Sunday, September 25, 2011

एड्स के नाम पर कारोबार


एड्स के नाम पर कारोबार
कुछ लोग के लिए एड्स जानलेवा बीमारी हो सकती है लेकिन ज्यादातर लोग इसके नाम पर अपनी जेबे भर रहे है नेता और अधिकारियो को एड्स के नाम पर विदेशो में धूमने से फुर्सत नही है वही ज्यादातर गैर सरकारी संगठन चांदी काट रहे है। सरकार को तो यह तक पता नहीं कि एड्स नियंत्रण के काम पर कौन -सा संगठन कितना पैसा कहा खर्च कर रहा है
         कुछ वर्ष पूर्व भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने संसद में बयान दिया था उन्होने कहाइन अवर कंट्री पीपल आर नाँट लिविंग विद एड्स , दे आर लिविंग आँन एड्सअर्थात हमारे देश में लोग एड्सके साथ नहीं जी रहे हैं , बल्कि एड्स से अपनी रोजी-रोटी कमा रहें हैं वाकई, आज देश एड्स माफिया के चंगुल में है एड्स के नाम पर पैसे की बरसात हो रही है विभिन्न इंटरनेशनल एजेंसीज एड्स के नाम पर अपनी सोच भी हम पर थोप रही है दरअसल एच आई वी - एड्स के क्षेत्र में मिल रही विदेशी सहायता ने तमाम गैर सरकारी संगठनों को इस ओर आकर्षित किया है नतीजन जो एन0 जी0 0 पहले से समाज सेवा के लिए काम करते थे, वे अब खुद अपनीसेवाके लिए एन0 जी0 0 खोल रहे हैं एड्स प्रोजेक्ट्स की बदंरबाट ने एच आई वी -एड्स का जमकर दुष्प्रचार किया है एड्स के उपचार के लिए दवाओं और कंडोम के इत्तेमाल पर भी वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं सारे प्रयोग यहां होने से भारत दुनिया की लेबोरेटरी बन रहा है देश में एड्स विशेषज्ञों का अभाव है साथ ही डाक्टर और पैरा मेडिकल स्टाफ भी इसको लेकर कई भ्रांतियां पाले हुए है
आज पूरी दुनिया में एच.आई.वी. और एड्स को लेकर जिस तरह का भय व्याप्त है और इसकी रोकथाम उन्मूलन के लिए जिस तरह के जोरदार अभियान चलाये जा रहे हैं , उससे कैंसर, हार्टडिजीज, टी.बी. और डायबिटीज जैसी खतरनाक बीमारियां लगातार उपेक्षित हो रही हैं और बेलगाम होकर लोगों पर अपना जानलेवा कहर बरपा रहीं है
पूरी दुनिया के ऑकडों की माने तो हर साल एड्स से मरने वालों की संख्या जहाँ हजारेां में होती है, वहीं दूसरी घातक बीमारियों की चपेट में आकर लाखों लोग अकाल ही मौत के मुंह में समा जाते हैं ।विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार अगर हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और क्षय-रोग से बचने के लिए लोगों को जागरूक या इनके उन्मूलन के लिए कारगर उपाय नहीं किये गये तो अगले दस वर्षो में इन बीमारियेां से लगभग पौने चार करोड लोगों की मौत हो सकती है इन बीमारियों की तुलना में एड्स से मरने वालों की संख्या काफी कम है हमारे देश में 1987 से लेकर अब एड्स से मरने वालों की संख्या जहॉ सिर्फ 12 हजार थी वहीं पिछले ही पिछलें ही वर्ष में केवल टी.बी. कैंसर से 6 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो गयी परन्तु सरकारी और गैरसरकारी दोनों स्तरों पर सिर्फ एच.आई.वी. और एड्स की रोकथाम के लिए गम्भीरता है और इसी के लिए अति सक्रिय कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं उदाहरण के लिए 2010-11 में जहॉ एड्स नियत्रंण पर जहाँ 800 करोड़ खर्च किये गयेे वहीं टी.बी. उन्मूलन पर सिर्फ 205 करोड और कैंसर नियत्रंण पर 89 करोड रू0 खर्च किये ये सभी आकडे़ सरकारी बजट का हिस्सा है शायद इसीलिए एड्स के लिए चलाये जा रहे तमाम अभियानों से कई चिकित्सा विज्ञानी कतई सहमत नहीं हैं उनका यह मानना है कि एच.