कई सालों बद कल अकेले कोई फिल्म देखने गया था .फेसबुक पर कुछ लोगोने ने तारीफ़
करी तो “मसान “ देखने चला गया ..जैसा कि उम्मीद थी सुबह के शो में ज्यादा दर्शक नहीं थे पीछे
से चौथी पंक्ति में बैठा था ,फिल्म शुरू होने के १० मिनट तक तो हॉल में शांति का
महाल था लेकिन १० मिनट के बाद मेरे पीछे की पंक्ति में बैठे ३-४ लड़कों ने “मोदी “ के बारे में जोर जोर से बात करनी शुरू कर दी ..कोई बोला ये
मोदी बिहार में कुछ नहीं कर पायेगा तो कोई बोलाइसकी ताबूत में आख़िरी कील है ये
चुनाव .,नीतिशवा इन्हें मजा चखा देगा ...कुलमिलाकर उनके इस वार्तालाप से मै बहुत
परेशान हो रहा था तो मैंने उनसे कहा कि वो लोग मोदी के बारें में बाहर बात कर लें
..खैर मेरे २-३ बार कहने पर भी वो लोग नहीं माने तो मैं अपनी सीट चेंज करके शांति से फिल्म देखने लगा ....फिल्म
के इंटरवल में उन ३-४ लडको से फिर बातचीत हुई तो पता चला कि वो सब जे एन यू से थे और वामपंथी थे .मुझे पहली बार प्रत्यक्ष
तौर पर अहसास हुआ कि मोदी ,वामपंथियों की रग रग में कैसे समाये हुए है, जिन्हें ये लोग सोते
जागते ,नहाते ,धोते ,खाते ,पिक्चर देखते समय भी ये मोदी की चर्चा ,परिचर्चा और
आलोचना में दिल से लगे रहते है ..ये कभी अपनी पार्टी के बारें में नहीं सोचते है न
ही उसके लिए कुछ कहते या करते है ..हनुमान जी की तरह अगर किसी वामपंथी का हृदय चीर
कर देखा जाए तो उसमे सिर्फ मोदी ही
दिखेंगे ...इनकी इसी मानसिक बीमारी से आज इन लोगों का पतन हो गया ..पूरे
देश में कोई नामलेवा भी नहीं बच रहा है इनका ..यार अब तो इन धूर्तों को देखकर
बिलकुल भी गुस्सा नहीं आता बल्कि बहुत ज्यादा दया आती है देखो इन्हें मोदी ने क्या
से क्या बना दिया ...सच में असली भक्त तो यही लोग है जो दिन रात तल्लीनता से मोदी
विरोध में लगे रहते है ..फिल्म का टिकट लेकर भी मोदी
भक्ति ....मान गया इन वामपंथियों को भाई
... खैर फिल्म तो बहुत ही ज्यादा अच्छी थी ,जितनी
तारीफ़ करू उतनी कम ...फिल्म का अहसास तो अभी तक है दिल दिमाग में ...
Wednesday, July 29, 2015
Wednesday, July 1, 2015
अन्त में हम दोनों ही होंगे !!!.
पति-पत्नी के रिश्तों पर एक बहुत ही मानवीय संवेदनशील कविता ,(मूल लेखक पता नही ..)
अन्त में हम दोनों ही होंगे !!!.
" भले ही झगड़े, गुस्सा करें एक दूसरे पर
टूट पड़ें एक दूसरे पर दादागिरि करने के लिये,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
जो कहना है, वह कह लें जो करना है, वह कर लें
एक दुसरे के चश्मे और लकड़ी ढूँढने में,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
मैं रूठूं तो तुम मना लेना, तुम रूठो ताे मै मना लूँगा
एक दुसरे को लाड़ लड़ाने के लिये,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
आँखें जब धुँधला जायेंगी, याददाश्त जब कमजोर होंगी
तब एक दूसरे को एक दूसरे मे ढूँढने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
घुटने जब दुखने लगेंगे, कमर भी झुकना बंद करेगी
तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
घुटने जब दुखने लगेंगे, कमर भी झुकना बंद करेगी
तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे साथ जब छूटने वाला होगा,
बिदाई की घड़ी जब आ जायेगी तब एक दूसरे को माफ करने के लिए, .
