Tuesday, August 20, 2013

एक छोटा बच्चा भगवान के सामने

एक छोटा बच्चा भगवान के सामने :-
आपको पता है? पापा कह रहे थे कि हर चीज बढ़ रही है ....
डॉलर 63 हो गया है, पेट्रोल 80 हो गया है, 
दूध हो 50 गया है, प्याज 70 हो गया है, 

भगवान जी बस आपका शुक्र है..
'पासिंग मार्कस' अभी भी 35 ही है...
प्लीज इसे मत बढ़ने दिजीयेगा ….

भारतीय पत्नी

भारतीय पत्नी काफी संस्कारिक होती हैं एवं पति का सम्मान करने वाली.. वोह कभी भी अपने पति को " ए गधे(Aye gadhe) " ," ओ गधे (O gadhe)" ,"सुनो गधे(suno gadhe)" कहकर संबोधित नहीं करती..

बस वोह शोर्ट फॉर्म इस्तमाल करती हैं " ए जी" ,"ओ जी" , "सुनो जी" ..

संस्कारिक पत्नियाँ के लिए संस्कारिक पतियों को बधाई..
 

Sunday, August 18, 2013

हिंदी के स्तंभकारों की स्तिथि ..


मै पिछले कुछ सालों से देश के प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में नियमित रूप से स्तंभ लिख रहा हूँ , प्रिंट मीडिया में बिना किसी गाडफादर और सिफारिश के सिर्फ अपनी मेहनत और लगन के बूते मैंने अपना स्थान बनाया है ..(मै अच्छा लिखता हूँ इसलिए छपता हूँ ,,मै छपता हूँ इसलिए नहीं लिखता )आज से १० साल पहले जब इंजीनियरिंग का छात्र था तब भी खूब लिखता था भले ही वो छपे या न छपे तब भी मेरे कई लेख जनसत्ता ,दैनिक जागरण ,अमर उजाला  आदि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुए थे..कुलमिलाकर लेखन शुरू से ही मेरे लिए जूनून रहा है और आज भी है और आगे भी रहेगा .पिछले दिनों एक पत्रकार ने मेरी शिकायत करते हुए कहा कि मेरा एक ही लेख देश के कई अखबारों में प्रकाशित हुआ है .मै उनकी शिकायत से पूरी तरह से सहमत हूँ (इस देश के अधिकांश बड़े नाम वाले लेखक तो घोषित तौर पर यही करते है ) और मेरा स्पष्ट मानना है कि अगर आप का लेख लखनऊ,दिल्ली ,जयपुर ,भोपाल ,पुणे ,राँची आदि अलग अलग जगह पर छप रहा है तो ये अच्छी बात है विभिन्न पाठकों तक आपकी बात पहुँच रही है .आज के समय में हिंदी के लेखकों को अखबार वाले बहुत कम पारिश्रमिक देते है (मात्र कुछ सौ रुपये ,कई अखबार तो ऐसे भी है जो इतना भी नहीं देते ).. पारिश्रमिक भी छोड़िये उसे ठीक से सम्मान तक नहीं दिया जाता ,उसका लेख प्रयोग होगा कि नहीं अधिकांश संपादक यह जवाब देना तक जरूरी नहीं समझते .कुल मिलाकर लेखक को वो टेक एज अ ग्रांट की तरह लेते है .जरुरत हुई तो लेख प्रयोग कर लिया नहीं तो लेखक भाड़ में जाए .ऐसी परिस्थितियों में लेखक क्या करे ?कुछ सालों में मैंने मीडिया इंडस्ट्री को बहुत अच्छी तरह से देखा है ,समझा है ,आप भारत जैसे देश में आर्थिक रूप से मजबूत होने पर  ही “हिंदी में “ स्वतंत्र लेखन कर सकते है अगर आप बिना किसी जाब के या मजबूत आधार के  फ्रीलांसिंग कर रहें है तो निश्चित तौर पर भूखे मर जायेगें.यहाँ स्तिथी बहुत ज्यादा भयावह है ,जो दिखता है वो है नहीं ,और भी बहुत सारी बाते है फिर कभी बताऊँगा..
इस मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने मेरी चिंताओ को साझा करते हुए लिखा है 
“हाल के दिनों में एक नवेले हिंदी पत्रकार ने कुछ अखबारों के संपादकीय और ऑप एड पेज प्रभारियों को कुछ स्तंभ लेखकों के एक ही लेख के कई जगह प्रकाशित होने की जानकारी दी है...इससे कुछ लेखकों के कुछ संपादकों ने लेख छापने भी कम कर दिए हैं...इस बारे में मुझे याद आता है अपना एक संस्मरण..दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट रसरंग में मैं 1998 में काम कर रहा था...तब दैनिक भास्कर के प्रधान संपादक कमलेश्वर थे। उस समय भास्कर सिर्फ मध्य प्रदेश और राजस्थान में ही प्रकाशित होता था। उन दिनों मृणाल पांडे एनडीटीवी छोड़ चुकी थीं। तब रविवारीय भास्कर की कुछ कवर स्टोरियां अच्युतानंद मिश्र और मृणाल पांडे जी से लिखवाई गईं। संयोग से भास्कर में प्रकाशित मृणाल जी की एक स्टोरी किसी दूसरे अखबार में भी प्रकाशित हुई। रविवारीय में कार्यरत हमारे एक साथी ने कमलेश्वर जी से इसकी शिकायत की। कमलेश्वर जी ने शिकायत सुनी...फिर साथी से सवाल पूछा- आप एक लेख का मृणाल जी जैसे लेखक को कितना पारिश्रमिक देते हैं...उन दिनों मिलने वाली रकम कुछ सौ रूपए होती थी..मित्र ने वही जवाब दिया...कमलेश्वर जी का जवाब था--पहले एक लेख का पारिश्रमिक पांच हजार देने का इंतजाम करो..तब सोचना कि मृणाल जी या दूसरे लेखक एक ही लेख दूसरी जगह छपने को ना दें...फिर उन्होंने उसे समझाया कि अगर एक ही लेख दो अलग-अलग इलाकों के दो या चार अखबारों में छपें तो हर्ज क्या है..आखिर पाठक भी तो अलग-अलग इलाकों के हैं..

Thursday, August 15, 2013

स्वतंत्रता दिवस पर कविता

आज स्वतंत्रता दिवस और मेरा जन्मदिवस दोनों है .यह संयोग मुझे काफी सुखद लगता है , आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें..इस अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई की यह कविता मुझे बहुत पसंद है
15 अगस्त का दिन कहता ,आजादी अभी अधूरी है
सपने सच होने बाकी है ,रावी की शपथ न पूरी है
दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएगें
गिल –गिल से गारो पर्वत तक आजादी पर मनाएंगे
उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसे बलिदान करें

जो पाया उसमे खो न जाएँ ,जो खोया उसका ध्यान करें ......

Wednesday, August 14, 2013

मेरा और मेरे देश दोनों का जन्मदिवस

आज मेरा और मेरे देश दोनों का जन्मदिवस है...मेरा तो कुछ नहीं पर मेरा देश सदा सर्वदा के लिए अमर हो जाये, खूब आगे बढे, हमेशा तरक्की करें ,विश्व महाशक्ति बने ,फिर से विश्व गुरु बने (तेरा गौरव बना रहें माँ ,हम दिन चार रहें न रहें )इसी कामना के साथ आप सभी को सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें ...मेरे जन्मदिवस पर आप सभी मित्रों की शुभकामनाओं से मै अभिभूत हूँ ,इसके लिए आप सभी का ह्रदय से आभार

Monday, August 12, 2013

नेशनल दुनिया के संपादकीय पेज पर मेरी कवितायेँ ..

आज के नेशनल दुनिया के संपादकीय पेज पर मेरी कवितायेँ .. लेख लिखने और छपने से कई गुना ज्यादा ख़ुशी होती है कवितायेँ लिखते और छपते समय .कवितायेँ मेरे दिल के बहुत ज्यादा करीब है ..आज काफी ख़ुशी हो रही है ..

poem link
http://www.nationalduniya.com/Admin/data/2013/08/10/Delhi/Delhi/images/page10_07.gif

Thursday, July 18, 2013

मिड डे मील के नाम पर मिलेगी मौत

छपरा की घटना बेहद दुखद और दिल को झकझोर देने वाली है .आप देश के किसी भी स्कूल में चेक कर लीजिए मिड डे मील के नाम  पर घटिया भोजन मिलेगा ,पूरी योजना बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की शिकार है ..फिलहाल सरकार बच्चों को मिड डे मील के नाम पर मार रही है ,आगे खाद्य सुरक्षा के नाम पर (GDP का 3 प्रतिशत )मारेगी ...देश के  लोगों को भिखारी समझ रखा है कांग्रेस ने ...देश के लोगों को इस समय बेहतर सार्वजनिक शिक्षा और चिकित्सा की जरुरत है जो इस समय देश में एकदम निम्न दर्जे की है ..बजाय इसके कांग्रेस लोगों को भिखारी बना कर खैरात बाटने पर लगी है ..कांग्रेसियों ..तुम लोगों ने देश को बर्बाद करने में ,लोगों का खून चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी ..अब तो बक्श  दो इस देश को .....ये देश तुमसे अपने जिंदगी की भीख माँग रहा है ...अब तो छोड़ दो ,बहुत लूट लिया इस देश को ..अब पहले उस लुटे हुए को खा तो लो .... प्लीज अब इस देश पर दया करो ..दया करो ...थोड़ा सा दया करो ..