Tuesday, January 17, 2012

कब सुलझेगा काले धन का मुद्दा



कब सुलझेगा काले धन का मुद्दा
काला धन एक बड़ी चुनौती
काले धन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है इसकी दो प्रमुख वजह है एक तो पिछले दिनों  अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने चेतावनी दी है कि भारत को मनी लॉन्डरिंग यानी काले धन को वैध बनाने और चरमपंथियों को आर्थिक सहायता का ख़तरा सबसे बड़ी चुनौती है । दूसरी यह कि देश में काले धन पर आवाज उठाने वाले और आंदोलन करने वाले बाबा रामदेव पर दिल्ल्ली में स्याही फेक दी गयी तब से लगातार इस पर राजनीतिक बयानबाजियो का दौर जारी है । कौन सही है कौन गलत है यह तो जाँच का विषय है लेकिन विरोध का यह तरीका ठीक नहीं है । लेकिन व्यक्ति विशेष को छोड़कर काले धन के मुद्दे पर ध्यान दे तो पता चलता है अभी तक इस विषय में सरकार द्वारा कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया । संसद के शीतकालीन सत्र में भी इस विषय पर संसद में चर्चा हुई लेकिन इसका कोई भी सार्थक नतीजा नहीं निकला जबकि यह देश के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दा है ।  
आईएमएफ़ की रिपोर्ट में कहा गया है, एशिया की उभरती आर्थिक ताकत के रूप में भारत अहम है लेकिन उसे मनी लॉन्डरिंग और चरमपंथियों तक आर्थिक सहायता पहुँचने का ख़तरा एक बड़ी चुनौती है। इसमें कहा गया है कि भारत में मनी लॉन्डरिंग देश और देश के बाहर की ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों का नतीजा हैं। आईएमएफ़ का मानना है कि भारत चरमपंथियों का निशाना पहले भी बना है और आगे भी उनके निशाने पर रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार चरमपंथियों को विभिन्न स्रोतों से धन पहुँचने का ख़तरा है। इसमें भारत के अंदर और बाहर ग़ैरक़ानूनी गतिविधियाँ, मादक पदार्थों का कारोबार, धोखाधड़ी, संगठित अपराध, मानव तस्करी, भ्रष्टाचार, नकली धन और अवैध धन वसूली जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।
भ्रष्टाचार देश की जड़ों को खोखला कर रहा है। भ्रष्टाचार के अनेक रूप हैं लेकिन काला धन इसका सबसे भयावह चेहरा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी के अनुसार भारत के लोगों का लगभग 20 लाख 85 हजार करोड़ रूपए विदेशी बैंकों में जमा है। देश में काले धन की समानांतर व्यवस्था चल रही है। चूंकि इस धन पर टैक्स प्राप्त नहीं होता है इसलिए सरकार अप्रत्यक्ष कर में बढ़ोतरी करती है, जिसके चलते नागरिकों पर महंगाई समेत तमाम तरह के बोझ पड़ते हैं।
अपनी कमाई के बारे में वास्तविक विवरण न देकर तथा कर की चोरी कर जो धन अर्जित किया जाता है, वह काला धन कहा जाता है। विदेशी बैंकों में यह धन जमा करने वाले लोगों में देश के बड़े-बड़े नेता, प्रशासनिक अधिकारी और उद्योगपति शामिल हैं। विदेशी बैंकों में भारत का कितना काला धन जमा है, इस बात के अभी तक कोई अधिकारिक आंकड़े सरकार के पास मौजूद नहीं हैं लेकिन स्विटजरलैंड के स्विस बैंक में खाता खोलने के लिए न्यूनतम जमा राशि 50 करोड़ रुपये बताई जाती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जमाधन की राशि कितनी विशाल होगी। स्विस राजदूत ने माना है कि भारत से काफी पैसा स्विस बैंकों में आ रहा है। कुछ महीनों पहले स्विस बैंक एसोसिएशन ने भी यह कहा था कि गोपनीय खातों में भारत के लोगों की 1456 अरब डॉलर की राशि जमा है।
पिछले दिनों विदेशों में जमा काले धन का मुद्दा और गर्मा गया जब स्विस बैंकर और ह्निसल्ब्लोअर रुडोल्फ एल्मर ने स्विस कानूनों को तोड़ते हुए स्विटजरलैंड की बैंकों में खुले 2000 खातों ें की जानकारी की सीडी विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे को दे दी। इस सीडी में स्विटजरलैंड की बैंकों में खाता रखने वाले अमेरिकाए ब्रिटेन और एशिया के नेताओं और उद्योगपतियों के नाम हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने विदेशों में जमा काले धन के मामले को जोर शोर से उठाया था और इसे चुनावी मुद्दा बनाया था। उस दौरान प्रधानमंत्री ने भी इसका समर्थन करते हुए प्रचार अभियान में वादा किया था कि सत्ता में आने के 100 दिनों के भीतर वे इस दिशा में ठोस कार्रवाई करेंगे लेकिन वह अपने वायदों से दूर भाग रहे हैं।
पिछले दिनों सर्वाेच्च न्यायालय ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन पर चिंता जताई। प्रख्यात वकील श्री राम जेठमालानी द्वारा दायर एक याचिका पर सर्वाेच्च न्यायालय ने कहा कि विदेशों में जमा काला धन केवल टैक्स की चोरी मात्र नही है, यह गंभीर अपराध, चोरी और देश की लूट का मामला है। न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एसएस निज्जर वाली पीठ ने यह कड़ी टिप्पणी की। काले धन का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने में किया जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने भी इस ओर इशारा किया है कि विदेशों में जमा काला धन ही आतंकियों को वित्तीय मदद के रूप में भारत में आता है