अन्त में हम दोनों ही होंगे...."
अन्त में हम दोनों ही होंगे !!!.
" भले ही झगड़े, गुस्सा करें एक दूसरे पर
टूट पड़ें एक दूसरे पर दादागिरि करने के लिये,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
जो कहना है, वह कह लें जो करना है, वह कर लें
एक दुसरे के चश्मे और लकड़ी ढूँढने में,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
मैं रूठूं तो तुम मना लेना, तुम रूठो ताे मै मना लूँगा
एक दुसरे को लाड़ लड़ाने के लिये,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
आँखें जब धुँधला जायेंगी, याददाश्त जब कमजोर होंगी
तब एक दूसरे को एक दूसरे मे ढूँढने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
घुटने जब दुखने लगेंगे, कमर भी झुकना बंद करेगी
तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे
घुटने जब दुखने लगेंगे, कमर भी झुकना बंद करेगी
तब एक दूसरे के पांव के नाखून काटने के लिए,
अन्त में हम दोनों ही होंगे साथ जब छूटने वाला होगा,
बिदाई की घड़ी जब आ जायेगी तब एक दूसरे को माफ करने के लिए, .
अन्त में हम दोनों ही होंगे...."
Wednesday, May 13, 2015
अलविदा सेंट मार्गेट ...अलविदा नीमराना
शशांक
द्विवेदी
पिछले
10 दिनों से अपने भीतर खुशी और उदासी दोनों
को एक साथ महसूस कर रहा हूँ .खुशी इसलिए कि मेवाड़ यूनिवर्सिटी (मेवाड़ इंस्टीट्यूट,वसुंधरा गाजियाबाद कैम्पस ) में As
a Deputy Director (Research ) ज्वाइन
करने वाला हूँ और मेरे साथ मेरी श्रीमती जी Assistant Professor
in Mass Comm..Deptt ज्वाइन
कर रही है .एक बेहतर आफर और मनपसंद काम के साथ जॉब की ये एक नयी शुरुआत है
.इसलिए काफी खुश
हूँ लेकिन 10 साल
सेंट मार्गेट में काम करने के बाद उसे छोड़ने को लेकर एक अजीब सी उदासी है मेरे मन में क्योकि
यहाँ पढ़ाते हुए मुझे बहुत कुछ हासिल हुआ ,सबसे बड़ी बात एक शानदार माहौल, कभी लगा ही नहीं कि जॉब कर रहा हूँ .सुबह आठ से
दोपहर 2 बजे की जॉब के बाद
जिंदगी के बहुत सारे काम यूं ही हो जाते थे .अरावली हिल्स के नीचे रहते
हुए हमेशा प्रकृति को अपने पास ही महसूस किया जो अब शायद नहीं कर पाऊंगा
लेकिन हर अच्छी चीज , जगह
और लोग भी कभी
न कभी ,किसी न किसी वजह से
बिछड़ते जरुर है शायद वही अलविदा वाली फीलिंग्स आ रही है मुझे ....फिलहाल 31
मई तक यही हूँ उसके बाद 1 जून को मेवाड़ यूनिवर्सिटी के वसुंधरा कैम्पस
में नई
जॉब ज्वाइन करूँगा .दिल्ली के नजदीक या यूं कहें दिल्ली में ही आ गया
हूँ .... अब दिल्ली वाले मित्रों से मुलाक़ात हो पाएगी ...सेंट मार्गेट के
मेरे सहयोगियों और इसके प्रबंधन को मेरा ह्रदय से आभार कि इन्होने हमेशा
मुझे बेहतर काम करने के लिए एक अच्छा माहौल दिया और हमेशा मेरा साथ दिया,अपने स्टूडेंट्स को बहुत मिस करूँगा जिन्हें सालों पढ़ाया
...Love u all ,love u Neemrana .....
