Tuesday, February 19, 2013

तुम जो पकड़ लो हाथ मेरा ,दुनियाँ बदल सकता हूँ मै ........

शशांक -प्रियंका 
आज मेरी और प्रियंका की शादी की चौथी सालगिरह है .ये चार साल हँसते –खेलते ,लड़ते –झगड़ते ,तारीफों-शिकायतों के बीच ऐसे गुजरे की पता ही नहीं चला .आज से 9 साल पहले अमर उजाला, आगरा और आगरा हमारे प्रेम का साक्षी बना . उस समय मै बीटेक फाइनल ईयर का छात्र था और अमर उजाला के लिए एक कॉलम “साइबर बाइट्स” लिख रहा था और मेरे कुछ लेख जनसत्ता ,दैनिक जागरण , अमरउजाला ,आज आदि में प्रकाशित हो चुके थे .जबकि प्रियंका अमर उजाला में सब एडिटर के रूप में काम कर रही थी .हम दोनों की वर्किंग  फील्ड(इंजीनियर-पत्रकार ) अलग थी ,दोनों के घर वाले भी एकदम खिलाफ थे  .परिस्थितियाँ विपरीत थी .घर वालों को मनाने में 5 साल लग गये ,लेकिन इन 5 सालों मे भी  हमने  शानदार जिंदगी जिया ,खूब मस्ती की ,मजा आया .हमने सोचा था कि किसी ही हाल में घर वालों के आशीर्वाद से ही शादी करेंगे .वही किया ,आज हमारे घर वाले इस रिश्ते से बहुत ज्यादा खुश है ...वास्तव में पति-पत्नी का रिश्ता बहुत ही खूबसरत होता है .एक दूसरे के सहयोग से दुनियाँ बदली जा सकती है ,कुछ भी हासिल किया जा सकता है (....तुम जो पकड़ लो हाथ मेरा ,दुनियाँ बदल सकता हूँ मै ........)ईश्वर करे हमारा ये रिश्ता हमेशा यू ही मजबूत बना रहें ..आप सभी मित्रों की  /बड़ों के आशीर्वाद /शुभकामनायों की आकांक्षा हमेशा बनी रहेगी ...

