Monday, January 30, 2012

गाँधी जी को किसने मारा !!


गाँधी जी को किसने मारा ?
आज  महात्मा गाँधी को राष्ट्र आज उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दे रहा है । गांधी की चौक-चौराहों पर लगी प्रतिमाओं पर जी भरकर श्रद्धासुमन अर्पित किये जा रहे हैं, देश गांधी मय हो गया है । पर एक प्रश्न सबके सामने आज भी खड़ा है कि गाँधी जी को किसने मारा ,नाथूराम गोडसे ने तो गाँधी जी को सिर्फ एक बार शारीरिक रूप से मारा लेकिन आज देश में गाँधी जी की हत्या तो हर रोज हो रही है ।गाँधी जी के विचारों को तो आजादी मिलते ही मार दिया गया था । जिस सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए  गाँधी जी ने पूरे विश्व को एक नई दिशा दी आज उन्ही के विचारों को हमने लगभग भुला दिया । गाँधी जी के नाम पर राजनीति करने वालों,वोट मागने वालों ने तो उन्हें कब का भुला दिया । अब वो सिर्फ सरकारी दफ्तरों में टंगी तस्वीरों में ही रह गए है । आजाद भारत ने तो कभी उनके विचारों को स्थान दिया ही नहीं ।
मगर उनका क्या जो अब गांधी का चित्र केवल करारी करेंसी में ही देखने के आदी हो चुके हैं । यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि जिस गांधी ने देश की आज़ादी के लिए अपने शरीर के सारे वस्त्रों का त्याग कर महज़ एक लंगोटी को अपनाया, जिनकी सच्चाई की कसमें खाईं जाती हों उसी बापू के चित्र वाले नोटों ने आज इंसानियत खत्म कर दी है ।
2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर (गुजरात) में जन्मे और भारतीय जनसमुदाय में बापू के नाम से पुकारे जाने वालेमोहनदास करमचंद गांधी की नृशंस हत्या इसी दिन देश के स्वातंत्र्य-प्राप्ति के चंद महीनों के भीतर30 जनवरी 1948 में हुयी थी । तब नाथूराम गोडसे ने भारत विभाजन के नाम पर उत्पन्न आक्रोश के वशीभूत होकर उन पर जानलेवा गोली चलाई थी । जिन गाँधी जो को अंग्रेजो ने आजादी तक बचाए रखा उन्ही को हम आजादी के कुछ साल भी जीवित न रख सके .कैसी विडम्बना है ये इस देश की । मुझे तो अब देश के भीतर हर उनका रोज का मारा जाना अधिक विचलित करता है ।  उनके नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले इस देश में अनेकों लोग उनकी शिक्षाओं की धज्जियां उड़ा रहे हैं, अपने कुकृत्यों से उनके देश को रसातल में धकेल रहे हैं ।
इस देश में क्या कुछ नहीं हो रहा है जो महात्मा गांधी के यशःशरीर पर आघात करने जैसा नहीं है?आज की राजनीति आपराधिक वृत्तियों वालों का अखाड़ा बनता जा रहा है । साफ-सुथरेपन का मुखौटा पहने हुए राजनेता अपराधियों के बल पर सत्ता हथियाने और उससे चिपके रहने के जुगाड़ में लगे हैं । वे हर प्रकार के समझौतों को स्वीकारने को तैयार हैं । अपने को साफ दिखाते हैं, लेकिन अपराधियों को संरक्षण देने का कुत्सित कार्य करते आ रहे हैं । यह ठीक है उनमें से बहुत से नेता स्वयं घूस नहीं लेते, देश का पैसा नहीं लूटते हैं, किसी की जमीन-जायदाद नहीं छीनते हैं, लेकिन ऐसा करने की छूट वे अपने सहयोगियों को तो देते ही हैं । जो चाहो करो भैया, बस मेरी कुर्सी बचाये रखोका मूक वचन उनके चरित्र का हिस्सा बन चुका है । अनर्गल बातें करना, दूसरों पर सही-गलत आरोप लगाना, कुछ भी बोलकर उसे नकारने कृत्य उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हो चुके हैं । क्या ये सब गांधी की वैचारिक हत्या करना नहीं है?
देश का प्रशासन संवेदनशून्य, अकर्मण्य, मुफ्तखोर और गैरजिम्मेदार बन चुका है । शर्माे-हया और आत्मग्लानि को जैसे देश-निकाला मिल गया है । वह तब तक सोता रहता है जब तक जनता धरना, चक्काजाम, आगजनी एवं हिंसक प्रदर्शन पर उतर नहीं उतर आती । पुलिस बल अपराधियों की नकेल कसने के बजाय निरपराध लोगों को जेल की सलाखों के पीछे करने से नहीं हिचकती है । एफआईआर दर्ज करने के लिए तक अदालत की शरण लेनी पड़ रही है । यह सब गांधी की हत्या से बदतर है ! और अदालतों का भी भरोसा है क्या? न्यायाधीशों पर भी गंभीर आरोप लगने लगे हैं । फिर भी जनता असहाय होकर उनको अपने पदों पर देख रही है । कोई कुछ नहीं कर पा रहा है । अवैधानिक या आपत्तिजनक कार्य कर चुकने पर भी किसी के चेहरे पर सिकन नहीं दिखती, तनाव का चिह्न नहीं उभरता, शर्म से गर्दन नहीं झुकती । क्या गांधी यही देखना चाहते थे? क्या उनके स्वप्नों की हत्या नहीं हो रही है?
गांधी का मत था कि हमारे समाज में सबसे निचले तबके के आदमी को सर्वाधिक महत्त्व मिलना चाहिए । वे इस पक्ष के थे कि संपन्न और अभिजात वर्ग को उनके लिए त्याग करना चाहिए । कृषि को प्राथमिकता मिलनी चाहिए । इस गरीब देश के तमाम लोगों के हित में श्रमसाध्य छोटे-मोटे उद्योगधंधों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । सभी को सादगी का मंत्र अपनाना चाहिए । लेकिन हो उल्टा रहा है । हाल की सरकारों का ध्यान कृषि से हटकर बड़े उद्योगों की ओर जा चुका है, ताकि संपन्न वर्ग अधिक संपन्न हो सके । आज हालात यह हैं कि दुनिया के सबसे अमीर लोगों में यहां के उद्योगपति हैं तो सबसे दरिद्र आदमी भी यहीं पर देखने को मिल रहे हैं । संपन्नता और विपन्नता की नित चौढ़ी हो रही खाई इसी देश की खासियत बन चुकी है । आज का आर्थिक मॉडल गांधी के विचारों के विपरीत है । किसानों की हालत बिगड़ती जा रही है और वे आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं । देश को ऐसी व्यवस्था की ओर धकेलना गांधी की हत्या करने के समान ही तो है।
हत्या, बलात्कार, लूट, अपहरण और आर्थिक भ्रष्टाचार के रूप में गांधी की हत्या हर दिन हो रही है । देश के शासनकर्ता और प्रशासन-तंत्र मूक बने हुए हैं । हाल के समय में अपराधियों का मनोबल तेजी से बढ़ा है । उन्हें राजनेताओं और शीर्षस्थ प्रशासनिक अधिकारियों का संरक्षण मिला रहता है इस बात में कोई शक नहीं है । गांधीजी ने स्वतंत्रता संग्राम में तो देश की अगुवाई की और भारत को दासता की बेड़ियों से आजाद करवाया लेकिन जब आजादी मिल गई तब वह अपनों के आगे हारते नजर आए । जिस सिपाही ने बिना हथियार उठाए देश को आजादी दिलाई उसे आज ऐसी जगह स्थान मिला है जिसके लिए लोग कभी भी और किसी भी हद तक हिंसा कर सकते हैं यानि पैसे के लिए । गांधीजी की फोटो के नीचे आज सभी नेता शान से रिश्वत लेते हैं । उनकी कल्पना के स्वराज्य का आधार आध्यात्मिक समाज ही हो सकता था और आध्यात्मिक समाज की रचना का माध्यम राज्य द्वारा स्थापित संस्थाएं या कानून नहीं होते अपितु आध्यत्मिक शक्ति से सम्पन्न व्यक्ति ही हो सकते हैं। इसलिए द.अफ्रीका में रहते हुए गांधी जी ने सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह व ब्राहृचर्य का व्रत पहले अपने जीवन में अपनाया और फिर फोनिक्स व टालस्टाय आश्रमों की स्थापना कर उस जीवन को अन्य आश्रमवासियों में उतारने का प्रयास किया।
गांधी जी की महानता को स्वीकार करते हुए भी यह प्रश्न तो हमारे मन में उठना ही चाहिए कि उनके जैसे प्रभावशाली आध्यात्मिक पुंज के भारत के सार्वजनिक जीवन का प्रेरणास्रोत बन जाने के बाद भी भारत हिन्द स्वराज में प्रस्तुत समाज निर्माण की दिशा में आगे क्यों नहीं बढ़ सका? जो लोग सोचते हैं कि हिन्द स्वराज को शब्द रूप में जन-जन तक पहुंचाकर भारत को पुन उस समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ा सकेंगे, वे भूल जाते हैं कि भारतीय मानस पर गांधी जी के प्रभाव का कारण हिन्द स्वराज नामक पुस्तक नहीं बल्कि गांधी जी का अपना जीवन था। इसीलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा को मेरे सत्य के प्रयोग जैसा नाम दिया। अब लोग गांधी जी के जीवन को तिलांजलि देकर उनके शब्दों का व्यायाम करके ही उनके सपनों का भारत बनाने का सपना देख रहे हैं। गांधी जी का जीवन तो उनके द्वारा प्रवर्तित रचनात्मक संस्थाओं में से भी विदा हो चुका है।
आज के दौर में जब देश में  राजनीति अपनी मर्यादा खोती जा रही है और भ्रष्टाचार अपने चरम पर है गाँधी जी के विचार और अधिक प्रासंगिक हो गए है । आज देश को उनके विचारों की ,उनकी नीतियों की बहुत ज्यादा जरुरत है । तभी हम असली आजादी महसूस कर सकेगे ।
लेखक
शशांक द्विवेदी 

