार द्वारा कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया । संसद के शीतकालीन सत्र में भी इस विषय पर संसद में चर्चा हुई लेकिन इसका कोई भी सार्थक नतीजा नहीं निकला जबकि यह देश के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दा है ।  
आईएमएफ़ की रिपोर्ट में कहा गया है, एशिया की उभरती आर्थिक ताकत के रूप में भारत अहम है लेकिन उसे मनी लॉन्डरिंग और चरमपंथियों तक आर्थिक सहायता पहुँचने का ख़तरा एक बड़ी चुनौती है। इसमें कहा गया है कि भारत में मनी लॉन्डरिंग देश और देश के बाहर की ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों का नतीजा हैं। आईएमएफ़ का मानना है कि भारत चरमपंथियों का निशाना पहले भी बना है और आगे भी उनके निशाने पर रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार चरमपंथियों को विभिन्न स्रोतों से धन पहुँचने का ख़तरा है। इसमें भारत के अंदर और बाहर ग़ैरक़ानूनी गतिविधियाँ, मादक पदार्थों का कारोबार, धोखाधड़ी, संगठित अपराध, मानव तस्करी, भ्रष्टाचार, नकली धन और अवैध धन वसूली जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।
भ्रष्टाचार देश की जड़ों को खोखला कर रहा है। भ्रष्टाचार के अनेक रूप हैं लेकिन काला धन इसका सबसे भयावह चेहरा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी के अनुसार भारत के लोगों का लगभग 20 लाख 85 हजार करोड़ रूपए विदेशी बैंकों में जमा है। देश में काले धन की समानांतर व्यवस्था चल रही है। चूंकि इस धन पर टैक्स प्राप्त नहीं होता है इसलिए सरकार अप्रत्यक्ष कर में बढ़ोतरी करती है, जिसके चलते नागरिकों पर महंगाई समेत तमाम तरह के बोझ पड़ते हैं।
अपनी कमाई के बारे में वास्तविक विवरण न देकर तथा कर की चोरी कर जो धन अर्जित किया जाता है, वह काला धन कहा जाता है। विदेशी बैंकों में यह धन जमा करने वाले लोगों में देश के बड़े-बड़े नेता, प्रशासनिक अधिकारी और उद्योगपति शामिल हैं। विदेशी बैंकों में भारत का कितना काला धन जमा है, इस बात के अभी तक कोई अधिकारिक आंकड़े सरकार के पास मौजूद नहीं हैं लेकिन स्विटजरलैंड के स्विस बैंक में खाता खोलने के लिए न्यूनतम जमा राशि 50 करोड़ रुपये बताई जाती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जमाधन की राशि कितनी विशाल होगी। स्विस राजदूत ने माना है कि भारत से काफी पैसा स्विस बैंकों में आ रहा है। कुछ महीनों पहले स्विस बैंक एसोसिएशन ने भी यह कहा था कि गोपनीय खातों में भारत के लोगों की 1456 अरब डॉलर की राशि जमा है।
पिछले दिनों विदेशों में जमा काले धन का मुद्दा और गर्मा गया जब स्विस बैंकर और ह्निसल्ब्लोअर रुडोल्फ एल्मर ने स्विस कानूनों को तोड़ते हुए स्विटजरलैंड की बैंकों में खुले 2000 खातों ें की जानकारी की सीडी विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे को दे दी। इस सीडी में स्विटजरलैंड की बैंकों में खाता रखने वाले अमेरिकाए ब्रिटेन और एशिया के नेताओं और उद्योगपतियों के नाम हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने विदेशों में जमा काले धन के मामले को जोर शोर से उठाया था और इसे चुनावी मुद्दा बनाया था। उस दौरान प्रधानमंत्री ने भी इसका समर्थन करते हुए प्रचार अभियान में वादा किया था कि सत्ता में आने के 100 दिनों के भीतर वे इस दिशा में ठोस कार्रवाई करेंगे लेकिन वह अपने वायदों से दूर भाग रहे हैं।
पिछले दिनों सर्वाेच्च न्यायालय ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन पर चिंता जताई। प्रख्यात वकील श्री राम जेठमालानी द्वारा दायर एक याचिका पर सर्वाेच्च न्यायालय ने कहा कि विदेशों में जमा काला धन केवल टैक्स की चोरी मात्र नही है, यह गंभीर अपराध, चोरी और देश की लूट का मामला है। न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एसएस निज्जर वाली पीठ ने यह कड़ी टिप्पणी की। काले धन का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने में किया जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने भी इस ओर इशारा किया है कि विदेशों में जमा काला धन ही आतंकियों को वित्तीय मदद के रूप में भारत में आता है
