Friday, April 20, 2012

मोटे होते ग्लेशियर


मोटे होते ग्लेशियर
पहले की तुलना में आज ये ग्लेशियर ज्यादा मोटे हो गए हैं। अभी तक सुनते आए हैं कि ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं ।
एशिया के कुछ ग्लेशियर मोटे हो चले हैं, खासकर कराकोरम की पहाड़ियों के। ग्लेशियर हमारे पेयजल के भंडार होते हैं। फ्रांस के वैज्ञानिकों ने उपग्रह के जरिए जो जानकारी एकत्रित की है, उससे ये सुखद संकेत मिले हैं। फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च तथा ग्रेनोबल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कराकोरम पहाड़ियों की सतह के उभार के दस साल के अंतराल में लिए गए चित्रों का जब तुलनात्मक अध्ययन किया, तो पाया कि पहले की तुलना में आज ये ग्लेशियर ज्यादा मोटे हो गए हैं। अभी तक हम यह सुनते आए हैं कि ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं अर्थात दुबले हो रहे हैं। ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। फलस्वरुप धरती के तटवर्ती इलाके जलमग्न हो जाएँगे। मालदीव और बांग्लादेश जैसे देश सबसे पहले चपेट में आएँगे क्योंकि वह सबसे निचली सतह पर हैं।

दरअसल वैज्ञानिकों की किस बात पर भरोसा करें? जलवायु परिवर्तन को लेकर २००७ में अंतर सरकारी पैनल ने तो यह कह दिया था कि हिमालय के कई इलाकों से २०३५ तक बर्फ नदारद हो जाएगी। बाद में इस भ्रमपूर्ण दावे के लिए वैज्ञानिकों को क्षमा भी माँगना पड़ी। सही बात तो यह है कि ग्लेशियरों पर वैज्ञानिक शोध-अध्ययन कम ही हुआ है। यह सच है कि औद्योगिक क्रांति के बाद से आज तक वातावरण में कार्बन उत्सर्जन बढ़ा है। पिछले सौ सालों के उपलब्ध रेकार्ड के अनुसार २० वीं सदी के अंतिम दस वर्ष सर्वाधिक गर्म वर्षों में शुमार थे। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ध्रुवीय बर्फ दूसरी बार अपने स्तर से काफी नीचे चली गई है। दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार देशों से बार-बार कहा जा रहा है कि वे अपनी कार गुजारियों पर लगाम कसें। मौसमी आपदाएँ संकेत दे रहीं हैं कि जलवायु परिवर्तन का दौर शुरू हो चुका है। अस्तित्व दांव पर लगा है और बाजी हाथ से निकली जा रही है। 
कनाडा के पास एल्समीयर द्वीप पर सदी से पहले तक ९ हजार वर्ग किमी क्षेत्र में फैली बर्फ सिमट कर वर्तमान में मात्र १ हजार वर्ग किमी रह गई है। म्यांमार में चक्रवात "नर्गिस" ८० हजार लोगों को लील चुका है। कैरेबियन सागर में हरीकेन करोड़ों की क्षति पहुँचा चुके हैं। भारत, बांग्लादेश बाढ़ का तांडव भुगत चुके हैं। मौसम के मिजाज बदलते जा रहे हैं। ठंड में गर्मी का अनुभव और जल स्त्रोतों का सिकु ड़ना या कभी वर्षा जैसे हालात बन जाना, फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। यही सिलसिला जारी रहा तो निर्बाध विकास की अवधारणा ध्वस्त हो जाएगी। विकासशील देशों की अर्थ व्यवस्था संकट में चली जाएगी। 

पिछले सौ सालों में धरती के औसत सतही तापमान में दशमलव ७४ डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है, जो शताब्दी के अंत तक डेढ़ से साढ़े चार डिग्री तक पहुँचेगा। यह स्पष्ट हो चुका है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए साठ प्रतिशत जिम्मेदार कार्बन डॉई ऑक्साइड है, जिसकी सांद्रता २९० प्रति दस लाख भाग से बढ़कर ३७०-३८० पीपीएम (पार्ट्‌स पर मिलियन) जा पहुँची है। अगर यही क्रम जारी रहा तो शताब्दी अंत तक यह ६००-७०० को पार कर जाएगी। करीब २५ करोड़ लोग पानी के लिए तरस जाएँगे और ३० प्रतिशत प्रजातियाँ विलुप्त हो जाएँगीं।
(साभार -नई दुनिया )