Friday, February 15, 2013

कैसे टूटें जाति की बेडि़यां

बंधुराज लोण
आजादी मिलने के बाद से आज तक स्वतंत्र भारत में आरक्षण पर जितनी चर्चा हुई है उतनी दूसरे विषय पर शायद ही हुई होगी। गणतांत्रिक भारत के इतिहास में आज तक का यह सर्वाधिक विवादित मुद्दा रहा है। वैसे भारत में आरक्षण का इतिहास काफी पुराना रहा है। परंपरा के अनुसार ऊपरी जातियों को आरक्षण दिया ही गया था, पर नियमानुसार इस देश में छत्रपति शाहूजी महाराज ने पहली बार 26 जुलाई 1902 को अपने प्रांत में आरक्षण देने का कानून बनाया था। भीमराव अंबेडकर कहते थे कि इस देश में श्रम का ही नहीं, श्रमिकों का भी विभाजन किया जा चुका है। इसीलिए जाति आधारित आरक्षण दिया गया, पर अब उनके नाती व भारतीय रिपब्लिकन पार्टी के नेता प्रकाश अंबेडकर ने इस राजनीतिक आरक्षण को रद करने की मांग की है। उन्होंने मांग की है कि स्कूल छोड़ने पर दिए जाने वाले प्रमाण पत्र से जाति का उल्लेख हटा दिया जाए। अंबेडकर ने गोलमेज परिषद् और साइमन कमीशन के सामने 1920 में अनुसूचित जातियों को आरक्षण देने की मांग की थी। फिर 1932 में जैसे ही ब्रिटिश सरकार ने अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण बहाल किया, महात्मा गांधी ने पुणे में अनशन शुरू कर दिया। तब महात्मा गांधी व अंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ और उसके बाद अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र की कल्पना साकार हुई। आज धारा 334 के तहत राजकीय आरक्षण मिलता है। तब से यह 10-10 साल के लिए बढ़ाया जाता रहा है। जाति आधारित समाज में दलित राजनीतिक सत्ता से वंचित थे। आरक्षण के चलते उन्हें सीधे संसद पहुचने का अवसर मिला। प्रकाश अंबेडकर के मुताबिक आरक्षित सीट सही अर्थ में अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि का चुनाव नहीं करती, बल्कि उससे खड़ा हुआ उम्मीदवार राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करता है। आरक्षित सीट से चुने गए सबसे ज्यादा सांसद समाजवादी पार्टी के हैं और नौकरी में प्रोन्नति के लिए आरक्षण का इसी ने विरोध किया है। प्रकाश अंबेडकर के सपा के इस विरोधाभास पर सवाल उठाया है, जिस पर विवाद शुरू हो गया है। शरद पवार तथा शिवसेना ने उनका समर्थन किया है। यहां काशीराम का जिक्र करना भी जरूरी है। वह आरक्षण को लेकर कभी उत्साही नहीं रहे। उनका कहना था की मांगने से अच्छा खुद देने की स्थिति में पहुंचना चाहिए। इसलिए उन्होंने खुद आरक्षित सीट से कभी चुनाव नहीं लड़ा था। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और सत्ता हासिल की। सवाल उठता है कि यदि कांशीराम यह कर सकते हैं तो आरक्षण की क्या जरुरत है? कुछ समय पहले चुनाव के दौरान शरद पवार महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों को चुनकर लाए थे। विशेष बात यह थी की इनमें से किसी ने भी आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ा था। उस समय राजनीतिक आरक्षण खत्म करने की मांग उठी थी। वर्तमान में संसद में आरक्षित सीटों से चुनकर आए 123 सांसद हैं। उन्हें अपनी जाति से कितना प्यार है? अनुसूचित जाति के लोगों पर होने वाले अत्यचार के संबंध में उन्होंने कब आवाज उठाई? आरक्षण से अनुसूचित जाति का संगठन मजबूत नहीं होता है। प्रकाश ने सियासी दलों से अपील की है कि वे बिना आरक्षण के ही अनुसूचित जाति के लोगों को उम्मीदवार बनाएं। उनकी इस मांग को महाराष्ट्र के सवण विचारकों ने समर्थन दिया है। यह होना भी चाहिए, लेकिन क्या राजनीतिक दल अनुसूचित जाति के लोगों को मौका देंगे? इसमें संदेह नहीं कि आरक्षित सीट से चुनकर आए विधयाकों और सांसदों का झुकाव जाति की तुलना में पार्टी के प्रति अधिक रहेगा। अपने यहां राजनीति में दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है। ऐसा होने के बावजूद यह तय है कि जाति आधारित राजनीतिक आरक्षण रद करने की मांग को अनुसूचित जाति वर्ग के लोग और उनके नेतागण अपनी मंजूरी कभी नहीं देंगे। राजनीति में आरक्षण को रद किए जाने से जातिवाद कम होगा, इस समझ का भी कोई कारण नजर नहीं आता है। 1932 में बाबासाहेब अंबेडकर ने कास्ट इन इंडिया (भारत में जातिवाद) नामक शोध पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया था कि जाति किस तरह राष्ट्र विरोधी और विकास विरोधी है। उन्होंने जाति के भेदभाव को खत्म करने की मुहिम शुरू की थी और संविधान में कानूनी तौर पर जाति को खत्म करने भी कोशिश की, लेकिन भारतीय जनमानस पटल से न जाति गई और न जातिगत शोषण ही खत्म हुआ, बल्कि उसका स्वरूप बदल गया। आज उन्हीं अंबेडकर और कांशीराम के नाम पर एक बार फिर जातिवादी आंदोलनों को हवा दी जा रही है। इससे अंतत: जातिगत व्यवस्था और जाति आधारित भेदभाव खत्म होने के बजाय बढ़ेंगे ही। अब सवाल है स्कूल छोड़ने पर दिए जाने वाले प्रमाण पत्र से जातिसूचक नाम हटाने का। सही मायनों में देखा जाए तो इस मांग का विरोध करने का कोई कारण नजर नहीं आता। आज भी महाराष्ट्र में लाखों बौद्ध धर्मावलंबी ऐसे हैं जिन्होंने स्कूल के प्रमाण पत्र में जाति का उल्लेख नहीं करने का आग्रह किया है, लेकिन सरकार उन्हें यह मौका नहीं देना चाहती है। स्कूल के प्रमाण पत्र में से यदि जातिसूचक नाम को हटा भी दिया जाता है तो उन्हें मिलने वाली सुविधाओं पर उसका कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जाति प्रमाण पत्र तो अलग से मिलता ही है। जाति प्रमाण पत्र न होने की सूरत में आज भी उस जाति को मिलने वाले लाभ व्यक्ति विशेष को नहीं मिलते हैं। फिर भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि कागज में से जाति को निकाल देने से बहुत कुछ हासिल हो जाएगा। यह जाति की बेडि़यां तोड़ने के लिए अब तक किए गए प्रयासों की अगली कड़ी होगा। महाराष्ट्र में जाति के भेदभाव को खत्म करने के अनेक प्रयास हुए। बाबा साहेब अंबेडकर ने अंतरजातीय विवाह को जातिगत भेदभाव को खत्म करने का प्रभावी मार्ग बताया था, लेकिन आज भी अंतरजातीय विवाह पर ऑनर किलिंग हो रही है। वीर सावरकर ने भी जाति की बेडि़यां तोड़ने की मुहिम चलाई थी, लेकिन वह भी अपर्याप्त ही रही। अंतरजातीय विवाह, स्त्री-पुरुष समानता, सभी को समान शिक्षा की राह इतनी आसान नहीं है। राजनीतिक आरक्षण जातिगत भेदभाव को खत्म करने का उपाय नहीं, बल्कि जातीय प्रदूषण फैलाने का हथियार है। आरक्षण सामान अवसर प्राप्त करने का एक हिस्सा मात्र है। जब समान अवसर प्राप्त हो गए तो उसकी जरूरत खत्म हो जानी चाहिए। महाराष्ट्र में इस तरह के विवाद पहले भी होते रहे हैं और विवाद के परिणाम के तौर पर हर बार कोई न कोई सकारात्मक पहल जरूर हुई है। ऐसे विवादों का होना इस लिहाज से भी अच्छा है कि उनसे एक विमर्श होता है और वह विमर्श सामाजिक चेतना को जगाने का काम करता है। लिहाजा, ऐसे मसलों पर वाद-विवाद होना चाहिए, क्योंकि इससे सकारात्मक सामाजिक बदलाव की संभावना से इन्कार नहींकिया जा सकता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