काले धन पर यूपीए सरकार के ढुलमुल रवैये से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार भ्रष्टाचारियों के साथ है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 30 जुलाई 2009 को राज्यसभा में बताया था कि विदेशी बैंकों से काले धन को वापस देश में लाने के लिए सरकार कदम उठा चुकी है। प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी सदन में वित्त विधेयक पर वित्त मंत्री के बयान पर खुद दी गई थी। प्रधानमंत्री ने देश को आश्वस्त किया था कि स्विस बैंकों में जमा एक लाख करोड़ रुपये के भारतीय काले धन को सत्ता संभालने के 100 दिन में वापस देश में ले आएंगे। लेकिन ये धन आज तक नही आया ।
वहीं दूसरी ओर, विदेशी बैंकों में जमा काले धन के बारे में सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा कड़ा रुख अपनाए जाने पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि काले धन को तुरंत वापस लाना आसान नहीं है और इस संबंध में मिली जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। जहां प्रधानमंत्री विदेशी बैंकों में भारतीय खाताधारकों के नाम बताने से इनकार कर रहे हैं वहीं कांग्रेस महासचिव श्री राहुल गांधी कह रहे हैं कि काला धन रखने वालों पर मामला दर्ज होना चाहिए। यह बयान केवल एक मजाक है। क्योंकि उन्हें बयान जारी करने की बजाए ठोस पहल प्रारंभ करनी चाहिए।
अभी तक विदेशी बैंकों में जमा काले धन को भारत वापस लाने के लिए हमारे पास ठोस कानून नहीं है। इसलिए इस दिशा में ठोस कानून बनाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही काले धन के मुद्दे पर राष्ट्रीय आम सहमति बनाने का प्रयास हो तथा विदेशों में भारतीय नागरिकों द्वारा जमा किए गए काले धन को वापस लाने के लिए सरकार प्रबल इच्छाशक्ति का परिचय दे। काले धन की वापसी से भारत की अर्थव्यवस्था का कायापलट हो सकता है। अगर ये काला धन देश की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ दिया जाए तो स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, बिजली आदि बुनियादी आवश्यकताओं को सहज ही पूरा किया जा सकता है।
लेखक 
शशांक द्विवेदी 


उम्मीदों का साल !!


आम आदमी की उम्मीदों का साल !!
नए साल में एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत का संकल्प लिया है और मजबूत लोकपाल बिल पास कराने की वकालत की है । बीते साल अगर उनके वक्तव्यों और वादों पर गौर करे तो पता चलता है उन्होंने देश की आम जनता से सिर्फ वादे किये है,सपने दिखाए है पर उनको पूरा करने के लिए वास्तविक धरातल पर कुछ नहीं किया है । इसका एक सबसे बड़ा उदाहरण है कि पिछले साल अगस्त में जब अन्ना हजारे का अनशन प्रधानमंत्री और संसद की पहल पर तोडा गया था उस समय जिन तीन बातों पर  संसद ने  सिध्धान्ततः सहमति जताई थी मसलन  सिटीजंस चार्टर, निचले स्तर की नौकरशाही को लोकपाल के तहत रखना  और  राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना । उनमे से प्रस्तावित कमजोर लोकपाल में सिर्फ एक राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना को रखा गया है । जबकि इसका भी पुरजोर विरोध सरकार के सहयोगी दल कर रहे है ,अधिकांश क्षेत्रीय दल इसका विरोध कर रहे है जिसको देखते हुए यह भी पारित  लोकपाल बिल में रह पायेगा या नहीं इस पर भी संशय  है । कहने का मतलब यह कि सरकार जो वायदे आम आदमी से करती है ,उसको वह पूरा करे ये जरुरी नहीं है । उस समय अन्ना का अनशन तुडवाना सरकार की प्राथमिकता में था उसके लिए चाहे जो भी वायदे करने  पड़ते  ,सरकार ने किये  । यही वजह है कि आज देश के सामने प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार के विरुद्ध संकल्प की कोई विश्वसनीयता जनता में रही नहीं ।   