काले धन पर यूपीए सरकार के ढुलमुल रवैये से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार भ्रष्टाचारियों के साथ है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 30 जुलाई 2009 को राज्यसभा में बताया था कि विदेशी बैंकों से काले धन को वापस देश में लाने के लिए सरकार कदम उठा चुकी है। प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी सदन में वित्त विधेयक पर वित्त मंत्री के बयान पर खुद दी गई थी। प्रधानमंत्री ने देश को आश्वस्त किया था कि स्विस बैंकों में जमा एक लाख करोड़ रुपये के भारतीय काले धन को सत्ता संभालने के 100 दिन में वापस देश में ले आएंगे। लेकिन ये धन आज तक नही आया ।
वहीं दूसरी ओर, विदेशी बैंकों में जमा काले धन के बारे में सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा कड़ा रुख अपनाए जाने पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि काले धन को तुरंत वापस लाना आसान नहीं है और इस संबंध में मिली जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। जहां प्रधानमंत्री विदेशी बैंकों में भारतीय खाताधारकों के नाम बताने से इनकार कर रहे हैं वहीं कांग्रेस महासचिव श्री राहुल गांधी कह रहे हैं कि काला धन रखने वालों पर मामला दर्ज होना चाहिए। यह बयान केवल एक मजाक है। क्योंकि उन्हें बयान जारी करने की बजाए ठोस पहल प्रारंभ करनी चाहिए।
अभी तक विदेशी बैंकों में जमा काले धन को भारत वापस लाने के लिए हमारे पास ठोस कानून नहीं है। इसलिए इस दिशा में ठोस कानून बनाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही काले धन के मुद्दे पर राष्ट्रीय आम सहमति बनाने का प्रयास हो तथा विदेशों में भारतीय नागरिकों द्वारा जमा किए गए काले धन को वापस लाने के लिए सरकार प्रबल इच्छाशक्ति का परिचय दे। काले धन की वापसी से भारत की अर्थव्यवस्था का कायापलट हो सकता है। अगर ये काला धन देश की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ दिया जाए तो स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, बिजली आदि बुनियादी आवश्यकताओं को सहज ही पूरा किया जा सकता है।
लेखक 
शशांक द्विवेदी 


उम्मीदों का साल !!


आम आदमी की उम्मीदों का साल !!
नए साल में एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत का संकल्प लिया है और मजबूत लोकपाल बिल पास कराने की वकालत की है । बीते साल अगर उनके वक्तव्यों और वादों पर गौर करे तो पता चलता है उन्होंने देश की आम जनता से सिर्फ वादे किये है,सपने दिखाए है पर उनको पूरा करने के लिए वास्तविक धरातल पर कुछ नहीं किया है । इसका एक सबसे बड़ा उदाहरण है कि पिछले साल अगस्त में जब अन्ना हजारे का अनशन प्रधानमंत्री और संसद की पहल पर तोडा गया था उस समय जिन तीन बातों पर  संसद ने  सिध्धान्ततः सहमति जताई थी मसलन  सिटीजंस चार्टर, निचले स्तर की नौकरशाही को लोकपाल के तहत रखना  और  राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना । उनमे से प्रस्तावित कमजोर लोकपाल में सिर्फ एक राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना को रखा गया है । जबकि इसका भी पुरजोर विरोध सरकार के सहयोगी दल कर रहे है ,अधिकांश क्षेत्रीय दल इसका विरोध कर रहे है जिसको देखते हुए यह भी पारित  लोकपाल बिल में रह पायेगा या नहीं इस पर भी संशय  है । कहने का मतलब यह कि सरकार जो वायदे आम आदमी से करती है ,उसको वह पूरा करे ये जरुरी नहीं है । उस समय अन्ना का अनशन तुडवाना सरकार की प्राथमिकता में था उसके लिए चाहे जो भी वायदे करने  पड़ते  ,सरकार ने किये  । यही वजह है कि आज देश के सामने प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार के विरुद्ध संकल्प की कोई विश्वसनीयता जनता में रही नहीं ।   
बीते साल २०११ में दो बड़ी घटनाये हुई .पहली यह कि अन्ना आन्दोलन के माध्यम से देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार पर  आम आदमी का आक्रोश कई दशको बाद सड़क पर आया ,उसकी उम्मीदें,उसका विश्वास जगा की अब इस देश में कुछ परिवर्तन  होगा । दूसरी घटना यह कि साल बीतते बीतते आम आदमी का विश्वास और उसकी उम्मीदे दोनों एक साथ टूट गए । इतना कमजोर लोकपाल बिल भी संसद में पारित नहीं हो सका । यूपीए गठबंधन के सहयोगी राजद के एक सांसद ने तो खुलेआम राज्यसभा में लोकपाल की प्रतिया फाड़ दी ।  सांसदों ने एक बार फिर से साबित कर दिया कि वास्तव में संसद ही सर्वाेच्च है ! सदन में आम आदमी एक बार फिर से हार गया.