पहली खबर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने मायावती के भाई आनंद कुमार और उनकी कंपनियों के 400 करोड़ रुपये के फिक्स डिपॉजिट को रिलीज कर दिया है। दूसरी खबर केंद्र सरकार ने मायावती को दिल्ली में जो 3 बंगले अलाट किये थे उन्हें प्रेरणा स्थल के नाम पर मायावती ने अंदर से तोड़ कर 30000 वर्ग फूट का एक बंगला बना दिया .दिल्ली में किसी के पास भी इतना बड़ा बंगला नहीं है .लुटियन जोन स्तिथ इन बंगलों में अंदर कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता फिर ऐसा क्यों किया गया ?केंद्र सरकार मायावती पर इतनी मेहरबान क्यों है ? नोयडा में एक मामूली से क्लर्क रहें मायावती के भाई के पास इतने कम समय में 700 करोड़ की संपत्ति कैसे आयी ..क्या कोई बताएगा या यहाँ पर भी सब गोलमाल है मतलब कांग्रेस के साथ मिलकर पूरा देश लूट लो ,कांग्रेस को समर्थन के बदले में जितना मर्जी आये उतना भ्रष्टाचार करों ..
Saturday, November 9, 2013
नेशनल दुनियाँ के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरी कविता .
नेशनल दुनियाँ के संपादकीय पेज पर आज मेरी कविता ...जब भी मेरी कवियायें प्रकाशित होती है बहुत ज्यादा खुशी महसूस होती है क्योंकि कवितायेँ मेरे दिल के ज्यादा करीब लगती है ....
1 "जीवन "
न पहचान सका
बस बहता ही रहा
जीवन की इस अविरल धारा में
जीवन को देखा बहुत
समझा बहुत
पर बदल न सका
अपने आप को
बहता ही रहा
पर किनारा न मिला
पर मिलता भी कैसे ?
जब कोई किनारा ही न था
बहते हुए भी
सँभल न सका
बस डूबता ही गया
पर ,जब डूबा तो ऐसा डूबा
इस अंतर्मन में
इस चेतना में कि
फिर लगा कि
डूबना ही जीवन है
क्योंकि फिर कोई ,
आस नहीं ,साँस नहीं
बस जीवन ही जीवन
जो अनंत है
अविकार है
वहाँ न तुम हो
न "मैं "हूँ
सब एक है ....
2 अकेलापन
दो पाटों के बीच
पिसता है आदमी
एक तरफ है
उसका परिवार यानि वो और उसकी पत्नी
दुसरी तरफ है
बूढ़े माँ –बाप का परिवार
उम्मीदें बहुत है दोनों तरफ
आवश्यकताएं बहुत है दोनों तरफ
आदमी सिर्फ एक है
बीच में
अंतर्द्वंद है मन में क्या करें
और क्या न करें
कैसे संतुलन बैठाएं
पत्नी और माता –पिता के बीच
क्योंकि एक के साथ
होनें का मतलब
दूसरें के साथ न होना है
वो बेटा बनें या पति
दोनों भूमिकाएं विपरीत है
एक दूसरे के
परिवारों के साथ इस द्वन्द में
उसकी भावनाओं को
उसकी सोच को
कौन समझेगा ?
वो तो सिर्फ बेचारा है
अकेला है
और लगता है कि
अकेला ही रहेगा ..