Monday, March 23, 2015
अच्छी लड़कियाँ बुरे लड़कों को क्यों पसंद करती है
मोनिका जैन
ज्यादातर लड़कियाँ बुरे लड़कों की तरफ आकर्षित होती है. इस फैक्ट ने अच्छाई को खत्म करने में कहीं ना कहीं अपना योगदान दिया है. इसलिए लड़कियों गौर फरमाओं. एक अच्छा लड़का तुमसे बहुत ज्यादा रोमांटिक और फ़्लर्टी बातें ना कर पाए पर वह प्यार तुम्हें बड़ी शिद्दत से करेगा. वह तुम्हें ठहाकों वाली हँसी भले ही ना दे पाए पर कभी रुलाएगा भी नहीं. हो सकता है वह बड़े-बड़े गिफ्ट्स और सरप्राइज पार्टी के दिखावे ना कर पाए पर वह तुम्हें जो भी देगा वह ओरिजिनल होगा...और ओरिजिनल तो ओरिजिनल ही होता है
ज्यादातर लड़कियाँ बुरे लड़कों की तरफ आकर्षित होती है. इस फैक्ट ने अच्छाई को खत्म करने में कहीं ना कहीं अपना योगदान दिया है. इसलिए लड़कियों गौर फरमाओं. एक अच्छा लड़का तुमसे बहुत ज्यादा रोमांटिक और फ़्लर्टी बातें ना कर पाए पर वह प्यार तुम्हें बड़ी शिद्दत से करेगा. वह तुम्हें ठहाकों वाली हँसी भले ही ना दे पाए पर कभी रुलाएगा भी नहीं. हो सकता है वह बड़े-बड़े गिफ्ट्स और सरप्राइज पार्टी के दिखावे ना कर पाए पर वह तुम्हें जो भी देगा वह ओरिजिनल होगा...और ओरिजिनल तो ओरिजिनल ही होता है
Friday, February 20, 2015
हमारी भी लड़ाई होती है ...
शशांक द्विवेदी
कल किसी ने मेरी मैरिज एनिवर्सरी की पोस्ट पढ़ने के बाद एक सवाल किया
कि क्या आपके और आपकी पत्नी के बीच भी लड़ाई होती है तो मैंने जवाब में कहा कि
दुनियाँ में पति –पत्नी की शायद ही ऐसी कोई जोड़ी होती होगी जिनके बीच कभी भी लड़ाई –झगड़ा
,नोक झोंक ना होती हो .खैर मेरे और प्रिया के बीच भी कभी कभार यह सब हो जाता है . आखिर हम दोनों भी इंसान है ,आदर्श स्तिथि तो
सिर्फ देवी –देवताओं में ही होती होगी .
हम दोनों के विचार बहुत भिन्न है कई मुद्दों पर मतभेद भी रहता है
लेकिन विचारों की यही भिन्नता मुझे कई बार बहुत ठीक लगती है इससे किसी भी चीज के
हर पहलू को समझने में मदत मिलती है .वैसे भी मेरा मानना है कि पति –पत्नी होने का
मतलब यह नहीं है कि एक दूसरे की जी –हुजूरी करने लग जाएँ या गुलामी जैसा महसूस
करें .सीधी सी बात है व्यक्तित्व भिन्न है तो विचार भी भिन्न ही होंगे .इसलिए
बेहतर आपसी समझ बनाने की जरुरत होती है .