देश के राजनेता एक दूसरे की  पीठ थपथपा रहे है कि हमने लोकपाल बिल पास नहीं होने दिया । अन्ना हजारे का मुंबई अनशन टूटने पर ,जेल भरो आंदोलन स्थगित होने पर, उनकी हार मान  कर सरकार में बैठे लोगो में खुशी की लहर दौड गयी । वास्तव में आम आदमी के रूप में अन्ना को तो हारना ही था !! इस देश में आम आदमी कभी जीता है क्या ? आजादी के पहले भी और बाद में भी आम आदमी हमेशा हारा ही है , आगे भी कभी जीत पायेगा इसकी सम्भावना कम हीै । सत्ता के दलालो से तो गाँधी जी भी हार गए थे ,उनकी फोटो लगाकर वोट मांगने वाले ,उनकी बात करने ,पूजा करने वालो ने आज तक उनकी भी कोई बात नहीं मानी । महात्मा गाँधी को अपना आदर्श मानने वाली कांग्रेस के महासचिव बी के हरिप्रसाद जब अन्ना हजारे को दो कौड़ी का आदमी बोलते है ,बेनी प्रसाद वर्मा ,मनीष तिवारी ,दिग्विजय सिंह आदि नेता भी अन्ना पर तीखे शब्द बाण चलाते रहते है .सरकार के खिलाफ आंदोलन ,धरने और प्रदर्शन करने वाले अन्ना ,हरिप्रसाद की नजर में यदि दो कौड़ी के आदमी है ,तो इसका मतलब मान लिया जाना चाहिए कि कांग्रेस विरोध के इन तरीकों को जायज नहीं मानती । राजनेता पूरी तरह से अन्ना हजारे के प्रति दुष्प्रचार में लगे हुए है ,कोई कहता है कि वे भगोड़े सिपाही है ,तो कोई उनको अमेरिका का एजेंट बताता है .वास्तव में उनका कसूर सिर्फ इतना है उन्होंने देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सकारात्मक मुहिम छेड़ी और आम आदमी में एक विश्वास और जज्बा पैदा किया ।
बीते साल सरकार ने अपना पूरा जोर देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध हो रहे आंदोलनों को कुचलने ,निष्प्रभावी बनाने में लगा दिया .स्वामी रामदेव के अनशन पर रात में लाठीचार्ज फिर लगातार उन पर कार्यवाही । यही हाल टीम अन्ना के साथ हुआ ,पूरी टीम के एक एक सदस्य के पीछे देश का खुफिया विभाग लगा रहा ,सरकारी मशीनरी उनके खिलाफ काम करती रही । इन लोगो का कसूर सिर्फ इतना है कि इन्होने देश में फैले व्यापक भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन किया ।
काश देश की ये सरकारी मशीनरी भ्रष्ट नेताओ ,अधिकारियो के कारनामो को देश के सामने लाती । विदेशो में जमा काले धन  को लेकर भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया ,जबकि सर्वाेच्च न्यायालय ने कर अदायगी से बचने के लिए हसन अली सहित अन्य लोगों के विदेशी बैंकों में जमा काले धन के स्रोत का पता लगाने की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाने के लिए कई बार केंद्र सरकार को फटकार लगाई। देश के बाहर भेजे गए धन का पता लगाने के लिए अब तक कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया। आज की तारीख में भी हमारे पास पुराने तथ्य मौजूद हैं। पिछले दिनों कैग की रिपोर्ट के अनुसार देश के पूरे कर का  ८७ प्रतिशत कर चोरी  १२ लोगो ने की है । लेकिन अब उसे वसूला नहीं जा सकता । तो सवाल यह उठता है कि इस दिशा में पहले कदम क्यों नहीं उठाये गए । वास्तव में सरकार ने इन लोगो के धन के स्रोत का पता लगाने की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं की ।
लोकपाल बिल के एक बार फिर लटकने से देशवासियों में गहरी निराशा है ,पिछले ४३ सालो से किसी न किसी कारण यह टलता आ रहा है । सच बात तो यह है इसको लेकर कोई भी पार्टी संजीदा नहीं है ,सब लोग राजनीति कर रहे है । लोकपाल को पारित कराने की पूरी कवायद की अगर हम बात करें, तो कुल मिलाकर सभी ने मिलकर संसद और देश का समय खराब किया है। कोई भी सांसद अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं होने देना चाहता ,क्षेत्रीय दल नहीं चाहते कि राज्यों में लोकायुक्त बनाना जरुरी हो । कुल मिलाकर कोई भी पार्टी मजबूत लोकपाल नहीं चाहती । देश मे इतने बड़े पैमाने पर ऊपर से नीचे फैले भष्टाचार पर आम आदमी को राहत कब मिलेगी ?इस साधारण प्रश्न का जवाब हमारे ईमानदार कहे जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  जी के पास भी नहीं है । उन्होंने नए साल के संकल्प पर भ्रष्टाचार मुक्त भारत का संकल्प लिया है । पर देश को वो सही दशा और दिशा कैसे देगे उसका जवाब अभी भी उनके पास नहीं है । 
देश में आम आदमी के साथ अन्याय अपनी सीमाए लाँघ चुका है,राजनीति अपनी मर्यादा खोती जा रही है । ऐसे में देश के बुद्धिजीवी वर्ग को आगे आना चाहिए । आगे आने वाले चुनाव में सभी राजनीतिक दलों से स्पष्ट पूछना चाहिए कि आपने अब तक हमारे लिए क्या किया है । वास्तव में जिस दिन इस देश की जनता जागरूक हो जायेगी ये लोग हमें बेवकूफ नहीं बना पायेगे । देशवासियो को जाति ,धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर आगे आना ही होगा तभी इस देश में आम जनता की सुनी जायेगी ,राजनेता भी संजीदा होगे । जब तक आम आदमी जाति और धर्म की राजनीति में फस रहेगा । नेता लोग मनमानी करते रहेंगे ।     
अनशन स्थगित करने के बाद स्वास्थ्य कारणों से अब यह साफ हो गया है कि अन्ना हजारे विधानसभा चुनाव वाले पांच राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार नहीं करेंगे। यह एक अच्छा फैसला है ,इसको टीम अन्ना को भी मानना चाहिए क्योकि सिर्फ कांग्रेस के विरोध से कुछ हासिल नहीं होगा । उनकी मुहिम चुनावी चुनावी राजनीति ने नहीं उलझनी चाहिए । . 
