Tuesday, July 30, 2019

वायरल फीवर को मात देंगी ये घरेलू नुस्खे

*वायरल फीवर को मात देंगे ये 5 रामबाण घरेलू नुस्खे*
 शशांक द्विवेदी
1 हल्दी और सौंठ का पाउडर -सौंठ यानी कि अदरक का पाउडर और अदरक में होते है फीवर को ठीक करने वाले गुण। इसलिए एक चम्मच काली मिर्च के चूर्ण में एक छोटी चम्मच हल्दी, एक चम्मच सौंठ का चूर्ण और थोड़ी सी चीनी मिलाएं। अब इसे एक कप पानी में डालकर गर्म करें, फिर ठंडा करके पिएं। इससे वायरल फीवर खत्म होने में मदद मिलेगी।
2 तुलसी का इस्तेमाल करें -तुलसी में एंटीबायोटिक गुण होते हैं जिससे शरीर के अंदर के वायरस खत्म होते हैं। इसलिए एक चम्मच लौंग के चूर्ण में 10-15 तुलसी के ताजे पत्तों को मिलाएं। अब इसे 1 लीटर पानी में डालकर इतना उबालें जब तक यह सूखकर आधा न हो जाए। अब इसे छानें और ठंडा करके हर 1 घंटे में पिएं। ऐसा करने से वायरल से जल्द ही आराम मिलेगा।
3 धनिये की चाय पिएं -धनिये में कई औषधीय गुण होते हैं। इसकी चाय बनाकर पीने से भी वायरल में जल्द आराम मिलता है।
 4 मेथी का पानी पिएं -एक कप मेथी के दानों को रातभर भिगों लें और सुबह इसे छानकर हर एक घंटे में पिएं।
 5 नींबू और शहद -नींबू का रस और शहद भी वायरल फीवर के असर को कम करते हैं। आप शहद और नींबू का रस का सेवन भी कर सकते हैं।

स्मार्ट फ़ोन की वजह से इन जगहों पर दर्द हो सकता है

*सावधान, इन 5 जगहों पर दर्द की वजह हो सकता है आपका स्मार्टफोन*
 शशांक द्विवेदी
1 ऊंगलियों में दर्द - लंबे समय तक फोन का इस्तेमाल करना ऊंगलियों में दर्द का कारण बन सकता है। इससे ऊंगलियों में दर्द के साथ ही खिंचाव या अकड़न भी हो सकती है।
2 गर्दन में दर्द - फोन का इस्तेमाल करते समय आपकी गर्दन में भी दर्द होना स्वाभाविक है। लंबे समय तक गर्दन पर जोर देना या एक ही अवस्था में रहना हानिकारक हो सकता है।
3 आंख दर्द - लंबे समय तक स्मार्टफोन का इस्तेमाल आंखों में दर्द, जलन के साथ ही आंखों की अन्य समस्याएं भी दे सकता है। इससे आंखों में सूखापन भी बढ़ सकता है।
4 पीठ दर्द - लगातार बैठकर स्मार्टफोन का इस्तेमाल करना आपकी पीठ में जकड़न और दर्द पैदा कर सकता है। इससे बचने के लिए सक्रिय रहना जरूरी है।
5 कंधे में दर्द - हाथों में फोन पकड़कर आप लंबे समय तक उसका इस्तेमाल करते हैं, तो कंधों में भी खिंचाव होता है और यह दर्द में भी बदल सकता है। इसलिए बीच-बीच में ब्रेक जरूर लेते रहें।

सेहत की साइकिल

सेहत की साइकल
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साइकल एक, काम अनेक! स्पोर्ट्स, एक्सरसाइज, ट्रांसपोर्ट, ट्रैवल... तमाम चीजों के काम आती है साइकल। बच्चों से लेकर बड़ों तक, आने-जाने से लेकर माउंटेनियरिंग तक के लिए कैसी-कैसी साइकल मार्केट में हैं, साइकल खरीदते समय क्या ध्यान रखें और साइक्लिंग के दौरान कौन-सी सावधानियां बरतें, मार्केट घूमकर और एक्सपर्ट्स से बात करके तमाम जानकारियां दे रही हैं प्रियंका सिंह