आई.वी. और एड्स से भी खतरनाक कैंसर और हाट-डिजीज होता है और एड्स को लेकर पूरी दुनिया में जितना शोर मचाया जा रहा है उतने तो इसके मरीज भी नहीं है फिर भी आज दुनिया भर के स्वास्थ्य के एजेंडे में एड्स मुख्य मुद्दा बना हुआ है और इसकी रोकथाम के लिए करांेडों डालर की धनराशि को पानी की तरह बहाया जा रहा है यही नहीं अब तो अधिकांश गैरसरकारी संगठन भी जन सेवा के अन्य कार्यक्रमों को छोड़कर एड्स नियत्रंण अभियानों को चलाने में रूचि दिखा रहे है। क्योंकि इसके लिए उनको आसानी से अनुदान
मिल जाता है और इससे नाम और पैसा आराम से कमाया जा सकता है कुछ वैज्ञानिकों का तो यह भी मानना है कि एच.आई.वी. -एड्स के हौवे की आड़ में कंडोम बनाने वाली कम्पनियाँ भारी मुनाफा कमाने के लिए ही इन अभियानों को हवा दे रही हैं तभी तो एड्स से बचाव के लिए सुरक्षित यौन संबंधों की सलाह तो खूब दी जाती है, पर संयम रखने या व्यभिचार करने की बात बिल्कुल नहीं की जाती है यानि कि खूब यौनाचार करो पर कंडोम के साथ
पर कहने का मतलब यह नहीं है कि एड्स की भयावहता के खिलाफ लोगों केा जागरूक किया जाए एच.आई.वी.-एड्स वाकई एक गंभीर बीमारी है और इसकी रोकथाम के लिए जन-जागरण अभियान जरूर चलाया जाना चाहिए, पर अन्य जानलेवा बीमारियों की कीमत पर कतई नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि थोड़े से प्रयासों एवं प्रयत्नों से ही हार्ट-डिजीज, डायबिटीज, डेंगू और कैंसर से होने वाली मौतों में 50से 60 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है
भारत में एच.आई.वी.-एड्स के क्षेत्र में काम कर रही बिल गेट्स की संस्थादि इडिंया एड्स इनीशिएटिव आँफ बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउडेशनके अनुसार अभी भी भारत में, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में सेक्स, कण्डोम, एड्स के बारे में बात करने पर आज भी लोग काफी हिचकिचाहट महसूस करते हैं यहाँ तक कि इस सम्बन्ध में टेलीविजन पर अगर कोई विज्ञापन भी प्रसारित हेाता है तो देखने वाले चैनल बदल देते हैं फिर प्रश्न उठता है कि एड्स निवारण के नाम पर जो करोड़ो का फंड आता हे वो जाता कहॉं है ? क्योंकि तो इसके ज्यााद मरीज हैं, और जो मरीज हैं भी उन्हें भी सुनिश्चित दवा और सहायता उपलब्ध नहीं कराई जाती वित्तीय अनियमितता अपने चरम पर है एड्स नियत्रंण कार्यक्रम सिर्फ नोट कमाने का जरिया बनकर रह गये है वहीं एड्स की कीमत पर अन्य बीमारियों के लिए सरकार समुचित फंड और सुविधायें उपलब्ध नहीं करा पा रही है
   लेखक
शशांक द्विवेदी
 (स्वतंत्र टिप्पणीकार)
(सदस्य, अखिल भारतीय स्वतंत्र लेखक मंच,नई दिल्ली)
 (पिछले 10 वर्षों से देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन)


शिक्षा के बाजारीकरण का सरकारी प्रयास


गुणवत्तापूर्ण अभियांत्रिकी शिक्षा की आवश्यकता
अभियांत्रिकी शिक्षा के मौजूदा सत्र में इस बार पूरे देश में  काफी बड़े पैमाने पर सीटे खाली रह गई | अकेले राजस्थान में १७००० सीटे खाली रह गई जबकि उत्तर प्रदेश में यह आकड़ा ७०००० का है | यह पहली बार हो रहा है की एक तरफ तो सरकार उच्च शिक्षा के बाजारीकरण पर जुटी है वही दूसरी तरफ लोगो का रुझान इस तरफ कम हो रहा है| जबकि देश की उन्नति और विकास के लिए अभियांत्रिकी शिक्षा का ढांचा और मजबूत होना चाहिए पर सरकार सिर्फ इसे व्यावसाईक  बनाने में जुटी हुई है |