चुनावी राजनीति के दंगल में राजनीतिक दलों को चित्त करना बहुत टेढ़ी खीर है उसके लिए जो संगठन, कौशल और रणनीति चाहिए वो शायद अभी अन्ना की टीम में नहीं है । ये एक बिल्कुल नए तरह का खेल है जिसके दाँव-पेंच समझना अभी इनके बस में नहीं है.इसलिए टीम अन्ना को अभी अधिक से अधिक आम जनता के बीच में जाना होगा ,उनको विश्वास में लेना होगा .साथ में हर फैसला सोच समझकर लेना होगा .फैसला लेने के बाद धैर्य दिखाना सबसे जरुरी है ।
वर्तमान  हालात में अन्ना हज़ारे और उनकी टीम द्वारा संचालित आंदोलन की प्रासंगिकता, उसके प्रभाव और आंदोलन के भविष्य को लेकर कई बातें की जाने लगी हैं। लेकिन हाल में ही एक निजी टीवी चौनल द्वारा कराये गए सर्वेक्षण के अनुसार अभी भी देश के ५२ प्रतिशत लोगो का विश्वास टीम अन्ना में बना हुआ है ,देश के आम आदमी की उम्मीदें अन्ना से जुडी हुई है इसलिए अब हर आंदोलन और अनशन को सजगता और धैर्य के साथ जनता को विश्वास में लेकर करना पड़ेगा क्योकि सत्ता से टकराना आसान नहीं है । इसमें देश के हर आम आदमी को अपना सकारात्मक योगदान देना होगा तभी भ्रष्टाचार मुक्त भारत का हमारा सपना पूरा होगा । देश के चिन्तनशील और अनुभवी लोगों के जाग्रत होने की जरूरत है। आवश्यकता इस बात की है कि देश के समझदार और संघर्षशील लोग खुले दिल व दिमाग से, इकट्ठा होकर एक मंच पर आएं। उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मुहिम को और आगे ले जाना चाहिए। इससे धीरे-धीरे देश की परिस्थितियां सुधरेंगी एवं भ्रष्टाचार के विरूद्ध मुहिम को सही दिशा व गति मिलेगी।
लेखक 
शशांक द्विवेदी 

Wednesday, January 11, 2012

एक नई पृथ्वी की खोज


एक नई पृथ्वी की खोज
इस ब्रह्माण्ड में जीवन के लिए सिर्फ हमारी पृथ्वी ही नहीं है बल्कि अब एक नई पृथ्वी की खोज कर ली गई है जहा पर जीवन संभव हो सकता है । अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के केप्लर मिशन ने एक ऐसे ग्रह का पता लगाया है जो शक्ल-सूरत से पृथ्वी से मिलता-जुलता है। यहां जमीन है और शायद पानी भी। इस ग्रह की परिस्थितियां जीवन के अनुकूल हैं और खास बात यह है कि यह ग्रह अपने सूरज जैसे तारे के जीवन -अनुकूल क्षेत्र में ही चक्कर काट रहा है। खगोल वैज्ञानिकों ने वैसे तो पिछले एक साल के दौरान हमारे सौरमंडल से बाहर अनेक नए ग्रहों का पता लगाया है और इनमे से कुछ ग्रहों को संभावित पृथ्वी के रूप में भी देखा गया है, लेकिन यह पहला मौका है जब किसी ग्रह में पृथ्वी जैसे गुण देखे गए हैं।
पिछले दिनों  अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सौरमंडल से बाहर पृथ्वी के समान और संभावित जीवन के लिए उपयुक्त वातावरण वाले केपलर 22बी नामक नए ग्रह की खोज की । नासा के अंतरिक्षविदों की टीम के अनुसार केपलर 22बी नामक इस नए ग्रह पर भविष्य में इंसानों का संभावित बसेरा हो सकता है । केप्लर 22बी ग्रह जिस तारे का चक्कर काट रहा है उसका नाम जी5 रखा गया है। यह लाइरा और साइग्नस तारामंडल में मौजूद है और पृथ्वी से लगभग 600 प्रकाश वर्ष दूर अपने सितारे के चारों ओर घूर्णन कर रहा केपलर-22बी हमारे ग्रह से 2 गुना 4 बड़ा है जिसके कारण इसे उन ग्रहों की श्रेणी में रखा गया है, जिन्हें सुपर-अर्थ कहा जाता है। यह ग्रह अपने सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने में 290 दिन का समय लेता है। अनुमान लगाया गया है कि सतह के निकट इस ग्रह का तापमान 72 डिग्री या 22 सेल्सियस होगा। हालांकि वैज्ञानिकों को यह जानकारी नहीं है कि यह ग्रह चटटानों से भरा है या यह गैस अथवा तरल अवस्था में है।. इस तारे का द्रव्यमान और अर्द्ध व्यास हमारे सूरज से कुछ कम है। इसकी वजह से इसकी चमक सूरज से 25 प्रतिशत कम है
जीवन की संभावना वाले पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज में एक कदम और आगे बढ़ते हुए नासा ने कहा है कि केपलर अंतरिक्ष दूरबीन ने हमारे सौर तंत्र से बाहर एक ऐसे ग्रह की मौजूदगी की पहली बार पुष्टि की है जिस पर जीवन हो सकता है।
