Wednesday, April 17, 2019

जल्दी फिट रहनें के लिए करें ये काम

*कम समय में होना है फिट तो पढ़ें काम के 6 टिप्स*
 शशांक द्विवेदी
1 कम समय में आपको जब मोटापा घटाना हो, तो ध्यान रखें खाने की मात्रा एकदम से बिल्कुल कम न करें। शरीर को 1200 कैलोरी की प्रतिदिन आवश्यकता होती है। ऐसे में आप 1000 से कम कैलोरी किसी भी स्थि‍ति में न लें। इससे थकान और उर्जा की कमी नहीं होगी।
2 खाने में तैलीय व मसालेदार चीजों से बिल्कुल परहेज करें। लो कैलोरी फूड पर ध्यान केंद्रित करें, उबली हुई सब्जियां भी फायदेमंद होंगी। चाहें तो बिना शकर का जूस, सूप, ग्रीन टी, नारियल पानी, नींबू पानी का सेवन कुछ घंटों में कर सकते हैं।
3 बिस्किट, ब्रेड, नमकीन, चॉकलेट, चिप्स जैसी चीजों से दूरी बना लें। मैदे की चीजें बिल्कुल न खाएं। सूप और जूस के मामले में भी बाजार की चीजों के बजाए घर पर बनाकर ही लें।
4 फल, सब्जियां, सलाद एवं सूखे मेवों को आहार में ज्यादा से ज्यादा शामिल करें। इससे आपके शरीर में पोषण की कमी नहीं होगी और उर्जा बनी रहेगी। इसके अलावा आपका पेट भी जल्दी भर जाएगा।
5 सुबह और शाम के समय लगभग 1 घंटा पैदल चलें और कार्डियो व्यायाम करें। लगभग 1 से डेढ़ घंटा कार्डियो करें। इसके अलावा योगा करने से भी शरीर सही आकार में आएगा।
6 सुबह खाली पेट गरम पानी में नींबू-शहद या फिर दालचीनी का पाउडर लें। आप चाहें तो हरा धनिया और नींबू का जूस बनाकर भी खालीपेट ले सकते हैं यह भी वजन कम करने में सहायक है।

बहुत गुणकारी है फिटकरी

*गर्मियों में नहाए फिटकरी के पानी से, होंगे कमाल के फायदे*

फिटकरी का इस्तेमाल आपने घर में होते कई बार देखा होगा। पानी को साफ करने के लिए अक्सर घरों में इसे मटके के पानी में डालकर घुमाया जाता है। फिटकरी के कुछ ऐसे घरेलू नुस्खे भी है, जो आपकी कई सेहत और सौन्दर्य समस्याओं को दूर कर सकते हैं। आइए, जानते हैं उन्हीं के बारे में -
1 शरीर पर जमी गंदगी और कीटाणुओं को समाप्त करने के लिए फिटकरी के पानी से नहाना बहुत अच्छा उपाय है।
2 यह आपके शरीर और पसीने की बदबू को भी कम करेगा।
3 त्वचा के दाग धब्बे हटाने के लिए फिटकरी एक बढ़िया उपाय है। आप चाहें तो नियमित रूप से चेहरे पर फिटकरी से मसाज करें या फिर फिटकरी मिले पानी से चेहरे को साफ करें। त्वचा बेदाग हो जाएगी।
4अगर आपके दांतों में दर्द है और आपको उससे निजात नहीं मिल रही, तो फिटकरी का पाउडर संबंधित स्थान पर लगाएं। ऐसा करने पर आपको दांत दर्द से निजात मिलेगा।


