Tuesday, January 8, 2013

एक बार फिर आरक्षण का जुआ खेल रही है सरकार


अनूप कुमार भटनागर।। 

टू जी स्पेक्ट्रम कांड के बाद कोयला कांड में बुरी तरह घिरीमनमोहन सिंह सरकार जनता का ध्यान बांटने के लिए अबपदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे का सहारा लेने की तैयारी में है।मनमोहन सिंह सरकार के नीतिकारों और सलाहकारों ने अगलेसाल दस राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और फिर2014 में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीति की बिसातबिछाने की कवायद शुरू कर दी है। इस राजनीतिक कवायद मेंसुप्रीम कोर्ट की 1992 और 2006 व्यवस्थाएं बाधक बन रहीहैं। पदोन्नति में आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन करने कीदिशा में कोई भी कदम बढाने से पहले सरकार को यह भली भांति समझना होगा कि उसके इस कदम की न्यायिकसमीक्षा होगी। सुप्रीम कोर्ट ने बीते अप्रैल में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मायावती सरकार द्वारा अनुसूचित जातिऔर अनुसूचित जनजातियों को पदोन्नति में आरक्षण देने के निर्णय को असंवैधानिक करार दिया था। 

बीएसपी का गेम 
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की मुख्य वजह यह थी कि राज्य सरकार इन वर्गो के कर्मचारियों को पदोन्नति मेंआरक्षण देने के निर्णय के समर्थन में जाति आधारित आंकडे़ पेश नहीं कर सकी थी। न्यायालय की इस व्यवस्था केबाद बहुजन समाज पार्टी ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया। राज्यसभा में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इसे जोर -शोर से उठाकर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी यूपीए सरकार और उसके घटक दलों को इसका फायदा लेने के लिएप्रेरित किया। सरकार ने भी सोचा कि विवादों से लोगों का ध्यान बंटाने के लिए इससे अच्छा अवसर नहींमिलेगा। सीएजी की ताजा रिपोर्ट के कारण संकट में घिरी सरकार ने इस गतिरोध को दूर करने के लिए सर्वदलीयबैठक बुलाने की बजाए पदोन्नति में आरक्षण के सवाल पर ऐसी बैठक बुलाने में पूरी तत्परता दिखाई। बैठक मेंप्रधानमंत्री ने इस सवाल पर सैद्धांतिक सहमति व्यक्त की लेकिन समाजवादी पार्टी सहित कई दलों की आपत्ति केकारण इस पर आम सहमति नहीं बन पाई। 

