Saturday, June 8, 2013

पर्यावरण.गंगा और हम

गंगा एक्शन प्लान सरकार का सबसे बड़ा छलावा
पिछले महीने बेटी के मुंडन संस्कार के लिए संगम (इलाहाबाद) जाना हुआ .गंगा स्नान करते समय मेरी 3 साल की बेटी ने तोतली जबान से कहा पापा पानी गंदा है ,मैंने कहाँ हाँ .उसने फिर पूँछा पानी क्यों गंदा है ?अब मै उसे क्या बताता कि पानी क्यों गंदा है ,ये सोच ही रहा था तो उसने कहा इसको हटा दो (पानी में फूल ,नारियल इत्यादि )तो अच्छा हो जायेगा न !!..उसकी इस बात से मै हतप्रभ रह गया ..कई दिनों तक सोचता रहा कि जो बात एक छोटी सी बच्ची की समझ में आ जाती है वो सरकारों /नेताओं को क्यों समझ में नहीं आती ?गंगा एक्शन प्लान सरकार का सबसे बड़ा छलावा है जिसमें अरबों रुपयें कागज पर खर्च किये जा रहें है ..भाई आप गंगा में गंदगी /केमिकल डालना छोड़ दे तो गंगा ,यमुना एक साल के भीतर पूरी तरह से स्वच्छ हो जायेगी ..इसमें हजारों करोड़ रुपये खर्च करने की जरुरत ही नहीं है ..ये पैसे तो सिर्फ भ्रष्टाचार /जेब में भरने के लिए है ...सोचता हूँ जो बात एक बच्चे की समझ में आ जाती है वो बातें सरकारों के समझ में क्यों नहीं आती ?बड़ी -बड़ी बैठके होती है ,पर्यावरण को बचाने के लिए करोड़ों रुपये बैठकों में खर्च हो जाता है ..लेकिन होता कुछ नहीं है ..हम सब लोग जिस कथित विकास की बेहोशी में जी रहें है एक दिन यही हमारे विनाश का कारण बनेगी ..आप देख लेना ..

ईर्ष्यालु लोग भी बड़ी किस्मत से मिलते है..

अगर आप लोगों की इर्ष्या और जलन का शिकार हो रहें है तो इसका सीधा मतलब है आप तरक्की कर रहें है ..अगर लोग आप पर नजर रख रहें है मतलब आप क्या कर रहें है ,कब कर रहें है ,कहाँ कर रहें है ,क्या खा -पी रहें है,पूरा खा रहें है या छोड़ भी रहें है..क्या पहन रहें है आदि आदि ...उनका अधिकाँश समय आपकी गतिविधियों को ट्रैक करने /शिकायत करने /चुगली करने में जाता है ...तो इसका सीधा मतलब है आप सेलिब्रेटी बनने की तरफ अग्रसर है ,या आप में कुछ खास है विशिष्ट है जो उनमे नहीं है ...इसलिए जितना ज्यादा आपके ईर्ष्यालुओं की संख्या बढ़ेगी ..आपकी सफलता भी बढ़ती जायेगी ..ईर्ष्यालु लोग भी बड़ी किस्मत से मिलते है ,सबकी नसीब में नहीं होतें है ..इसलिए मेरी ईश्वर से कामना है की मेरे ईर्ष्यालु मित्रों की संख्या लगातार बढ़ती रहें ..कभी कम न हो .....