केपलर 22बी नामक ग्रह पर एक साल 290 दिनों का होता है । इस ग्रह को सर्वप्रथम वर्ष 2009 में देखा गया था. नासा आमेस अनुसंधान केन्द्र में केपलर के प्रधान शोधकर्ता बिल बोरूची के अनुसार दो वर्षों के गहन अध्ययन के पश्चात यह निष्कर्ष निकाला गया कि केपलर-22बी पर जीवन हेतु सभी उपयुक्त परिस्थितियां हैं ।  किसी भी ग्रह पर जीवन की संभावना होने के लिए उसका अपने मुख्य तारे से उचित दूरी होना जरूरी है ताकि वह ना ही अत्यधिक गर्म या ठंडा हो ।
    
इस वर्ष की शुरूआत में फ्रांसीसी खगोलविदों ने पहली  बार एक ऐसे ग्रह के मिलने की पुष्टि की थी जिस पर जीवन के लिए आवश्यक सभी शर्तें मौजूद थी। लेकिन पहली बार 2009 में खोजा गया केपलर-22बी पहला ऐसा ग्रह है जिसकी पुष्टि अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी ने की है। पुष्टि करने का अर्थ है कि खगोलविदों ने इसे इसके सितारे के सामने से गुजरते हुए तीन बार देखा है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि खगोलविदों को यह जानकारी है कि जीवन वहां पाया जा रहा है। इसका अर्थ सिर्फ इतना भर है कि जीवन के पाये जाने के लिए वहां परिस्थितियां एकदम ठीक हैं। ऐसे ग्रह की दूरी सितारे से ठीक उतनी होती है, जितनी दूरी पर उस ग्रह में पानी पाया जा सके। इसके अलावा जीवन को धारण करने के लिए वहां सही तापमान और वातावरण भी होता है। उल्लेखनीय है कि केप्लर टेलीस्कोप 1,55,000 तारों की चमक पर निगरानी रखता है। जब पृथ्वी जैसे ग्रह चक्कर काटते हुए अपने तारे या सूरज के आगे से गुजरते हैं तो वे उसकी चमक को फीका कर देते हैं। केप्लर टेलीस्कोप तारे की चमक में आने वाले इस परिवर्तन को दर्ज कर लेता है और इस आधार पर खगोल वैज्ञानिक तारे के इर्दगिर्द ग्रह की उपस्थिति का अनुमान लगाते हैं।   
नासा आमेस अनुसंधान केन्द्र में केपलर के प्रधान शोधकर्ता बिल बोरूची ने कहा, केपलर-22बी के रूप में हमे एक ऐसा ग्रह मिल गया है जिस पर सभी उपयुक्त परिस्थितियां हैं। उन्होंने कल कहा कि हम आश्वस्त हैं कि इस ग्रह पर जीवन की तमाम परिस्थितियां हैं और अगर इस पर सतह मौजूद है, तो यहां का तापमान इसके अनुकूल होना चाहिए। नासा ने यह भी घोषणा की है कि केपलर दूरबीन ने ऐसे 1094 ग्रहों की खोज की है जिन पर जीवन हो सकता है। इससे पहले यह संख्या इसकी आधी थी। केपलर नासा का पहला ऐसा अभियान है जो हमारे जैसे सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा रहे ग्रहों की खोज कर रहा है और इस अभियान पर 60 अरब डालर खर्च किये जा रहे हैं।
नासा का मिशन कैप्लर
नासा ने स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर 2007 में लांच की थी और इसका मकसद था पृथ्वी से मिलते-जुलते ऐसे नए ग्रहों की, जहां जिंदगी मुमकिन हो सकती है।
नासा ने मिशन कैप्लर की अब तक की खोज की तमाम जानकारियां सार्वजनिक कर दी हैं। स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर ने पहली बार हमारी धरती जैसा एक नया ग्रह और अपने सितारे के हैबिटेट जोन में मौजूद एक ऐसा ग्रह खोज निकाला है, जहां पानी तरल अवस्था में ग्रह की सतह पर मौजूद हो सकता है। मिशन कैप्लर ने अपने सितारे की परिक्रमा करते 6 ग्रहों एक ऐसा नया सौरमंडल खोजा है जिसके 5 ग्रहों का आकार हमारी धरती के जैसा ही है। इस सौरमंडल की सूरज हमारे सूर्य के मुकाबले ठंडा है और सबसे खास बात तो ये कि धरती जैसे आकार वाले इसके सभी पांचों ग्रह अपने सितारे के हैबिटेट जोन में हैं। इस मिशन के सम्मान में नए सौरमंडल के सूरज का नाम कैप्लर-11 रखा गया है। कैप्लर-11 और इसका 6 ग्रहों से भरा-पूरा सौरमंडल हमसे 2000 प्रकाश वर्ष दूर है। हमारे सौरमंडल से बाहर अब तक इतना विशाल और इतना व्यवस्थित सौर-परिवार पहले कभी नहीं खोजा गया था।