अलविदा डिस्कवरी

बीते मंगलवार की सुबह वाशिंगटन का ट्रैफिक थम गया। लोग टकटकी लगाए अंतरिक्ष यान डिस्कवरी को देखते रहे। दरअसल, इस पुराने यान को बोइंग 747 पर लादकर संग्रहालय में लाया जा रहा था। यकीनन, अमेरिकी गौरव के इस प्रतीक की यह उपयुक्त विदाई रही। कुछ साल पहले संयुक्त राज्य अमेरिका ने यह दावा किया था कि वह इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने में सक्षम है। ऐसे में, अंतरिक्ष यान के बेड़े ही वे प्राथमिक साधन थे, जिनके द्वारा इंसानों को अंतरिक्ष की कक्षाओं में भेजने का सिलसिला शुरू हुआ। इस दौरान बार-बार इस पर भी विचार-विमर्श किया गया कि यूएस एयरफोर्स का नाम बदलकर एयरोस्पेस फोर्स कर दिया जाए। लेकिन बीते जुलाई महीने में यह बहस समाप्त हो गई, जब अंतरिक्ष यान अटलांटिस ने अपना आखिरी मिशन पूरा किया। अब अगर किसी अमेरिकी को अंतरिक्ष में जाने की इच्छा होगी, तो वह दूसरे देशों के यात्रियों के साथ ही जा पाएंगे। और यह भी सच है कि ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड की वायुसेना खुद को एयरोस्पेस फोर्स बताती है। एक वक्त था, जब अंतरिक्ष कार्यक्रम अमेरिकी उपलब्धियों का प्रतीक था। यह युवा पीढ़ी के लिए गर्व व प्रेरणा का स्त्रोत था। लेकिन अब वे दिन लद गए हैं। 2011 के बजट में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नासा की नक्षत्र परियोजना को रद्द कर दिया। यहां तक कि पुराने अंतरिक्ष यान की जगह नए को लाने की इजाजत भी नहीं दी गई। वैसे व्हाइट हाउस की तरफ से अंतरिक्ष अन्वेषण और मंगल ग्रह पर अमेरिकियों को उतारने का भरोसा दिया जाता रहा। दो साल पहले ओबामा ने कहा था, ‘उम्मीद है कि 2030 तक हम मंगल पर कदम रख देंगे।’ लेकिन अपने हालिया बजट में उन्होंने मंगल मिशन से जुड़ी योजनाएं खत्म कर दीं। वहीं, चीन के कदम मंगल की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। खैर, हवा में शटल को चक्कर काटते देखकर वाशिंगटन के बाशिंदे खड़े के खड़े रह गए। कारें रुक गईं। लोग इमारतों से बाहर निकल आए। वे यान को देखकर खुशी के मारे चीखने-चिल्लाने लगे। कुछ लोग तो रोने भी लगे। जाहिर है, उनमें उत्तेजना थी, पर कुछ खोने का गम भी था।
द वाशिंगटन पोस्ट, अमेरिका

Thursday, April 19, 2012

शोध और अनुसंधान

हिन्दुस्तान लेख 


वैज्ञानिक अनुसंधान की जरूरत ही किसे है
शशांक द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर, सेंट मार्गरेट इंजीनियरिंग कॉलेज