लिवर की सेहत के लिए जरूरी हैं ये

*लिवर की समस्या में फायदेमंद है इन 5 चीजों का सेवन, आप भी जानिए*
 शशांक द्विवेदी
1. कलौंजी का तेल : यह एक एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करता है। इसे हम खासतौर पर शरीर की प्रतिरोधकता बढाने वाला समझ सकते हैं। एंटीऑक्सीडेंट कैंसर से लडते हैं इसके अलावा लिवर की हेल्थ भी कलौंजी से बढ़िया रहेगी। इस तेल के उपयोग से लिवर लेड जैसी धातु को शरीर के बाहर आराम से निकाल देता है।
2. हल्दी : हल्दी का उपयोग भारतीय भोजन में रंग, स्वाद और न्यूट्रिएंट्स के लिए होता है। इसे जादुई चीज़ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इसमें एंटीऑक्सीडेंट, एंटीइंफ्लेमेट्री (सूजन घटाने का), एंटीबैक्टेरियल गुण होते हैं। लिवर एकदम दुरूस्त रहेगा।
3. अदरक : अदरक लिवर को ऐसे तत्व देता है जिससे इसका काम की क्षमता बढ़ जाती है। यह भी एंटीऑक्सीडेंट गुणों का खजाना है। रिसर्च में तब बात साबित हो चुकी है कि अदरक का प्रयोग आपके लिवर को तंदुरूस्त रखेगा।
4. नींबू : नींबू का पेट या पाचन को दुरूस्त करने के लिए कई बार आपके सामने सलाह के रूप में आया होगा। हर दिन की शुरुआत नींबू और गर्म पानी के साथ करने की सलाह दी जाती है। लिवर की क्रियाओं को नींबू जमकर बूस्ट देता है।
5. चुकंदर : खून को हीमोग्लोबिन और आपको हेल्थ की लालिमा देने वाला चुकंदर गुणों का खजाना है। कई बीमारियों से आपकी रक्षा के अलावा चुकंदर आपके लिवर को भी कई गुना अधिक ताकतवर बना देगा।

Sunday, April 14, 2019

नींबू है बहुत फायदेमंद

*थोड़ा सा नींबू भोजन में शामिल करने से होंगे 12 बेहतरीन फायदे*

1. नींबू खराब गले, कब्ज, किडनी और मसूड़ों की समस्याओं में राहत पहुंचाता है।
 2. यह ब्लड प्रेशर और तनाव को कम करता है।
3. नींबू विटामिन सी का बेहतर स्रोत है इसलिए यह त्वचा को स्वस्थ बनाने के साथ ही लिवर के लिए भी यह बेहतर होता है।
4. नींबू पानी में कई तरह के मिनरल्स जैसे आयरन, मैग्नीशियम, फास्फोरस, कैल्शियम, पोटैशियम और जिंक पाए जाते हैं।
5. नींबू पानी पीने से शरीर को रिहाइड्रेट होने में मदद मिलती है और यह यूरीन को पतला रखने में मदद करता है। साथ ही यह किडनी स्टोन बनने के किसी भी तरह के खतरे को कम करता है।
6. नींबू पानी हाई शुगर वाले जूस व ड्रिंक का बेहतर विकल्प है। खासतौर से उनके लिए जो डायबिटिक या वजन कम करना चाहते हैं।
7. पाचनक्रिया में फायदेमंद- नींबू पानी में मौजूद नींबू का रस हाइड्रोक्लोरिक एसिड और पित्त सिक्रेशन के प्रोडक्शन में वृद्धि करता है,जो पाचन के लिए आवश्यक है।
8. प्रतिदिन सुबह गर्म नींबू पानी पिएं और पूरे दिन कॉन्स्टीपेशन की समस्या से दूर रहें।
9. नींबू पानी को गुनगुना करके पीने से गले की खराबी या फैरिन्जाइटिस में आराम पहुंचाता है।
 10. नींबू पानी पीने से मसूड़ों से संबंधित समस्याओं से राहत मिलती है। नींबू पानी में एक चुटकी नमक मिलाकर पीने से बेहतर परिणाम मिलते हैं।
11. नींबू पानी में एंटी ट्यूमर गुण होते हैं, जिससे की कैंसर का खतरा कम हो जाता है।
12. इसमें ब्लड प्रेशर को कम करने के गुण के साथ ही तनाव, डिप्रेशन और अवसाद कम करने के गुण पाये जाते हैं। नींबू पानी पीने से तुरंत ही आपको आराम का अनुभव होगा।