Saturday, January 21, 2012

युवा शक्ति के प्रतीक है नेता जी सुभाष चन्द्र बोस


युवा शक्ति के प्रतीक है नेता जी सुभाष चन्द्र बोस 

नेताओं की भीड़ में मैं नेताजी तलाश रहा हूं
नारों के शोर में मैं जय हिंद तलाश रहा हूं
ज़ुबां खामोश है आज, दिल में टीस है बहुत
किसके आगे लगे जी , बस ये तलाश रहा हूं।।


तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे ‌‌‌आज़ादी दूंगा.. खून भी एक-दो बूंद नहीं, इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाए और मैं उसमें ब्रिटिश साम्राज्य को डूबो दूं। ये बाते कही थी नेताजी सुभाष चंद्र बोस। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, आजाद हिन्द फौज के संस्थापक और जय हिन्द का नारा देने वाले सुभाष चंद्र बोस (जन्म-23 जनवरी, 1897, कटक, उड़ीसा) के अतिरिक्त हमारे देश के इतिहास में ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं हुआ जो एक साथ महान सेनापति, वीर सैनिक, राजनीति का अद्भुत खिलाड़ी और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरुषों, नेताओं के समकक्ष साधिकार बैठकर कूटनीतिज्ञ तथा चर्चा करने वाला हो। भारत की स्वतंत्रता के लिए सुभाष चंद्र बोस ने क़रीब-क़रीब पूरे यूरोप में अलख जगाया। बोस प्रकृति से साधु, ईश्वर भक्त तथा तन एवं मन से देशभक्त थे। महात्मा गाँधी के नमक सत्याग्रह को 'नेपोलियन की पेरिस यात्रा' की संज्ञा देने वाले सुभाष चंद्र बोस का एक ऐसा व्यक्तित्व था, जिसका मार्ग कभी भी स्वार्थों ने नहीं रोका, जिसके पाँव लक्ष्य से पीछे नहीं हटे, जिसने जो भी स्वप्न देखे, उन्हें साधा और जिसमें सच्चाई के सामने खड़े होने की अद्भुत क्षमता थी।  हालांकि गांधीजी से उनकी विचारधारा मेल नहीं खाती थी, लेकिन गांधी जी ‌‌‌ने उन्हें "देशभक्तों का देशभक्त" कहा। ‌‌‌उनका दिया नारा "जय हिन्द" भारत का राष्ट्रीय नारा बना। "दिल्ली चलो" का नारा भी उन्होंने ही दिया। ‌‌‌बोस ने ही गांधीजी को "राष्ट्रपिता" की संज्ञा दी।
जिस नेता जी उपनाम को सुभाष बाबू ने गरिमा दी. वही नेता जी उपनाम आज भ्रष्ट तंत्र का पर्यायवाची हो गया है . आजादी के बाद देश के राजनीतिज्ञों ने नेता शब्द को इतना शर्मशार कर दिया कि आज कोई युवा नेता नहीं बनना चाहता .वह राजनीति की मुख्यधारा में शामिल होना ही नहीं चाहता .जबकि आजादी से पहले अधिकांश युवाओ में देश के लिए एक जज्बा था , एक सपना था  ,उम्मीदें थी ,हर कोई नेता जी सुभाष चन्द्र बोस बनना चाहता था .नेता जी युवाओ के प्रेरणा स्रोत तब भी थे और आज भी है .लेकिन आजादी के बाद नेता शब्द ऐसा हो गया है कि अब शायद ही कोई युवा इसे अपने नाम के साथ लगाना चाहे . ये देन है हमारी राजनीतिक व्यवस्था की . 
आजादी के पहले देश के नेता कहते थे तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूँगा ,आजादी के बाद तथाकथित नेता कहते है कि तुम मुझे वोट दो मै तुम्हे घोटाले दूँगा   .

