Friday, August 21, 2015

प्रेम बनाम विवाह

रचना त्रिपाठी
स्त्री हो या पुरुष- दोनों के जीवन में प्रेम का होना बहुत जरुरी है! प्रेम- यह वो संजीवनी है जिसे पाने की चाह शायद हर प्राणी में होती है। पर प्रेम में पागल होकर प्रेमी के साथ विवाह कर लेना बहुत समझदारी नहीं होती। क्योंकि प्रेम और विवाह दोनों की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए प्रेम को विवाह के खाके में फिट करना थोड़ा कठिन हो जाता है। तो जरुरी नहीं है कि जिससे प्रेम करें उससे विवाह भी करें। क्यों कि प्रेमविवाह में विवाह के बाद पवित्र प्रेम की जैसी आशा होती है वह कहीं न कहीं विवाह के पश्चात क्षीण होने लगती है।
देश की अदालत ने लिव-इन को क़ानूनी मान्यता भले ही दे दी हो, लेकिन हमारी सामाजिक बनावट ऐसी नहीं है जहाँ प्रेम करने वालों को शादी किये बिना विशुद्ध प्रेम की मंजूरी मिलती हो। इसलिए प्रेमीयुगल इस संजीवनी को पाने की चाह में प्रेम की परिणति विवाह के रूप में करने को मजबूर हो जाते हैं; और विवाह हो जाने के बाद वैसा प्रेम बना नहीं रह पाता। दूसरी तरफ हमारे समाज में ऐसे युगलों की भी बहुत बड़ी संख्या है जिनके जीवन में प्रेम का आविर्भाव ही शादी के बाद होता है। अरेंज्ड मैरिज की इस व्यवस्था को समाज में व्यापक मान्यता प्राप्त है। इसमें साथ-साथ पूरा जीवन बिताने के लिए ऐसे दो व्यक्तियों का गठबंधन करा दिया जाता है जो उससे पहले एक दूसरे को जानते तक नहीं होते। फिर भी अधिकांशतः इनके भीतर ठीक-ठाक आकर्षण, प्रेम और समर्पण का भाव पैदा हो जाता है। गृहस्थ जीवन की चुनौतियों का मुकाबला भी कंधे से कंधा मिलाकर करते हैं। संबंध ऐसा हो जाता है कि इसके विच्छेद की बात प्रायः कल्पना में भी नहीं आती। ऐसी आश्वस्ति डेटिंग करने वाले प्रेमी जोड़ों में शायद ही पायी जाती हो। वहाँ तो कौन जाने किस मामूली बात पर रास्ते अलग हो जाँय कह नहीं सकते। प्रेम उस मृगनयनी के समान है जिसे पाकर कोई भी फूला न समाये लेकिन शादीशुदा व्यक्ति के लिए है यह अत्यंत दुर्लभ है। यह मत भूलिए कि विवाह उस लक्ष्मण रेखा से कम नहीं जिससे बाहर जाने की तो छोड़िये ऐसा सोचना भी भीतर से हिलाहकर रख देता है।
विवाह के पश्चात् स्त्री पुरुष के बीच प्रेम का अस्तित्व वैसा नहीं रह जाता जैसा कि विवाह से पहले रहता है। प्रेम का स्वभाव उन्मुक्त होता है और विवाह एक गोल लकीर के भीतर गड़े खूंटे से बँधी वह परम्परा है जिसके इर्द गिर्द ही उस जोड़े की सारी दुनिया सिमट कर रह जाती है। फिर विवाह के साथ प्रेम का निर्वाह उसके मौलिक रूप में सम्भव नहीं रह जाता। प्रेम का विवाह के बाद रूपांतरण सौ प्रतिशत अवश्यम्भावी है। विवाह और प्रेम को एक में गड्डमड्ड कर प्रेमविवाह कर लेने वालों की स्थिति वेंटिलेटर पर पड़े उस मरीज की भाँति हो जाती है जिसकी नाक में हर वक्त ऑक्सीजन सिलिंडर से लगी हुई एक लंबी पाइप से बंधा हुआ मास्क लगा रहता है। यह प्रेम-विवाह में प्रेम-रस का वह पाइप होता है जिसपर यह संबंध जिन्दा रहता है। जिसके बिना चाहकर भी दूर जाने की सोचना खतरे को दावत देने जैसा है। सिलिंडर से लगी वह पाइप सांस लेने में सहायक तो जरूर बन जाती है पर वह स्वाभाविक जिंदगी नहीं दे पाती। अगर जिंदगी बची भी रह जाय तो शायद उसे उन्मुक्त होकर जीने की इजाजत न दे।