Saturday, April 13, 2019

ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करनें में मददगार है लीची

*ब्लडप्रेशर को नियंत्रित कर हृदयगति को रखना है सही तो खाएं गुणों से भरपूर लीची*

1. विटामिन, मिनरल्स, एंटी-ऑक्सीडेंट और डायट्री फाइबर से भरपूर लीची आपके स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी फल है, जिसमें 66 कैलोरी प्रति 100 ग्राम की मात्रा में उपलब्ध होती है।और इसमें सैच्युरेटेड फैट या संतृप्त वसा बिल्कुल भी नहीं होता।
2. लीची में मौजूद पोटेशि‍यम ब्लड प्रेशर को नियंत्रित कर ह्दय-गति और खून की चाल को नियंत्रित करता है, जिससे हृदय रोग या अटैक की संभावना कम होती है।
3. इसमें कॉपर भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो लाल रक्त कणिकाओं का निर्माण करता है।
4. लीची में एंटी-ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो आपकी त्वचा को स्वस्थ और खूबसूरत बनाए रखने में सहायक हैं।
5. लीची में विटामिन- सी भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है। प्रति 100 ग्राम लीची में विटामिन-सी की मात्रा 71.5 मिलीग्राम होती है, जो प्रतिदिन की आवश्यकता का 119 प्रतिशत है।
6. बी-कॉम्प्लेक्स और बीटा कैरोटीन से भरपूर लीची, फ्री रेडिकल्स से रक्षा करती है, साथ ही मेटाबॉलिज्म को भी नियंत्रित करती है।
 7. ऑथ्राईटिस में लीची खाने से लाभ होता है और दमा के मरीजों के लिए भी लीची बेहद लाभदायक फल है।इसके अलावा यह रक्तसंचार को बेहतर करने में सहायक है।
 8. लीची में एंटी-ऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो आपकी त्वचा को स्वस्थ और खूबसूरत बनाए रखने में सहायक हैं। इसके साथ ही लीची, सूरज की हानिकारक यूवी किरणों से बचाव करने में भी बेहद फायदेमंद है।
9. इसमें मौजूद फाइबर की अत्यधि‍क मात्रा आपके पाचन तंत्र को बेहतर बनाने के साथ ही सीने और पेट की जलन को भी शांत करती है।
 10. यदि आपको कफ की शिकायत बनी रहती है, तो लीची आपके लिए लाभदायक सिद्ध हो सकती है।

यूरिक एसिड से संबंधित भ्रांतियों को दूर करिये

स्कंद शुक्ला

साधो , तुम्हें 'गाउट' है। गाउट नहीं समझते ? यूरिक एसिड वाला गठिया-रोग !