आज जब देश में नेता शब्द के गरिमा घटी है ,समाज में नेता का मतलब भ्रष्ट समझा जाता है .ऐसे  में देश के असली नेता,नेता जी सुभाष चंद्र बोस का स्मरण होता है .जो देश के वास्तविक नेता थे ,आज देश को ऐसे ही नेता की जरुरत है ,जो देश को नई दिशा दिखा सके .
सुभाषचंद्र बोस एक महान नेता थे। महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के विचार भिन्न-भिन्न थे। लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मक़सद एक है, यानी देश की आज़ादी। वे यह भी जानते थे कि महात्मा गाँधी ही देश के राष्ट्रपिता कहलाने के सचमुच हक़दार हैं।

1938 में गाँधीजी ने कांग्रेस अध्यक्षपद के लिए सुभाषबाबू को चुना तो था, मगर गाँधीजी को सुभाषबाबू की कार्यपद्धति पसंद नहीं आयी। इसी दौरान यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल छा गए थे। सुभाषबाबू चाहते थे कि इंग्लैंड की इस कठिनाई का लाभ उठाकर, भारत का स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र किया जाए। हालांकि, गाँधीजी उनके इस विचार से सहमत नहीं थे।
‌‌‌आज़ादी की लड़ाई लड़ते बोस 11 बार जेल गए। अंग्रेज समझ चुके थे कि यदि बोस ‌‌‌आज़ाद रहे तो भारत से ‌‌‌उनके पलायन का समय बहुत करीब है। अंग्रेज चाहते थे कि वे भारत से बाहर रहें, इसलिए उन्हें जेल में डाले रखा। तबीयत बिगड़ने के बाद वे 1933 से 1938 तक यूरोप में रहे। यूरोप में रहते हुए सुभाषचन्द्र बोस ने ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, फ्राँस, जर्मनी, हंगरी, आयरलैण्ड, इटली, पोलैण्ड, रूमानिया, स्वीजरलैण्ड, तुर्की और युगोस्लाविया की यात्राएँ कर के यूरोप की राजनीतिक हलचल का गहन अध्ययन किया और उसके बाद भारत को स्वतन्त्र कराने के उद्देश्य से आजाद हिन्द फौज का गठन किया।
 यूरोप में वे इटली के नेता मुसोलिनी ‌‌‌से मिले। आयरलैंड के नेता डी वलेरा बोस के अच्छे दोस्त बन गए। बर्लिन में बोस जर्मनी के नेताओं से मिले। बर्लिन में जर्मनी के तत्कालीन तानाशाह हिटलर से मुलाकात की और भारत को स्वतंत्र कराने के लिए जर्मनी व जापान से सहायता मांगी.  जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की. इसी दौरान सुभाषबाबू, नेताजी नाम से जाने जाने लगे. पर जर्मनी भारत से बहुत दूर था. इसलिए 3 जून 1943 को उन्होंने पनडुब्बी से जापान के लिए प्रस्थान किया. पूर्व एशिया और जापान पहुंच कर उन्होंने आजाद हिन्द फौज का विस्तार करना शुरु किया. पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण करके वहाँ स्थानीय भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भरती होने का और आर्थिक मदद करने का आह्वान किया. उन्होंने अपने आह्वान में संदेश दिया “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा.”
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया. अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने “दिल्ली चलो” का नारा दिया. दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंडमान और निकोबार द्वीप जीत लिए . 6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया. इस भाषण के दौरान, नेताजी ने गांधीजी को राष्ट्रपिता बुलाकर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद मांगा. इस प्रकार, नेताजी ने गांधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया.

दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी ने रूस से मदद मांगनी चाही। 18 अगस्त 1945 को ‌‌‌उन्होंने विमान से मांचुरिया के लिए उड़ान तो भरी, लेकिन इसके बाद क्या हुआ, कोई नहीं जानता। खबर आई कि वह विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हालांकि उनकी मौत पर संदेह है। ‌‌‌कहा यह भी जाता है कि अंग्रेज सरकार उन्हें जीवित देखना नहीं चाहती थी। इसलिए वह हादसा कराया गया। लेकिन 2005 में ताइवान सरकार ने नेताजी की कथित मौत पर गठित मुखर्जी आयोग को बताया कि 1945 में ताइवान में कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ। भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की इस रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। भारत के सबसे बड़े स्वतंत्रता सेनानी और इतने बड़े नायक की मृत्यु के बारे में आज तक रहस्य बना हुआ है जो देश की सरकार के लिए एक शर्म की बात है.

देश की आजादी में अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले वीर योद्धा का अस्तित्व कहां खो गया यह आजाद भारत के छह दशक से भी ज्यादा समय में नहीं पता लगाया जा सका। किसी भी राष्ट्र के स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनी ऐतिहासिक धरोहर होती है। आने वाली पीढ़ियां इन्हीं के आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए एक अपने देश के लिए सोचती हैं। कुछ करती हैं 
अब जापान में रखी नेताजी की अस्थियों की असलियत पर संदेह उठने लगा है तो सरकार नेताजी की अस्थियों की डीएनए डेस्ट करार उसका मिलान उनकी बेटी से करने का विचार क्यों नहीं करती है? क्योंकि नेताजी की रहस्यमई मौते से पर्दा उठाने पर ही देश की आजादी के इतिहास से नेताजी और उनकी भारतीय राष्ट्रीय सेना के योगदान को और गौरव दिलाया जा सकता है।
स्वाधीनता संग्राम के अन्तिम पच्चीस वर्षों के दौरान उनकी भूमिका एक सामाजिक क्रांतिकारी की रही और वे एक अद्वितीय राजनीतिक योद्धा के रूप में उभर के सामने आए. सुभाष चन्द्र बोस का जन्म उस समय हुआ जब भारत में अहिंसा और असहयोग आन्दोलन अपनी प्रारम्भिक अवस्था में थे. इन आंदोलनों से प्रभावित होकर उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. पेशे से बाल चिकित्सक डॉ बोस ने नेताजी की राजनीतिक और वैचारिक विरासत के संरक्षण के लिए नेताजी रिसर्च ब्यूरो की स्थापना की. नेताजी का योगदान और प्रभाव इतना बडा था कि कहा जाता हैं कि अगर आजादी के समय नेताजी भारत में उपस्थित रहते, तो शायद भारत एक संघ राष्ट्र बना रहता और भारत का विभाजन न होता.
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नेताजी ने उग्रधारा और क्रांतिकारी स्वभाव में लड़ते हुए देश को आजाद कराने का सपना देखा था. अगर उन्हें भारतीय नेताओं का भी भरपूर सहयोग मिला होता तो देश की तस्वीर यकीकन आज कुछ अलग होती. नेताजी सुभाष चन्द बोस को मेरी तरफ से भावभीनी श्रद्धांजलि.