आज देश में बिना किसी गुणवत्तापूर्ण  शिक्षा की गारंटी के लगातार कॉलेज खुल रहे है | लोगो को यह एक अच्छा व्यवसाय नजर आने लगा है | पिछले दिनों  इस पर योजना आयोग ने  अपना ताजा दृष्टिकोण-पत्र जारी कर दिया है| आयोग चाहता है ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना के लिए अनुमति दे दी जानी चाहिए, जिनका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो। दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक 1 अप्रैल 2012 से शुरू हो रही 12वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा, खासकर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाने की जरूरत है। अभी इस दृष्टिकोण-पत्र पर सरकार की मुहर नहीं लगी है, इसके बावजूद यह सुझाव पिछले वर्षो के दौरान उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में चली चर्चा के अनुरूप ही है। विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखा खोलने की इजाजत के साथ भी यह बात जुड़ी हुई है कि वे सिर्फ मुनाफे की संभावना दिखने पर ही यहां आएंगे। 
व्यापारीकरण, व्यवसायीकरण तथा निजीकरण ने शिक्षा क्षेत्र को अपनी जकड़ में ले लिया है। मण्डी में शिक्षा क्रय-विक्रय की वस्तु बनती जा रही है। इसे बाजार में निश्चित शुल्क से अधिक धन  देकर खरीदा जा सकता है। परिणामत: शिक्षा में एक भिन्न प्रकार की जाति प्रथा जन्म ले रही है जो धन के आधार पर आई.आई.टी, एम.बी.ए., सी.ए. एम.बी.बी.एस आदि उपाधियों के लिये प्रवेश पा कर उच्च भावना से ग्रस्त ओैर धनाभाव के कारण प्रवेश से वंचित हीनभावना से ग्रस्त रहते है। दोनो ही श्रेणियों के छात्र ग्रस्त है। असमानता की खाई बढ़ रही है। सामाजिक असंतुलन और विषमता इस का ही परिणाम है।
दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली का ही परिणाम है की शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था एवं शिक्षकों का एकमात्र उद्देश्य व्यावसाईक हितों के अनुरूप शिक्षा का बाजारीकरण करना हो गया है वही शिक्षा को ग्रहण करने वाले शिक्षार्थी का एकमात्र लक्ष्य शिक्षा को ग्रहण कर अधिक अधिक से नंबर लाकर अधिक से अधिक ऊँचे वेतन वाले ऊँचे पदों को प्राप्त करना मात्र रह गया है । फलस्वरूप व्यावसाईक एवं स्वार्थपरक व्यक्तित्व युक्ता युवा पीढ़ी का निर्माण हो रहा है । जो अधिक से अधिक भौतिक सुखों और सुविधाओं को प्राप्त करने हेतु भ्रष्ट्राचार , अनैतिक एवं अवैधानिक तरीकों और रास्तों को अपनी जीवन शैली तरजीह दे रहे हैं ।
आज से कई दशक पहले गाँधी जी ने कहा था की देश की समग्र उन्नति और आर्थिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा का गुणवत्ता पूर्ण होना बहुत जरुरी है उन्होंने इसको प्रभावी बनाने के  लिए कहा था  की कॉलेज में हाफ-हाफ सिस्टम होना चाहिए मतलब की आधे समय में किताबी ज्ञान दिया जाये और आधे समय में उसी ज्ञान का व्यावहारिक पक्ष बताकर उसका प्रयोग सामान्य जिन्दगी में कराया जाये | भारत में तो गाँधी जी की बाते ज्यादा सुनी नहीं गई पर चीन ने उनके इस प्रयोग को पूरी तरह से अपनाया |और आज स्तिथि यह है की चीन  उतपादन की दृष्टि में चीन भारत से बहुत आगे है ,भारतीय बाजार चीनी सामानों से भरे पड़े है|दिवाली ,रक्षाबंधन हमारे देश के प्रमुख त्यौहार है पर आज बाजार में सबसे ज्यादा पटाखे और राखिया चीन की ही बनी हुई मिलती है |