यूरिक एसिड के कारण होने वाला गठिया 'गाउट' के नाम से जाना जाता है।
साधो , समस्या यही है। लोग यूरिक एसिड को ज़्यादा जानते हैं और गाउट को कम। इसी लिए चारों ओर यह अन्धेर फैला है। कारक के बारे में जब लोगों को अधिक पता होगा और परिणति के बारे में कम , तो ऐसे ही तमाशे होंगे।
साधो , तुम्हारे पुराने वाले डॉक्टर साहब ने तुमसे प्रोटीन बन्द करने को कहा है ; उनका मानना है कि अगर प्रोटीन खाओगे तो यूरिक एसिड बढ़ जाएगा। इसलिए तुमने हर तरह के प्रोटीन-समृद्ध भोज्य का सेवन त्याग दिया है। प्रोटीन की वृद्धि रोकने के लिए तुमने अपने पुराने डॉक्टर साहब के साथ कमर कस ली है।
साधो , प्रोटीन के पीछे डण्डा लेकर क्यों पड़े हैं , तुम और तुम्हारे डॉक्टर साहब ! असली मुजरिम तो कोई और है ! वह जिसे न तुम्हारे डॉक्टर साहब देखते हैं और न तुम्हें दिखाते हैं। बिलावजह दाल-दूध-अण्डा --- सब के लिए तुम्हारी जीभ पर पहरा बिठा दिया है !
उनसे कहो कि एम.बी.बी.एस प्रथम वर्ष में पढ़ कर धर दी बायोकेमिस्ट्री की पाठ्यपुस्तक दोबारा खोलें और उसमें यूरिक एसिड के निर्माण-चक्र को फिर से पढ़ें। सम्भवतः बहुत सी अच्छी पुरानी बातों के तरह उन्होंने उसे भी बिसरा दिया है। यूरिक एसिड-निर्माण का तो प्रोटीन से कोई सम्बन्ध ही नहीं है।
साधो , यूरिक एसिड एक अपशिष्ट है शरीर का --- एक प्रकार का मल , जो शरीर मुख्य रूप से पेशाब में बाहर निकालता है। यह प्रोटीन से नहीं , बल्कि प्यूरीन (डी.एन.ए. और आर.एन.ए.) के विखण्डन के फलस्वरूप बनता है। प्यूरीन ही यूरिक एसिड के निर्माण की कच्ची सामग्री हैं , कोई प्रोटीन-वोटीन नहीं।
अब तुम प्यूरीन के विषय में जानते ही नहीं और तुम्हारे पुराने डॉक्टर साहब को बायोकेमिस्ट्री अब याद नहीं रही। इसलिए वे प्रोटीन-परहेज़ की माला फेर रहे हैं और तुम्हें भी फेरने को कह रहे हैं। जब चिकित्सा लेने व देने वाले दोनों ही पढ़ाई-लिखाई में कमज़ोर होंगे , तो ऐसी ही भ्रान्तियाँ तो पैदा होंगी न !
साधो , गाउट नामक गठिया-रोग शरीर में यूरिक एसिड के अधिक पैदा होने से अथवा पेशाब में कम निकाले जाने से उत्पन्न होता है। ज़्यादा विस्तार में नहीं जाऊँगा , लेकिन इतना तो जानो ही कि इस रोग का मुख्य लक्षण किसी ख़ास जोड़ में ( विशेषकर पैर के अँगूठे , टखने अथवा घुटने में ) भयंकर दर्द व सूजन है। सूजन भी ऐसी कि जोड़ के ऊपर की खाल लाल नज़र आने लगती है।
गाउट नामक इस गठिया का दर्द कोई ऐसा-वैसा दर्द नहीं है। मेडिकल पाठ्यपुस्तकों में सबसे भीषण दर्दों --- प्रसवपीड़ा , हृदयाघात और दाँत-दर्द के साथ गाउट का नाम आता है। अब तुम समझ सकते हो कि मैं किस शिद्दत के दर्द की बात यहाँ कर रहा हूँ।
साधो , गाउट का उपचार तुम्हें नहीं बताऊँगा , नहीं तो तुम नीम-हक़ीमी करने लगोगे। लेकिन कुछ करणीय-अकरणीय बातों से अवश्य अवगत कराऊँगा।
गाउट में पानी का 2-3 लीटर सेवन लाभप्रद रहता है। यह पानी जो तुम पीते हो न , पेशाब बनकर यूरिक एसिड के उत्सर्जन में मदद करता है। मांस और मदिरा से यथासम्भव दूर रहो। ये दोनों वस्तुएँ शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ाती हैं। और हाँ ! फैंटा-पेप्सी-कोका कोला को भी नमस्ते कर लो , इनसे भी यह बढ़ता है।
दाल और दूध छोड़ने की बात मत करो , उन्हें खाते रहो। प्रोटीन का ढंग से सेवन ज़रूरी है , सभी के लिए। ( कोई गुर्दा-रोगी हो , तो बात अलग है !) नींबू / सन्तरा / मौसमी /आँवला खाओ , इनमें मौजूद विटामिन सी यूरिक एसिड की मात्रा नीचे रखने में सहायक है।
और फिर सबसे महत्त्वपूर्ण बात , साधो --- अपने तोंद छाँटो ! मोठे लोगों का तो यूरिक एसिड बढ़ा हुआ आएगा ही , यह तो एक वैज्ञानिक सत्य है ! मक्कारी -कामचोरी बन्द करो , कसरत करो , पसीना बहाओ !
और अन्त में ! अपने डॉक्टर साहब से ऊपर लिखी सभी बातों पर चर्चा करो , मगर ख़ुद बिना डिग्री के डॉक्टर न बनो। जिस मेडिकल साइंस को समझने में हमें पन्द्रह साल भी कम जान पड़े , उसे हम तुम्हें एक फ़ेसबुकिया लेख में नहीं समझा सकते।
लेकिन यूरिक एसिड प्रोटीन खाने से नहीं बनता , यह एक जैवरासायनिक सत्य है। इसे जानो , मानो और अपने डॉक्टर साहब को याद दिलाओ।