लेखक 
शशांक द्विवेदी 

इंडियन नेशनल आर्मी की सभा में दिया गया उनका महत्वपूर्ण भाषण


इंडियन नेशनल आर्मी की सभा में दिया गया उनका महत्वपूर्ण भाषण

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, आजाद हिन्द फौज के संस्थापक और जय हिन्द का नारा देने वाले सुभाष चंद्र बोस (जन्म-23 जनवरी, 1897 कटक, उड़ीसा) के अतिरिक्त हमारे देश के इतिहास में ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं हुआ जो एक साथ महान सेनापति, वीर सैनिक, राजनीति का अद्भुत खिलाड़ी और अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरुषों, नेताओं के समकक्ष साधिकार बैठकर कूटनीतिज्ञ तथा चर्चा करने वाला हो। भारत की स्वतंत्रता के लिए सुभाष चंद्र बोस ने क़रीब-क़रीब पूरे यूरोप में अलख जगाया।
सन् 1941 में कोलकाता से अपनी नजरबंदी से भागकर ठोस स्थल मार्ग से जर्मनी पहुंचे, जहां उन्होंने भारत सेना का गठन किया। जर्मनी में कुछ कठिनाइयां सामने आने पर जुलाई 1943 में वे पनडुब्बी के जरिए सिंगापुर पहुंचे। सिंगापुर में उन्होंने आजाद हिंद सरकार (जिसे नौ धुरी राष्ट्रों ने मान्यता प्रदान की) और इंडियन नेशनल आर्मी का गठन किया।
मार्च एवं जून 1944 के बीच इस सेना ने जापानी सेना के साथ भारत-भूमि पर ब्रिटिश सेनाओं का मुकाबला किया। यह अभियान अंत में विफल रहा, परंतु बोस ने आशा का दामन नहीं छोड़ा। जैसा कि यह भाषण उद्घाटित करता है, उनका विश्वास था कि ब्रिटिश युद्ध में पीछे हट रहे थे और भारतीयों के लिए आजादी हासिल करने का यही एक सुनहरा अवसर था। यह शायद बोस का सबसे प्रसिद्ध भाषण है। इंडियन नेशनल आर्मी के सैनिकों को प्रेरित करने के लिए आयोजित सभा में यह भाषण दिया गया, जो अपने अंतिम शक्तिशाली कथन के लिए प्रसिद्ध है।

यहां पेश है इंडियन नेशनल आर्मी की सभा में दिया गया उनका महत्वपूर्ण भाषणः-

दोस्तों! बारह महीने पहले पूर्वी एशिया में भारतीयों के सामने सम्पूर्ण सैन्य संगठन या अधिकतम बलिदान का कार्यक्रम पेश किया गया था। आज मैं आपको पिछले साल की हमारी उपलब्धियों का ब्योरा दूंगा तथा आने वाले साल की हमारी मांगें आपके सामने रखूंगा। परंतु ऐसा करने से पहले मैं आपको एक बार फिर यह एहसास कराना चाहता हूं कि हमारे पास आजादी हासिल करने का कितना सुनहरा अवसर है।
अंग्रेज एक विश्वव्यापी संघर्ष में उलझे हुए हैं और इस संघर्ष के दौरान उन्होंने कई मोर्चाे पर मात खाई है। इस तरह शत्रु के काफी कमजोर हो जाने से आजादी के लिए हमारी लड़ाई उससे बहुत आसान हो गई है, जितनी वह पांच वर्ष पहले थी। इस तरह का अनूठा और ईश्वर-प्रदत्त अवसर सौ वर्षाे में एक बार आता है। इसीलिए अपनी मातृभूमि को ब्रिटिश दासता से छुड़ाने के लिए हमने इस अवसर का पूरा लाभ उठाने की कसम खाई है।
हमारे संघर्ष की सफलता के लिए मैं इतना अधिक आशावान हूं, क्योंकि मैं केवल पूर्व एशिया के 30 लाख भारतीयों के प्रयासों पर निर्भर नहीं हूं। भारत के अंदर एक विराट आंदोलन चल रहा है तथा हमारे लाखों देशवासी आजादी हासिल करने के लिए अधिकतम दुरूख सहने और बलिदान देने के लिए तैयार हैं।
दुर्भाग्यवश, सन् 1857 के महान् संघर्ष के बाद से हमारे देशवासी निहत्थे हैं, जबकि दुश्मन हथियारों से लदा हुआ है। आज के इस आधुनिक युग में निहत्थे लोगों के लिए हथियारों और एक आधुनिक सेना के बिना आजादी हासिल करना नामुमकिन है। ईश्वर की कृपा और उदार नियम की सहायता से पूर्वी एशिया के भारतीयों के लिए यह संभव हो गया है कि एक आधुनिक सेना के निर्माण के लिए हथियार हासिल कर सकें।
इसके अतिरिक्त, आजादी हासिल करने के प्रयासों में पूर्वी एशिया के भारतीय एकसूत्र में बंधे हुए हैं तथा धार्मिक और अन्य भिन्नताओं का, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत के अंदर हवा देने की कोशिश की, यहां पूर्वी एशिया में नामोनिशान नहीं है। इसी के परिणामस्वरूप आज परिस्थितियों का ऐसा आदर्श संयोजन हमारे पास है, जो हमारे संघर्ष की सफलता के पक्ष में है - अब जरूरत सिर्फ इस बात की है कि अपनी आजादी की कीमत चुकाने के लिए भारती स्वयं आगे आएं।