गालिब ने जब अल्लाह से शराब मांगी


फिरोज बख्त अहमद
जब कलम और पैसे का कभी मेल नहीं हुआ तो भला वो गालिब के ही साथ कैसे रहता। गालिब की जीवन के संबंध में गालिब अकेडमी द्वारा प्रकाशित और डॉ. अकील अहमद द्वारा संपादित गालिब संस्करण में उनके कुछ बड़े रोचक प्रसंग बयान किए गए हैं। गालिब 1840 से 15 फरवरी 1869 यानी अपनी मृत्यु तक हमेशा फाकाकशी का ही शिकार रहे। जो थोड़ी-बहुत पेंशन मिलती थी, वह कर्जदारों को चली जाती थी। पहली तारीख आते ही गालिब के घर दर्जी, धोबी, राशन-परचून वाले, दूध वाले, किताब वाले आदि दस्तक देना शुरू कर देते थे। बेचारी पत्नी उमराव बेगम को मुश्किल हो जाता था टालना।

एक बार ऐसा हुआ कि गालिब के पास एक भी पैसा न रहा। तब वे गली कासिमजान, बल्लीमारान वाले अपने मकान में रहते थे। घर में खाने को दाना नहीं था। वे उन दिनों अपना फारसी दीवान लिख रहे थे और नए शेरों की रचना के लिए शराब की सख्त जरूरत थी उन्हें। मजबूर हो कर जनानखाने में गए जहां उनकी धर्म पत्नी उमराव बेगम रहती थीं। उनसे इधर-उधर के बहाने बनाकर पैसे देने की विनती की। मगर उन्होंने साफ मना कर दिया।