इसमें कोई नई बात नहीं हुई। हमेशा की तरह इस बार भी विज्ञान कांग्रेस में चिंता का विषय यही रहा कि हमारे यहां विज्ञान पर शोध ज्यादा नहीं हो रहा है। चीन हमसे काफी आगे निकल गया है, वगैरह-वगैरह। यही बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्घाटन के समय कही और इसी की गूंज पूरे सम्मेलन में सुनाई देती रही। वैज्ञानिक शोध पर होने वाले खर्च को बढ़ाना, जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना, छात्रों को इसके लिए प्रोत्साहन देना, समाज में वैज्ञानिकों को महत्व दिया जाना, ये तमाम बातें इस संदर्भ में अक्सर कही जाती हैं, लेकिन बात कभी इससे आगे नहीं बढ़ती।
हमारे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान कम हो रहे हैं, इससे ज्यादा चिंता की बात है कि वे लगातार घटते जा रहे हैं। कभी दुनिया भर में होने वाले शोधकार्यों में भारत का नौ फीसदी योगदान था, आज यह घटकर महज 2.3 फीसदी रह गया है। यह भी सच है कि वैज्ञानिक अनुसंधान की जरूरत ही किसे महसूस हो रही है। देश में इस्तेमाल की जाने वाली ज्यादातर तकनीक पूरी तरह से आयातित है। इनमें 55 फीसदी तो बिना किसी बदलाव के ज्यों की त्यों इस्तेमाल होती है और 45 फीसदी थोड़ा-बहुत परिवर्तन के साथ इस्तेमाल होती है। विकसित तकनीक के लिए आयात पर निर्भरता के कारण उद्योग जगत की भी देसी अनुसंधानों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उद्योग जगत ऐसे अनुसंधानों में न तो कोई दिलचस्पी रखता है और न ही इसमें निवेश करना चाहता है। यही वजह है कि भारतीय प्रतिभाएं व वैज्ञानिक विदशों में जाकर शोध करना ही बेहतर मानते हैं।
जब हम वैज्ञानिक शोध की बात करते हैं, तो हमें एक नजर उच्च शिक्षा पर भी डाल लेनी चाहिए। देश की आबादी का मात्र 10-11 फीसदी हिस्सा ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाता है। इसके विपरीत जापान में 70-80 प्रतिशत, यूरोप में 45-50 फीसदी, कनाडा और अमेरिका में 80-90 प्रतिशत लोग उच्च शिक्षा लेते हैं। हमारे देश की हर 10 लाख आबादी पर सिर्फ 112 लोग वैज्ञानिक शोध में लगे हुए हैं। इस संख्या को बढ़ाने के लिए उच्च शिक्षा और उसकी गुणवत्ता को बढ़ाना सबसे जरूरी काम है। इसके अलावा दुनिया के ज्यादातर विकसित देश वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के लिए अपने रिसर्च फंड का 30 फीसदी तक हिस्सा विश्वविद्यालयों को देते हैं, मगर अपने देश में यह अंश सिर्फ छह प्रतिशत है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों के अंदरूनी हालात ऐसे हो गए हैं कि वहां शोध के लिए स्पेस काफी कम रह गया है। पिछले कुछ समय में शिक्षा पर हमने काफी काम किया है, लेकिन यह काम मूल रूप से व्यावसायिक शिक्षा तक ही सीमित है। आईआईटी जैसे संस्थानों की दुनिया भर में ख्याति व्यावसायिक कारणों से ही है। यही हालांकि चीन में भी हुआ है,पर चीन ने फंडामेंटल रिसर्च को नजरअंदाज नहीं किया है। दरअसल, अब इसी पर ध्यान देने का समय है।  हिन्दुस्तान में 10/01/12 को प्रकाशित 
लेख लिंक
http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-211014.html

बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है ऊर्जा संरक्षण

हिन्दुस्तान लेख 
बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है ऊर्जा संरक्षण
शशांक द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर, सेंट मार्गरेट इंजीनियरिंग कॉलेज
ऊर्जा किसी राष्ट्र की प्रगति, विकास व खुशहाली का प्रतीक होती है और खुशहाली की यह राह ही ऊर्जा संकट तक भी जाती है। आज ऊर्जा के असंतुलित और अत्यधिक उपयोग के कारण जहां एक ओर ऊर्जा खत्म होने  की आशंका प्रकट हो गई है, वहीं दूसरी ओर मानव जीवन, पर्यावरण, भूमिगत जल, हवा, पानी, वन, वर्षा सभी के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता बाल्टर कान का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले तेल और प्राकृतिक गैस का कुल उत्पादन 10 से 30 साल बाद चरम पर होगा, उसके बाद उनमें तीव्र गिरावट आएगी। यानी इनके विकल्प तलाशने का समय आ गया है।
भारत की दिक्कत यह है कि वह जीवाश्म ईंधन यानी पेट्रोल, डीजल, गैस, कोयले आदि में आत्मनिर्भर नहीं है। बाकी दुनिया में भी यह ईंधन काफी तेजी से कम होता जा रहा है। वह भी उस दौर में, जब ऊर्जा की हमारी जरूरतें बहुत तेजी से बढ रही हैं। दूसरी तरफ, 10वीं पंचवर्षीय योजना में 41,000 मेगावाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन के लक्ष्य के मुकाबले मात्र 21,200 मेगावाट उत्पादन ही हो पाया। 11वीं योजना में 78,577 मेगावाट अतिरिक्त उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था, जिसे संशोधित कर 62,375 मेगावाट कर दिया गया। हर अगली पंचवर्षीय योजना में हमें ऊर्जा उत्पादन को लगभग दोगुना करते जाना होगा। मांग और आपूर्ति में जो अतंर है, वह कभी घटेगा, ऐसा संभव नहीं लगता।
ऐसे में, ऊर्जा उत्पादन, उपलब्ध ऊर्जा का संरक्षण और ऊर्जा को सही दिशा देना जरूरी है। ऊर्जा को बचाने के लिए हमेशा छोटे कदमों की जरूरत होती है, जिनके असर बड़े होते हैं। मसलन, पूरे प्रदेश में बिजली की बचत वाले सीएफएल बल्ब लगाने के केरल सरकार के अभियान से ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल होने का अनुमान है। इसके तहत पूरे प्रदेश में सीएफएल बल्ब वितरित किए गए हैं। 95 करोड़ रुपये की इस प्रदेशव्यापी योजना से 520 मेगावाट बिजली की बचत की उम्मीद है। योजना पर अमल से केरल में इस बार बिजली की अधिकतम मांग वाले समय में भी कोई लोड शेडिंग नहीं हुई। कुछ ऐसा ही प्रयोग हिमाचल प्रदेश में भी हुआ है। वहां परंपरागत बल्ब के बदले सीएफएल वितरित करने की योजना बनी और आप को दूर-दराज के गांवों में भी सीएफएल जलते दिख जाएंगे। हिमाचल एक पावर सरप्लस राज्य है। यानी ऐसा राज्य, जो अपनी जरूरतों से ज्यादा बिजली पैदा करता है और उस बिजली को वह दूसरे प्रदेशों को बेचता है। इसीलिए सीएफएल योजना से प्रदेश को दोहरा लाभ हुआ है। केरल और हिमाचल की इन कोशिशों से बाकी राज्य भी सबक ले सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा संरक्षण उपायों से देश भर में 25,000 मेगावाट बिजली की बचत की जा सकती है। हिन्दुस्तान में 14/12/11 को प्रकाशित 

कालेधन पर

नई दुनिया लेख -शशांक द्विवेदी 
कालेधन पर क्यों चुप है सरकार
पिछले दिनों राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने संसंद में बजट सत्र पर  अपने अभिभाषण में काला धन पर केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि सरकार ने काले धन की समस्या से प्रभावी ढंग से निबटने के लिये कुछ कानून बनाए हैं। विदेशों में जमा काले धन के बारे सूचनायें एकत्र करने के लिए सरकार चौनल भी स्थापित कर रही है जिसके तहत विदेशों में नई आयकर यूनिटें शुरू करना और नए दोहरे कराधान निवारण करार करना शामिल है।
अब यहाँ पर सवाल उठता है कि पिछले 3 सालों में सरकार ने कालेधन को देश में लाने के लिए क्या प्रभावी प्रयास किये जबकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 30 जुलाई 2009 को राज्यसभा में बताया था कि विदेशी बैंकों से काले धन को वापस देश में लाने के लिए सरकार कदम उठा चुकी है। प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी सदन में वित्त विधेयक पर वित्त मंत्री के बयान पर खुद दी गई थी। प्रधानमंत्री ने देश को आश्वस्त किया था कि स्विस बैंकों में जमा एक लाख करोड़ रुपये के भारतीय काले धन को सत्ता संभालने के 100 दिन में वापस देश में ले आएंगे। लेकिन ये धन आज तक नही आया ।
कालाधन का मुद्दा देश में लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है पिछले दिनों  अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने चेतावनी दी है कि भारत को मनी लॉन्डरिंग यानी काले धन को वैध बनाने और चरमपंथियों को आर्थिक सहायता का ख़तरा सबसे बड़ी चुनौती है ।
काले धन के मुद्दे पर ध्यान दे तो पता चलता है अभी तक इस विषय में सरकार द्वारा कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया । संसद के शीतकालीन सत्र में भी इस विषय पर संसद में चर्चा हुई लेकिन इसका कोई भी सार्थक नतीजा नहीं निकला जबकि यह देश के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दा है ।  
पिछले दिनों दिल्ली में इस मुद्दे पर इंटरपोल के प्रथम भ्रष्टाचार विरोधी वैश्विक कार्यक्रम का आयोजन हुआए जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार से होने वाली कमाई की निगरानी और अंतरराष्ट्रीय और सीमापार जांच में कानूनी मदद के प्रभावी उपयोग जैसे विषयों में जांचकर्ताओं और अभियोजकों का ज्ञान तथा कौशल बढ़ाना था । अब देखना यह है कि सरकार इस मुद्दे पर कितना संजीदा है और कालेधन को लाने में क्या प्रभावी कदम उठाती है ।
आईएमएफ़ द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है, एशिया की उभरती आर्थिक ताकत के रूप में भारत अहम है लेकिन उसे मनी लॉन्डरिंग और चरमपंथियों तक आर्थिक सहायता पहुँचने का ख़तरा एक बड़ी चुनौती है। इसमें कहा गया है कि भारत में मनी लॉन्डरिंग देश और देश के बाहर की ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों का नतीजा हैं। आईएमएफ़ का मानना है कि भारत चरमपंथियों का निशाना पहले भी बना है और आगे भी उनके निशाने पर रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार चरमपंथियों को विभिन्न स्रोतों से धन पहुँचने का ख़तरा है। इसमें भारत के अंदर और बाहर ग़ैरक़ानूनी गतिविधियाँ, मादक पदार्थों का कारोबार, धोखाधड़ी, संगठित अपराध, मानव तस्करी, भ्रष्टाचार, नकली धन और अवैध धन वसूली जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।
भ्रष्टाचार देश की जड़ों को खोखला कर रहा है। भ्रष्टाचार के अनेक रूप हैं लेकिन काला धन इसका सबसे भयावह चेहरा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी के अनुसार भारत के लोगों का लगभग 20 लाख 85 हजार करोड़ रूपए विदेशी बैंकों में जमा है। देश में काले धन की समानांतर व्यवस्था चल रही है। चूंकि इस धन पर टैक्स प्राप्त नहीं होता है इसलिए सरकार अप्रत्यक्ष कर में बढ़ोतरी करती है, जिसके चलते नागरिकों पर महंगाई समेत तमाम तरह के बोझ पड़ते हैं।
अपनी कमाई के बारे में वास्तविक विवरण न देकर तथा कर की चोरी कर जो धन अर्जित किया जाता है, वह काला धन कहा जाता है। विदेशी बैंकों में यह धन जमा करने वाले लोगों में देश के बड़े-बड़े नेता, प्रशासनिक अधिकारी और उद्योगपति शामिल हैं। विदेशी बैंकों में भारत का कितना काला धन जमा है, इस बात के अभी तक कोई अधिकारिक आंकड़े सरकार के पास मौजूद नहीं हैं लेकिन स्विटजरलैंड के स्विस बैंक में खाता खोलने के लिए न्यूनतम जमा राशि 50 करोड़ रुपये बताई जाती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जमाधन की राशि कितनी विशाल होगी। स्विस राजदूत ने माना है कि भारत से काफी पैसा स्विस बैंकों में आ रहा है। कुछ महीनों पहले स्विस बैंक एसोसिएशन ने भी यह कहा था कि गोपनीय खातों में भारत के लोगों की 1456 अरब डॉलर की राशि जमा है।