बच्चों के लिए साइकल
साइकल चलाना बच्चों को बहुत पसंद आता है। कई बार बच्चे, यहां तक कि बड़े भी साइकल, बाइसाइकल और बाइक नाम के बीच कन्फ्यूज हो जाते हैं कि साइकल के लिए सही शब्द क्या है। दरअसल, 2 पहियों की किसी भी सवारी को बाइक कहा जाता है, इसलिए साइकल को भी बाइक कह दिया जाता है, जबकि इसके लिए इंग्लिश में बाइसाइकल और हिंदी में साइकल शब्द है। बहरहाल, बच्चों के लिए इन दिनों अलग-अलग तरह की साइकल मार्केट में मौजूद हैं। बच्चों के लिए साइकल खरीदते हुए वील के आकार का ध्यान रखना जरूरी है। बच्चों के लिए 12 इंच के वील से लेकर 26 इंच के वील तक की साइकल आती हैं। लड़कियों के लिए अलग साइकल भी आती हैं, जिनमें आगे का डंडा नहीं होता लेकिन आजकल ज्यादातर यूनिसेक्स यानी लड़के और लड़कियों के लिए कॉमन साइकल ही इस्तेमाल की जाती हैं।

2 साल तक के लिए
इन बच्चों के लिए 12 इंच वील वाली साइकल ठीक रहती है।
कीमत: 2000 रुपये से 5000 रुपये

2-4 साल तक के लिए
इनके लिए 14 इंच वील वाली साइकल लेनी चाहिए।
कीमत: 2200 रुपये से 6000 रुपये

नोट: अच्छी बात यह है कि अब 2-4 साल के बच्चों के लिए भी साइकल का ऑप्शन है जबकि पहले सिर्फ इनके लिए ट्राइसाइकल होती थी। साइकल आमतौर पर 2 साल तक चल जाती है जबकि ट्राइसाइकल करीब छह महीने ही चलती है। बच्चों की साइकल में साइड वील या सपोर्टर लगे होते हैं, जो साइकल को बैलेंस करते हैं और गिरने से रोकते हैं।

4-6 साल तक के लिए
इस उम्र के बच्चों के लिए 16 इंच वील वाली साइकल लें।
कीमत: 2500 रुपये से 7000 रुपये तक

6-9 साल तक के लिए
इन बच्चों के लिए 20 इंच वील वाली साइकल लेनी चाहिए। 20 इंच से ऊपर सपोर्टिंग वील नहीं होते।
कीमत: 2700 रुपये से 10,000 रुपये तक

10-12 साल तक के बच्चों के लिए
इनके लिए 24 इंच साइज के वील वाली साइकल बेहतर है।
कीमत: 3500 रुपये से 15,000 रुपये तक

12 साल से बड़े बच्चों के लिए
इनके लिए अडल्स साइज यानी 26 इंच वील वाली साइकल लेनी चाहिए।
कीमत: 3500 रुपये से 4 लाख रुपये तक

सेफ्टी है जरूरी
बच्चों के लिए साइकल खरीदते समय हेल्मेट, घुटने और कोहनी के गार्ड (Knee and Elbow Guard), ग्लव्स आदि भी खरीदें। ये तमाम चीजें साइकल से गिरने पर बच्चों को चोटिल होने से बचाती हैं।