फिर ताना देते हुए बोलीं, मिर्जा खुदा के दरबार में सच्ची दुआ करो और नमाज पढ़ो तो मुराद पूरी होगी! गालिब उन्हें खुश करने के लिए नमाज के पाक-साफ कपड़े पहने और जामा मस्जिद की ओर निकल पड़े। मशहूर शायर मरहूम वाजिद सहरी लिखते हैं कि रास्ते में अनेकों व्यक्ति उन्हें मिले और यह देख कर चकित हुए कि सूर्य पश्चिम से कैसे निकला अर्थात गालिब जामा मस्जिद की ओर कैसे? वे तो रोजा और नमाज से दूर ही रहा करते थे।
जामा मस्जिद पहुंच कर गालिब ने हौज से वजू किया और सुन्नतें पढ़ने बैठ गए। इस संदर्भ में यह याद रहे कि सुन्नतें नमाज का एक अंग है। नमाज तीन भागों में बंटी हैं-सुन्नतें, फर्ज और नफिल। इन में सबसे महत्वपूर्ण है फर्ज वाला भाग जो सुन्नतों के बाद और नफिलों के पूर्व पढ़ा जाता है और जिसे इमाम पढ़ाता है। फर्ज नमाज जमात (समूह) के साथ पढ़ी जाती है। उधर जब गालिब ने सुन्नतें पढ़ लीं तो मस्जिद में इधर-उधर ताकने लगे। सुन्नतें मनुष्य स्वयं अपने लिए नहीं बल्कि हजरत मुहम्मद (स) के लिए पढ़ता। फर्ज अल्लाह के लिए पढ़े जाते हैं और गालिब ने आखिर सुन्नतें भी कैसे पढ़ लीं। यह समय दोपहर की नमाज का था। उधर गालिब घुटनों पर सिर झुका कर बैठ गए कि कब खुदा का हुक्म हो और शराब की बोतल उनके चरणों में गिरे।

अभी गालिब साहब मस्जिद पहुंचे ही होंगे कि एक शागिर्द उन से मिलने को उनके घर गए। उन्हें अपने उस्ताद गालिब से अपनी शायरी ठीक करानी थी। उमराव बेगम ने बताया कि उस्ताद तो आज जामा मस्जिद गए हैं नमाज पढ़ने। शागिर्द को भी आश्चर्य हुआ कि गालिब और जामा मस्जिद! उसने जब पूरा हाल सुना तो तुरन्त बाजार गया और शराब की एक बोतल खरीदी। उसे कोट के भीतर छिपा कर वह मस्जिद गया और गालिब को आवाज दी। पहले तो उन्होंने अनसुनी कर दी, मगर दूसरी बार जब शागिर्द ने पुकारा तो देखा कि वह कोट की अंदर की जेब की ओर इशारा कर रहा था। उस्ताद यह देख कर जूतियां उठाकर चल पड़े।

गालिब को जमात में सम्मिलित न होते देख कर लोगों को बड़ी हैरानी हुई कि इमाम साहब तो नमाज पढ़ाने आ रहे हैं और गालिब साहब मस्जिद से बाहर जा रहे हैं। एक मित्र तो यहां तक बोले गालिब साहब, जिंदगी में पहली बार तो आप मस्जिद में आए हैं और बिना फर्ज पढ़े जा रहे हैं। आखिर मामला क्या है?'' तब गालिब बोले, 'भाई, बिना फर्ज पढ़े, मेरा काम तो सुन्नतों से ही हो गया है!

गालिब का घर हकीमों वाली मस्जिद के नीचे था और लोग प्रायः उन्हें टोका करते थे कि मस्जिद के ठीक जेरे साया (नीचे) बैठकर वे शराब न पिएं। उसी पर गालिब ने शेर पढ़ा था,
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता जहां खुदा न हो!