Thursday, August 6, 2015

देश के लिए खतरा स्तरहीन मीडया

शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर ((रिसर्च, मेवाड़ यूनिवर्सिटी
पिछले दिनों याकूब मेनन की  "फांसी लाइव" दिखाने की जो होड़ टीवी चैनलों में दिखी न सिर्फ वो घटिया थी बल्कि देश के लिए बेहद खतरनाक भी थी या आगे जाकर खतरनाक हो सकती है ..जिस तरह से दिन रात सिर्फ याकुब को ही दिखाया गया और मामले को जानबूझकर संवेदनशील बनाया गया उससे पता चलता है कि इस देश का टीवी मीडिया पूरी तरह से स्तरहीन है जिसे पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांत भी नहीं पता है ..कई बार लगता है कि ये टीवी वाले सीधे सीधे अपने देश के साथ देशद्रोह कर रहें है इस तरह से लोगों की भावनाएं भड़का कर जिसके लिए इन्हें कभी माफ़ न किया जा सकता है ना ही कभी किया जाना चाहिए ..एक दुर्दांत अपराधी को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया इन लोगों ने ...शर्म करो ..शर्म करो ..मीडिया की इस तरह की घटिया कवरेज रोकने के लिए भी एक मजबूत नियामक संस्था होनी चाहिए जो देश में शांति /संवेदनशीलता के मुद्दों पर इस तरह की रिपोर्टिंग करने से इन्हें रोके नहीं तो भविष्य में यही मीडिया देश के लिए बड़ा खतरा भी साबित हो सकते है .. ..

Wednesday, July 29, 2015

"मसान" विद मोदी विद वामपंथ

कई सालों बद कल अकेले कोई फिल्म देखने गया था .फेसबुक पर कुछ लोगोने ने तारीफ़ करी तो मसान देखने चला गया ..जैसा कि उम्मीद थी सुबह के शो में ज्यादा दर्शक नहीं थे पीछे से चौथी पंक्ति में बैठा था ,फिल्म शुरू होने के १० मिनट तक तो हॉल में शांति का महाल था लेकिन १० मिनट के बाद मेरे पीछे की पंक्ति में बैठे ३-४ लड़कों ने मोदी के बारे में जोर जोर से बात करनी शुरू कर दी ..कोई बोला ये मोदी बिहार में कुछ नहीं कर पायेगा तो कोई बोलाइसकी ताबूत में आख़िरी कील है ये चुनाव .,नीतिशवा इन्हें मजा चखा देगा ...कुलमिलाकर उनके इस वार्तालाप से मै बहुत परेशान हो रहा था तो मैंने उनसे कहा कि वो लोग मोदी के बारें में बाहर बात कर लें ..खैर मेरे २-३ बार कहने पर भी वो लोग नहीं माने तो मैं अपनी सीट  चेंज करके शांति से फिल्म देखने लगा ....फिल्म के इंटरवल में उन ३-४ लडको से फिर बातचीत हुई तो पता चला कि वो सब जे एन यू  से थे और वामपंथी थे .मुझे पहली बार प्रत्यक्ष तौर पर अहसास हुआ कि मोदी ,वामपंथियों की रग रग  में कैसे समाये हुए है, जिन्हें ये लोग सोते जागते ,नहाते ,धोते ,खाते ,पिक्चर देखते समय भी ये मोदी की चर्चा ,परिचर्चा और आलोचना में दिल से लगे रहते है ..ये कभी अपनी पार्टी के बारें में नहीं सोचते है न ही उसके लिए कुछ कहते या करते है ..हनुमान जी की तरह अगर किसी वामपंथी का हृदय चीर कर देखा जाए तो उसमे सिर्फ मोदी ही  दिखेंगे ...इनकी इसी मानसिक बीमारी से आज इन लोगों का पतन हो गया ..पूरे देश में कोई नामलेवा भी नहीं बच रहा है इनका ..यार अब तो इन धूर्तों को देखकर बिलकुल भी गुस्सा नहीं आता बल्कि बहुत ज्यादा दया आती है देखो इन्हें मोदी ने क्या से क्या बना दिया ...सच में असली भक्त तो यही लोग है जो दिन रात तल्लीनता से मोदी विरोध में लगे रहते है  ..फिल्म का टिकट लेकर भी मोदी भक्ति  ....मान गया इन वामपंथियों को भाई ... खैर फिल्म तो बहुत ही ज्यादा अच्छी थी ,जितनी तारीफ़ करू उतनी कम ...फिल्म का अहसास तो अभी तक है दिल दिमाग में ...

Wednesday, July 1, 2015

अन्त में हम दोनों ही होंगे !!!.