Saturday, June 1, 2013

धर्म और लोकतंत्र

असग़र वजाहत
हाल ही में बसपा के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क सदन से उठ कर चले गए थे क्योंकि वहां वंदे मातरम् की धुन बज रही थी। अगर किसी का इस्लाम इतना कमजोर है कि वह वंदे मातरम् की धुन से खंडित हो जाता है तो उसे पहले अपने धर्म को पक्का करने पर ध्यान देना चाहिए। बर्क को यह भी मालूम होना चाहिए कि वे किसी इस्लामी देश में नहीं बल्कि संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहते हैं, जहां मुसलमान कई मुसलिम देशों से ज्यादा सुरक्षित और सम्मानित हैं। बर्क साहब अगर वंदे मातरम् की धुन को इस्लाम-विरोधी मानते हैं तो क्या वे हिंदू-बहुल देश में रहने को गैर-इस्लामी नहीं मानते, जबकि अब भी दुनिया में इस्लामी देश हैं जहां जाया जा सकता है। बर्क साहब का इस्लाम हिंदू वोट लेने और सांसद हो जाने की अनुमति तो देता है, देश और संसद की आचार संहिता पर विश्वास करने की अनुमति नहीं देता यह आश्चर्य की बात है। धर्म की आग पर रोटियां सेंकने वाले ही समाज में द्वेष, घृणा और अलगाव पैदा कर रहे हैं, क्योंकि संभवत: उन्हें अपने इन कृत्यों से धर्मांध मतदाताओं का समर्थन मिल जाता है। उन्हें शायद नहीं मालूम कि वे मुसलमानों का जितना अहित कर रहे हैं उतना कोई और नहीं कर रहा है।

Tuesday, May 21, 2013

बसपा का नव ब्राह्मण वाद


शशांक द्विवेदी 
राजनीति भी अजब-गजब चीज है कुछ भी करवा सकती है .मुझे आज भी याद है ९० के दशक में जब मै 10 वी,12 वी में था मायावती और कांशीराम की रैलियों में हमेशा सवर्ण विरोधी नारे लगते थे ,तिलक ,तराजू और तलवार इनको मारों ......असल में बसपा की नींव ही सवर्ण विरोध पर ही थी .लेकिन आज देखिये वक्त बदला और सत्ता के लिए उन्ही मायावती ने लोकसभा की घोषित 36 में 19 सीटों पर ब्राह्मणों को टिकट दे दिया .पिछले विधान सभा में भी बसपा में जमकर सवर्णों को टिकट बाटें थे .दलितों को मुर्ख बनाकर मायावती जो कर रही है वो शायद दलित चिंतकों को न दिख रहा है न वो देखना चाहते है .वो सिर्फ अपने स्तर पर सवर्णों को गरिया रहें है जबकि उनकी सुप्रीमों इन्ही दबंग सवर्ण सांसद –विधायकों के हाथो खेल रही है .सवर्णों के लिए खासकर ब्राह्मणों के लिए तो बसपा सबसे मुफीद पार्टी है ,पैसे दो टिकट लो फिर सांसद –विधायक बनकर गुंडई करो ,दबंगई करो ,उन्ही दलितों पर अत्याचार करों जिनकी एकमात्र घोषित मसीहा मायावती है . अब तो ये नारा लगने लगा कि “ब्राह्मण संख बाजयेगा हाथी दिल्ली जाएगा ..”अभी तो सिर्फ 36 के ही टिकट घोषित हुए है 44 के तो अभी और होने है देखते जाइए अभी वो क्या क्या करती है .ये सब देखकर ये तो समझ में आ रहा है कि पहले किसी जाति विशेष की राजनीति करो फिर जब सत्ता का सुख मिल जाए तो उसी जाति विशेष के हितों पर सबसे ज्यादा कुठाराघात करो ..देश /प्रदेश के कथित दलित चिंतक क्या कर रहें है क्या उन्हें ये सब दिखाई नहीं दे रहा है (कोई खुल कर बोल नहीं रहा है )या वो सब भी मायावती की तरह ही सोचने लगे है ..मायावती के टिकट बटवारे को देखकर सांसद बनने की इच्छा जोर पकड़ रही है समस्या सिर्फ एक है टिकट खरीदने के लिए इतने ज्यादा पैसे नहीं है ..अगर आप लोग मदत करें तो सांसद बनना तय है ....कुल मिलाकर आजादी के बाद सवर्णों के लिए सांसद –विधायक बनने का सबसे मुफीद मौका है सपा –बसपा दोनों ही उन्हें जमकर टिकट देने को तैयार दिख रही है ..कुल मिलाकर राजनीति में कुछ भी हो सकता है!!!