गरीबी ही गालिब पर गालिब (हावी) रही। थोड़ी-बहुत आमदनी मुशायरों से या वजीफों से हो जाती थी। लगातार कमाई का कोई जरिया नहीं था। लेकिन गालिब ऊंची नाक वाले व्यक्ति थे और स्वाभिमान व शानो शौकत नवाबों से भी बड़ी थी। यह शान पैसे की न थी, बल्कि मिजाज की थी। मुशायरों में वे सदा स्टेज के ऊपर व बीच में या बादशाह के बराबर बैठना पसंद करते थे।

Wednesday, February 13, 2013

महाकुंभ हादसे पर मेरी यह कविता

“मौत “
किसी के लिए आंकड़ों का खेल है ,
किसी के लिए राजनीति का खेल है ,
किसी के लिए जाति और धर्म का खेल है ,
किसी के लिए दिखावे की संवेदना का खेल है ,
लेकिन आम आदमी की “मौत “ ,
उसके परिवार की उम्मीदों की मौत है 
उसके सपनों की मौत है 
सरकारी आंकड़ों की बाजीगरी में मौत बन जाती है “कागजी “
जिससे मानवीय संवेदनाएं कोसों दूर है 
जहाँ कागज में 
मौत को मुआवजें के तराजू में तौला जाता है 
जहाँ मौत को जाति और धर्म के तराजू में तौला जाता है
लेकिन मौत को मौत के तराजू में कभी तौला नहीं जाता 
अक्सर मौत हार जाती है मुआवजें के सामने 
पैसे के सामने 
अक्सर सरकारें भूल जाती है 
आम आदमी के दर्द को ,मातम को 
उसके आसुंओं को 
क्या मुआवजा लौटा सकता है 
किसी की जिंदगी को 
किसी के सपनों को 
किसी की उम्मीदों को ....
स्वरचित –शशांक द्विवेदी

Monday, February 11, 2013

महाकुंभ में .....

पिछले महीने २७ जनवरी को पूर्णिमा के विशेष स्नान के दिन माँ के साथ संगम ,महाकुंभ स्नान के लिए इलाहाबाद गया था .उस दिन स्नान के बाद मन बहुत प्रफुल्लित था ,मेला क्षेत्र में मेला प्रशासन की व्यवस्था भी अच्छी थी ..लेकिन शहर के अंदर और स्टेशन पर भीड़ को देखते हुए कोई खास इंतजाम नहीं थे सिवाय इसके कि कई सारे टी टी रेलवे स्टेशन के बाहर खड़े होकर अपनी ड्यूटी बजा रहें थे ...हताहत होने या भगदड़ के लिए चिकित्सा के कोई भी इंतजाम नहीं थे ..उस दिन स्टेशन पर मुझे लगा था कि भीड़ बहुत ज्यादा है (उस दिन १ करोड़ ) लेकिन रेलवे प्रशासन संजीदा नहीं है ,सिर्फ खाना पूर्ति है ..यही लापरवाही कल स्टेशन पर मातम में बदल गयी ..जब प्रशासन को पता था कि आज ३ करोड़ की भीड़ जुट सकती है तो उसके हिसाब से इंतजाम क्यों नहीं किये ...कल की घटना से मुझे बहुत ज्यादा दुःख हुआ .. उन सभी परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए उन्हें भावभीनी श्रधांजली ...

Saturday, January 19, 2013

चुनौतियों के चक्रव्यूह में गणतंत्र !