साइकल खरीदते वक्त रखें ध्यान
- बच्चों की साइकल खरीदते हुए ध्यान रखें कि सीट, ग्रिप, पैडल, बास्केट आदि में इस्तेमाल की गई प्लास्टिक नॉन टॉक्सिक हो ताकि बच्चा मुंह में डाल ले तो भी नुकसान न हो।
- साइकल का वजन कम हो, साइकल मजबूत हो और वह चलाने में स्मूद हो।
- बच्चों की साइकल में अजस्टेबल सीट लें यानी सीट ऐसी हो जो जरूरत पड़ने पर ऊपर-नीचे की जा सके। इस तरह की सीट में ऊंचाई 6 इंच तक बढ़ जाती है यानी साइकल लंबे समय तक इस्तेमाल की जा सकती है। साथ ही, सीट को बच्चे की हाइट के अनुसार भी अजस्ट किया जा सकता है।
- बच्चों को गीयर वाली साइकल भी दिला सकते हैं, लेकिन इसमें सपोर्टिंग वील नहीं होते इसलिए इस गीयर वाली साइकल चलाने के लिए बच्चे की उम्र कम-से-कम 10-11 साल होनी चाहिए। और हां, उसे साइकल चलानी भी आनी चाहिए क्योंकि साइड में सपोर्टिंग वील न होने से गिरने का डर रहता है।
- साइकल के टायर कॉटन के बजाय नायलॉन के हों तो बेहतर है। इसी तरह, नॉर्मल ब्रेक के मुकाबले पावर ब्रेक बेहतर हैं।
- पहले के मुकाबले अब साइकल की सीट छोटी हो गई हैं। इसकी वजह यह है कि छोटी सीट वाली साइकल देखने में स्मार्ट लगती हैं। अगर सीट छोटी लगे तो साइकल खरीदते वक्त ही बड़ी सीट लगवा लें तो बेहतर है। 200-300 रुपये लेकर दुकानदार सीट बदल देते हैं।
- साइकल चलाते हुए ऊंचाई का हमेशा ध्यान रखें। देखें कि साइकल सीट की हाइट और पैडल के बीच हाइट ठीक हो। सीट इतनी ऊंचाई पर हो कि चलाते हुए पैर सीधा हो। पैर मोड़कर साइकल चलाएंगे तो घुटनों में दर्द हो जाएगा और एक्सरसाइज का पूरा फायदा भी नहीं मिलेगा।

बड़ों के लिए साइकल
आजकल बड़े लोगों में साइक्लिंग का क्रेज बढ़ा है। बड़ों के लिए 27.5 इंच वील से लेकर 29 इंच वील तक की साइकल आती है। अगर किसी की हाइट करीब 5 फुट है तो साइकल का वील साइज 26 इंच, हाइट लगभग 5.5 इंच है तो वील साइज 27.5 इंच और हाइट 5.7 इंच या ज्यादा है तो वील साइज 29 इंच तक होना चाहिए। इसके अलावा, साइकल खरीदते हुए उसके मटीरियल, शॉकर, ब्रेक, लाइट आदि चीजों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। मार्केट में इन दिनों अलग-अलग वैरायटी की साइकल मौजूद हैं। जिनमें खास हैं:

स्टैंडर्ड साइकल
28 इंच टायरों वाली यह साइकल साधारण या निम्न तबके के लोग आने-जाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह साइकल के सबसे पुराने रूपों में से है।
कीमत: 3500 रुपये से 4000 रुपये

हाइब्रिड साइकल
यह पतले टायरों वाली आम साइकल होती है, जो खासतौर पर शहरों की सड़कों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। लोग आने-जाने या फिर नॉर्मल एक्सरसाइज के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। इसमें 2 तरह की साइकल आती हैं। बिना गीयर वाली और गीयर वाली।

बिना गीयर वाली: ज्यादातर लोग यही साइकल लेना पसंद करते हैं।
कीमत: 7500 रुपये से 10,000 रुपये

गीयर वाली साइकल
इस साइकल में गीयर होते हैं। 10-12 साल के बच्चों से लेकर किसी भी उम्र तक के लोग इसे चला सकते हैं। इसे चलाने में ज्यादा ताकत नहीं लगानी पड़ती इसलिए ज्यादा देर तक बिना थके साइकल चला सकते हैं और ऊंचाई पर भी आसानी से चढ़ा सकते हैं। हां, यह गलतफहमी है कि गियर वाली साइकल ज्यादा तेज चलती है। लेकिन इसकी प्रतिरोधक क्षमता काफी अच्छी होती है और गिरने के चांस कम होते हैं। अपने देश में शिमानो (Shimano) के गीयर सबसे ज्यादा चलते हैं लेकिन इसमें भी अलग-अलग प्रकार होते हैं। शिमानो में बेसिक गीयर हैं TZ, फिर Tourney, फिर Altus, इसके बाद Acera आदि आते हैं।
कीमत: 14,000 रुपये से शुरू