Sunday, May 12, 2013

हिंदी साहित्य के लाबीस्ट

मनीषा कुलश्रेष्ठ से बड़ा लाबीस्ट हिंदी साहित्य के क्षेत्र में कोई नहीं है ..आप उनकी सिर्फ तारीफ़ करें तभी वह खुश रहती है ,अगर उनकी थोड़ी भी आलोचना कर दे तो वो बौखला जाती है ..हो सकता है वो तकनीकी रूप से लेखिका हो लेकिन विचारों ,इंसानियत के स्तर पर तो बेहद घमंडी ,संवेदनहीन ,सिर्फ चापलूसी ,तारीफ पसंद करने वाली है ..हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में उनका जो भी स्थान है वो सिर्फ चापलूसी ,चुगलखोरी और लाबिंग की वजह से है ..लेखक या लेखिका के लिए पहली और अनिवार्य शर्त उसमे इंसानियत /मानवता का होना है अगर उसमे ये तत्व नहीं है तो ऐसे लोगों को क्या कहूँ ..बस ज्यादा कहना नहीं चाहता ...मनीषा कुलश्रेष्ठ के शब्दों ,लेखों और रचनाओं पर ना जाइये वो बिना किसी मानवीय भावना के लिखी जाती है जहाँ सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ तत्व की प्रधानता होती है ..जब तक आप उनकी तारीफ,चापलूसी करेंगे बस तभी तक वो आप के साथ है नहीं तो सिर्फ उनका झूठा घमंड ,बौखलाहट यानी उनका असली चेहरा ...

Monday, April 29, 2013

चीन के मामले में हम शांतिप्रिय है न !!!


रक्षाबंधन हमारे देश का त्यौहार है लेकिन इसमें प्रयोग होने वाली 80 फीसदी राखियां चीन की ,दीवाली में भी 80 फीसदी पटाखे चीन के ,देश के इलेक्ट्रानिक्स बाजार पर चीन का ही आधिपत्य है ,हमारे देश की कई हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पहले ही दबाये हुए है ,अब वो हमारी सीमा में 10 किलोमीटर अंदर घुस आया ..लेकिन इतने पर भी हमारे देश के रहनुमाओं /नेताओं को कुछ नहीं दिखता ,वो ये सब देखना भी नहीं चाहते ...शांतिप्रिय है न !!!...इस पर एक शेर याद आ रहा है 
"जिन कहारों पर विश्वास डोली सौप कर ,वे ही यदि बटमार हो जाएँ तो बोलों क्या करे .."

दो पाटों के बीच पिसता है "आदमी"

अधिकांश लोगों के जिंदगी से जुड़ी मेरी यह कविता 

दो पाटों के बीच 
पिसता है आदमी 
एक तरफ है 
उसका परिवार यानि वो और उसकी पत्नी 
दुसरी तरफ है 
बूढ़े माँ –बाप का परिवार 
उम्मीदें बहुत है दोनों तरफ 
आवश्यकताएं बहुत है दोनों तरफ 
आदमी सिर्फ एक है 
बीच में
अंतर्द्वंद है मन में क्या करें
और क्या न करें
कैसे संतुलन बैठाएं
पत्नी और माता –पिता के बीच
क्योंकि एक के साथ
होनें का मतलब
दूसरें के साथ न होना है
वो बेटा बनें या पति
दोनों भूमिकाएं विपरीत है
एक दूसरे के
परिवारों के साथ इस द्वन्द में
उसकी भावनाओं को
उसकी सोच को
कौन समझेगा ?
वो तो सिर्फ बेचारा है
अकेला है
और लगता है कि
अकेला ही रहेगा ..
स्वरचित – © शशांक द्विवेदी