इंदिरा साहनी केस 
यह सिलसिला और आगे बढ़े , इससे पहले हमें 19 अक्टूबर 2006 को एम नागराज प्रकरण में भारत केतत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाईएस सभरवाल की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ की व्यवस्था को ध्यान में रखनाहोगा। इस पीठ के बाकी दोनों सदस्य भी बाद मेंदेश के मुख्य न्यायाधीश बने। न्यायमूर्ति के जी बालाकृष्णन अबराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष हैं जबकि न्यायमूर्ति एसएच कपाडिया देश के वर्तमान मुख्य न्यायाधीशहैं। संविधान पीठ की राय थी कि यह व्यवस्था संविधान के बुनियादी ढांचे और इसके अनुच्छेद 16 में प्रदत्त समताके अधिकार के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने इस निर्णय में अन्य पिछडे़ वर्गो के लिए आरक्षण देने के सरकार केनिर्णय से जुडे़ बहुचर्चित इंदिरा साहनी मामले में 16 नवंबर ,1992 को सुनाये गए फैसले को अपना आधारबनाया। इस निर्णय में व्यवस्था दी गई थी कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के तहत नौकरी की शुरुआत मेंआरक्षण दिया जा सकता है लेकिन पदोन्नति के मामले में इसका विस्तार नहीं किया जा सकता। इस निर्णय सेपहले पदोन्नति में भी आरक्षण की व्यवस्था थी। 
1992 के इस निर्णय से अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था प्रभावितहो रही थी , इसलिए सरकार ने इन वर्गो के लिए यह सुविधा बनाए रखने के इरादे से 77 वां संविधान संशोधनकरके अनुच्छेद 16 में एक नया प्रावधानअनुच्छेद 16 (4- ) जोड़ा , जिसका अभिप्राय पिछडे़पन और अपर्याप्तप्रतिनिधित्व वाली अनुसूचित जाति और जनजातियों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देना था। यह नयाप्रावधान जून 1995 से प्रभावी हुआ था। लेकिन वीरपाल सिंह और अजित सिंह के प्रकरण में न्यायालय कीव्यवस्थाओं की वजह से सरकार को एक बार फिर 2001 में 85 वां संविधान संशोधन करके अनुच्छेद 16 (4-  )में पुन : संशोधन करना पड़ा। नागराज के मामले में संविधान पीठ के निर्णय में आरक्षण की सीमा 50 फीसदीतक सीमित रखने , इन वर्गो में संपन्न तबके की अवधारणा और पिछडे़पन तथा अपर्याप्त प्रतिनिधित्व जैसेबाध्यकारी कारणों की संवैधानिक अनिवार्यता को दोहराया गया था। न्यायालय का मत था कि इसके बगैरसंविधान के अनुच्छेद 16 में प्रदत्त समान अवसर का ढांचा ही चरमरा जाएगा। 
संविधान पीठ ने यह भी कहा था कि पदोन्नति के मामले में राज्य अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए आरक्षण व्यवस्था करने के लिए बाध्य नहीं है। इसके बावजूद यदि कोई राज्य अपने विवेकाधिकार का इस्तेमालकर पदोन्नति के मामले में ऐसी व्यवस्था करना चाहते हैं तो उन्हे ऐसे वर्ग के पिछडे़पन और नौकरी में अपर्याप्तप्रतिनिधित्व के आंकडे़ एकत्र करने होंगे। लेकिन ऐसा करते समय भी राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि 50फीसदी की सीमा या संपन्न तबके के सिद्धांत का पालन हो और अनिश्चितकाल के लिए आरक्षण का विस्तार नकिया जाए। न्यायपालिका की इतनी स्पष्ट राय के बावजूद सरकार तथा चुनिंदा राजनीतिक दल एससी - एसटीके नाम पर राजनीति की रोटियां सेंकने को आतुर हैं और वे एक और संविधान संशोधन की कवायद शुरू करानेजा रहे हैं। 
वाहनवती की सलाह 
अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती ने कानून मंत्रालय को भेजी गई अपनी सलाह में केंद्र सरकार से कहा है किपदोन्नति में आरक्षण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्णयों केआलोक में बहुत सोच समझ कर कदमउठाने की आवश्यकता है क्योंकि इसके कानून का रूप लेते ही इसकी संवैधानिकता को चुनौती दी जा सकती है।वाहनवती का सुझाव है कि नागराज प्रकरण में आई न्यायिक व्यवस्था के मद्देेनजर संविधान के अनुच्छेद 16 केसाथ ही अनुसूचित जाति और जनजातियांे की सूची से संबंधित अनुच्छेद 341 और 342 में भी संशोधन करनापड़ सकता है। अटार्नी जनरल ने सरकार को आगाह किया है कि यदि इन संशोधनों की संवैधानिकता को भीन्यायालय में चुनौती दी गई तो इसके नतीजों के बारे में कोई कयास लगाना नामुमकिन होगा। क्या हम उम्मीदकरें कि इन जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए सरकार तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए जल्दबाजी में कोईकदम नहीं उठाएगी ?

शोध का माहौल बनाना होगा

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Monday, December 31, 2012

इंसानियत की मौत

"दामिनी " की मौत के बाद से मन बहुत व्यथित है ,दामिनी की मौत एक सामन्य मौत नहीं है ये इंसानियत की मौत है ,आम आदमी के भरोसे की मौत है ,युवाओं/महिलाओं के उम्मीदों की मौत है ...इस मौत में हम सब गुनहगार है ..इस मौत ने हम सब के सामने ,समाज के सामने बहुत सारे प्रश्न खड़े कर दिए है जिनका उत्तर अगर अभी नहीं तलाशा गया तो शायद भविष्य हमें प्रश्न करने का भी मौका नहीं मिलेगा ...यह समय किसी और पर आक्षेप लगाने का नहीं बल्कि अपने भीतर झाकने का है ..दामिनी को सच्ची श्रधांजली सिर्फ यही हो सकती है कि आज से ही हम सब महिलाओं के प्रति अपने व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाएं ,उन्हें घर के अंदर और बाहर सम्मान दे ....ईश्वर करे ये जघन्यतम कृत्य किसी भी बेटी के साथ कभी न हो ...दामिनी को भावभीनी और अश्रुपूर्ण श्रधांजली..