MTB
माउंटेन टैरिन बाइक ज्यादातर पहाड़ी और ऊबड़-खाबड़ इलाकों के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें पहिए मोटे होते हैं। इनकी एक खासियत भी है कि इनमें शॉकर यानी सस्पेंशन लगे होते हैं। इसमें भी 2 कैटिगरी होती हैं: हार्ड ट्रेल साइकल और सॉफ्ट ट्रेल साइकल।

हार्ड ट्रेल साइकल: इसमें सिर्फ फ्रंट सस्पेंशन यानी आगे की तरफ एक शॉकर लगा होता है और इसे सिंगल शॉकर साइकल भी कहते हैं।
कीमत: 7500 रुपये से लेकर 12000 रुपये

सॉफ्ट ट्रेल साइकल: इसे ड्यूल सस्पेंशन या डबल शॉकर साइकल भी कहा जाता है। इसमें फ्रंट और रियर, दो सस्पेंशन होते हैं। इससे ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर इस पर झटके कम लगते हैं।
कीमत: 10,000 रुपये से 30,000 रुपये
नोट: यहां बेसिक कीमतें दी गई हैं। खासियतों के आधार पर एक अच्छी MTB की कीमत 20,000 से लेकर लाखों तक जाती है।

डिस्क ब्रेक्स वाली साइकल
डिस्क ब्रेक होने से अचानक ब्रेक लगाने पर साइकल लड़खड़ाती कम है। इससे साइकल को अचानक ब्रेक लगाना आसान होता है। साइकल पलटने के चांस भी कम हो जाते हैं।
कीमत: सिंगल स्पीड: 6,000 रुपये से शुरू, मल्टी स्पीड: 8,000 रुपये से शुरू

फोल्डिंग साइकल
यह साइकल बीच से फोल्ड हो जाती है और इसे आसानी से बैग के अंदर रखकर एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकते हैं। साइक्लिंग के शौकीन इसे कार या मेट्रो में रखकर ले जाते हैं और जहां मर्जी हुई वहां चलाते हैं। मेट्रो में खुली साइकल लेकर जाना मुमकिन नहीं है लेकिन बैग में बंद है तो ले जा सकते हैं। यह काफी हल्की होती है और इसे एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाना आसान होता है। कुछ एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि झटका लगने पर इनके बीच का हुक खुल सकता है। हालांकि आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। इंडिया में डहॉन (Dahon) ब्रैंड की फोल्डिंग साइकल ज्यादा मिलती हैं। हालांकि बिट्विन (Btwin) और गो ए-वन(GogoA1) आदि कंपनियों की भी मिल जाती हैं। साथ ही, गैर-ब्रैंडिड में चाइनीज़ साइकल भी आती हैं।
कीमत: 15,000 से शुरू

रेसिंग बाइक
इसे रोड साइकल भी कहते हैं। इसके पहिए पतले होते हैं और वजन कम होता है। यह आमतौर पर स्पोर्ट्स कॉम्पिटिशन में इस्तेमाल होती है। यह आरामदेह और ज्यादा समतल सड़कों के लिए बनी होती है, न कि साधारण सड़कों के लिए।
कीमत: 25,000 से 3-4 लाख रुपये तक

टेंडम साइकल
इसे अगर फिल्मी साइकल कहा जाए तो गलत नहीं होगा क्योंकि इसे लोग ज्यादातर टशन के लिए खरीदते हैं। इसमें एक ही साइकल में 2 हैंडल और 2 सीट होती हैं यानी एक साथ 2 लोग चला सकते हैं इसे। इंडिया में रैले (Raleig) कंपनी की टेंडर साइकल आती हैं।
कीमत: 17000 रुपये से 20000 रुपये तक