सम्पूर्ण सैन्य संगठन के कार्यक्रम के अनुसार मैंने आपसे जवानों, धन और सामग्री की मांग की थी। जहां तक जवानों का संबंध है, मुझे आपको बताने में खुशी हो रही है कि हमें पर्याप्त संख्या में रंगरूट मिल गए हैं। हमारे पास पूर्वी एशिया के हर कोने से रंगरूट आए हैं - चीन, जापान, इंडोचीन, फिलीपींस, जावा, बोर्नियो, सेलेबस, सुमात्रा, मलाया, थाईलैंड और बर्मा से।
आपको और अधिक उत्साह एवं ऊर्जा के साथ जवानों, धन तथा सामग्री की व्यवस्था करते रहना चाहिए, विशेष रूप से आपूर्ति और परिवहन की समस्याओं का संतोषजनक समाधान होना चाहिए।
हमें मुक्त किए गए क्षेत्रों के प्रशासन और पुनर्निर्माण के लिए सभी श्रेणियों के पुरुषों और महिलाओं की जरूरत होगी। हमें उस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए, जिसमें शत्रु किसी विशेष क्षेत्र से पीछे हटने से पहले निर्दयता से घर-फूंक नीति अपनाएगा तथा नागरिक आबादी को अपने शहर या गांव खाली करने के लिए मजबूर करेगा, जैसा उन्होंने बर्मा में किया था।
सबसे बड़ी समस्या युद्धभूमि में जवानों और सामग्री की कुमुक पहुंचाने की है। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम मोर्चाे पर अपनी कामयाबी को जारी रखने की आशा नहीं कर सकते, न ही हम भारत के आंतरिक भागों तक पहुंचने में कामयाब हो सकते हैं।
आपमें से उन लोगों को, जिन्हें आजादी के बाद देश के लिए काम जारी रखना है, यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि पूर्वी एशिया - विशेष रूप से बर्मा - हमारे स्वातंत्र्य संघर्ष का आधार है। यदि यह आधार मजबूत नहीं है तो हमारी लड़ाकू सेनाएं कभी विजयी नहीं होंगी। याद रखिए कि यह एक संपूर्ण युद्ध है - केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध नहीं है। इसलिए, पिछले पूरे एक वर्ष से मैंने पूर्व में संपूर्ण सैन्य संगठन पर इतना जोर दिया है।
मेरे यह कहने के पीछे कि आप घरेलू मोर्चे पर और अधिक ध्यान दें, एक और भी कारण है। आने वाले महीनों में मैं और मंत्रिमंडल की युद्ध समिति के मेरे सहयोगी युद्ध के मोरचे पर-और भारत के अंदर क्रांति लाने के लिए भी - अपना सारा ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। इसीलिए हम इस बात को पूरी तरह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आधार पर हमारा कार्य हमारी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से और निर्बाध चलता रहे।
साथियों एक वर्ष पहले, जब मैंने आपके सामने कुछ मांगें रखी थीं, तब मैंने कहा था कि यदि आप मुझे सम्पूर्ण सैन्य संगठनष दें तो मैं आपको एक एक दूसरा मोरचा दूंगा। मैंने अपना वह वचन निभाया है। हमारे अभियान का पहला चरण पूरा हो गया है। हमारी विजयी सेनाओं ने निप्योनीज सेनाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शत्रु को पीछे धकेल दिया है और अब वे हमारी प्रिय मातृभूमि की पवित्र धरती पर बहादुरी से लड़ रही हैं।

अब जो काम हमारे सामने हैं, उन्हें पूरा करने के लिए कमर कस लें। मैंने आपसे जवानों, धन और सामग्री की व्यवस्था करने के लिए कहा था। मुझे वे सब भरपूर मात्रा में मिल गए हैं। अब मैं आपसे कुछ और चाहता हूं। जवान, धन और सामग्री अपने आप विजय या स्वतंत्रता नहीं दिला सकते। हमारे पास ऐसी प्रेरक शक्ति होनी चाहिए, जो हमें बहादुर व नायकोचित कार्याे के लिए प्रेरित करें।

सिर्फ इस कारण कि अब विजय हमारी पहुंच में दिखाई देती है, आपका यह सोचना कि आप जीते-जी भारत को स्वतंत्र देख ही पाएंगे, आपके लिए एक घातक गलती होगी। यहां मौजूद लोगों में से किसी के मन में स्वतंत्रता के मीठे फलों का आनंद लेने की इच्छा नहीं होनी चाहिए। एक लंबी लड़ाई अब भी हमारे सामने है।
आज हमारी केवल एक ही इच्छा होनी चाहिए - मरने की इच्छा, ताकि भारत जी सके; एक शहीद की मौत करने की इच्छा, जिससे स्वतंत्रता की राह शहीदों के खून बनाई जा सके।

साथियों, स्वतंत्रता के युद्ध में मेरे साथियो! आज मैं आपसे एक ही चीज मांगता हूं, सबसे ऊपर मैं आपसे अपना खून मांगता हूं। यह खून ही उस खून का बदला लेगा, जो शत्रु ने बहाया है। खून से ही आजादी की कीमत चुकाई जा सकती है। तुम मुझे खून दो और मैं तुम से आजादी का वादा करता हूं ।

(प्रभात प्रकाशन प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित पुस्तक भारत के महान भाषण से साभार)

प्रस्तुति
शशांक द्विवेदी


Tuesday, January 17, 2012

Check out एक शक्तिहीन संकल्प « जागरण मेहमान कोना

Check out एक शक्तिहीन संकल्प « जागरण मेहमान कोना
this is my article which is published in dainik jagran on 13jan12