पति-पत्नी के रिश्तों पर एक बहुत ही मानवीय संवेदनशील कविता ,(मूल लेखक पता नही ..)

अन्त में हम दोनों ही होंगे !!!.
" भले ही झगड़े, गुस्सा करें एक दूसरे पर
 टूट पड़ें एक दूसरे पर दादागिरि करने के लिये,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
जो कहना है, वह कह लें जो करना है, वह कर लें
एक दुसरे के चश्मे और लकड़ी ढूँढने में,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
मैं रूठूं तो तुम मना लेना, तुम रूठो ताे मै मना लूँगा
एक दुसरे को लाड़ लड़ाने के लिये,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
आँखें जब धुँधला जायेंगी, याददाश्त जब कमजोर होंगी
तब एक दूसरे को एक दूसरे मे ढूँढने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
घुटने जब दुखने लगेंगे, कमर भी झुकना बंद करेगी
तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
घुटने जब दुखने लगेंगे, कमर भी झुकना बंद करेगी
तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे साथ जब छूटने वाला होगा,
बिदाई की घड़ी जब आ जायेगी तब एक दूसरे को माफ करने के लिए, .
अन्त में हम दोनों ही होंगे...."

Wednesday, May 13, 2015

अलविदा सेंट मार्गेट ...अलविदा नीमराना



शशांक द्विवेदी 
पिछले 10 दिनों से अपने भीतर खुशी और उदासी दोनों को एक साथ महसूस कर रहा हूँ .खुशी इसलिए कि मेवाड़ यूनिवर्सिटी (मेवाड़ इंस्टीट्यूट,वसुंधरा गाजियाबाद कैम्पस ) में As a Deputy Director (Research ) ज्वाइन करने वाला हूँ और मेरे साथ मेरी श्रीमती जी Assistant Professor in Mass Comm..Deptt ज्वाइन कर रही है .एक बेहतर आफर और मनपसंद काम के साथ जॉब की ये एक नयी शुरुआत है .इसलिए काफी खुश हूँ लेकिन 10 साल सेंट मार्गेट में काम करने के बाद उसे छोड़ने को लेकर एक अजीब सी उदासी है मेरे मन में क्योकि यहाँ पढ़ाते हुए मुझे बहुत कुछ हासिल हुआ ,सबसे बड़ी बात एक शानदार माहौल, कभी लगा ही नहीं कि जॉब कर रहा हूँ .सुबह आठ से दोपहर 2 बजे की जॉब के बाद जिंदगी के बहुत सारे काम यूं ही हो जाते थे .अरावली हिल्स के नीचे रहते हुए हमेशा प्रकृति को अपने पास ही महसूस किया जो अब शायद नहीं कर पाऊंगा लेकिन हर अच्छी चीज , जगह और लोग भी कभी न कभी ,किसी न किसी वजह से बिछड़ते जरुर है शायद वही अलविदा वाली फीलिंग्स आ रही है मुझे ....फिलहाल 31 मई तक यही हूँ उसके बाद 1 जून को मेवाड़ यूनिवर्सिटी के वसुंधरा कैम्पस में नई जॉब ज्वाइन करूँगा .दिल्ली के नजदीक या यूं कहें दिल्ली में ही आ गया हूँ .... अब दिल्ली वाले मित्रों से मुलाक़ात हो पाएगी ...सेंट मार्गेट के मेरे सहयोगियों और इसके प्रबंधन को मेरा ह्रदय से आभार कि इन्होने हमेशा मुझे बेहतर काम करने के लिए एक अच्छा माहौल दिया और हमेशा मेरा साथ दिया,अपने स्टूडेंट्स को बहुत मिस करूँगा जिन्हें सालों पढ़ाया ...Love u all ,love u Neemrana .....

Monday, March 23, 2015

अच्छी लड़कियाँ बुरे लड़कों को क्यों पसंद करती है

मोनिका जैन 
ज्यादातर लड़कियाँ बुरे लड़कों की तरफ आकर्षित होती है. इस फैक्ट ने अच्छाई को खत्म करने में कहीं ना कहीं अपना योगदान दिया है. इसलिए लड़कियों गौर फरमाओं. एक अच्छा लड़का तुमसे बहुत ज्यादा रोमांटिक और फ़्लर्टी बातें ना कर पाए पर वह प्यार तुम्हें बड़ी शिद्दत से करेगा. वह तुम्हें ठहाकों वाली हँसी भले ही ना दे पाए पर कभी रुलाएगा भी नहीं. हो सकता है वह बड़े-बड़े गिफ्ट्स और सरप्राइज पार्टी के दिखावे ना कर पाए पर वह तुम्हें जो भी देगा वह ओरिजिनल होगा...और ओरिजिनल तो ओरिजिनल ही होता है 

Friday, February 20, 2015

हमारी भी लड़ाई होती है ...