इलेक्ट्रिक साइकल
यह साइकल भी आम साइकल की तरह की चलाई जाती है, लेकिन इसमें चार्जेबल बैटरी लगी होती है। यह बैटरी 6 घंटे में फुल चार्ज हो जाती है और 2-3 दिन चल जाती है। ऊंचाई पर चढ़ने के वक्त यह अपने आप इलेक्ट्रिक साइकल में बदल जाती है और बिना किसी प्रेशर के आसानी से ऊपर चढ़ जाती है। अपने देश में इलेक्ट्रा (Electra) नाम से हीरो कंपनी की साइकल आती है। इसके अलावा ऑनलाइन चाइनीज़ साइकल भी खरीद सकते हैं।
कीमत: एलेक्ट्रा 30,000 रुपये के करीब, चाइनीज 15-17 हजार रुपये लगभग

स्नो या सैंड साइकल
यह साइकल बर्फ या रेत में आसानी से चलाई जा सकती है। देखने में भी स्टाइलिश लगती हैं ये। इन्हें फैट साइकल भी कहते हैं क्योंकि इनके पहिये मोटे होते हैं। आम साइकल का पहिया 2 इंच का होता है जबकि मोटे टायर वाली साइकल का पहिया 4 इंच का होता है। मोटे पहियों वाली साइकल की ग्रिप सड़क पर थोड़ी बेहतर होती है।
कीमत: 20,000 रुपये से 35,000 रुपये तक में आती है ब्रैंडेड, जबकि चाइनीज 14-15 हजार रुपये में आ जाती है।

स्टेशनरी साइकल
स्टेशनरी साइकल एक्सरसाइज के लिए इस्तेमाल की जाती हैं। इनमें पहिये नहीं होते। ये काफी मजबूत होती हैं और जब तक जोर लगाकर इन्हें सरकाया नहीं जाए, ये एक ही जगह पर स्थिर रहती हैं। इनमें Proline, Lifeline, Fitking, Cardio Max, Kobo, Cockatoo आदि कई ब्रैंड्स की साइकल आती हैं।
कीमत: 6000 रुपये से शुरू

अलग-अलग फ्रेम की साइकल
साइकल की कीमत कई चीजों पर निर्भर करती है, जैसे कि मटीरियल, शॉकर, डिस्क ब्रेक, प्रिंटेड स्टीकर, फ्लोरेसेंट कलर आदि। इन तमाम चीजों के आधार पर साइकल की कीमत 2000 रुपये से लेकर 3-4 लाख रुपये तक हो सकती है। वैसे, बेसिक मटीरियल के आधार पर साइकलों को इस तरह बांट सकते हैं:

1. आयरन फ्रेम: यह साइकल आयरन से बनी होती है और वजन में भारी होती है। यह आमतौर पर 17-18 किलो वजनी होती है। रुटीन इस्तेमाल के लिए यह सबसे सही है।
कीमत: 7,500 रुपये से 12,000 रुपये तक

2. अलॉय फ्रेम: इसे अल्युमिनियम की साइकल भी कहा जाता है। यह आयरन साइकल के मुकाबले हल्की होती है। मोटेतौर पर इसका वजन 13.5 किलो से 14.5 किलो तक होता है। बहुत लंबी दूरी तक साइकल चलाने वाले इसे खरीदना पसंद करते हैं।
कीमत: 12,000 रुपये से 30,000 रुपये तक

3. कार्बन या टाइटेनियम फ्रेम: यह साइकल वजन में बहुत हल्की होती है। वजन महज 4-5 किलो होता है। यह स्पेशलाइज्ड (Specialized), जाएंट (Giant), ट्रेक (Treck), लातेयर (Lattire) आदि ब्रैंड्स में आती है। साइक्लिंग का जुनून रखने वाले लोग इसे खरीदते हैं।
कीमत: 3-4 लाख रुपये