@शशांक द्विवेदी
Poem Link
Tuesday, October 22, 2013
मेरी बेटी यूं ही हमेशा खुश रहे
आन्या के तीसरे जन्मदिन27फरवरी 2013 पर प्रियंका
तीन साल पहले जब माँ बनी थी ,उस
दर्द के एहसास की खुशी तो ताउम्र रहेगी। मां बनकर मैने अपनी बेटियों
में अपना अक्स को अनुभव किया उनका
बोलना,खेलना
और न जाने क्या क्या। अब लगता है कि दो जिंदगियां ऐसी हैं जो सिफ मेरे और मेरे लिए
है। उनके दूर होने के एहसास से मुझे तो डर लगता है। कभी डाटने पर मैं उनसे कहती
हूं मैं चली जाउगी आप मुझे परेशान मत करो तो वे तुरंत मान जाती है क्योंकि मेरे जाने का कहने से मेरी बेटियों को भी मेरे दूर होने का एहसास
सालता है। उनकी तोतली जुबान कहती है मम्मी आप नहीं जाओ नही
तो मैं रो जाउगी और मुझे आपकी याद आएंगी। ऐसा लगता है कि कोई है जिसे मेरे दूर
होने से या जाने से दर्द होता है। शायद यही रिश्ता है मां का बेटी का जो भगवान का
दिया हुआ है जिसे हम दोनो महसूस करते हैं .अभी
मेरी बेटी को दुनियाँ की समझ नहीं है, हमारे रिश्तों में शब्द नहीं है लेकिन एक
एहसास है जिसे मैं नहीं भुलना चाहती। आज उसकी तीसरी बर्थ डे पर जब मैं उसकी
प्लानिंग कर रही थी तो लग रहा था न जाने मैं उन्हें क्या क्या दे दू कि
वो खुश रहे, उसकी मुस्कुराहट उसकी आंखों की चमक हमेशा यूं ही खिलती रहे। इसी उम्मीद
से आज उसकी बर्थ डे सेलीब्रेट की, बहुत एंज्वाय किया इन यादगार पलों को । मैं बहुत खुश हूँ और सोच रही हूँ कि समय ठहर जाए और मेरी बेटी यूं हमेशा खुश
रहे।
Monday, October 21, 2013
देश के रहनुमाओं अब तो शर्म करो ...
शशांक द्विवेदी
रोज-रोज सुनते
सुनते थक गया हू कि पाकिस्तान ने सीमा पार से फिर गोलाबारी की इसमें इतने जवान
शहीद और इतने घायल हो गये , इतने जवानों का सर
काट कर ले गये ,इतनों को बुरी तरह मार कर फेक दिया ,केरन सेक्टर में आतंकियों की घुसपैठ पर इंडियन आर्मी का आपरेशन जारी है
..बचपन से ही सुनते आ रहा हू इस तरह की न्यूज ,हर बार और
हमेशा शर्म आती है इस देश की सरकार पर भी और खुद पर भी ..सोचता हू इतना बड़ा देश है
इतनी बड़ी सेना है फिर भी पाकिस्तान वाले ,बंगलादेश वाले जब
चाहते है घुस कर मारते है ..कितना कायर और घटिया है इस देश का नेतृत्व ..आजादी के
बाद से हमने पाकिस्तान के खिलाफ हर युद्ध जीता लेकिन वार्ता की मेज पर भारत हमेशा
हारा .. 71के युद्ध में हमने लाहौर तक कब्ज़ा किया ,जीत का विश्व रिकार्ड तक बनाया लेकिन बाद में क्या किया सरकार ने जीती हुई
जमीन तो हमें वापिस करनी ही पड़ी अपने देश की जमीन भी देनी पड़ी जो गुलाम कश्मीर के
नाम से जानी जाती है ..चीन देश की 42 हजार वर्ग किलोमीटर और
पाकिस्तान 12 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन दबाए हुए है
...अमेरिका ,चीन ,ब्रिटेन ,यूरोप के देशों का आप एक सैनिक मार दीजिए फिर देखिये वो घुस कर मारेंगे
..लेकिन भारत में देखिये रोज सीमापार से जबरदस्त फायरिंग होती है ,घुसपैठ होती है ,रोज जवान मारे जाते है ,घायल होते है ..फिर भी यहाँ की सरकार कुछ नहीं बोलती ..देश का रक्षा
मंत्री ऐसा है जो खुद अपने पैरों पर ठीक से खड़ा तक नहीं हो सकता ,कई बार गिर चुका है चलते चलते ,व्हील चेयर में चला
लंबे समय तक ..ताज्जुब है ..ऐसे तो रक्षा मंत्री है ...वास्तव में इस देश में
नेताओं ,मंत्रियों ,सरकार की कायरता
देख कर शर्म आती है ,चूड़ी पहन लेना चाहिए इन सब बेशर्मों को
...ज्यादा सोचता हू तो लगता है यही इस देश का भाग्य है सैकड़ों साल गुलाम रहा ,लुटता रहा ,अब आजाद होने के बाद पड़ोसी देश घुस -घुस
कर हमारे जवान मार राहें है ...