Wednesday, April 10, 2019

मर्ज को दें मीठी गोली

आज 10 अप्रैल को विश्व होम्योपैथी दिवस पर विशेष
Homeopathy Basics: Special on World Homeopathy Day

मर्ज को दें मीठी गोली
होम्योपैथी से तो सभी परिचित हैं, लेकिन सवाल यह है कि हम होम्योपैथी को जानते कितना हैं? कहीं हमारी जानकारी सुनी-सुनाई बातों पर तो आधारित नहीं? एक मरीज के रूप में होम्योपैथी की खासियतों और सीमाओं के बारे में जानना जरूरी है। होम्योपैथी के विशेषज्ञ डॉक्टरों से बात कर पूरी जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति की शुरुआत 1796 में सैमुअल हैनीमैन द्वारा जर्मनी से हुई। आज यह अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी में काफी मशहूर है, लेकिन भारत इसमें वर्ल्ड लीडर बना हुआ है। यहां होम्योपैथी डॉक्टर की संख्या ज्यादा है तो होम्योपैथी पर भरोसा करने वाले लोग भी ज्यादा हैं। भारत सरकार भी इस चिकित्सा पद्धति पर काफी ध्यान दे रही है। इसे आयुष मंत्रालय के अंतर्गत जगह दी गई है।

क्या है होम्योपैथी, क्यों है यह खास?
एलोपैथी और आयुर्वेद की तरह होम्योपैथ भी एक चिकित्सा पद्धति है। इसमें एलोपैथी की तरह दवाओं का एक्सपेरिमेंट जानवरों पर नहीं होता। इसे सीधे इंसानों पर ही टेस्ट किया जाता है। होम्योपैथिक दवाइयां एलोपैथी की तुलना में काफी सुरक्षित मानी जाती हैं।

क्या इसके भी साइड इफेक्ट्स हैं?
होम्योपैथी के साइड इफेक्ट्स काफी कम होते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि किसी को बुखार की दवाई दी गई और उस व्यक्ति को लूज मोशन, उल्टी या स्किन पर एलर्जी हो हो जाए। दरअसल, ये परेशानी साइड इफेक्ट की वजह से नहीं है। ये होम्योपैथी के इलाज का हिस्सा है, लेकिन लोग इसे साइड इफेक्ट समझ लेते हैं। इस प्रक्रिया को 'हीलिंग काइसिस' कहते हैं जिसके द्वारा शरीर के जहरीले तत्व बाहर निकलते हैं।

क्या होम्योपैथी में इलाज काफी धीमा होता है?
80 फीसदी मामलों में लोग होम्योपैथ के पास तब पहुंचते हैं जब एलोपैथी या आयुर्वेद से इलाज कराकर थक चुके होते हैं। कई बार तो 15 से 20 साल से इंसुलिन लेने वाले शुगर के पेशंट थक-हारकर होम्योपैथ के पास पहुंचते हैं। ऐसे मामलों में इलाज में वक्त लग सकता है।

कैसे होता है इलाज?
इसमें मरीज की हिस्ट्री काफी मायने रखती है। अगर किसी की बीमारी पुरानी है तो डॉक्टर उससे पूरी हिस्ट्री पूछता है। मरीज क्या सोचता है, वह किस तरह के सपने देखता है जैसे सवाल भी पूछे जाते हैं। ऐसे तमाम सवालों के जवाब जानने के बाद ही मरीज का इलाज शुरू होता है।
 
किस तरह की बीमारियों में सबसे अच्छी?
इलाज लगभग सभी बीमारियों का है। पुरानी और असाध्य बीमारियों के लिए सबसे अच्छा इलाज माना जाता है इसे। असाध्य बीमारियां वे होती हैं जो एलोपैथ से इलाज के बाद भी बार-बार आ जाती हैं, लेकिन माना जाता है कि होम्योपैथी उन्हें जड़ से खत्म कर ली है, मसलन एलर्जी (स्किन), एग्जिमा, अस्थमा, कोलाइटिस, माइग्रेन आदि।