साइकल के टॉप ब्रैंड्स
इंडियन ब्रैंड्स: Hero, Hercules, Avon, Atlas, BSA
विदेशी ब्रैंड्स: Firefox, Raleigh, Sovereign, Suncross
नोट: आमतौर पर देसी और विदेशी ब्रैंड्स में बेसिक चीजें तो एक जैसी ही होती हैं, ज्यादा फर्क फिटिंग और फिनिशिंग का होता है। इसी के आधार पर रेट भी काफी बढ़ जाते हैं। ज्यादातर ब्रैंड अपने नाम से असेसरीज भी निकालते हैं।

साइकल के सेफ्टी टूल्स
साइकल चलाते हुए सेफ्टी का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है, वरना गिरकर चोट लग सकती है। इसके लिए हमारे पास कुछ चीजें जरूर होनी चाहिए और बेहतर है कि इन्हें साइकल के साथ ही खरीद लिया जाए। वैसे भी आजकल ज्यादातर साइकल कंपनियां अपनी असेसरीज़ बनाती हैं।

हेल्मेट: साइकल चलाते हुए हेल्मेट जरूर पहनना चाहिए। ध्यान रहें कि हेल्मेट सिर्फ फैशन या दिखावे के लिए न हो बल्कि अच्छी क्वॉलिटी वाला हो।
कीमत: 1000 रुपये से 3000 रुपये

ग्लव्स: आमतौर पर फैशन स्टेटस समझे जानेवाले ग्लव्स साइकल पर पकड़ तो अच्छी बनाते ही हैं, गिरने पर हाथों को चोटिल होने से भी बचाते हैं।
कीमत: 250 रुपये से 5000 रुपये

चश्मा: साइकल चलाते हुए आंखों पर चश्मा जरूर लगाएं। यह धूल-कंकड़-कीड़े आदि से आंखों को बचाता है। दिन में सनग्लास और रात में प्लेन चश्मा लगाएं।
कीमत: 2000 से 10000 तक

मास्क (Buff Mask): लंबी दूरी तक साइकल चला रहे हैं तो बफ मास्क का इस्तेमाल करें। इसे पहनने से चेहरा धूप और धूल से बचा रहता है।
कीमत: 50 -100 रुपये

घुटने और कोहनी के गार्ड: इनकी जरूरत बच्चों को होती है। बड़ों के लिए ये जरूरी नहीं हैं। ये गिरने पर कोहनी और घुटने को चोटिल होने से बचाते हैं।
कीमत: 600 रुपये से 2500 रुपये

रिफ्लेक्टर जैकिट: यह जैकिट अंधेरे में चमकती है और इसकी वजह से दूसरे लोग आपको आसानी से देख पाते हैं। इससे एक्सिडेंट होने की आशंका कम हो जाती है।
कीमत: 1000 रुपये से 1500 रुपये

साइकल की असेसरीज़
साइकल सीट कवर: इन्हें जेल कवर भी कहते हैं। ये साइकल की सीट को आरामदेह बना देते हैं।
कीमत: 500-5000 रुपये

लाइट्स
सेल वाली लाइट: 300-500 रुपये का सेट आता है। इनकी बैटरी 2 घंटे तक चल जाती है।
रिचार्जेबल लाइट: 550-600 रुपये का सेट आ आता है। बैटरी चार्ज होने के बाद 5 घंटे तक चल जाती है।

रिफ्लेक्टर
इन्हें साइकल के आगे या पीछे लगाया जाता है। रोशनी पड़ने पर ये चमकने लगते हैं। इनकी वजह से साइकल सवार दूर से नजर आ जाता है और रोड पर सेफ रहता है। ये साइकल के साथ ही आते हैं।
कीमत: अलग से खरीदने पर 200-300 रुपये में मिल जाते हैं।