वास्तव में हम अपने ज्ञान को बहुत ज्यादा व्यावहारिक नहीं बना पाए है | नंबरों होड़ युक्त शिक्षा प्रणाली में  तो बस ग्रहण किये गया ज्ञान के आंकलन हेतु , रटे गए ज्ञान का लिखित परीक्षायों के माध्यम से मूल्याङ्कन से होता है । और इस तरह की मूल्यांकन और परीक्षा प्रणाली बच्चों को तनावग्रस्त करती है और वांछित सफलता न मिलने पर खुद को नुक्सान पहुचाने वाले अप्रिय कदम उठाने हेतु बाध्य करती है ।
आज देश में हजारो की संख्या में इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए है और लगातार खुल भी रहे है पर क्या इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी दे जा सकती है |यही वजह है आज लोगो का रुझान अभियांत्रिकी की तरफ कम होने लगा है और इन कॉलेज में सीटे  खाली रहने लगी है | जबकि देश के विकास के लिए हमें अधिक से अधिक योग्य इंजिनियर चाहिए ,आज चीन और जर्मनी में 80-80, कोरिया में 95, ऑस्ट्रेलिया में 70, ब्रिटेन में 60 फीसदी युवक तकनीकी शिक्षा से लैस हैं, जबकि भारत में तकनीकी शिक्षा पाने वाले नौजवानों का प्रतिशत महज 4.8 फीसदी है। देश की आबादी में प्रतिवर्ष 2.8 करोड़ युवा जुड़ जाते हैं तथा 1.28 करोड़ युवकों की लेबर फोर्स में एंट्री होती है, लेकिन इनमें से सिर्फ 25 लाख ट्रेंड होते हैं, जबकि मौजूदा अर्थव्यवस्था में जो रोजगार पैदा हो रहे हैं, उनमें 90 फीसदी ऐसे रोजगार हैं जिसमें तकनीकी शिक्षा की जरूरत होती है।
सरकार तकनीकी  शिक्षा प्रणाली में बदलाव के लिए जो  कदम उठा रही हैं। मसलन प्रवेश परीक्षाओं से लेकर सिलेबस तक में जो बदलाव किए जा रहे हैं। इन सबका एक ही मकसद है कि कैसे भारत  दुनिया के बाजार के लिए पेशेवर लोगों की फौज तैयार की जाए। इसके जरिये हम अपनी समस्याओं को नहीं तलाश रहे हैं बल्कि दुनिया के लिए प्रशिक्षित नौकर तैयार कर रहे हैं|सरकार को इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि उसके कदमों से देश का या देश की जनता का क्या फायदा होने वाला है। इस कदम से होगा क्या? इंजीनियरिंग और मेडिकल के असली ज्ञान का विकास हमारे नौजवान नहीं कर पाएंगे। बल्कि यह कार्य करेंगे पश्चिम मुल्क। जबकि हमारे नौजवान सिर्फ तकनीकी डिग्रियां हासिल कर वैश्विक बाजार में दोयम दर्जे की नौकरी कर रहे होंगे। इस पहल से तकनीकी ज्ञान की सस्ती फौज ही हम तैयार कर पाएंगे। तकनीकी क्षेत्र में नया कुछ नहीं कर पाएंगे। हां, हमारे नौजवानों को नौकरी मिल जाएगी और और इस सस्ती फौज की बदौलत दुनिया मुनाफा कमाएगी। इसलिए ऐसे प्रस्ताव से सिर्फ विदेशी कंपनियों को फायदा होगा क्योंकि उन्हें देश-विदेश में सस्ते में भारतीय पेशेवर मिलेंगे।
आज जरुरत है ऐसे तकनीकी ज्ञान की जो वास्तविकता की धरातल पर हो  साथ में व्यावहारिक भी हो जिससे हम  उसे अपने देश की परिस्थितियों के हिसाब से प्रयोग कर सके | देश के नौजवानों में इसे सिर्फ डिग्री लेने तक ही सीमित न रख पाए बल्कि उनके अन्दर इसे लेकर एक उत्साह हो ,समझ हो ,विश्वास हो कुछ सकारात्मक कर पाने के लिए |

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इरोम शर्मिला चानू पर विशेष


कब नींद टूटेगी सरकार की ?
कब टूटेगा इरोम शर्मिला का अनशन ?
इस संघर्ष का अंत कब होगा ?
इस समय देश में राजनीतिक उपवास ,यात्राओ ,रथयात्राओ आदि का दौर चल रहा है | ये सब मीडिया  में चर्चा का विषय बना  हुआ है  ,अधिकांश टीवी चैनलों पर इसी से जुडी हुई खबरे, परिचर्चा  दिखाई जा रही है | इन सब पर खूब राजनीती और जनता के पैसे का दुरूपयोग भी हो रहा है | पर इन सब के बीच उस ३९ साल की बहादुर लड़की इरोम शर्मीला पर किसी भी न्यूज़ चैनल की नजर नहीं जा रही जो पिछले १० सालो से उपवास पर है ,वो भी अपने लिए नहीं बल्कि अपने देश के नागरिको की सुरक्षा के लिए |
इरोम शर्मिला, मणिपुर की 39 वर्षीया बहादुर बेटी,मानवाधिकार कार्यकर्ता और कवयित्री,पिछले १०  साल से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून जैसी जनविरोधी नीति के खिलाफ अनशन पर बैठी है| केवल हंगामा खड़ा करने के लिए नहीं, सूरत बदलने के लिए | पर  पिछले १०  सालों में कुछ भी नहीं बदला ,सरकार को न तो इरोम से कोई हमदर्दी है न ही उसके अहिसंक अनशन पर गंभीरता | उसका आन्दोलन भी अहिंसक और सत्याग्रही ही है| लेकिन उसके साथ कोई ''टीम शर्मिला'' नहीं है और ना ही कोई ''सिविल सोसायटी''| मीडिया को न मणिपुर से कुछ मिलने वाला है न इरोम शर्मिला के इस आन्दोलन से,सो वह भी दूर-दूर है | अन्ना हजारे के 12 दिन के अनशन ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया |सरकार भी जनांदोलन के इस दबाव में झुक गई| अन्ना के अनशन में लाखो लोग शामिल हुए मीडिया से लेकर बॉलिवुड तक इस हॉट मामले से दूर नहीं रहे| पल-पल की खबर टीवी पर सुबह से शाम तक दिखाई जा रही थी| लेकिन इसी दौरान सबकी आंखों और खबरों से वह इंसान क्यूं दूर रह गई जिसने पिछले १०  से भी ज्यादा सालों से अनशन किया हुआ है| पर इतने लम्बे अनशन के बाद भी मणिपुर की आयरन लेडी इरोम चानू शर्मिला के हौसले आज भी बुलंद हैं|
भारत के पूर्वोत्तर में पचास के दशक से चले आ रहे कई पृथक्तावादी आंदोलनों की चुनौती से निपटने के लिए उस इलाके में सरकार ने सशस्त्रबल विशेषाधिकार कानून लागू किया है, जिसके तहत सेना की कार्रवाई किसी भी कानूनी जाँच परख के परे है। इरोम 2 नवंबर, 2000 से  मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट, 1958, जिसे सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून  भी कहा जाता है, को हटाए जाने की मांग पर अनशन करने के लिए बैठी हुई हैं| इस एक्ट के तहत मणिपुर में तैनात सैन्य बलों को यह अधिकार प्राप्त है कि उपद्रव के अंदेशे पर वे किसी को भी जान से मार दें और इसके लिए किसी अदालत में उन्हें सफाई भी नहीं देनी पड़ती है| साथ ही सेना को बिना वॉरंट के गिरफ़्तारी और तलाशी की छूट भी है| 1956 में नगा विद्रोहियों से निबटने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा पहली बार सेना भेजी गई थी| तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने संसद में बयान दिया था कि सेना का इस्तेमाल अस्थाई है तथा छह महीने के अन्दर सेना वहां से वापस बुला ली जाएगी| पर वास्तविकता इसके ठीक उलट है| सेना समूचे पूर्वोत्तर भारत के चप्पे-चप्पे में पहुंच गई| 1958 में ‘आफ्सपा’ लागू हुआ और 1972 में पूरे पूर्वोत्तर राज्यों में इसका विस्तार कर दिया गया| 1990 में जम्मू और कश्मीर भी इस कानून के दायरे में आ गया | आरोप है कि इसकी आड़ में वहां उपस्थित सेना ने कई हत्याएं और बलात्कार जैसे अपराधों को अंजाम दिया है| जरा-सा भी शक होने पर बिना कार्यवाही किए नागरिकों को मार दिए जाने के कई केस सामने आए पर हमेशा इस एक्ट ने सैनिकों को बचा लिया|
पिछले साल भारत के के गृहसचिव जीके पिल्लै ने कहा था की  मणिपुर की आंदोलनकारी इरोम शर्मिला की एक दशक से भी ज्यादा समय से चल रही भूख हड़ताल सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण है।
शर्मिला का कहना है कि वह देश के दूर-दराज क्षेत्र की साधारण समाजसेवी है, इसलिए १०  सालों से भूख हड़ताल पर बैठी होने के बावजूद सरकार उसकी मांग पर ध्यान नहीं दे रही है| मगर अब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि इस कानून में कुछ सुधार किया जाये| चिदंबरम के अनुसार वह  एक साल से इसमें संशोधन के लिए प्रयासरत  हैं, मगर मंत्रिमंडल में सहमति नहीं बन पाई है| इस कानून के दुरुपयोग की शिकायतों के बीच 2004 में एक आयोग का गठन किया गया था, लेकिन उसकी सिफारिशें लागू नहीं की गर्इं| पर अब गृह मंत्रालय चाहता है कि बिना वारंट घर की तलाशी का प्रावधान खत्म हो और किसी नागरिक की जान लेने का अधिकार भी इसे न हो| इसके अलावा कानून के दुरुपयोग के खिलाफ शिकायत की व्यवस्था हो, जो नागरिक सरकार के हाथ में हो | पर वास्तविकता यह है की सरकार इसको लेकर गंभीर नहीं है | सरकार अगर इस मुद्दे पर गंभीर होती तो यह असंभव था कि इक महिला १०  साल से आमरण अनशन पर है और उसे जबरन जिन्दा रखा जा रहा है |हर एक साल बाद उसे सांकेतिक तौर पर छोड़ा जाता है फिर उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है |
इस एक्ट के  विरोध में कश्मीर से लेकर पूरे पूर्वोत्तर राज्यों में आवाज उठी है पर यह भी सच है कि इस एक्ट के बिना इन राज्यों की हालत बहुत गंभीर हो सकती है| सीमा पर होने और मुख्य धारा से अलग होने की वजह से चीन और पाकिस्तान जैसे देश हमेशा इन राज्यों पर पकड़ बनाने के लिए नजर बनाए रखते हैं| अगर यहां से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून हटा दिया गया तो हो सकता है यह राज्य देश से अलग हो जाएं और आतंकवादी यहां अपना गढ़ बना लें|पर इस मुद्दे का समाधान तो करना ही पड़ेगा वरना यह राज्य कब तक सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून की आड़ में सेना का शोषण सहेंगे| आज एक इरोम खड़ी हैं कल को हो सकता है कई सौ इरोम  हो जाएं|
इरोम पिछले १० साल से अनशन पर है  लेकिन मीडिया उसकी तरफ ठीक से देख भी नहीं रहा है| ये मीडिया की ही ताकत थी की अन्ना हजारे का आन्दोलन सफल रहा| मीडिया को भी उत्तर पूर्व के लोगो की भावनाओ को समझकर अब उनकी समस्याओ को देश के सामने रखना चाहिए |
इरोम चानू अभी तक अपने मकसद में कामयाब तो नहीं हो पाई हैं लेकिन उन्होंने दो वर्ल्ड रिकॉर्ड जरूर बनाए हैं| पहला सबसे अधिक दिनों तक भूख हड़ताल करने का और दूसरा सबसे ज्यादा बार जेल जाकर रिहा होने का| इस कानून को वापस लेने की मांग के चलते शर्मिला को कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हो चुके हैं और विभिन्न सामाजिक संगठनों तथा नेताओं ने उन्हें समर्थन दिया है| इरोम के विचारों से अनेक लोग मतभेद रख सकते हैं, परंतु उन्होंने विरोध का जो तरीक़ा अपनाया है वह वास्तव में किसी आदर्श से कम नहीं है।
शशांक द्विवेदी
(स्वतंत्र लेखक और पत्रकार )