खाने के मामले में प्रियंका जहाँ बेहद सात्विक है मतलब वो लहसुन और
प्याज बिल्कुल नहीं खाती ना ही उसके परिवार में कोई खाता वहीं मुझे ये बेहद पसंद
है .प्रियंका के होते हुए घर में सभी सब्जियां बिना लहसुन और प्याज के ही बनती है
,सबसे खास बात यह है कि सब्जियां बेहद शानदार और टेस्टी बनती है और अब तो मुझे भी
खूब पसंद आने लगी ..हाँ अब मै अलग से प्याज सलाद के साथ में खा लेता हूँ . कई मामले ऐसे भी है जहाँ वो
मेरी बात मानती है .करियर के मामले में जहाँ मै पूर्णकालिक तौर पर मीडिया में जाना
चाहता था /चाहता हूँ लेकिन प्रियंका ने कभी जाने नहीं दिया उसने कहा पढाने के साथ
लेखन करो वही ठीक है मीडिया में जाने की जरुरत नहीं है.. प्रिया ने अमर उजाला में
कई साल काम किया इसलिए उसे मीडिया का अनुभव मुझसे कहीं ज्यादा है फिलहाल उसकी बात
मानना ही मुझे ठीक लगा .मेरे अंदर ड्रेसिंग सेंस नहीं है प्रिया में है और आज की
डेट में मेरे ८० फीसदी कपड़े प्रियंका ही खरीदती है .प्रियंका आम ठेठ भारतीय
पत्नियों की तरह सिर्फ “यस मैन “ नहीं है बल्कि मेरे अंदर या फिर मेरे किसी काम में उसे जो ठीक नहीं
लगता उस पर वो बिना झिझक कर बोलती है .चाहे वो मुझे बुरा ही क्यों ना लगे ..बहुत
मामलों में मेरी पहली आलोचक मेरी पत्नी ही है ..एक बात जरुर है कि मुझे कई बार
शादी एक बंधन के रूप में भी दिखती है क्योंकि शादी के पहले भी मै ५ साल प्रिया के
साथ रहा वहाँ मुझे बड़ी स्वतंत्रता महसूस होती थी लेकिन शादी के बाद बिना वजह बहुत
सारे झंझट आ जाते है मसलन परिवार ,समाज ,रिश्तेदार..इन्हें खुश करो ,उन्हें खुश
करो ...ज्यादातर नोंकझोक भी इन्ही बातों से होती है ..बेवजह के ढकोसलों से भी बहुत
खीज और परेशानी होती है ...लेकिन फिर भी ये सब तो झेलना ही पड़ेगा भाई क्योंकि
प्रेम विवाह की कुछ कीमत तो चुकानी ही
पड़ती है. लेकिन विचारों में थोड़ा बहुत मतभेद होते हुए भी हमारे बीच “प्रेम “ का
गहरा अहसास है जो हमें हमेशा जोड़े रहता है और सच्चाई है कि सिर्फ “प्रेम “ में ही
इतना सामर्थ्य है जो आपको जिंदगी भर जोड़े रख सकता है .
Thursday, February 19, 2015
तुम्हे देखा है बहुत ,फिर भी बहुत कम देखा ..
6 year of togetherness ... आज शादी को 6 साल पूरे हो गये ,लेकिन प्रियंका से दोस्ती -प्रेम को तो 11 साल हो गये ..इतना वक्त गुजर गया पता ही नहीं चला ..आगरा आया था इंजीनियरिंग की पढाई करने उसी दौरान पहले "प्रेम" हुआ फिर "विवाह " मतलब प्रेम -विवाह हो गया...काफी मुश्किलें आई लेकिन हो गया ...वैसे मेरा स्पष्ट मानना है कि संघर्ष के ,प्रेम के ,रोमांस के वे 5 साल काफी जबर्दस्त थे...काश वो दिन फिर से वापस आ जाए ... मेरी जिंदगी की कहानी पूरी फ़िल्मी है फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ के सभी पात्र वास्तविक है ....प्रियंका के प्रेम ने ही मुझे "लेखक "भी बना दिया ..सच कहूँ तो मै पत्थर था उसने ही मुझे तराश कर किसी काम का बना दिया ...मै जो कुछ भी हूँ उसमें उसका बहुत ज्यादा योगदान है .. .अमर उजाला ,आगरा से चली ये प्रेम कहानी तो फिलहाल जबर्दस्त तरीके से चल रही है ,उम्मीद करता हूँ कि आगे भी चलती रहेगी ..क्योंकि मुझे हमेशा से यही लगता है कि सिर्फ "प्रेम "ही आपको जोड़े रख सकता है ,विवाह तो एक पड़ाव भर है ..
प्रिया के लिए तो यही पंक्तियाँ याद आ रहीं है कि
"तुमसा ना कोई हमदम देखा ,उड़ गये होश जवानी का वो आलम देखा ,तुम्हे देखकर जी भरता ही नहीं ,तुम्हे देखा है बहुत ,फिर भी बहुत कम देखा ..."
मै बहुत खुश नसीब हूँ कि मुझे प्रिया जैसी प्रेमिका और जीवन संगिनी मिली ,उसने मुझे बहुत खुशी और प्यार दिया ,हर कदम पर मेरा साथ देते हुए मेरा हौसला भी बढ़ाया ...प्रियंका को शादी की सालगिरह पर ढेरों शुभकामनाएँ.....ईश्वर से प्रार्थना है कि हमारे संबंधों की मजबूत डोर ऐसे ही बंधी रहें ...
मै बहुत खुश नसीब हूँ कि मुझे प्रिया जैसी प्रेमिका और जीवन संगिनी मिली ,उसने मुझे बहुत खुशी और प्यार दिया ,हर कदम पर मेरा साथ देते हुए मेरा हौसला भी बढ़ाया ...प्रियंका को शादी की सालगिरह पर ढेरों शुभकामनाएँ.....ईश्वर से प्रार्थना है कि हमारे संबंधों की मजबूत डोर ऐसे ही बंधी रहें ...
हमारी भी लड़ाई होती है ...
कल किसी ने मेरी मैरिज एनिवर्सरी की पोस्ट पढ़ने के बाद एक सवाल किया
कि क्या आपके और आपकी पत्नी के बीच भी लड़ाई होती है तो मैंने जवाब में कहा कि
दुनियाँ में पति –पत्नी की शायद ही ऐसी कोई जोड़ी होती होगी जिनके बीच कभी भी लड़ाई –झगड़ा
,नोक झोंक ना होती हो .खैर मेरे और प्रिया के बीच भी कभी कभार यह सब हो जाता है . आखिर हम दोनों भी इंसान है ,आदर्श स्तिथि तो
सिर्फ देवी –देवताओं में ही होती होगी .
हम दोनों के विचार बहुत भिन्न है कई मुद्दों पर मतभेद भी रहता है
लेकिन विचारों की यही भिन्नता मुझे कई बार बहुत ठीक लगती है इससे किसी भी चीज के
हर पहलू को समझने में मदत मिलती है .वैसे भी मेरा मानना है कि पति –पत्नी होने का
मतलब यह नहीं है कि एक दूसरे की जी –हुजूरी करने लग जाएँ या गुलामी जैसा महसूस
करें .सीधी सी बात है व्यक्तित्व भिन्न है तो विचार भी भिन्न ही होंगे .इसलिए
बेहतर आपसी समझ बनाने की जरुरत होती है .
Sunday, February 8, 2015
अब तो बहाना ही पड़ेगी उल्टी गंगा!!
अनुराधा बेनीवाल
उत्तर
भारत में एक गाँव था. कहने को तो गाँव में काफी खुशहाली थी लेकिन कुछ समय से वहां
एक विचित्र समस्या घर कर गयी थी. वहां दिन ढलने के बाद लड़को का निकलना मुश्किल हो
गया था. हर गली नुक्कड़ पे आवारा लड़कियाँ खड़ी रहती, आते जाते लड़को पर फब्तियाँ कसती,
उन्हें भद्दे इशारे करती, और मौक़ा लगने पर
चोंटी तक काट लेती. गांव के बस स्टॉप, पान कि दुकान, चाय कि दुकान, पंसारी यहाँ तक के पंचयात तक में
उन्होंने अपना कब्ज़ा जमा लिया था. जब देखो, जहाँ देखो
लड़कियां ही खड़ी दिखती. एक-आध लड़का भूले-बिसरे वहां से चल गुजरता तो बस, सब उसपर लपक पड़ती.