हमें कब तक शर्म आती रहेगी


हमें कब तक शर्म आती रहेगी
स्वीकार करने से ही काम चलेगा क्या !!
पिछले दिनों प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म बताया। तेजी से प्रगति कर रहे भारत में  इतने विकास के बावजूद यदि देश में ४२ प्रतिशत से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं तो यह निश्चित ही शर्म की बात है। आजकल प्रधानमंत्री जी लगातार गंभीर मुद्दों पर देश की वर्तमान दशा कि सही स्वीकरोक्ति कर रहे है। लेकिन अब सवाल समस्याओं का नहीं बल्कि समाधान का है, कार्यक्रमों और नीतियों के जमीनी स्तर पर सही क्रियान्वयन का है। सरकार इस मुद्दे के समाधान के लिए सिर्फ एकीकृत बाल विकास योजनाओं (आईसीडीएस) पर निर्भर नहीं रह सकती है। आईसीडीएस शिशुओं के विकास के लिए संचालित कार्यक्रम है। प्रधानमंत्री ने भूख और कुपोषण (हंगामा) पर रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि  हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेजी से वृद्धि के बावजूद पोषण का स्तर सामान्य से इतना कम होना अस्वीकार्य है। उन्होंने इस बात को माना कि भारत ने कुपोषण के स्तर में कमी लाने में पर्याप्त प्रगति नहीं की है।
आज के समय में कुपोषण अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये चिंता का विषय बन गया है। यहां तक की विश्व बैंक ने इसकी तुलना ब्लेक डेथ नामक महामारी से की है। जिसने 18 वीं सदीं में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। कुपोषण को क्यों इतना महत्वपूर्ण माना जा रहा हैं? विश्व बैंक जैसी संस्थायें क्यों इसके प्रति इतनी चिंतित है? सामान्य रूप में कुपोषण को चिकित्सीय मामला माना जाता है और हममें से अधिकतर सोचते हैं कि यह चिकित्सा का विषय है। वास्तव में कुपोषण बहुत सारे सामाजिक-राजनैतिक कारणों का परिणाम है। जब भूख और गरीबी राजनैतिक एजेडा की प्राथमिकता नहीं होती तो बड़ी तादाद में कुपोषण सतह पर उभरता है। भारत का उदाहरण ले जहां कुपोषण उसके पड़ोसी अधिक गरीब और कम विकसित पड़ोसीयों जैसे बांगलादेश और नेपाल से भी अधिक है। बंगलादेश में शिशु मृत्युदर 48 प्रति हजार है जबकि इसकी तुलना में भारत में यह 67 प्रति हजार है। यहां तक की यह उप सहारा अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण का दर लगभग 55 प्रतिशत है जबकि उप सहारीय अफ्रीका में यह 27 प्रतिशत के आसपास है।
जिस देश का बचपन कुपोषण का शिकार है, उसका भविष्य क्या होगा? अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। आज देश का हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है और उम्र के हिसाब से उसकी लंबाई नहीं बढ़ रही है। यह आंकड़ा देश में बढ़ती आर्थिक विषमता की असलियत भी बयां करता है। यह आंकड़े बताते हैं कि बाल स्वास्थ्य के मामले में हमारी स्थिति अफ्रीका के गरीब मुल्कों से भी बदतर है। देश के 100 जनपदों में पांच साल से अधिक उम्र के एक लाख से ज्यादा बच्चों पर कराये गये हंगामा के सर्वेक्षण में यह तथ्य भी सामने आया कि तकरीबन साठ फीसदी बच्चों का कद उनकी उम्र के हिसाब से काफी कम है। कुपोषण का यह आंकड़ा गरीबी के प्रतीक माने जाने वाले सहारा अफ्रीकी गरीब देशों की तुलना में दुगना है। चूँकि यह सर्वेक्षण देश के महज नौ राज्यों के ११२ जिलों में ७३ हजार परिवारों को आधार बनाकर किया गया है, लिहाजा इसे देश में कुपोषण की मुकम्मिल तस्वीर नहीं माना जा सकता, जो कि और भी भयावह हो सकती है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स २०११ में (दुनिया के ८१ विकासशील और पिछड़े मुल्कों में) भारत का स्थान ६७वाँ है, जबकि बांग्लादेश का ६८ वाँ। दुनिया के महज १४ देश ही हमसे पीछे हैं। चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, वियतनाम जैसे एशियाई देशों के अलावा रवांडा और सूडान जैसे देश भी इस मामले में भारत से बेहतर स्थिति में नजर आते हैं, जबकि भारत की छवि तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था की बनी हुई है।
पिछले एक साल के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई बार भुखमरी, गरीबी और कुपोषण पर अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। एक ओर देश में हर साल उचित भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ जाता है जबकि दूसरी ओर करोड़ों भारतीयों को भूखे पेट सोना पड़ता है। यह कहते हुए कोई एक साल सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई थी लेकिन उसके बाद भी हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। भंडारण की बदइंतजामी के चलते अनाज के सड़ने और लोगों के भूख से मरने का सिलसिला लगातार जारी है। कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के जरिए भारत में कुपोषण की व्यापकता सामने आ चुकी है और अब एक अन्य सर्वेक्षण ने भी इस भयावह हकीकत की तसदीक की है। पर केंद्र सरकार ने कभी भी शीर्ष अदालत की चिंता को गंभीरता से नहीं लिया। यही वजह है कि एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को आड़े हाथों लेते हुए उसे आदेश दिया है कि देश में कोई भी मौत भुखमरी और कुपोषण की वजह से नहीं होनी चाहिए। यह जिम्मेदारी सरकार की है कि वह गरीबों को भोजन उपलब्ध कराए। कोर्ट ने यह निर्देश पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) द्वारा एक जनहित याचिका पर दिया है। यह याचिका सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में भ्रष्टाचार और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के गोदामों में सड़ रहे अनाज के मुद्दे पर दायर की गई थी। याचिका में कहा गया है कि देश में एक तरफ हजारों लोग भूखे रह रहे हैं तो दूसरी तरफ अनाज गोदामों में सड़ रहा है। सचमुच देश में गरीबी और भुखमरी का यह आलम है कि देश में आधे से अधिक बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में है। ऐसे में अनाजों को गोदामों में बंद रखना बेहद ही निर्मम सरकारी व्यवस्था को दर्शाता है। इस दिशा में जो भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, वह देश में गरीबी को देखते हुए अच्छा कदम है। यदि बात अनाजों की सड़ने की करें तो अनाजों के सड़ने में बड़ी समस्या गोदामों की कमी भी है। जस्टिस दलवीर भंडारी और जस्टिस दीपक वर्मा की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को भ्रष्टाचार और हेराफेरी से बचाने के लिए इसका कंप्यूटरीकरण जरूरी है, ताकि पीडीएस में हो रहे बड़े स्तर पर चोरी और भ्रष्टाचार को कम किया जा सके। क्योंकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तरह बंटने वाले अनाज की कालाबाजारी बहुत अधिक है। इस पर अंकुश लगाने के लिए समूची प्रणाली की कंप्यूटरीकरण जरूरी है।