टूल किट
घर से दूर साइकल लेकर जा रहे हैं तो उसमें एक टूल किट जरूर रखना चाहिए। इस टूल किट में पंचर रिपेयर, टायर खोलने वाला इक्विमेंट, स्पैनर, एक्स्ट्रा ट्यूब, लुब्रिकेशन ऑयल आदि होना चाहिए।
कीमत: 500-800 रुपये

फर्स्ट-एड: डेटॉल, कॉटन, बैंड-एड, पट्टी, एंटी-सेप्टिक सलूशन आदि
कीमत: 300-500 रुपये
नोट: जब भी दूर तक साइक्लिंग के लिए निकलें, सनस्क्रीन लगाकर जाएं। साथ में पानी की बोतल जरूर रखें। खाने के लिए एनर्जी बार आदि भी रखें।

साइकल की ऐसे करें देखभाल
आमतौर पर 1000 किमी चलने के बाद साइकल की सर्विस करा लेनी चाहिए। साइकल में स्पीड और दूरी नोट करने के लिए स्पीडोमीटर भी लगवा सकते हैं। यह 600 रुपये से लेकर 15000 रुपये तक में मिलता है। सर्विस के लिए 500-600 रुपये तक चार्ज किए जाते हैं। लेकिन सर्विस के बिना भी आप अपनी साइकल का रखरखाव कर सकते हैं। हर 3-4 महीने में अपनी साइकल के ब्रेक, गियर और चेन का अजस्टमेंट कराएं। चेन पर तेल लगाना चाहिए खासकर बारिश के दौरान, वरना उस पर जंग लग सकती है। इसके लिए अलग से तेल आता है। आप चाहें तो डीजल या कोई भी तेल इस्तेमाल कर सकते हैं। वैसे, मार्केट में चेन लुब्रिकेंट भी आते हैं। इसमें मॉटेल, WD40, जौरिक आदि पॉपुलर ब्रैंड हैं। इनके 200 मिली बॉटल की कीमत 400-500 रुपये होती है। इसके अलावा, साइकल में पंचर लगाना सीखना भी जरूरी है, खासकर अगर आप लंबी दूरी तक साइकलिंग करते हैं।

ये ऐप हैं कारगर
Starva: यह ऐप साइकल चलाने के दौरान आपकी स्पीड, टाइम, दूरी आदि का रेकॉर्ड रखता है। साथ ही, आप इस दौरान कितनी कैलरी बर्न हुईं, यह भी जान सकते हैं। यह ऐप एंड्रॉयड और iOS, दोनों के लिए है।
Runtastic: इस ऐप की मदद से आप अपनी साइकल की स्पीड, तय की गई दूरी और इसमें लगे टाइम का रेकॉर्ड रखते हैं। एंड्रॉयड और iOS, दोनों के लिए यह ऐप मौजूद है।
Wahoo app: इस ऐप के जरिए आप अपनी राइड्स पर निगाह रख सकते हैं। साथ ही हार्ट रेट मॉनिटर, स्पीड सेंसर आदि के साथ भी कनेक्ट किया जा सकता है। यह ऐप एंड्रॉयड और iOS, दोनों के लिए है।

एक्सपर्ट पैनल
पुनीत मेहता, डायरेक्टर, डिप्लोमैट साइकल्स
आशीष अग्रवाल, ओनर, टॉयज़ प्लस
हरमन जीत सिंह, डायरेक्टर, कैपिटल साइकल्स