किन बीमारियों में कम कारगर?
होम्योपैथी कैंसर में आराम दे सकती है। हां, पूरी तरह ठीक करना मुश्किल है। शुगर, बीपी, थायरॉइड आदि के नए मामलों में यह ज्यादा कारगर है। अगर किसी मर्ज का पुराना केस है तो पूरी तरह ठीक करने में देरी होती है।

इसके इलाज के लिए कोई डॉक्टर सफेद मीठी गोलियां देता है तो कोई लिक्विड। ऐसा क्यों?
होम्योपैथी हमेशा से ही मिनिमम डोज के सिद्धांत पर काम करती है। इसमें कोशिश की जाती है कि दवा कम से कम दी जाए। इसलिए ज्यादातर डॉक्टर दवा को मीठी गोली में भिगोकर देते हैं क्योंकि सीधे लिक्विड देने पर मुंह में इसकी मात्रा ज्यादा भी चली जाती है। इससे सही इलाज में रुकावट पड़ती है।

क्या होम्योपैथी में दवा सुंघाकर भी इलाज किया जाता है?
हां, कुछ दवाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें मरीज को सिर्फ सूंघने के लिए कहा जाता है। मसलन, साइनुसाइटिस और नाक में गांठ की समस्या होने पर डॉक्टर ऐसे ही इलाज करते हैं।

अगर किसी को 5 बीमारियां हैं तो क्या उसे 5 तरह की दवा दी जाएगी?
ऐसा बिलकुल भी नहीं है। एलोपैथ की तरह इसमें 5 अलग-अलग बीमारियों के लिए 5 तरह की दवा नहीं दी जाती है। होम्योपैथ डॉक्टर 5 बीमारियों के लिए एक ही दवा देता है।

इलाज के दौरान लहसुन-प्याज न खाएं?
10-15 साल पहले होम्योपैथी दवाई लिखने के बाद डॉक्टर यह ताकीद जरूर करते थे कि लहसुन, प्याज जैसी चीजें नहीं खाना है, क्योंकि माना जाता था कि इनकी गंध से दवाई का असर कम हो जाएगा। लेकिन नए शोधों ने इस तरह की सोच को बदल दिया है। अब डॉक्टर इन चीजों को खाने की मनाही नहीं करते। अब इंसानी शरीर प्याज, लहसुन आदि के लिए नया नहीं रहा।

तो इस चिकित्सा पद्धति से इलाज कराते हुए कोई परहेज नहीं है?
होम्योपैथी की दवा खाने के दौरान जिस एक चीज की सख्त मनाही होती है वह है कॉफी। दरअसल, कॉफी में कैफीन होती है। कैफीन होम्योपैथी दवा के असर को काफी कम कर देती है। कुछ डॉक्टर डीयो और परफ्यूम भी लगाने से मना करते हैं। माना जाता है कि इनकी खुशबू से भी दवा का असर कम हो जाता है।

एक होम्योपैथिक डॉक्टर की डिग्री क्या होनी चाहिए?
होम्योपैथी में इलाज करने के लिए साढे पांच साल की BHMS की डिग्री जरूरी है। यह एलोपैथ की MBBS की डिग्री के बराबर है। इसके अलावा डॉक्टर के पास अगर MD (3 साल) की डिग्री हो तो सोने पर सुहागा है। एमडी के कई ब्रांचेज हैं, मसलन मटीरिया मेडिका (दवाओं के बारे में), साइकाइट्री (मरीज की मानसिक स्थिति को समझना), रिपोर्टरी (दवाई ढूंढने का तरीका)। DHMS यानी डिप्लोमा वाले, जिन्होंने 1980 से पहले िडग्री ली है, प्रैक्टिस कर सकते हैं।

क्या होम्योपैथिक डॉक्टरों का रजिस्ट्रेशन भी होता है?
हां, होता है। एक केंद्रीय स्तर पर और दूसरा राज्य स्तर पर। इन दोनों जगहों पर डॉक्टरों को रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। केंद्र में CCH (Central Council of Homeopathy) में सभी डॉक्टरों को रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। इसकी साइट www.cchindia.com पर जाकर किसी खास डॉक्टर से संबंधित जानकारी RTI के द्वारा मांग सकते हैं। यह वेबसाइट आयुष मंत्रालय की साइट www.ayush.gov.in से सीधा लिंक्ड है। इनके अलावा जिस राज्य में होम्योपैथ प्रैक्टिस करता है, उसी राज्य की कौंसिल में भी रजिस्ट्रेशन जरूरी है।

