Thursday, April 19, 2012

कालेधन पर

नई दुनिया लेख -शशांक द्विवेदी 
कालेधन पर क्यों चुप है सरकार
पिछले दिनों राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने संसंद में बजट सत्र पर  अपने अभिभाषण में काला धन पर केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि सरकार ने काले धन की समस्या से प्रभावी ढंग से निबटने के लिये कुछ कानून बनाए हैं। विदेशों में जमा काले धन के बारे सूचनायें एकत्र करने के लिए सरकार चौनल भी स्थापित कर रही है जिसके तहत विदेशों में नई आयकर यूनिटें शुरू करना और नए दोहरे कराधान निवारण करार करना शामिल है।
अब यहाँ पर सवाल उठता है कि पिछले 3 सालों में सरकार ने कालेधन को देश में लाने के लिए क्या प्रभावी प्रयास किये जबकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 30 जुलाई 2009 को राज्यसभा में बताया था कि विदेशी बैंकों से काले धन को वापस देश में लाने के लिए सरकार कदम उठा चुकी है। प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी सदन में वित्त विधेयक पर वित्त मंत्री के बयान पर खुद दी गई थी। प्रधानमंत्री ने देश को आश्वस्त किया था कि स्विस बैंकों में जमा एक लाख करोड़ रुपये के भारतीय काले धन को सत्ता संभालने के 100 दिन में वापस देश में ले आएंगे। लेकिन ये धन आज तक नही आया ।
कालाधन का मुद्दा देश में लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है पिछले दिनों  अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने चेतावनी दी है कि भारत को मनी लॉन्डरिंग यानी काले धन को वैध बनाने और चरमपंथियों को आर्थिक सहायता का ख़तरा सबसे बड़ी चुनौती है ।
काले धन के मुद्दे पर ध्यान दे तो पता चलता है अभी तक इस विषय में सरकार द्वारा कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया । संसद के शीतकालीन सत्र में भी इस विषय पर संसद में चर्चा हुई लेकिन इसका कोई भी सार्थक नतीजा नहीं निकला जबकि यह देश के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दा है ।  
पिछले दिनों दिल्ली में इस मुद्दे पर इंटरपोल के प्रथम भ्रष्टाचार विरोधी वैश्विक कार्यक्रम का आयोजन हुआए जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार से होने वाली कमाई की निगरानी और अंतरराष्ट्रीय और सीमापार जांच में कानूनी मदद के प्रभावी उपयोग जैसे विषयों में जांचकर्ताओं और अभियोजकों का ज्ञान तथा कौशल बढ़ाना था । अब देखना यह है कि सरकार इस मुद्दे पर कितना संजीदा है और कालेधन को लाने में क्या प्रभावी कदम उठाती है ।
आईएमएफ़ द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है, एशिया की उभरती आर्थिक ताकत के रूप में भारत अहम है लेकिन उसे मनी लॉन्डरिंग और चरमपंथियों तक आर्थिक सहायता पहुँचने का ख़तरा एक बड़ी चुनौती है। इसमें कहा गया है कि भारत में मनी लॉन्डरिंग देश और देश के बाहर की ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों का नतीजा हैं। आईएमएफ़ का मानना है कि भारत चरमपंथियों का निशाना पहले भी बना है और आगे भी उनके निशाने पर रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार चरमपंथियों को विभिन्न स्रोतों से धन पहुँचने का ख़तरा है। इसमें भारत के अंदर और बाहर ग़ैरक़ानूनी गतिविधियाँ, मादक पदार्थों का कारोबार, धोखाधड़ी, संगठित अपराध, मानव तस्करी, भ्रष्टाचार, नकली धन और अवैध धन वसूली जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।
भ्रष्टाचार देश की जड़ों को खोखला कर रहा है। भ्रष्टाचार के अनेक रूप हैं लेकिन काला धन इसका सबसे भयावह चेहरा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी के अनुसार भारत के लोगों का लगभग 20 लाख 85 हजार करोड़ रूपए विदेशी बैंकों में जमा है। देश में काले धन की समानांतर व्यवस्था चल रही है। चूंकि इस धन पर टैक्स प्राप्त नहीं होता है इसलिए सरकार अप्रत्यक्ष कर में बढ़ोतरी करती है, जिसके चलते नागरिकों पर महंगाई समेत तमाम तरह के बोझ पड़ते हैं।
अपनी कमाई के बारे में वास्तविक विवरण न देकर तथा कर की चोरी कर जो धन अर्जित किया जाता है, वह काला धन कहा जाता है। विदेशी बैंकों में यह धन जमा करने वाले लोगों में देश के बड़े-बड़े नेता, प्रशासनिक अधिकारी और उद्योगपति शामिल हैं। विदेशी बैंकों में भारत का कितना काला धन जमा है, इस बात के अभी तक कोई अधिकारिक आंकड़े सरकार के पास मौजूद नहीं हैं लेकिन स्विटजरलैंड के स्विस बैंक में खाता खोलने के लिए न्यूनतम जमा राशि 50 करोड़ रुपये बताई जाती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जमाधन की राशि कितनी विशाल होगी। स्विस राजदूत ने माना है कि भारत से काफी पैसा स्विस बैंकों में आ रहा है। कुछ महीनों पहले स्विस बैंक एसोसिएशन ने भी यह कहा था कि गोपनीय खातों में भारत के लोगों की 1456 अरब डॉलर की राशि जमा है।