इस नई खोज के बारे में बात करते वक्त मिशन कैप्लर से जुड़े सभी वैज्ञानिक अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं। 1,50,000 सितारों से आती रोशनी और उनके सामने से किसी ग्रह के गुजरने से मंद पड़ते प्रकाश को पकड़ने में स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर ने असाधारण कुशलता का परिचय दिया हैे। मिशन कैप्लर ने अभी जो खोजा है उससे हमें केवल नए ग्रह के आकार के बारे में पता चलता है, इससे हमें उस ग्रह के द्रव्यमान के बारे में कुछ पता नहीं चलता। यानि खोजे गए नए ग्रहों के घनत्व और वहां मौजूद तत्वों के बारे में हमें आमतौर पर कुछ भी पता नहीं चल पाता।
नासा के एडमिनिस्ट्रेटर चार्ल्स बोल्डेन बताते हैं कि मिशन कैप्लर ने नए ग्रहों को कल्पना की उड़ान से निकाल कर उन्हें एक हकीकत में बदल दिया है। मंगलवार 1 फरवरी 2011 को जारी किए गए नासा के डेटा के अनुसार अब हमारे सौरमंडल से बाहर खोजे जा चुके नए ग्रहों की तादाद बढ़कर 1,235 हो चुकी है। इनमें से 500 नए ग्रहों की पुष्टि तो ग्राउंड ऑब्जरवेटरीज कर चुकी हैं, बाकी की पुष्टि दुनिया भर में फैली ऑब्जरवेटरीज से की जानी बाकी है। मिशन कैप्लर ने जिन नए ग्रहों को खोजा है उनमें से 68 नए ग्रहों का आकार करीब-करीब पृथ्वी के बराबर है, 288 नए ग्रहों का आकार पृथ्वी से तीन से पांच गुना तक विशाल है, 662 नए ग्रह नेपच्यून जैसे हैं, 165 नए ग्रह हमारे बृहस्पति की तरह हैं और 19 नए ग्रहों का आकार हमारे सौरमंडल के सबसे विशाल ग्रह बृहस्पति से भी कहीं ज्यादा विशाल है।
54 नए ग्रह ऐसे हैं जो अपने-अपने सितारों के हैबिटेट जोन में हैं और इनमें से 5 ग्रह ऐसे हैं जिनका आकार हमारी धरती के बराबर है। हैबिटेट जोन में मौजूद शेष 49 नए ग्रहों में से कुछ सुपर-अर्थ साइज के हैं, तो कुछ हमारी धरती से दोगुने विशाल और कुछ तो बृहस्पति से भी विशाल हैं। मिशन कैप्लर से आई ये ताजा जानकारियां इस स्पेस ऑब्जरवेटरी के उन ऑब्जरवेशंस पर आधारित हैं जो 12 मई से 17 सितंबर 2009 के बीच किए गए थे। इस दौरान कैप्लर ने 1,56,000 सितारों का अध्ययन किया और इस तरह हमने नई पृथ्वी की तलाश में आसमान के सौवें हिस्से को छानने की पहली कोशिश की।

नासा के एम्स रिसर्च सेंटर, कैलीफोर्निया में काम कर रहे मिशन कैप्लर के मुख्य वैज्ञानिक निरीक्षक विलियम बोरुकी कहते हैं, “ हमने अपनी पहली कोशिश में ही आकाश के एक छोटे से हिस्से में इतने नए ग्रह ढूंढ़ निकाले, इससे पता चलता है कि हमारी आकाशगंगा में अनगिनत ग्रह अपने-अपने सितारों की परिक्रमा कर रहे हैं। हमने शून्य से शुरुआत करके पृथ्वी जैसे आकार वाले 68 नए ग्रह ढूंढ़ निकाले और शून्य से ही शुरुआत करके 54 ऐसे नए ग्रह खोज डाले हैं, जिनमें से कुछ की धरती पर शायद पानी अपने तरल स्वरूप में बहता हो।
नए सौरमंडल कैप्लर-11 के सभी 6 ग्रहों की पुष्टि दूसरी ऑब्जरवेटरीज से भी हो चुकी है और इन सबका परिक्रमा-पथ हमारे शुक्र के भी छोटा है। इस नए सौर-परिवार के पांच ग्रहों का परिक्रमा-मार्ग तो बुध से भी छोटा है। इसके अलावा एक दूसरा सितारा जिसके सामने से इसके ग्रह को गुजरता हुआ देखा गया है, वो है कैप्लर-9। सितारे कैप्लर-9 के भी तीन ऐसे ग्रहों का पता चला है जो इसकी परिक्रमा कर रहे हैं।
नासा की एम्स लैब में काम कर रही मिशन कैप्लर की साइंस टीम के सदस्य और प्लेनेटेरी साइंटिस्ट जैक लिसौर कहते हैं, “ कैप्लर-9 सौरमंडल की बनावट और इसका व्यवस्थित क्रम अदभुत है। इससे हमें ये पता चल सकेगा कि इसकी रचना कैसे हुई। सूरज कैप्लर-11 की परिक्रमा कर रहे सभी 6 ग्रह पथरीले भी हैं और गैसीय भी। शायद इनमें से कुछ पर पानी भी मौजूद हो। ये सभी नए ग्रह हमारे सौरमंडल से बाहर खोजे गए सबसे हल्के ग्रहों में से हैं।
अब तक तीन ग्रह
सौरमंडल के बाहर अब तक ऐसे तीन ग्रह खोजे जा चुके हैं जहां भविष्य की पीढिय़ों द्वारा कॉलोनी बनाना संभव हो सकता है। इन्हें एक्सो प्लेनेट्स के नाम से जाना जाता है। मई में फ्रेंच खगोलविदों ने ग्लीजर 581डी की पहचान की थी। यह पृथ्वी से काफी नजदीक करीब 20 प्रकाश वर्ष दूर है। इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान से छह गुना अधिक है। यह ग्रह छह ग्रहों के एक परिवार का हिस्सा है। अगस्त में स्विट्जरलैंड की एक टीम ने कहा कि  कि एचडी 85512बी नामक एक अन्य ग्रह पर भी जीवन की संभावना हो सकती है। यह पृथ्वी से 36 प्रकाश वर्ष दूर है। इसका द्रव्यमान पृथ्वी से 3.6 गुना है।