राजेश कश्यप 
 छह दशक पार कर चुके गौरवमयी गणतंत्र के समक्ष यत्र-तत्र-सर्वत्र समस्यांए एवं विडम्बनाएं मुंह बाए खड़ी नजर आ रही हैं। देशभक्तों ने जंग-ए-आजादी में अपनी शहादत एवं कुर्बानियां एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए दीं, जिसमें गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी, बेकारी, शोषण, भेदभाव, अत्याचार आदि समस्याओं का नामोनिशान भी न हो और राम राज्य की सहज प्रतिस्थापना हो। यदि हम निष्पक्ष रूप से समीक्षा करें तो स्थिति देशभक्तों के सपनों के प्रतिकूल प्रतीत होती है। आज देश में एक से बढ़कर एक समस्या, विडम्बना और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को सहज देखा जा सकता है।
देश में भ्रष्टाचार न केवल चरम पर पहुंच चुका है, बल्कि यह एक नासूर का रूप धारण कर चुका है। इस समय भी देश आदर्श सोसायटी, राष्ट्रडल खेल और टू-जी स्पेक्ट्रम आदि घोटालों के दंश से तिलमिला रहा है। देश स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर आज तक जीप घोटाला, हर्षद मेहता काण्ड, हवाला काण्ड, हर्षद मेहता काण्ड, झामूमो रिश्वत काण्ड, दूरसंचार घोटाला, चारा घोटाला, यूरिया घोटाला, सत्यम घोटाला, तहलका काण्ड आदि सेकड़ों घोटालों  के दंश का शिकार हो चुका है। कई लाख करोड़ रूपये घोटालों की भेंट चढ़ चुके हैं। इसके अलावा देश व विदेश में कई हजार करोड़ रूपये कालेधन के रूप में जमा हैं। लेकिन, भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है।
भ्रष्टतंत्र के समक्ष लोकतंत्र दम तोड़ता नजर आ रहा है। भ्रष्टाचारियों को नकेल डालने के लिए सशक्त जन लोकपाल बिल लाने और विदेशों में जमा काले धन को लाकर राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने के लिए क्रमशः वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे और योग गुरू बाबा रामदेव ने गतवर्ष राष्ट्रव्यापी आन्दोलन चलाए। लेकिन, वे सत्तारूढ़ सरकार के चक्रव्युह और राजनीतिकों के कुचक्रों की भेंट चढ़ गए। अन्ना के आन्दोलन को जहां ‘आजादी की दूसरी जंग’ कहा गया तो दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के आन्दोलन के दमन को ‘जलियांवाला बाग काण्ड’ के पुर्नावलोकन की संज्ञा दी गई। ये दोनों ही संज्ञाएं छह दशक पार कर चुके गणतंत्र के लिए विडम्बना ही कही जाएंगीं।
देश के समक्ष आतंकवादी घटनाएं बड़ी चिंता एवं चुनौती का विषय बनी हुई हैं। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आंतकवाद पर भी अंकुश नहीं लग पा रहा है। दिल्ली, जोधपुर, जयपुर, मालेगाँव आदि आतंकवादी हमलों के बाद भी आतंकवाद के प्रति सरकार का रवैया ढूलमूल रहा, जिसका खामियाजा पूरे देश ने मुम्बई आतंकवादी हमले के रूप में भुगतना पड़ा। सबसे बड़ी विडम्बना का विषय यह है कि मुम्बई आतंकवादी हमले के दोषी कसाब को आज तक फांसी नहीं हो पाई है। संसद हमले के आरोपी अफजल गुरू की फांसी का मामला भी ठण्डे बस्ते में पड़ा हुआ है। देश आतंकवादी के खौफ से उबर नहीं पा रहा है, यह गौरवमयी गणतंत्र के लिए बेहद शर्मिन्दगी का विषय है।
देश का अन्नदाता किसान कर्ज के असहनीय बोझ के चलते आत्महत्या करने को विवश है। नैशनल क्राइम रेकार्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में प्रतिदिन 46 किसान आत्महत्या करते हैं। रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 1997 में 13,622, वर्ष 1998 में 16,015, वर्ष 1999 में 16,082, वर्ष 2000 में 16,603, वर्ष 2001 में 16,415, वर्ष 2002 में 17,971, वर्ष 2003 में 17,164, वर्ष 2004 में 18241, वर्ष 2005 में 17,131, वर्ष 2006 में 17,060, वर्ष 2007 में 17,107 और वर्ष 2008 में 16,632 किसानों को कर्ज, मंहगाई, बेबशी और सरकार की घोर उपेक्षाओं के चलते आत्महत्या करने को विवश होना पड़ा। इस तरह से वर्ष 1997 से वर्ष 2006 के दस वर्षीय अवधि में कुल 1,66,304 किसानों ने अपने प्राणों की बलि दी और यदि 1995 से वर्ष 2006 की बारह वर्षीय अवधि के दौरान कुल 1,90,753 किसानों ने अपनी समस्त समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या का सहारा लेना पड़ा।
देश में गरीबी और भूखमरी का साम्राज्य स्थापित है। एशिया विकास बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 75 फीसदी लोग निर्धन मध्य वर्ग में आते हैं, जिनकी मासिक आय 1035 रुपये से कम है। निम्न मध्य वर्ग, जिसकी आय 1035 से 2070 रुपये के बीच है, में लगभग 22 करोड़ लोग हैं। 2070-5177 आय वर्ग वाले मध्य-मध्य वर्ग के लोगों की संख्या पांच करोड़ से कम है। उच्च मध्य वर्ग के लगभग 50 लाख लोगों की मासिक आय 10 हजार का आंकड़ा छूती है। केवल 10 लाख लोग, जिन्हें अमीर समझा जाता है, की आय 10 हजार रुपये से अधिक है। गत वर्ष प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष सुरेश तेन्दुलकर की अध्यक्षता में गठित समिति के अध्ययन के अनुसार देश का हर तीसरा आदमी गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहा है। गाँवों में रहने वाले 41.8 प्रतिशत लोग जीवित रहने के लिए हर माह सिर्फ 447 रूपये खर्च कर पाते हैं। देश के 37 प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीब हैं। जबकि भारत सरकार द्वारा नियुक्त अर्जुन सेन गुप्त आयोग के अनुसार भारत के 77 प्रतिशत लोग (लगभग 83 करोड़ 70 लाख लोग) 20 रूपये से भी कम रोजाना की आय पर किसी तरह गुजारा करते हैं। जाहिर है कि महज 20 रूपये में जरूरी चीजें भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा एवं स्वास्थ्य आदि पूरी नहीं की जा सकती। इनमें से 20 करोड़ से अधिक लोग तो केवल और केवल 12 रूपये रोज से अपना गुजारा चलाने को विवश हैं।
भूख और कुपोषण की समस्या राष्ट्रीय शर्म का विषय बन चुकी है। हाल ही में भूख और कुपोषण सर्वेक्षण रिपोर्ट (हंगामा-2011) ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक और विश्व की दूसरी सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश को हकीकत का आईना दिखाया। इस सर्वेक्षण के तथ्यों के अनुसार देश के 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और उनका वजन सामान्य से कम है।  रिपोर्ट के अनुसार देश के 100 जिलों के 60 प्रतिशत बच्चों की वृद्धि भी सामान्य नहीं हो रही है। सबसे बड़ी हैरानी वाली बात तो यह है कि देश की 92 प्रतिशत माताओं ने ‘कुपोषण’ शब्द कभी सुना तक नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस रिपोर्ट के तथ्यों को राष्ट्रीय शर्म करार देना स्थिति की गंभीरता का सहज अहसास करवाता है।
विष्व भूख सूचकांक, 2011 के अनुसार 81 विकासशील देशों की सूचनी में भारत का 15वां स्थान है। इस सूचकांक के मुताबिक भूखमरी के मामले में पाकिस्तान, बांग्लादेश, युगांडा, जिम्बाबे व मलावी देशों की भारत की तुलना में स्थिति कहीं अधिक बेहतर है। यदि गरीबी के आंकड़ों पर नजर डाला जाए तो विश्व बैंक के अनुसार भारत में वर्ष 2005 में 41.6 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे थे। एशियाई विकास बैंक के अनुसार यह आंकड़ा 62.2 प्रतिशत बनता है। केन्द्र सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समूह द्वारा सुझाए गए मापदण्डों के अनुसार देश में गरीबों की संख्या 50 प्रतिशत तक हो सकती है। गरीबों की गिनती के लिए मापदण्ड तय करने में जुटे विशेषज्ञों के समूह की सिफारिश के मुताबिक देश की 50 प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा से नीचे (बीपीएल) पहुंच जाती है।
बड़ी विडम्बना का विषय है कि देश में प्रतिवर्ष हजारों-लाखों टन अनाज देखरेख के अभाव में गोदामों में सड़ जाता है और देश के 20 करोड़ से अधिक व्यक्ति, बच्चे एवं महिलाएं भूखे पेट सोने को विवश होते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1997 से अक्तूबर, 2007 तक की दस वर्षीय अवधि में एफसीआई के गोदामों में 10 लाख, 37 हजार, 738 मीट्रिक टन अनाज सड़ गया। इस अनाज से अनुमानतः एक करोड़ से अधिक लोग एक वर्ष तक भरपेट खाना खा सकते थे। लेकिन, सरकार को यह मंजूर नहीं हुआ। सबसे रोचक बात तो यह भी है कि गतवर्ष 12 अगस्त, 2011 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार को आदेशात्मक सुझाव दिया कि अनाज सड़ाने की बजाय गरीबों को ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली’ (पीडीएस) के जरिए मुफ्त बांटने का आदेशात्मक सुझाव दिया था। इसे भी सरकार ने नकार दिया।
देश  का नौजवान बेकारी व बेरोजगारी के चंगुल में फंसकर अपराधिक मार्ग का अनुसरण करने के लिए विवष है। पैसे व ऊंची पहुँच रखने वाले लोग ही सरकारी व गैर-सरकारी नौकरियों पर काबिज हो रहे हैं। पैसे, सिफारिष, गरीबी, और भाई-भतीजावाद के चलते देष की असंख्य प्रतिभाएं दम तोड़ रही हैं। निरन्तर महंगी होती उच्च शिक्षा गरीब परिवार के बच्चों से दूर होती चली जा रही है। आज की  शिक्षा पढ़े लिखे बेरोजगार व बेकार तथा अपराधी तैयार करने के सिवाय कुछ नहीं कर पा रही है। क्या शिक्षा में आचूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है?
दहेजप्रथा, कन्या-भ्रूण हत्या, नारी-प्रताड़ना, हत्या, बलात्कार जैसी सामाजिक कुरीतियां व अपराध समाज को विकृत कर रहे हैं। नशा, जुआखोरी, चोरी, डकैती, अपहरण, लूटखसोट जैसी प्रवृतियां देश की नींव को खोखला कर रही हैं। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता लिंगानुपात, घटते रोजगार, प्रदूषित होता पर्यावरण, पिंघलता हुआ हिमालय, गन्दे नाले बनती पवित्र नदियां आदि विकट समस्याएं गणतंत्र के समक्ष बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। कुल मिलाकर इस समय हमारा गौरवमयी गणतंत्र अनेक विकट समस्याओं के सशक्त चक्रव्युह में फंसा हुआ है। गणतंत्र की गौरवमयी गरिमा बनाए रखने के लिए इस चक्रव्युह का शीघ्रातिशीघ्र भेदन किया जाना अति आवश्यक है। इसके लिए हर भारतवासी को चुनौतियों का डटकर मुकाबला करने, इनसे निपटने की कारगर रणनीति बनाने, सार्थक चिन्तन करने और अपनी सकारात्मक भूमिका सुनिश्चित करने का संकल्प लेने की नित्तांत आवश्यकता है।