बीते साल २०११ में दो बड़ी घटनाये हुई .पहली यह कि अन्ना आन्दोलन के माध्यम से देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार पर  आम आदमी का आक्रोश कई दशको बाद सड़क पर आया ,उसकी उम्मीदें,उसका विश्वास जगा की अब इस देश में कुछ परिवर्तन  होगा । दूसरी घटना यह कि साल बीतते बीतते आम आदमी का विश्वास और उसकी उम्मीदे दोनों एक साथ टूट गए । इतना कमजोर लोकपाल बिल भी संसद में पारित नहीं हो सका । यूपीए गठबंधन के सहयोगी राजद के एक सांसद ने तो खुलेआम राज्यसभा में लोकपाल की प्रतिया फाड़ दी ।  सांसदों ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि वास्तव में संसद ही सर्वाेच्च है ! सदन में आम आदमी एक बार फिर से हार गया.देश के राजनेता एक दूसरे की  पीठ थपथपा रहे है कि हमने लोकपाल बिल पास नहीं होने दिया । अन्ना हजारे का मुंबई अनशन टूटने पर ,जेल भरो आंदोलन स्थगित होने पर, उनकी हार मान  कर सरकार में बैठे लोगो में खुशी की लहर दौड गयी । वास्तव में आम आदमी के रूप में अन्ना को तो हारना ही था !! इस देश में आम आदमी कभी जीता है क्या ? आजादी के पहले भी और बाद में भी आम आदमी हमेशा हारा ही है , आगे भी कभी जीत पायेगा इसकी सम्भावना कम हीै । सत्ता के दलालो से तो गाँधी जी भी हार गए थे ,उनकी फोटो लगाकर वोट मांगने वाले ,उनकी बात करने ,पूजा करने वालो ने आज तक उनकी भी कोई बात नहीं मानी । महात्मा गाँधी को अपना आदर्श मानने वाली कांग्रेस के महासचिव बी के हरिप्रसाद जब अन्ना हजारे को दो कौड़ी का आदमी बोलते है ,बेनी प्रसाद वर्मा ,मनीष तिवारी ,दिग्विजय सिंह आदि नेता भी अन्ना पर तीखे शब्द बाण चलाते रहते है .सरकार के खिलाफ आंदोलन ,धरने और प्रदर्शन करने वाले अन्ना ,हरिप्रसाद की नजर में यदि दो कौड़ी के आदमी है ,तो इसका मतलब मान लिया जाना चाहिए कि कांग्रेस विरोध के इन तरीकों को जायज नहीं मानती । राजनेता पूरी तरह से अन्ना हजारे के प्रति दुष्प्रचार में लगे हुए है ,कोई कहता है कि वे भगोड़े सिपाही है ,तो कोई उनको अमेरिका का एजेंट बताता है .वास्तव में उनका कसूर सिर्फ इतना है उन्होंने देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सकारात्मक मुहिम छेड़ी और आम आदमी में एक विश्वास और जज्बा पैदा किया ।
बीते साल सरकार ने अपना पूरा जोर देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे आंदोलनों को कुचलने ,निष्प्रभावी बनाने में लगा दिया .स्वामी रामदेव के अनशन पर रात में लाठीचार्ज फिर लगातार उन पर कार्यवाही । यही हाल टीम अन्ना के साथ हुआ ,पूरी टीम के एक एक सदस्य के पीछे देश का खुफिया विभाग लगा रहा ,सरकारी मशीनरी उनके खिलाफ काम करती रही । इन लोगो का कसूर सिर्फ इतना है कि इन्होने देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन किया ।
काश देश की ये सरकारी मशीनरी भ्रष्ट नेताओ ,अधिकारियो के कारनामो को देश के सामने लाती । विदेशो में जमा काले धन  को लेकर भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया ,जबकि सर्वाेच्च न्यायालय ने कर अदायगी से बचने के लिए हसन अली सहित अन्य लोगों के विदेशी बैंकों में जमा काले धन के स्रोत का पता लगाने की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाने के लिए कई बार केंद्र सरकार को फटकार लगाई। देश के बाहर भेजे गए धन का पता लगाने के लिए अब तक कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया। आज की तारीख में भी हमारे पास पुराने तथ्य मौजूद हैं। पिछले दिनों कैग की रिपोर्ट के अनुसार देश के पूरे कर का  ८७ प्रतिशत कर चोरी  १२ लोगो ने की है । लेकिन अब उसे वसूला नहीं जा सकता । तो सवाल यह उठता है कि इस दिशा में पहले कदम क्यों नहीं उठाये गए । वास्तव में सरकार ने इन लोगो के धन के स्रोत का पता लगाने की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं की ।