Saturday, December 22, 2012

गंगा संरक्षण पर आईआईटी की पहल

अरुण तिवारी
 यूंतो गंगा संरक्षण का यह सन्नाटा दौर है। कहीं कोई बवाल न हो, इस डर से सरकार ने गंगा पर बनी अंतरमंत्रालयी समिति की रिपोर्ट को कुंभ तक के लिए टाल दिया है। ताज्जुब है कि इसका आभास होने के बावजूद 17 जून, 2012 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर साधु-संतों के दिखाये दम ने चुप्पी साध ली है! उत्तराखंड की पनबिजली परियोजनाओं पर सवाल उठाते-उठाते जनता-नेता जैसे थक चुके हैं। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण को लेकर विशेषज्ञ सदस्य खुद उठाये सवालों के जवाब नहीं मांग रहे हैं लेकिन इस सन्नाटे के दौर में आईआईटी ने उम्मीद की छोटी सी खिड़की खोली है। यदि निर्मल-अविरल गंगा चाहिए, तो जरूरी होगा सभी की राय का सम्मान और साझेदारी का ऐलान। आईआईटी, कानपुर ने दिल्ली में त्रिदिवसीय चर्चा आयोजित कर यही संदेश देने की कोशिश की। उसने ऐसे कई सुझावों से सहमति भी जताई है, लंबे समय से गंगा आंदोलनकारी जिनकी मांग करते रहे हैं जैसे जीरो डिस्चार्ज, प्रकृति के लिए ताजा जल और नदियों की जीवंत पण्राली छेड़े बगैर पनबिजली निर्माण, कार्यक्रम से पहले नीति, नदी सुरक्षा के लिए कानून, नदियों की जीवंत पण्राली को ‘नैचुरल पर्सन’ का दर्जा, उपयोगी नवाचारों को मान्यता और जननिगरानी आदि। उद्घाटन सत्र के दौरान देशी गंगा प्रेमियों से ज्यादा विदेशी निवेशकों व तकनीकी विशेषज्ञों की मौजूदगी को लेकर शंका व सवाल उठाये जा सकते हैं। योजना सरकार को स्वीकार्य होगी-नहीं होगी, लागू होगी-नहीं होगी, इस पर भी सवाल हो सकते हैं; लेकिन यदि आयोजित चर्चा को सच मानें, तो गंगा योजना को लेकर आईआईटी ने खुले दिमाग का परिचय दिया है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन पर्यावरणीय प्रबंधन योजना-2020 तैयार करने का संयुक्त जिम्मा देश के सात प्रमुख आईआईटी संस्थानों के पास है। आईआईटी, कानपुर और इसके अकादमिक प्रतिनिधि डॉ. विनोद तारे की भूमिका योजना निर्माण कार्य में संयोजक की है। सभी की राय का सम्मान करने का निर्णय खासतौर पर डॉ विनोद तारे की निजी सोच व प्रयासों का परिणाम है। गंगा कार्य योजना के योजनाकारों व क्रियान्वयन के कर्णधारों ने यही नहीं किया था। कालांतर में गंगा कार्य योजना के फेल होने का यह सबसे बड़ा कारण बना। उन्होंने इस सच को छिपाने की भी कोशिश नहीं की कि सरकारी अमले के पास भारत के जल संसाधन की वस्तुस्थिति की ताजा और समग्र जानकारी आज भी उपलब्ध नहीं है। डॉ तारे ने योजना से पहले उसका नीति दस्तावेज, सफल क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए कानून और नवाचारों को भी जरूरी माना। सब जानते हैं कि नदी पूर्णत: प्राकृतिक व संपूर्ण जीवंत पण्राली है। इसे ‘नैचुरल पर्सन’ के संवैधानिक दर्जे की मांग हाल में जलबिरादरी के मेरठ सम्मेलन में उठी थी। डॉ. तारे ने इससे सहमति जताई कि नदियों के अधिकार व उनके साथ हमारे व्यवहार की मर्यादा इसी दज्रे से हासिल की जा सकती है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के सफल प्रबंधन के बगैर किसी भी राष्ट्र का सतत-स्वावलंबी आर्थिक विकास संभव नहीं। अत: सुनिश्चित करना होगा कि नदी पण्राली को नुकसान पहुंचाये बगैर पनबिजली निर्माण हो।