लड़को
ने अकेले घर से निकलना तक बंद कर दिया था. खासकर के शाम के वक़्त तो हर जगह सिर्फ
लड़कियां ही लड़कियां दिखाई पड़ती. जब लड़को का पूरा समय अंदर बैठ कर दम घुटने लगा तो
कुछ हिम्मत वाले लड़को बाहर जाने की कोशिश की. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, लड़कियों ने लड़को
को ऐसा सबक सिखाया कि लड़के और भी भयभीत हो गए. आख़िरकार लड़को के माँ-बाप और कुछ
शुभचिंतको ने पंचायत के सामने अपनी समस्या रखी, लेकिन ये
क्या, पंचायत (जिसमे सब लड़कियां ही थी) ने लड़को का मोबाइल और
टी-वी बंद करा दिया.
गांव
में एक ही कॉलेज था, उस कॉलेज के गेट पर लड़कियां सुबह सुबह दादी बन के खड़ी हो जाती, और आते जाते लड़को को परेशान करती. लड़को का गेट पे खड़े रहना तो दूर,
कॉलेज के अंदर जाना तक दुर्भर हो गया था. लड़को के टाइट कपड़े देख
लड़कियां और भी उत्तेजित हो जाती, और उनकी फिगर तो लेकर भद्दी
बाते कहती थी. जब लड़को ने कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन से शिकायत की तो, लड़को को ढंग के कपड़े पहनने के लिए कहा गया और एक ड्रेस कोड जरुरी कर दिया.
अब कोई लड़का गर्मियों में छोटी बाजू का टी-शर्ट पहन के आता तो उसे वापस घर भेज
दिया जाता. बात भी सही थी, माहौल ही इतना ख़राब था, सोच समझ के कपड़े पहनने चाहिए.
लड़को
के माँ-बाप ने उन्हें सख्त हिदायत दे रखी थी कि वो आँखे नीची कर के सीधा कॉलेज जाए
और वापस घर आएं. कैंटीन में मस्ती करने की, खाली गेट पे तफरी करने की या दोस्ती-यारी में जोर से
हंसने या खिलखिलाने की उन्हें बिलकुल मनाई थी. जोर से हंसता या गाना गाता लड़का
लड़कियों को आकर्षित कर सकता था, और फिर तो आप सब जानते ही
हैं के जमाना ख़राब हो चला था. जो लड़का इन बातो को नहीं मानता उसे तेज और बुरे
करैक्टर के सर्टिफिकेट दिए जाने लगे.
अब
हर तरफ लड़को कि इज़्ज़त को खतरा था. और चूँकि घर की इज़्ज़त लड़को के हाथ में होती है, लड़को के घरवालों
ने अपनी नाक की खातिर लड़को को घर में रखना शुरू कर दिया. यहाँ तक कि शादी तक जल्दी
कराने लगे. लड़को को सिखाया जाने लगा कि लड़के खुली तिज़ोरी कि तरह होते हैं, अगर अपने को ढक के नही रखेंगे तो चोर की तो नज़र तो खराब होगी ही, जमाने को सुधारने से अच्छा है खुद को सुधारो. लड़के या आदमी को अपना शरीर
ढक कर रखना चाहिए अगर इस हवसी दुनिया से बचना है. और भी ऐसी अनेको बाते लड़को को
समझाई जाने लगी, और सख्त नियम बनाये जाने लगे, कि कैसे लड़कियों का शिकार होने से बचा जाए. शायद लड़कियों को समझाने का
किसी ने सोचा ही नहीं, और छोटी लड़कियां बड़ो के देखा देखी में
उन्ही जैसे बनने कि कोशिश करती.
यहाँ
तक कि फिल्मों और नाटको में ऐसी ही लड़की को हीरोइन बताया जाने लगा, जो लड़के के पीछे
पड़ जाए, सीटी बजाये, आँख मारे, भद्दे कमेंट करे, और उसकी ना में भी हाँ ही सुने. और
लड़के ऐसे ही अच्छे बताए जाने लगे जो अपने काम-से-काम रखें, आँख
नीची कर के चले और आख़िरकार अपने घरवालों की नाक की खातिर अग्नि-परीक्षा दे डाले.
अब छोटी लड़कियां टीवी पर ही अपने आइडियलस ढूंढ़ती और उनकी नक़ल करती, और क्यूंकि सीधे-सीधे लड़को से बात करना समाज ने बैन कर रखा था, वो फिल्मों से ही लड़को के बारे में जानकारी पाती.