लोकपाल बिल के एक बार फिर लटकने से देशवासियों में गहरी निराशा है ,पिछले ४३ सालो से किसी न किसी कारण यह टलता आ रहा है । सच बात तो यह है इसको लेकर कोई भी पार्टी संजीदा नहीं है ,सब लोग राजनीति कर रहे है । लोकपाल को पारित कराने की पूरी कवायद की अगर हम बात करें, तो कुल मिलाकर सभी ने मिलकर संसद और देश का समय खराब किया है। कोई भी सांसद अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं होने देना चाहता ,क्षेत्रीय दल नहीं चाहते कि राज्यों में लोकायुक्त बनाना जरुरी हो । कुल मिलाकर कोई भी पार्टी मजबूत लोकपाल नहीं चाहती । देश मे इतने बड़े पैमाने पर ऊपर से नीचे फैले भष्टाचार पर आम आदमी को राहत कब मिलेगी ?इस साधारण प्रश्न का जवाब हमारे ईमानदार कहे जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  जी के पास भी नहीं है । उन्होंने नए साल के संकल्प पर भ्रष्टाचार मुक्त भारत का संकल्प लिया है । पर देश को वो सही दशा और दिशा कैसे देगे उसका जवाब अभी भी उनके पास नहीं है । 
देश में आम आदमी के साथ अन्याय अपनी सीमाए लाँघ चुका है,राजनीति अपनी मर्यादा खोती जा रही है । ऐसे में देश के बुद्धिजीवी वर्ग को आगे आना चाहिए । आगे आने वाले चुनाव में सभी राजनीतिक दलों से स्पष्ट पूछना चाहिए कि आपने अब तक हमारे लिए क्या किया है । वास्तव में जिस दिन इस देश की जनता जागरूक हो जायेगी ये लोग हमें बेवकूफ नहीं बना पायेगे । देशवासियो को जाति ,धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर आगे आना ही होगा तभी इस देश में आम जनता की सुनी जायेगी ,राजनेता भी संजीदा होगे । जब तक आम आदमी जाति और धर्म की राजनीति में फस रहेगा । नेता लोग मनमानी करते रहेंगे ।     
अनशन स्थगित करने के बाद स्वास्थ्य कारणों से अब यह साफ हो गया है कि अन्ना हजारे विधानसभा चुनाव वाले पांच राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार नहीं करेंगे। यह एक अच्छा फैसला है ,इसको टीम अन्ना को भी मानना चाहिए क्योकि सिर्फ कांग्रेस के विरोध से कुछ हासिल नहीं होगा । उनकी मुहिम चुनावी चुनावी राजनीति ने नहीं उलझनी चाहिए । . 
चुनावी राजनीति के दंगल में राजनीतिक दलों को चित्त करना बहुत टेढ़ी खीर है उसके लिए जो संगठन, कौशल और रणनीति चाहिए वो शायद अभी अन्ना की टीम में नहीं है । ये एक बिल्कुल नए तरह का खेल है जिसके दाँव-पेंच समझना अभी इनके बस में नहीं है.इसलिए टीम अन्ना को अभी अधिक से अधिक आम जनता के बीच में जाना होगा ,उनको विश्वास में लेना होगा .साथ में हर फैसला सोच समझकर लेना होगा .फैसला लेने के बाद धैर्य दिखाना सबसे जरुरी है ।
वर्तमान  हालात में अन्ना हज़ारे और उनकी टीम द्वारा संचालित आंदोलन की प्रासंगिकता, उसके प्रभाव और आंदोलन के भविष्य को लेकर कई बातें की जाने लगी हैं। लेकिन हाल में ही एक निजी टीवी चौनल द्वारा कराये गए सर्वेक्षण के अनुसार अभी भी देश के ५२ प्रतिशत लोगो का विश्वास टीम अन्ना में बना हुआ है ,देश के आम आदमी की उम्मीदें अन्ना से जुडी हुई है इसलिए अब हर आंदोलन और अनशन को सजगता और धैर्य के साथ जनता को विश्वास में लेकर करना पड़ेगा क्योकि सत्ता से टकराना आसान नहीं है । इसमें देश के हर आम आदमी को अपना सकारात्मक योगदान देना होगा तभी भ्रष्टाचार मुक्त भारत का हमारा सपना पूरा होगा । देश के चिन्तनशील और अनुभवी लोगों के जाग्रत होने की जरूरत है। आवश्यकता इस बात की है कि देश के समझदार और संघर्षशील लोग खुले दिल व दिमाग से, इकट्ठा होकर एक मंच पर आएं। उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम को और आगे ले जाना चाहिए। इससे धीरे-धीरे देश की परिस्थितियां सुधरेंगी एवं भ्रष्टाचार के विरूद्ध मुहिम को सही दिशा व गति मिलेगी।
लेखक 
शशांक द्विवेदी