इसके लिए क्या उचित व मान्य तकनीक हो सकती है? योजना इस पर काम करेगी। उन्होंने योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए व्यापक व विकेन्द्रित जननिगरानी को भी उपयोगी माना। माना गया कि उद्योगों, होटलों व ऐसे अन्य व्यावसायिक उपक्रमों व रिहायशी क्षेत्रों से निकलने वाले शोधित- अशोधित मल-अवजल को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष किसी रूप में गंगा और उसकी सहायक धाराओं और प्राकृतिक नालों में डालना पूरी तरह प्रतिबंधित हो। यह मांग पहली बार गंगा ज्ञान आयोग अनुशंसा रिपोर्ट-2008 के जरिए सरकार के सामने रखी गई थी। गंगा संरक्षण के काम से जुड़े अधिकारी व तकनीकी लोग इसकी व्यावहारिकता पर सवाल उठाते रहे। सुखद है कि गंगा योजना ने ‘जीरो डिस्चार्ज’ हासिल करने को अपना लक्ष्य बनाया है। हालांकि प्रस्तावित लक्ष्य को औद्योगिक अवजल के अलावा एक लाख से अधिक आबादी यानी ए-श्रेणी शहरों के सीवेज तक सीमित रखा गया है, बावजूद इसके ‘जीरो डिस्चार्ज’ को लक्ष्य बनाना सकारात्मक संकेत है। सवाल है, तो सिर्फ यही कि ‘जीरो डिस्चार्ज’ लक्ष्य प्राप्ति की अवधि 25 से 30 साल रखी गई है और अनुमानित खर्च है सौ बिलियन डॉलर यानी पांच लाख करोड़ रुपये। इसके तौर-तरीके, व्यावहारिकता व संभावित दुष्प्रभावों की अभी से जांच जरूरी होगी। अवैज्ञानिक सिंचाई को अनुशासित कर नदी प्रवाह बनाये रखने वाला बहुत सारा भूजल तथा नहरों के जरिए पहुंचा सतही जल बचाया जा सकता है। रासायानिक उर्वरकों का प्रयोग प्रदूषण व पानी का खपत दोनों बढ़ाता है। कीटनाशकों का जहर बांटने का काम है ही। इन समस्याओं से निजात के लिए फसल चक्र में बदलाव करना होगा। मिश्रित खेती को प्राथमिकता देनी होगी। सिक्किम ने जैविक कृषि राज्य बनने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिए हैं। पूरे देश की कृषि को ही जैविक कृषि की ओर मोङ़ना होगा, तभी हमारा खान-पान-स्वास्थ्य, मिट्टी-पानी-नदियां यानी पूरी कुदरत रासायनिक उर्वरकों के जहर से बच सकती है। योजना इससे भी इत्तेफाक रखती है कि ताजा पानी प्रकृति के लिए हो और उद्योग, ऊर्जा, कृकृषि, निर्माण जैसी विकास की आवश्यकताओं के लिए ‘वेस्ट वाटर’ यानी अवजल का इस्तेमाल हो। योजनाकारों ने औद्योगिक- व्यावसायिक-बागवानी प्रयोग के लिए जलापूर्ति की लागत के बराबर वसूली का प्रस्ताव रखा है। नीतिगत तौर पर यह तय करने व व्यावहारिक तौर पर लागू करने से ही मल व अवजल का शोधन तथा पुन: उपयोग सुनिश्चित होगा। उक्त नीतिगत उपायों को ‘नेशनल गंगा रिवर बेसिन एन्वायरन्मेंट मैनेजमेंट प्लान’ में जगह देकर आईआईटी संस्थानों ने नायाब पहल की है। लेकिन योजना लक्ष्य से भटके नहीं और सरकार सकारात्मक बिंदु लागू करे, कंपनियां लूटकर न ले जाने पायें; जन-जन को इसके लिए जागते रहना होगा।(ref-sahara)