इस पर यही बात
याद आते है कि
क्षमा शोभती उस
भुजंग को जिसके पास गरल हो ..
उसका क्या जो दंतहीन
,विषरहित ,विनीत सरल हो ...
देश के रहनुमाओं
अब तो शर्म करो ,कुछ तो शर्म करो,कुछ तो कायरता कम करो ...देश को
तो भ्रष्टाचार करके लूट ही चुके हो कम से कम सीमायों की तो रक्षा करो ...
Thursday, October 17, 2013
चुम्बकीय शक्ति प्रभाव
टीचर: चुम्बकीय शक्ति प्रभाव किसे कहते हैं..?.................जब कोई लडकी स्कूटी पर जाते हुयेकिसी बाइक सवार
लडके के पास से गुजरती हैतो उस लडके की बाइक की गति स्वत: ही बढ जाती है..लडकी
द्वारा उत्पन्न किये गये इसगति परिवर्तन को ही "चुम्बकीय शक्ति प्रभाव" कहते
हैं...!!
एक पत्रकार की उत्तरकथा!
शंभुनाथ शुक्ल
मैं
अब निराश और डिप्रस्ड होकर सोचने लगा हूं कि दिल्ली छोड़ ही दूं। कई वजहें हैं
मसलन दिल्ली में अगर आप भाजपाई, कांग्रेसी या घोषित
कम्युनिस्ट पत्रकार नहीं हैं तो आपको कोई पूछेगा नहीं। अगर आपके संबंध संपादकों से
मधुर नहीं हैं तो कोई आपको छापेगा नहीं और अगर मालिकों से आपका सीधे संवाद नहीं है
तो कोई नौकरी देगा नहीं। अब इस उम्र में पत्रकारिता से इतर कोई व्यवसाय तो कर नहीं
सकता इसलिए एक ही विकल्प बचता है कि दिल्ली छोड़कर अपने मूल शहर या किसी अन्य शहर
में जाकर कोई भी छोटा-मोटा व्यवसाय कर लूं। ३५ साल तक पत्रकारिता की और सक्रिय रहा
लेकिन आज अखबारों में अपने काकस हैं। उनका कहना है कि हम आपको नहीं छाप सकते
क्योंकि हमारे कालमिस्ट तय हैं। यह अलग बात है कि वे कालमिस्ट आंचलिक अखबारों के
लेख उड़ाकर अपने नाम से छाप लेते हैं। कुछ कालमिस्ट अंग्रेजी में लिखते हैं पर
हिंदी के अखबार उधार की प्रतिभा छाप लेते हैं। उन्हें मूल प्रतिभा नहीं चाहिए। अब
तक जितना भी जोड़ रखा था सब खत्म हो गया। अब सोचता हूं कि गाड़ी बेच दूं और
गाजियाबाद के वसुंधरा इलाके में स्थित फ्लैट भी। कानपुर स्थित अपने गांव जाकर
थोड़े में गुजारा कर लूं। या बस स्टैंड पर चाय अथवा पकौड़ी की दूकान खोल लूं। हर
व्यवसाय अपने अनुभवी लोगों की कद्र करता है पर पत्रकारिता में अनुभवी लोगों के लिए
सिवाय भूखों मरने के और कोई रास्ता नहीं बचता। न मैं जातिवादी हूं न संप्रदायवादी
इसलिए किसी भी राजनैतिक दल के लिए मेरी प्रतिभा की दरकार नहीं है। दिक्कत यह है कि
जो लोग सिर्फ अपना श्रम बेच सकते हैं उन्हें सरकार क्या सुविधा प्रदान करती है।
मुझ जैसे लोगों को भी साल में कम से कम १०० दिन की मजूरी तो मिलनी चाहिए। बीमार
पड़ जाएं तो इलाज की भी सुविधा हो वर्ना सिवाय आत्महत्या के और क्या चारा है।
घुट-घुट कर जीने से तो स्वस्थ रहते हुए ऊपर जाना बेहतर है।
(लेखक देश
के वरिष्ठ और जाने -माने पत्रकार है )
Wednesday, October 2, 2013
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