Wednesday, January 9, 2013

आईआईटी की बढ़ी फीस

आईआईटी  की बढ़ी फीस को लेकर छात्र अभिभावक सब परेशान हैं, मध्यम व गरीब घर के बच्चे जो कर्ज लेकर, माँ के गहने गिरवी रख, एजुकेशन लोन आदि लेकर पढ़ाई कर रहे हैं वे तो मानसिक तनाव में आ गए हैं कि आखिर कैसे पूरा होगा इंजीनियरिंग का सपना । क्योंकि पहले से तय फीस को लेकर उनके घरों में जो बजट तैयार है वह फीस वृद्धि के फैसले की वजह से अचानक गड़बड़ा सकता है। देश में  लाखों गरीब बच्चे-बच्चियाँ स्कूली जीवन में ही इंजीनियर-डॉक्टर बनने के सपने देखते हैं लेकिन  देश में महगीं तकनीकी शिक्षा की वजह से उनकी  इच्छाओं  और सपनों पर पानी फिर जाता है ।  क्या केंद्रीय सरकार को गरीब प्रतिभावान छात्रों की कोई फिक्र है ? किसी देश या समाज के सर्वांगीण विकास  में उच्च और तकनीकी शिक्षा का सबसे बड़ा योगदान होता है । गौर से देखा जाए, तो दुनिया के ताकतवर व समृद्ध देशों की सफलता का एक बड़ा कारण विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा ही है।