सचमुच हमारे देश में रख-रखाव और भंडारण की पर्याप्त सुविधा न होने से हरेक साल 50000 करोड़ से ज्यादा का खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है। जरा सोचिए, इतने खाद्यान्न से कितने भूखे लोगों व उनके परिवार का पेट भरा जा सकता है। यह एक ऐसे देश की शर्मसार करने वाली तस्वीर है, जहां आज भी प्रतिदिन 26 करोड़ लोग एक वक्त बिना खाए भूखे सोने के लिए मजबूर है। यह सही है कि गरीबों को खाना देने की कई योजनाएं अरसे से हमारे यहां चल रही हैं। घटी दरों पर खाद्यान्न देने के कार्यक्रम भी होते रहते हैं। कहने के लिए राशन की व्यवस्था भी है, लेकिन इन सबके बावजूद हकीकत यह है कि लोग भूख से मरते हैं। भंडारगृहों में खाद्यान्न है, लेकिन वह न तो जरूरमंदों तक पहुंचता है और न ही जरूरतमंद उस तक पहुंच पाते हैं।
कुपोषण इस समय देश में  एक जटिल समस्या है। घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब गरीब समर्थक नीतियां बनाई जाए जो कुपोषण और भूख को समाप्त करने के प्रति लक्षित हों। हम ब्राजील से सीख सकते हैं जहां भूख और कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा माना जाता है। वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में जहां गरीबों के कल्याण को नजर अंदाज किया जाता है, खाद्य असरुक्षा बढ़ने के आसार नजर आते हैं। हम किस प्रकार सरकार के निर्णय को स्वीकार कर सकते है जब वह लाखों टन अनाज पशु आहार के लिए निर्यात करती है और महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में कुपोषण से मौतों की मूक दर्शक बनी रहती है। आज के समय में किसानों को खाद्यान्न से हटकर नगदी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के कारण खाद्य संकट और गहरा सकता है और देश को फिर से खाद्यान्नों के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ सकता है। हाल ही में जनवितरण प्रणाली को समाप्त करने के सरकार के प्रयास इस ओर इशारा करते हैं।
भारत में समेकित बाल विकास सेवा एक मात्र कार्यक्रम है जो सीधे कुपोषण निवारण के लिये जिम्मेदार है। यह आंगनवाड़ियों के एक विस्तृत नेटवर्क द्वारा संचालित होता है जिसमें पूरक पोषण, स्कूल पूर्व शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बच्चों, गर्भवति एवं धात्री महिलाओं और कुपोषित बालिकाओं तक पहुंचाना अपेक्षित है। किन्तु आंगनवाड़ियों की प्रभाविता कई कारणों से बाधित होती है। केन्द्रों की अपर्याप्त संख्या, कम मानदेय प्राप्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, 3 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये झूलाघर की अनउपलब्धता जैसी समस्यायें धरातल पर नजर आती है। वृहद स्तर पर राजनैतिक इच्छा शक्ति और बजट प्रावधान में कम प्राथमिकता इसे प्रभावित करती है। वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद का 3000 करोड़ रूपयों का प्रावधान सकल घरेलू उत्पाद का 1/10वां हिस्सा भी नहीं हैं। यह तथ्य और स्पष्ट होता है जब हम इसकी तुलना रक्षा के लिये किये गये आवंटन से करते हैं। यदि संसद में बच्चों के लिए उठाये जाने वाले प्रश्नों को देखे तो तो यह दोनों सदनों में उठाये गए प्रश्नों का मात्र 3 प्रतिशत होता है। आश्चर्य की बात नहीं है-बच्चें मतदाता नहीं होते!
कुपोषण कार्यक्रमों और गतिविधियों से नहीं रूक सकता है। एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है। जब तक खाद्य सुरक्षा के लिये दूरगामी नीतियां निर्धारित न हो और बच्चों को नीति निर्धारण तथा बजट आवंटन में प्राथमिकता न दी जाए तो कुपोषण के निवारण में अधिक प्रगति संभव नहीं है।
अमर्त्य सेन की 1981 में लिखी गई किताब पॉवर्टी एंड फैमीन एंड एम्से आन इनटाइटिलमेंट एंड डिप्राइजेशन में दलील दी गई है कि ज्यादातर मामलों में भुखमरी और अकाल का कारण अनाज की उपलब्धता की कमी नहीं, बल्कि असमानता और वितरण व्यवस्था की कमी है। सभी को कम से कम दो जून की रोटी नसीब हो, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि आधुनिकता व भूमंडलीकरण के बावजूद स्थिति में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो पा रहा है।

यह स्पष्ट है कि दीर्घकालिक हल आर्थिक नीतियों की पुनरर्चना व ग्रामीण विकास और रोजगार को बढ़ावा जैसी प्रक्रिया बिना नहीं निकल सकते। समग्रता से खाद्यान सुरक्षा, छोटे किसान, भूमिहीन मजदूर व कारीगरों के रोजगार, स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल खेती, और दामों पर नियन्त्रण की नीतियों को अपनानी होंगी। परन्तु इस सब के लिये बहुसंख्य जनता इन्तजार करती रही तो तात्कालिक संकट से कैसे जूझेगी ?
सम्भव तात्कालिक कारगर उपाय

1. सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा महीने का बी.पी.एल. परिवारों को 35 किलो. बेचने का प्रावधान था जिसको हाल में 45 किलो. किया गया। परन्तु यह अभी भी अपर्याप्त है और आवश्यकता है कि 100 किलो. अनाज दिया जाए ताकि 5 व्यक्तियों के परिवार को बाजार से खरीदना न पड़े। गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों के अलावा अन्य के लिये भी यह प्रावधान खोल दिया जाय। राजस्थान सरकार के एक सर्वेक्षण ने दिखाया था कि कुपोषण ग्रसित बच्चों में एक तिहाई ही बी.पी.एल. थे और दो तिहाई तो गरीबी रेखा के ऊपर वाले थे। (ए.पी.एल.) हालांकि बी.पी.एल. में 80 प्रतिशत कुपोषित थे और ए.पी.एल. में लगभग 20 प्रतिशत ही।

२. जिला का प्रशासन भुखमरी से हुई मौत के प्रमाणित होने पर मृतक के परिवार को मुआवजा, खाद्यान अथवा रोजगार देता है। हालांकि प्रमाण इकट्ठे करना जो प्रशासन को मान्य हो, यह अक्सर विवादित रहता है।

3. सूखा ग्रस्त जिलों को चिन्हित कर प्रशासन उनमें रिलीफ का काम चालू करता है। परन्तु यह खाद्यानों के दाम बढ़ने पर लागू नहीं होता, जब तक भुखमरी से मौत का प्रमाण न मिलें।