पिछले दिनों विदेशों में जमा काले धन का मुद्दा और गर्मा गया जब स्विस बैंकर और ह्निसल्ब्लोअर रुडोल्फ एल्मर ने स्विस कानूनों को तोड़ते हुए स्विटजरलैंड की बैंकों में खुले 2000 खातों ें की जानकारी की सीडी विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे को दे दी। इस सीडी में स्विटजरलैंड की बैंकों में खाता रखने वाले अमेरिकाए ब्रिटेन और एशिया के नेताओं और उद्योगपतियों के नाम हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने विदेशों में जमा काले धन के मामले को जोर शोर से उठाया था और इसे चुनावी मुद्दा बनाया था। उस दौरान प्रधानमंत्री ने भी इसका समर्थन करते हुए प्रचार अभियान में वादा किया था कि सत्ता में आने के 100 दिनों के भीतर वे इस दिशा में ठोस कार्रवाई करेंगे लेकिन वह अपने वायदों से दूर भाग रहे हैं।
वास्तव में सरकार भ्रष्टाचार से निपटने और विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने में ने जिस जिस प्रकार से निष्क्रियता दिखा रही है उससे देश के लोगों का विश्वास कम हो रहा है ,लोगों को  यह महसूस होता है कि काले धन का मुद्दा कभी सुलझ नहीं सकता क्योंकि आधे से ज्यादा पैसा तो भ्रष्ट राजनेताओ का है । इसी वजह से इस मुद्दे पर कोई ठोस कानून नहीं बन पा रहा है न ही गंभीरता के साथ इस पर कार्यवाही हो रही है . जबकि कई बार और कई स्रोतों से यह पाता चल चुका है कि विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाले सबसे अधिक संख्या में भारतीय हैं और किस प्रकार यह पैसा ब्रिटिश विर्जिन द्वीप समूह, केमैन द्वीप समूह आदि जैसे विभिन्न टैक्स हैवंस में दुबई, सिंगापुर, मॉरीशस के रास्ते पहुंचता है। पिछले दिनों जेनेवा में एचएसबीसी में जमा इस प्रकार के कालेधन के 1200 खातों के खुलासे से देश को भारी मात्रा में कालेधन के होने का पता चला है, दुर्भाग्यवश, सरकार इन खातों को क्राइम मनी न मानकर केवल कर बचाने का मामला मान रही है। यह चोरी की संपत्ति मानी जानी चाहिए क्योंकि इस प्रकार से जमा पैसा अन-अकाउंटिड लाभ में परिवर्तित किया जा रहा है, इससे भी खराब बात यह है कि लिच्टेंस्टीन बैंक खातों के बारे में जानकारी पर अपेक्षित गंभीरता से कार्यवाही नहीं की गई है,
जबकि सरकार को देश के चुराये गये इस धन का पता लगाने और आपराधिक कार्रवाई करके दोषियों को दंडित करने के लिए अपेक्षित गति से और कड़ाई से कार्रवाई करनी चाहिए और कि एचएसबीसी बैंक के 1200 खाताधारियों के नामों को तुरंत सार्वजनिक किया जाना चाहिए .
पिछले दिनों सर्वाेच्च न्यायालय ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन पर चिंता जताई। प्रख्यात वकील श्री राम जेठमालानी द्वारा दायर एक याचिका पर सर्वाेच्च न्यायालय ने कहा कि विदेशों में जमा काला धन केवल टैक्स की चोरी मात्र नही है, यह गंभीर अपराध, चोरी और देश की लूट का मामला है। न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एसएस निज्जर वाली पीठ ने यह कड़ी टिप्पणी की। काले धन का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने में किया जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने भी इस ओर इशारा किया है कि विदेशों में जमा काला धन ही आतंकियों को वित्तीय मदद के रूप में भारत में आता है
काले धन पर यूपीए सरकार के ढुलमुल रवैये से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार भ्रष्टाचारियों के साथ है। विदेशी बैंकों में जमा काले धन के बारे में सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा कड़ा रुख अपनाए जाने पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि काले धन को तुरंत वापस लाना आसान नहीं है और इस संबंध में मिली जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। जहां प्रधानमंत्री विदेशी बैंकों में भारतीय खाताधारकों के नाम बताने से इनकार कर रहे हैं वहीं कांग्रेस महासचिव श्री राहुल गांधी कह रहे हैं कि काला धन रखने वालों पर मामला दर्ज होना चाहिए। यह बयान केवल एक मजाक है। क्योंकि उन्हें बयान जारी करने की बजाए ठोस पहल प्रारंभ करनी चाहिए।
अभी तक विदेशी बैंकों में जमा काले धन को भारत वापस लाने के लिए हमारे पास ठोस कानून नहीं है। इसलिए इस दिशा में ठोस कानून बनाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही काले धन के मुद्दे पर राष्ट्रीय आम सहमति बनाने का प्रयास हो तथा विदेशों में भारतीय नागरिकों द्वारा जमा किए गए काले धन को वापस लाने के लिए सरकार प्रबल इच्छाशक्ति का परिचय दे। काले धन की वापसी से भारत की अर्थव्यवस्था का कायापलट हो सकता है। अगर ये काला धन देश की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ दिया जाए तो स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, बिजली आदि बुनियादी आवश्यकताओं को सहज ही पूरा किया जा सकता है।
लेखक शशांक द्विवेदी ,नई दुनिया में 19/04/12 को प्रकाशित 
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