जब
भी कोई लड़की किसी लड़के को तंग करती या उठा ले जाती और उसके साथ बतमीज़ी करती तो
लड़को पर ही लड़कियों को अट्रेक्ट करने का इलज़ाम लगाया जाता. पुलिस (जोकि लड़कियां ही
थी) उनसे भद्दे सवाल पूछती और अकेले शाम को उनके निकलने के मकसद पर सवाल करती.
मीडिया लड़को के चेहरे को ब्लर कर के बार बार उनके अकेले घर से निकलने के कारण
पूछती. अब लड़के खुद भी समझने लगे थे, अब उन्होंने खुद ही बाहर जाना बंद कर दिया था,
अब वो सोच समझ कर कपड़े पहनते और अपने दोस्तों को भी समझाते.
लेकिन
जब छोटे लड़को को भी परेशान किया जाने लगा और दो-तीन साल के लड़को के साथ भी कुकर्म
होने लगे तब पानी सर से गुजर गया. और उन्हें पूरे सिस्टम पर शक होने लगा. जब ऐसी
ऐसी घटनाएँ सामने आने लगी कि सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो जाते, तब लड़को ने एक
जुट हो धरने करने का फैंसला किया. अब एक दो घटनाएँ नहीं पूरा सिस्टम ही गड़बड़ लगने
लगा था. अब वो और नहीं सह सकते थे और सड़को पे उतर आये.
अब
उन्हें अपनी इज़्ज़त से प्यारी आज़ादी थी. एक बार रात को अकेले घूमने का सुख देखा तो
उन्हें भी लड़कियों के जैसे आज़ादी का मन करने लगा था. अब वो भी अकेले रात को बाइक
चलाना चाहते थे. अब उन्हें भी रात को खेत की ठंडी हवा में घूमना था. अब उन्हें पता
चल गया था, कि खुद कैसे ही कपड़े पहन लें, जब तक लड़कियाँ उन्हें
अपने बराबर का इंसान नहीं समझेंगी, उन्हें अकेले देख हमेशा
झपट ही पड़ेंगी. और अपने बराबर तब तक नहीं समझेंगी, जब तक
उन्हें हर तरफ उतनी ही गिनती में लड़के नहीं दिखाई देंगे जितनी के लड़कियां. जब
ड्रेस कोड सिर्फ लड़को पर नहीं लगाया जायेगा. जब मोबाइल फ़ोन की गलती ना बता लड़कियों
की गलती बताई जायेगी. जब इलज़ाम चाउमिन पर नहीं सीधे सीधे गुनहगार को दिया जाएगा.
जब वो घर की इज़्ज़त का टोकरा ढोना बंद कर देंगे. जब घरवाले लड़को को घर में बंद ना
कर, लड़कियों को लड़को कि इज़्ज़त करना सिखाएंगे. अब वो सब समझ
गयी थी, लेकिन समस्या समाज की नसों में फ़ैल गयी थी और उन्हें
पता था कि अब तो उलट-फेर ही उपाय है. एक-दो टहनियाँ नहीं अब तो जड़ो को काटना था.
और
जब जड़े कटती हैं तो कुछ घोंसले भी टूटते हैं, और बेगुनाह पंछी भी बेघर होते हैं. लेकिन बदलाव तो
लाना था, क्यूंकि और कोई चारा बचा ही नहीं था. गौर करें सब
लड़कियां बुरी नहीं थी, कुछ लड़कियां तो लड़को के साथ उनकी लड़ाई
तक में खड़ी थी. लेकिन सदियों से परेशान होते लड़को को लड़की जात पे ही शक होने लगा
था. एक लड़के पर अत्याचार होता तो गालियां पूरे लड़की समाज को पड़ती. अब लड़ाई बड़ी थी
तो इक्की दुक्की शरीफ लड़कियां भी लपेट में आई. लेकिन लड़ाई तो जायज़ थी और जारी
रहेगी.
(ref -palpalindia.com)
Subscribe to:
Posts (Atom)