4. आमतौर पर भी पर्याप्त खानों के दाम 30-40 प्रतिशत आबादी की क्रय शक्ति के बाहर रहते हैं। ऐसे में करोड़ों भारतीय भूखे ही सो जाते है, बहुसंख्य बचपन से ही छोटे कद के व दुर्बल रह जाते है। ऐसे दुर्बल बच्चे व बुजुर्ग बढ़ती खाद्यान की कमी के सबसे पहले शिकार बनते हैं। इस समस्या के हल के लिये सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा खाद्यान्न का प्रावधान है, और बच्चों व गर्भवती माँओं के लिये आँगनवाड़ी पर पोषण की व्यवस्था है।
कुपोषण की जटिल समस्या के समाधान के लिए कोई भूखा न सोएअभियान की सम्भावना

- नागरिक प्रशासन को 9 प्रतिशत की आर्थिक बढ़ोतरी के फल को बांटना पड़ेगा, कम से कम हर परिवार को न्यूनतम भोजन मौहयया कराने के लिये।

- कुपोषण और भुखमरी बढ़ाने के संकेत शुरू में ही पहचानने की व्यवस्था बनानी होगी, ताकि कारगर कदम उठाकर भूख की व्यापकता कम की जा सके।

- चिन्हित इलाकों, समुदायों व परिवारों के लिये, परिस्थिति अनुरूप, कम दरों पर खाद्यान्न, रिलीफ के लिये मजदूरी के काम और समुदायिक रसोई जैसी व्यवस्थाऐं करी जाये।

- स्वास्थ्य विभाग एवं आंगनवाड़ी (आई.सी.डी.एस.) के कार्यकर्ता लगभग हर गाँव व कस्बे में तैनात हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के तहत हर 1000 या उससे भी कम की आबादी पर एक आशाहै-आठवीं पास गाँव की बहू जिसकों ट्रेनिंग देकर स्वास्थ्य के मुद्दों पर जागरूकता बढ़ानें एवं प्राथमिक उपचार देने के लिये तैयार किया गया है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता व आशा को मिलकर माह में एक दिन ग्रामीण स्वास्थ्य पोषण दिवस मनाना होता है। वहीं बच्चों का वजन मापा जाता है। ए.एन.एम. (डेढ़ साल की ट्रेनिंग पाई नर्स) गर्भवती महिलाओं की जाँच और माँओं व बच्चों का टीकाकरण भी करती है। खेद की बात है कि पोषण पर ध्यान घटता जा रहा है। बच्चों के वजन द्वारा कुपोषण मापने पर कारगर कदम उठाना तो दूर, कुपोषण दर्ज करने पर ही पाबन्दी हैं। अब स्वास्थ्य मंत्रालय व महिला व बाल विकास डिपार्टमेंट के अफसर और नीतिनिर्थाक भी इससे चिन्तित है, और कुछ कारगर उपाय खोज रहे हैं। पोषण व स्वास्थ्य के काम में तालमेंल बढ़ाना इसका एक तरीका है।
- इस संयुक्त काम को इस साल अगर मुहिम के तौर पर उठाया जाए तो प्रशासन, स्वास्थ्य सेवा व आई.सी.डी.एस. तीनों को कुपोषण की समस्या पर फिर ध्यान केन्द्रित करना होगा। सरकार व राजनैतिक पार्टियां लोगों की एक प्रमुख समस्या पर कुछ ठोस काम करती नजर आएंगी।
- बच्चों के वजन पर महीनेवार सख्त निगरानी रखने से पता लगाया जा सकता है कि किस इलाके या आबादी में 20 प्रतिशत से अधिक बच्चों का वजन घटा है। इसकों समुदाय में बिगड़ती खाद्य परिस्थिति और सम्भावित भुखमरी का द्योतक माना जा सकता है। ऐसी स्थिति की रिपोर्ट तुरन्त पंचायत व जिला कलेक्टर को दी जाए, और वह उपरोक्त कदम लेने के लिये तैयार रहें, तो भुखमरी के कारण मौतों की रोकथाम हो सकती है।
-जहाँ अब तक आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ज्यादा कुपोषण रिपोर्ट न करने की मौखिक हिदायत दी जाती है, जरूरी है कि अब कुपोषित बच्चे चिन्हित करने पर उन्हें (व आशा को) इनाम दिया जाए।
- ग्राम स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समिति व पंचायत मिलकर इसका ध्यान रखे कि क्या गाँव के परिवारों में खाने का अभाव है, और यदि हाँ तो कौन भूख का शिकार हैं। इसका वह प्रशासन से उपाय मांगें। इससे आगे, वह सरकार द्वारा दिया सालाना रू.  10000/- व अन्य चन्दा इकट्ठा करके कोई भूखा न सोएअभियान चला सकते हैं।
- स्वयंसेवी व विभिन्न आंदोलन समूह भी इस काम में जुड़े। सरकारी कार्यक्रमों में उन्हें जोड़ा जाए ताकि ग्राम स्वास्थ्य एवं स्वच्छा समिति कारगर बनें, आशा व आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के काम में मजबूती लाएं। परन्तु सरकारी कार्यक्रम हो या न हो, स्वयंसेवी आन्दोलन समूह अगर अपने-अपने क्षेत्र में अपने ही कार्यकर्ताओं के माध्यम से यह कार्य शुरू कर दें और गाँव व मौहल्ले के स्तर पर कोई भूखा न सोएअभियान चालू कर दें तो उसका कुछ तो असर होगा।
- मन्दिर-मस्जिद-गुरूद्वारे, व्यापारी मण्डल और कॉर्पाेरेट सोशल रिस्पोंन्सिबिलिटि निभाने वाले समूह सभी इस बुनियादी अभाव को दूर कर देश को इस कलंक से मुक्ति दिलाने के लिये एक लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
इसके लिये राजनैतिक संकल्प की आवश्यकता है और ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों की जो समाज की त्रासदी और लोगों की पीड़ा के कारगर निदान के लिये कदम लेने को तत्पर हो। अगर हम अभी बड़े पैमाने पर ऐसे कदम नही उठाएंगे तो देश मिलेनियम डिवेल्पमेन्ट गोल्जव राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के लक्ष्यों की चुनौती से और दूर चला जाएगा।
आज हमारा देश और समाज जिस चौराहे पर खड़ा है, हमारे भविष्य की शक्ल ऐसी चुनौतियों से ही निर्णायक रूप लेगी। हम सब एक जुट होकर कैसे इस चुनौती का सामना करते है, उससे तय होगा कि हमारा समाज एक जिंदा, मजबूत, संवेदनशील और मानव अधिकारों को मानवीयता और जरूरतमंद की सेवा से जोड़ने वाले समाज के रूप में उभरेगा, या अपने सदस्यों को भूख से तड़पने को छोड़ बेमुरव्वत, गैरजिम्मेवार, बंटा हुआ व संवेदनशून्य समाज बनेगा।
लेखक 
शशांक द्विवेदी