शशांक द्विवेदी 
कल किसी ने मेरी मैरिज एनिवर्सरी की पोस्ट पढ़ने के बाद एक सवाल किया कि क्या आपके और आपकी पत्नी के बीच भी लड़ाई होती है तो मैंने जवाब में कहा कि दुनियाँ में पति –पत्नी की शायद ही ऐसी कोई जोड़ी होती होगी जिनके बीच कभी भी लड़ाई –झगड़ा ,नोक झोंक ना होती हो .खैर मेरे और प्रिया के बीच भी कभी कभार यह सब हो जाता है . आखिर हम दोनों भी इंसान है ,आदर्श स्तिथि तो सिर्फ देवी –देवताओं में ही होती होगी .
हम दोनों के विचार बहुत भिन्न है कई मुद्दों पर मतभेद भी रहता है लेकिन विचारों की यही भिन्नता मुझे कई बार बहुत ठीक लगती है इससे किसी भी चीज के हर पहलू को समझने में मदत मिलती है .वैसे भी मेरा मानना है कि पति –पत्नी होने का मतलब यह नहीं है कि एक दूसरे की जी –हुजूरी करने लग जाएँ या गुलामी जैसा महसूस करें .सीधी सी बात है व्यक्तित्व भिन्न है तो विचार भी भिन्न ही होंगे .इसलिए बेहतर आपसी समझ बनाने की जरुरत होती है .

खाने के मामले में प्रियंका जहाँ बेहद सात्विक है मतलब वो लहसुन और प्याज बिल्कुल नहीं खाती ना ही उसके परिवार में कोई खाता वहीं मुझे ये बेहद पसंद है .प्रियंका के होते हुए घर में सभी सब्जियां बिना लहसुन और प्याज के ही बनती है ,सबसे खास बात यह है कि सब्जियां बेहद शानदार और टेस्टी बनती है और अब तो मुझे भी खूब पसंद आने लगी ..हाँ अब मै अलग से प्याज सलाद के साथ  में खा लेता हूँ . कई मामले ऐसे भी है जहाँ वो मेरी बात मानती है .करियर के मामले में जहाँ मै पूर्णकालिक तौर पर मीडिया में जाना चाहता था /चाहता हूँ लेकिन प्रियंका ने कभी जाने नहीं दिया उसने कहा पढाने के साथ लेखन करो वही ठीक है मीडिया में जाने की जरुरत नहीं है.. प्रिया ने अमर उजाला में कई साल काम किया इसलिए उसे मीडिया का अनुभव मुझसे कहीं ज्यादा है फिलहाल उसकी बात मानना ही मुझे ठीक लगा .मेरे अंदर ड्रेसिंग सेंस नहीं है प्रिया में है और आज की डेट में मेरे ८० फीसदी कपड़े प्रियंका ही खरीदती है .प्रियंका आम ठेठ भारतीय पत्नियों की तरह सिर्फ “यस मैन “ नहीं है बल्कि मेरे  अंदर या फिर मेरे किसी काम में उसे जो ठीक नहीं लगता उस पर वो बिना झिझक कर बोलती है .चाहे वो मुझे बुरा ही क्यों ना लगे ..बहुत मामलों में मेरी पहली आलोचक मेरी पत्नी ही है ..एक बात जरुर है कि मुझे कई बार शादी एक बंधन के रूप में भी दिखती है क्योंकि शादी के पहले भी मै ५ साल प्रिया के साथ रहा वहाँ मुझे बड़ी स्वतंत्रता महसूस होती थी लेकिन शादी के बाद बिना वजह बहुत सारे झंझट आ जाते है मसलन परिवार ,समाज ,रिश्तेदार..इन्हें खुश करो ,उन्हें खुश करो ...ज्यादातर नोंकझोक भी इन्ही बातों से होती है ..बेवजह के ढकोसलों से भी बहुत खीज और परेशानी होती है ...लेकिन फिर भी ये सब तो झेलना ही पड़ेगा भाई क्योंकि प्रेम विवाह की  कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है. लेकिन विचारों में थोड़ा बहुत मतभेद होते हुए भी हमारे बीच “प्रेम “ का गहरा अहसास है जो हमें हमेशा जोड़े रहता है और सच्चाई है कि सिर्फ “प्रेम “ में ही इतना सामर्थ्य है जो आपको जिंदगी भर जोड़े रख सकता है .