नई खोज से आशायें बढ़ी
नई खोज से खगोल वैज्ञानिकों के इस विश्वास को और बल मिला है कि हमारा ब्रह्माण्ड जीवन से सराबोर है। केप्लर 22बी खोजने वाली टीम के एक सदस्य एलन बॉस का कहना है कि केप्लर मिशन हमारी आकाशगंगा में मौजूद पृथ्वी जैसे जीने लायक ग्रहों की वास्तविक संख्या का पता लगाने के काफी नजदीक पहुंच गया है। इस बीच, यूनिवर्सिटी ऑफ प्युर्टाेरिको के खगोल वैज्ञानिकों ने अब तक खोजे गए 700 बाहरी ग्रहों का वर्गीकरण करना शुरू कर दिया है। इनमें ज्यादातर वर्ग हमारे बृहस्पति और नेपच्यून की तरह गैस-प्रधान हैं जो अपने तारे के बहुत समीप चक्कर काट रहे हैं लेकिन कुछ ग्रह ऐसे भी हैं जो जीवन-अनुकूल क्षेत्र में परिक्रमा कर रहे हैं। तारे से सही दूरी रखने वाले और सही आकार वाले ग्रह को ही जीवन के लिए उपयुक्त माना जा सकता है। नए वर्गीकरण के आधार पर वैज्ञानिकों ने 47 ऐसे बाहरी ग्रहों और बाहरी चंद्रमाओं की पहचान की है जो जीवन-अनुकूल हो सकते हैं। 700 बाहरी ग्रहों के अलावा केप्लर मिशन ने करीब एक हजार संभावित ग्रहों का पता लगाया है।
शशांक द्विवेदी  

वैज्ञानिक अनुसंधान पर उदासीनता


                          बातें नहीं ,क्रियान्न्वयन जरूरी
वैज्ञानिक अनुसंधान पर उदासीनता

पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस के 99 वें अधिवेशन में कहा की भारत विज्ञान और तकनीक के मामले में चीन से काफी पिछड़ा है। साथ में उन्होंने कहा कि वह देश में  वैज्ञानिक अनुसंधान पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का  एक फीसदी से बढ़ाकर दो फीसदी करना चाहते हैं । अब यहाँ पर सवाल  उनके चाहने पर नहीं बल्कि करने पर है ,पिछले कई सालो से हर बार भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में सरकार के कुछ लोग इस तरह की घोषणाएं करते है लेकिन बाद में वास्तविक धरातल पर वह क्रियान्वित नहीं हो पाता । देश में वैज्ञानिक अनुसंधान और शोधो की दशा अत्यंत दयनीय है । अगर ध्यान से देखे तो तकनीक के मामले में हम सिर्फ पश्चिम की नक़ल करते है ।आजादी के बाद भी आज तक ऐसा कोई बुनियादी ढांचा विकसित नहीं हो पाया जिससे देश में बड़े पैमाने पर अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जा सके । इस बात का प्रमाण हमें अपने समाज में मिल जायेगा जहाँ अधिकाशं युवा शोध और अनुसंधान के क्षेत्र में नहीं जाना चाहते,अगर वो जाना भी चाहते है तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों में जहाँ उनको ऊँचा पैकेज मिलता है।.विदेशी कम्पनियों इस तरह से आपने लाभ के लिए युवाओं के दिमाग का इस्तेमाल करती  ह।ै आज देश में यही तो हो रहा है कोई भी युवा आईआईटी, आईआईऍम में सिर्फ इसलिए जाना चाहता है जिससे उसको मोटा पैकेज मिले ,वो बड़ी कंपनियों में जा सके । सरकार के लिए ये सबसे बड़ा सवाल है कि इन संस्थानों से निकलने वाले अधिकांश ग्रेजुएट क्यों अनुसंधान और शोध की तरफ आकर्षित नहीं होते । जाहिर सी बात  इसकी सबसे बड़ी वजह आर्थिक सुरक्षा है,जो सरकार उपलब्ध करा नहीं सकती ।
देश में पढ़े हजारों उच्च शिक्षित काबिल वैज्ञानिक आज अपनी सेवाए विदेशो में दे रहे है ,उनके लिए जी जान से काम कर रहे है । ऐसा नहीं है कि इन लोगो को अपने देश से ,समाज से प्यार नहीं है बल्कि ये वो लोग है जिनको हमारा देश ,यहाँ की सरकारी मशीनरी लगभग नकार चुकि होती है । इन होनहार लोगो को सरकार अनुसंधान के लिए बुनियादी सुविधाए और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने में हमेशा नाकाम रहती है । डॉ हरगोविंद खुराना जैसे वैज्ञानिक को भी इस देश ने भुला दिया जिन्होंने विश्व को जीन के क्षेत्र में नयी दिशा दी.उनके जैसे व्यक्ति को भी हम अपने देश में काम नहीं दे सके ऐसे कई उदाहरण है जिन्होंने भारत के बाहर अपनी योग्यता और क्षमता का लोहा पूरे विश्व को मनवाया । ऐसे लोगो के युगांतकारी कामो के बाद ,प्रसिद्धि के बाद हम कहते है ये भारतीय मूल के है .लेकिन सच बात तो यह है कि अब उनकी सेवाए दूसरे देश ले रहे है ।