कई होम्योपैथ डॉक्टर ऐलोपैथिक दवाई भी देते हैं, ऐसा क्यों है?
कोई भी होम्योपैथ एलोपैथी की दवाई नहीं दे सकता। कानूनी रूप से गलत है।

क्या प्लास्टिक या शीशे की डिब्बी से फर्क पड़ता है?
साइज से कोई फर्क नहीं पड़ता। हां, होम्योपैथी की दवाएं कांच की बोतल में देना ही बेहतर है। अगर उस पर कॉर्क लगा हो तो और भी अच्छा। दरअसल, होम्योपैथी की दवाओं में कुछ मात्रा में अल्कोहल का उपयोग किया जाता है। अल्कोहल प्लास्टिक से रिऐक्शन कर सकता है। वैसे, आजकल प्लास्टिक बॉटल की क्वॉलिटी भी अच्छी होती है। इसलिए प्लास्टिक का इस्तेमाल भी कई डॉक्टर दवाई देने के लिए करते हैं। दरअसल, कांच की बॉटल को साथ में ले जाना करना मुश्किल होता है। इसके टूटने का खतरा बना रहता है।

क्या एलोपैथी और होम्योपैथी की दवाई एक साथ ले सकते हैं?
हां, जरूर ले सकते हैं, लेकिन यह समझना मुश्किल हो जाता है कि बीमारी ठीक किसकी वजह से हुई है।

कहां की बनी हुई दवाइयां बेहतर हैं?
होम्योपैथी की दवाई के उत्पादन और गुणवत्ता के मामले में जर्मनी पूरी दुनिया में आगे है। इंडिया में होम्योपैथी की डिमांड को देखते कुछ जर्मन कंपनियों ने यहां भी अपने सेंटर शुरू किए हैं। कई भारतीय कंपनियां भी अच्छी दवाएं बना रही हैं।

क्या है होम्योपैथी की सीमा?
- अगर किसी शख्स में किसी विटामिन या मिनरल की कमी हो जाती है तो होम्योपैथी में उनके लिए ज्यादा ऑप्शन नहीं हैं। मसलन, किसी को आयरन की कमी की वजह से एनीमिया हो गया है तो इस मामले में होम्योपैथी की एक सीमा है।
- इमर्जेंसी की स्थिति में यह काम नहीं करती। अगर किसी का एक्सिडेंट हुआ है या हार्ट अटैक आया है तो एलोपैथी ही बेहतर ऑप्शन है। हां, जब इमर्जेंसी की स्थिति खत्म हो जाए, फिर स्थायी इलाज के लिए होम्योपैथी को शामिल कर सकते हैं।
- हर शख्स के ऊपर होम्योपैथी अलग-अलग तरीके से काम करती है। ऐसा नहीं है कि एक दवाई अगर एक पर काम कर गई तो वही दवाई दूसरे पर भी काम करेगी। साथ ही, इसका असर भी अलग-अलग व्यक्तियों पर अलग-अलग होता है। इसलिए लंबे समय से होम्योपैथी की दवाओं के उपयोग से फायदा न हो तो एलोपैथी, आयुर्वेद या नेचुरोपैथी को देखना चाहिए।
- मरीज की वर्तमान स्थिति से ज्यादा इतिहास खंगालने में यकीन करती है यह पद्धति। अगर किसी वजह से किसी की पूर्व की समस्याओं या इतिहास पता न हो तो होम्योपैथी से इलाज कराना मुश्किल हो जाता है।

एक्सपर्ट पैनल
डॉ. सुशील वत्स, बीएचएमएस, एमडी
डॉ. शुचींद्र सचदेव, बीएचएमएस,  एमडी
डॉ. कुशल बनर्जी, बीएचएमएस,  एमडी
डॉ. हिमांशु सक्सेना, बीएचएमएस, एमडी

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित