Monday, October 21, 2013

देश के रहनुमाओं अब तो शर्म करो ...

शशांक द्विवेदी 
रोज-रोज सुनते सुनते थक गया हू कि पाकिस्तान ने सीमा पार से फिर गोलाबारी की इसमें इतने जवान शहीद और इतने घायल हो गये , इतने जवानों का सर काट कर ले गये ,इतनों को बुरी तरह मार कर फेक दिया ,केरन सेक्टर में आतंकियों की घुसपैठ पर इंडियन आर्मी का आपरेशन जारी है ..बचपन से ही सुनते आ रहा हू इस तरह की न्यूज ,हर बार और हमेशा शर्म आती है इस देश की सरकार पर भी और खुद पर भी ..सोचता हू इतना बड़ा देश है इतनी बड़ी सेना है फिर भी पाकिस्तान वाले ,बंगलादेश वाले जब चाहते है घुस कर मारते है ..कितना कायर और घटिया है इस देश का नेतृत्व ..आजादी के बाद से हमने पाकिस्तान के खिलाफ हर युद्ध जीता लेकिन वार्ता की मेज पर भारत हमेशा हारा .. 71के युद्ध में हमने लाहौर तक कब्ज़ा किया ,जीत का विश्व रिकार्ड तक बनाया लेकिन बाद में क्या किया सरकार ने जीती हुई जमीन तो हमें वापिस करनी ही पड़ी अपने देश की जमीन भी देनी पड़ी जो गुलाम कश्मीर के नाम से जानी जाती है ..चीन देश की 42 हजार वर्ग किलोमीटर और पाकिस्तान 12 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन दबाए हुए है ...अमेरिका ,चीन ,ब्रिटेन ,यूरोप के देशों का आप एक सैनिक मार दीजिए फिर देखिये वो घुस कर मारेंगे ..लेकिन भारत में देखिये रोज सीमापार से जबरदस्त फायरिंग होती है ,घुसपैठ होती है ,रोज जवान मारे जाते है ,घायल होते है ..फिर भी यहाँ की सरकार कुछ नहीं बोलती ..देश का रक्षा मंत्री ऐसा है जो खुद अपने पैरों पर ठीक से खड़ा तक नहीं हो सकता ,कई बार गिर चुका है चलते चलते ,व्हील चेयर में चला लंबे समय तक ..ताज्जुब है ..ऐसे तो रक्षा मंत्री है ...वास्तव में इस देश में नेताओं ,मंत्रियों ,सरकार की कायरता देख कर शर्म आती है ,चूड़ी पहन लेना चाहिए इन सब बेशर्मों को ...ज्यादा सोचता हू तो लगता है यही इस देश का भाग्य है सैकड़ों साल गुलाम रहा ,लुटता रहा ,अब आजाद होने के बाद पड़ोसी देश घुस -घुस कर हमारे जवान मार राहें है ...
इस पर यही बात याद आते है कि
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो ..
उसका क्या जो दंतहीन ,विषरहित ,विनीत सरल हो ...

देश के रहनुमाओं अब तो शर्म करो ,कुछ तो शर्म करो,कुछ तो कायरता कम करो  ...देश को तो भ्रष्टाचार करके लूट ही चुके हो कम से कम सीमायों की तो रक्षा करो ...

Thursday, October 17, 2013

चुम्बकीय शक्ति प्रभाव

टीचर: चुम्बकीय शक्ति प्रभाव किसे कहते हैं..?.................जब कोई लडकी स्कूटी पर जाते हुयेकिसी बाइक सवार लडके के पास से गुजरती हैतो उस लडके की बाइक की गति स्वत: ही बढ जाती है..लडकी द्वारा उत्पन्न किये गये इसगति परिवर्तन को ही "चुम्बकीय शक्ति प्रभाव" कहते हैं...!!

एक पत्रकार की उत्तरकथा!

शंभुनाथ शुक्ल 
मैं अब निराश और डिप्रस्ड होकर सोचने लगा हूं कि दिल्ली छोड़ ही दूं। कई वजहें हैं मसलन दिल्ली में अगर आप भाजपाई, कांग्रेसी या घोषित कम्युनिस्ट पत्रकार नहीं हैं तो आपको कोई पूछेगा नहीं। अगर आपके संबंध संपादकों से मधुर नहीं हैं तो कोई आपको छापेगा नहीं और अगर मालिकों से आपका सीधे संवाद नहीं है तो कोई नौकरी देगा नहीं। अब इस उम्र में पत्रकारिता से इतर कोई व्यवसाय तो कर नहीं सकता इसलिए एक ही विकल्प बचता है कि दिल्ली छोड़कर अपने मूल शहर या किसी अन्य शहर में जाकर कोई भी छोटा-मोटा व्यवसाय कर लूं। ३५ साल तक पत्रकारिता की और सक्रिय रहा लेकिन आज अखबारों में अपने काकस हैं। उनका कहना है कि हम आपको नहीं छाप सकते क्योंकि हमारे कालमिस्ट तय हैं। यह अलग बात है कि वे कालमिस्ट आंचलिक अखबारों के लेख उड़ाकर अपने नाम से छाप लेते हैं। कुछ कालमिस्ट अंग्रेजी में लिखते हैं पर हिंदी के अखबार उधार की प्रतिभा छाप लेते हैं। उन्हें मूल प्रतिभा नहीं चाहिए। अब तक जितना भी जोड़ रखा था सब खत्म हो गया। अब सोचता हूं कि गाड़ी बेच दूं और गाजियाबाद के वसुंधरा इलाके में स्थित फ्लैट भी। कानपुर स्थित अपने गांव जाकर थोड़े में गुजारा कर लूं। या बस स्टैंड पर चाय अथवा पकौड़ी की दूकान खोल लूं। हर व्यवसाय अपने अनुभवी लोगों की कद्र करता है पर पत्रकारिता में अनुभवी लोगों के लिए सिवाय भूखों मरने के और कोई रास्ता नहीं बचता। न मैं जातिवादी हूं न संप्रदायवादी इसलिए किसी भी राजनैतिक दल के लिए मेरी प्रतिभा की दरकार नहीं है। दिक्कत यह है कि जो लोग सिर्फ अपना श्रम बेच सकते हैं उन्हें सरकार क्या सुविधा प्रदान करती है। मुझ जैसे लोगों को भी साल में कम से कम १०० दिन की मजूरी तो मिलनी चाहिए। बीमार पड़ जाएं तो इलाज की भी सुविधा हो वर्ना सिवाय आत्महत्या के और क्या चारा है। घुट-घुट कर जीने से तो स्वस्थ रहते हुए ऊपर जाना बेहतर है।
(लेखक देश के वरिष्ठ और जाने -माने पत्रकार है )


Wednesday, October 2, 2013

लोकमत में प्रकाशित मेरी कवितायेँ -अकेलापन

मुजफ्फरनगर दंगे पर नेशनल दुनियाँ में मेरी कवितायेँ (संपादकीय पेज पर )

मजबूती का नाम महात्मा गाँधी

शशांक द्विवेदी 
आज से 8 साल पहले तक (इंजीनियरिंग की पढाई तक ) मै गाँधी जी के बारे में बहुत ज्यादा खराब विचार रखता था .लेकिन एक दिन किसी ने गाँधी जी पर बहस के दौरान कहा कि आप गाँधी जी के बारे में जानते ही क्या है सिर्फ सुनी -सुनाई बातों पर बहस कर रहें है पहले एक बार उनके बारे में ठीक से जान तो लो ,उनके बारे में पढ़ लो फिर बात करना ..उसी दिन मैंने गांधी जी से सम्बंधित कई किताबे खरीदी जिसमे उनकी आत्मकथा "सत्य के प्रयोग " भी शामिल थी .उन सबको पढ़ा उसके बाद मुझे उनकी वास्तविक शक्सियत का एहसास हुआ ,मेरे विचार उनके बारे में बहुत अच्छे हो गये वाकई में वो लाजवाब व्यक्ति थे ,सत्य और अहिंसा को जीवन में अपनाना आसान बात नहीं है उन्होंने तो इन्हें ही अपने पूरे जीवन में हथियार बनाया .लोग कहते है मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी लेकिन सच बात तो यह है कि मजबूती का नाम महात्मा गाँधी होना चाहिए ...क्योंकि सत्य और अहिंसा को मजबूत आदमी ही अपना सकता है ..आज के दिन उनका और सीधे ,सरल और मजबूत व्यक्तित्व के धनी पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन है ..इस अवसर पर दोनों महान आत्माओं को ह्रदय से याद करते हुए भावभीनी श्रधांजली ...

Monday, August 26, 2013

प्रियंका द्विवेदी की कवितायें नेशनल दुनियाँ अखबार में

बेटियाँ ही क्यूं
जला दी जाती हैं बेटियाँमार दी जाती हैं बेटियाँ
पैदा होने से पहले और बाद में भी मार दी जाती हैं बेटियाँ
आखिर क्यूं
शादी के लिए और शादी के बाद भी मार दी जाती हैं बेटियां
आखिर क्यूं
हर घंटे हिंसा का शिकार होती है बेटियाँ
घर हो या दफतर या हो कोई भी चैराहा
सरेआम बेपर्दा की जाती हैं बेटियाँ
गरीब हो या अमीर फिर रोती हैं बेटियाँ
सिसकियां भरती हैं बेटियाँ
आखिर क्यूं
क्या नारी होना ही अभिशाप है इस धरा पर
अरे मत भूलों जगत जननी भी होती हंै बेटियाँ
तुम्हारें घर को संभालती हैं बेटियाँ
तुम्हारें घर में चिराग जलाती हैं बेटियाँ
तुम्हारें वंश को आगे बढाती हैं बेटियाँ
तुम्हारें रिश्ते बनाती, तुम्हें मान भी दिलाती हैं बेटियाँ
अपना घर छोड दूसरों की जिंदगी संवारती हैं बेटियाँ

     बचपन 

नटखट और नादान है बचपन
बेखौफ और बेधडक है बचपन
न किसी से डरना और ना धमकना है बचपन
बेखौफ शरारते करता है बचपन
हंसना और बस हंसना है बचपन
मनमरजी शरारतें करता है बचपन
अपनी बातें मनवाता है बचपन
रो रोकर चिल्लाता है बचपन 
अपनी बात पहंुचाता बचपन
नन्हें पैरों से चलना, गिरना फिर गिर कर संभलना है बचपन
गिरकर भी चोट, दर्द का एहसास न होना है बचपन
बस उठो और फिर से करो वही
आखिर क्यूं गिरे न सोचो यही तो है बचपन
कभी पानी तो कभी मिटटी में खेलना यही तो है बचपन
न धूल और ना धूप की गर्मी की चिंता, यही तो है बचपन
पानी में भीगना, अपने को और दूसरों को भीगोना यही तो है बचपन
न ठंड की परवाह न गर्मी का एहसास यही तो है बचपन
कभी रोना और आंखों में आंसू भरना
गले से आवाज निकालना और चिल्लाना यहीं तो है बचपन
न अपने और न पराए का भेद यही तो है बचपन
सब कुछ देना सब कुछ लेना है बचपन
न जात, न पात की समझ, यही तो है नादान बचपन
लेखिका
प्रियंका द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार

वर्तमान में देश की प्रमुख पत्र पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन
कविता link