कभी दुनिया भर में होने वाले शोध कार्य में भारत का नौ फीसद योगदान था जो आज घटकर महज 2.3 फीसद रह गया है। सृजन के क्षेत्र में हमारी बढ़ती दरिद्रता का आलम क्या है इस पर भी एक नजर डालें। देश में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक (टेक्नोलॉजी) को लें तो तकरीबन पूरी टेक्नोलॉजी आयातित है। इनमें 50 फीसद तो बिना किसी बदलाव के ज्यों की त्यों इस्तेमाल होती है और 45 फीसद थोड़ा-बहुत हेर-फेर के साथ इस्तेमाल होती है। इस तरह विकसित तकनीक के लिए हमारी निर्भरता आयात पर है। कहा तो जा रहा है कि देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन ये प्रतिभा क्या केवल विदेशों में नौकरी या मजदूरी करने वाली हैं? दूसरे पहलू से भी इस बढ़ती दरिद्रता को देखने की जरूरत है। देश की जनसंख्या का मात्र 10-11 फीसद हिस्सा ही उच्च शिक्षा ले पाता है। इसके विपरीत जापान में 70-80 प्रतिशत, यूरोप में 45-50 कनाडा और अमेरिका में 80-90 फीसद लोग उच्च शिक्षा लेते हैं।
अमेरिका बुनियादी विज्ञान विषयों की प्रगति का पूरा ध्यान रखता है। उसकी नीति है कि वैज्ञानिक मजदूर तो वह भारत से लेगा, पर विज्ञान और टेक्नोलॉजी के ज्ञान पर कड़ा नियत्रंण रखेगा। चीन में भी शिक्षा का व्यावसायीकरण हुआ है, पर बुनियादी विज्ञान और टेक्नोलॉजी की प्रगति का उसने पूरा ध्यान रखा है। भारत को चीन से शिक्षा लेनी चाहिए। वर्ल्ड क्लासबनने के लिए बुनियादी विज्ञान का विकास जरूरी है।

दुनिया के कई छोटे देश तक वैज्ञानिक शोध के मामले में हमसे आगे निकल चुके हैं। सन् 1930 में सी. वी. रमन को उनकी खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, लेकिन रमन स्कैनर का विकास किया दूसरे देशों ने। यह हमारी नाकामी नहीं तो और क्या है. आज देश में प्रति 10 लाख भारतीयों पर मात्र 112 व्यक्ति ही वैज्ञानिक शोध में लगे हुए हैं।
दुनिया के ज्यादातर विकसित देश वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के लिए अपने रिसर्च फंड का 30 प्रतिशत तक यूनिवर्सिटीज को देते हैं, मगर अपने देश में यह प्रतिशत सिर्फ छह है। उस पर ज्यादातर यूनिवर्सिटीज के अंदरूनी हालात ऐसे हो गए हैं कि वहां शोध के लिए स्पेस काफी कम रह गया है। शोध के साथ ही पढ़ाई के मामले में भी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है, ताकि यूनिवर्सिटी सिर्फ डिग्री बांटने वाली दुकानें न बनकर रह जाएं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 99वें भारतीय विज्ञान कांग्रेस में जो  कहा उससे तो यही लगता है  कि वह देश में  विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र की समस्याओ से अच्छी तरह से अवगत है मसलन  आपूर्ति ,शोध और विकास कार्य पर काफी कम खर्च ,पिछले कुछ दशकों में विज्ञान के क्षेत्र में भारत की स्थिति में लगातार गिरावट आदि । लेकिन अब समय समस्याओं को ध्यान में रखकर ठोस और बुनियादी समाधान करने का है । इन बातों पर क्रियान्न्वयन कब होगा यह तो आगे आने वाला समय ही बताएगा ।
यह आर्यभट्ट, कणाद, ब्रह्मभट्ट, रामानुजन, भास्कर,जगदीश चंद्र बोस ,सी वी रमण  जैसे वैज्ञानिको  का देश है। अगर हमने अपनी समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा को पूरी शिद्दत और ईमानदारी के साथ आगे बढ़ाया होता तो विज्ञान के क्षेत्र में भारत दुनिया के शीर्ष पर होता। ऐसा नहीं है कि हमने उपलब्धियां हासिल नहीं की हैं, लेकिन हमारी योग्यता और क्षमता के लिहाज से हम इस मोर्चे पर अब भी काफी पीछे हैं। अब विज्ञान के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनानी ही होगी और देश में वैज्ञानिक शोध और आविष्कार का माहौल बनाना होगा।
शशांक द्विवेदी