पिछले दिनों विदेशों में जमा काले धन का मुद्दा और गर्मा गया जब स्विस बैंकर और ह्निसल्ब्लोअर रुडोल्फ एल्मर ने स्विस कानूनों को तोड़ते हुए स्विटजरलैंड की बैंकों में खुले 2000 खातों ें की जानकारी की सीडी विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे को दे दी। इस सीडी में स्विटजरलैंड की बैंकों में खाता रखने वाले अमेरिकाए ब्रिटेन और एशिया के नेताओं और उद्योगपतियों के नाम हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने विदेशों में जमा काले धन के मामले को जोर शोर से उठाया था और इसे चुनावी मुद्दा बनाया था। उस दौरान प्रधानमंत्री ने भी इसका समर्थन करते हुए प्रचार अभियान में वादा किया था कि सत्ता में आने के 100 दिनों के भीतर वे इस दिशा में ठोस कार्रवाई करेंगे लेकिन वह अपने वायदों से दूर भाग रहे हैं।
वास्तव में सरकार भ्रष्टाचार से निपटने और विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने में ने जिस जिस प्रकार से निष्क्रियता दिखा रही है उससे देश के लोगों का विश्वास कम हो रहा है ,लोगों को  यह महसूस होता है कि काले धन का मुद्दा कभी सुलझ नहीं सकता क्योंकि आधे से ज्यादा पैसा तो भ्रष्ट राजनेताओ का है । इसी वजह से इस मुद्दे पर कोई ठोस कानून नहीं बन पा रहा है न ही गंभीरता के साथ इस पर कार्यवाही हो रही है . जबकि कई बार और कई स्रोतों से यह पाता चल चुका है कि विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वाले सबसे अधिक संख्या में भारतीय हैं और किस प्रकार यह पैसा ब्रिटिश विर्जिन द्वीप समूह, केमैन द्वीप समूह आदि जैसे विभिन्न टैक्स हैवंस में दुबई, सिंगापुर, मॉरीशस के रास्ते पहुंचता है। पिछले दिनों जेनेवा में एचएसबीसी में जमा इस प्रकार के कालेधन के 1200 खातों के खुलासे से देश को भारी मात्रा में कालेधन के होने का पता चला है, दुर्भाग्यवश, सरकार इन खातों को क्राइम मनी न मानकर केवल कर बचाने का मामला मान रही है। यह चोरी की संपत्ति मानी जानी चाहिए क्योंकि इस प्रकार से जमा पैसा अन-अकाउंटिड लाभ में परिवर्तित किया जा रहा है, इससे भी खराब बात यह है कि लिच्टेंस्टीन बैंक खातों के बारे में जानकारी पर अपेक्षित गंभीरता से कार्यवाही नहीं की गई है,
जबकि सरकार को देश के चुराये गये इस धन का पता लगाने और आपराधिक कार्रवाई करके दोषियों को दंडित करने के लिए अपेक्षित गति से और कड़ाई से कार्रवाई करनी चाहिए और कि एचएसबीसी बैंक के 1200 खाताधारियों के नामों को तुरंत सार्वजनिक किया जाना चाहिए .
पिछले दिनों सर्वाेच्च न्यायालय ने विदेशी बैंकों में जमा काले धन पर चिंता जताई। प्रख्यात वकील श्री राम जेठमालानी द्वारा दायर एक याचिका पर सर्वाेच्च न्यायालय ने कहा कि विदेशों में जमा काला धन केवल टैक्स की चोरी मात्र नही है, यह गंभीर अपराध, चोरी और देश की लूट का मामला है। न्यायमूर्ति बी सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति एसएस निज्जर वाली पीठ ने यह कड़ी टिप्पणी की। काले धन का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने में किया जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने भी इस ओर इशारा किया है कि विदेशों में जमा काला धन ही आतंकियों को वित्तीय मदद के रूप में भारत में आता है
काले धन पर यूपीए सरकार के ढुलमुल रवैये से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार भ्रष्टाचारियों के साथ है। विदेशी बैंकों में जमा काले धन के बारे में सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा कड़ा रुख अपनाए जाने पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि काले धन को तुरंत वापस लाना आसान नहीं है और इस संबंध में मिली जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। जहां प्रधानमंत्री विदेशी बैंकों में भारतीय खाताधारकों के नाम बताने से इनकार कर रहे हैं वहीं कांग्रेस महासचिव श्री राहुल गांधी कह रहे हैं कि काला धन रखने वालों पर मामला दर्ज होना चाहिए। यह बयान केवल एक मजाक है। क्योंकि उन्हें बयान जारी करने की बजाए ठोस पहल प्रारंभ करनी चाहिए।
अभी तक विदेशी बैंकों में जमा काले धन को भारत वापस लाने के लिए हमारे पास ठोस कानून नहीं है। इसलिए इस दिशा में ठोस कानून बनाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही काले धन के मुद्दे पर राष्ट्रीय आम सहमति बनाने का प्रयास हो तथा विदेशों में भारतीय नागरिकों द्वारा जमा किए गए काले धन को वापस लाने के लिए सरकार प्रबल इच्छाशक्ति का परिचय दे। काले धन की वापसी से भारत की अर्थव्यवस्था का कायापलट हो सकता है। अगर ये काला धन देश की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ दिया जाए तो स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, बिजली आदि बुनियादी आवश्यकताओं को सहज ही पूरा किया जा सकता है।
लेखक शशांक द्विवेदी ,नई दुनिया में 19/04/12 को प्रकाशित 
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