संडे नवभारत टाइम्स 

विपश्यना के वे 10 दिन

Post of 22 June 2015

विपश्यना के वे 10 दिन

अपनी जिंदगी में अभी तक इतनी तकलीफ कभी नहीं झेली थी, जितनी उन 10 दिनों में बर्दाश्त की। 10 दिन एक तरह से कैद में था। कैंपस से बाहर जाने की इजाजत नहीं। बाहरी दुनिया से एकदम कटा रहा। मोबाइल पहले ही दिन जब्त कर लिया गया। पढ़ने-लिखने, टीवी-अखबार, इंटरनेट-ईमेल जैसे नशों की भी छूट नहीं। घर-परिवार, देश-दुनिया में क्या हो रहा है, पूरी तरह बेखबर। कैंपस के भीतर भी ढेर सारी पाबंदियां। किसी से बात करने की इजाजत नहीं। इशारे भी नहीं। लिखकर भी नहीं। शाम 5 बजे टी ब्रेक के बाद कुछ नहीं मिलता था। नो डिनर। कायदे का खाना दिन में बस एक बार। वह भी सुबह 11 बजे। सुबह 4 बजे जग जाना होता था। फिर रात 9 बजे तक घंटे, दो घंटे के 8 सेशन, रोज कुल 10 घंटे ध्यान। गर्दन और कमर सीधी रखकर जमीन पर पालथी मारकर बैठे रहो। गर्दन दर्द, कमर दर्द और घुटने दर्द झेलो। 40 डिग्री तक गर्मी, पर कोई एसी-कूलर नहीं। सिर्फ पंखा।

बात चल रही है विपश्यना कोर्स की। विपश्यना बड़ा टफ कोर्स है- ऐसा बहुतों से सुन रखा था। फिर भी पिछले महीने मई में इगतपुरी (महाराष्ट्र) जाकर विपश्यना कोर्स करने का मन बना लिया। कारण, बरसों से यह कोर्स करने की तमन्ना थी। लेकिन मन में दो बड़ी घबराहटें भी थीं। एक: ध्यान के घंटों लंबे सेशन मेरा तन-मन झेल पाएगा कि नहीं। दो: शाम 5 बजे हल्के स्नैक्स के बाद रात को कुछ भी खाने का नहीं दिया जाता और अपनी आदत यह है कि हर 3-4 घंटे में कुछ न खाऊं तो हाल बेहाल हो जाता है। मारे भूख के सरदर्द चालू हो जाता है। इसी डर से कोर्स की पूर्वसंध्या पर स्नैक्स ज्यादा खाकर पेट की टंकी ठूंस-ठूंस कर फुल भर ली। रात को प्रवचन में कहा गया कि यहां डिनर नहीं मिलता है तो लोग शाम के स्नैक्स डबल खा लेते हैं। इससे अच्छे ध्यान में रुकावट आती है। मन ही मन शर्मिंदा हुआ। टंकी एक्स्ट्रा भरना छोड़ दिया। बाद में भूख ने तंग तो नहीं किया। हां, सिर्फ तीसरे दिन कुछ कमजोरी महसूस हुई। हाद में ठीक हो गया। 10वें यानी आखिरी दिन सुबह 10 बजे मौन खुला तो रात को पेट में चूहे कूदे। तब एहसास हुआ कि मौन कितना जरूरी था और बातों में हम कितनी ढेर सारी इनर्जी बर्बाद कर देते हैं। पहला दिन तो नई जगह, नया माहौल देखने-समझने में कट गया। दूसरा दिन बेहद भारी लगा। ध्यान लग नहीं पाया। 1 घंटे के सेशन में 40- 45 मिनट विचारों में ही खोया रह जाता। रात के प्रवचन में बताया गया कि ऐसा होना स्वाभाविक है। भीतर की गंदगी बाहर आ रही है।

शरीर की बगावत
तीसरे दिन लगने लगा, कहां आकर फंस गया। गर्दन दर्द, कमर दर्द, घुटने दर्द - सब बर्दाश्त से बाहर होने लगा। बोलने की चाहे मनाही थी लेकिन कोई जरूरत, समस्या या सवाल होने पर कभी भी सहायक आचार्य या धम्मसेवक (वॉलंटियर) से बात की जा सकती थी। ब्रेक के दौरान सहायक आचार्य से कहा: 'कुर्सी पर बैठने की इजाजत दे दें।' मना कर दिया गया। समझाया गया: 'बर्दाश्त करो, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। कुर्सी तो बीमारों और बूढ़ों के लिए है।' गुजारिश ठुकरा दिए जाने पर बुरा लगा। अगले दिन उन्हीं सहायक आचार्य का शुक्रिया अदा किया कि उन्होंने कुर्सी नहीं दी। इसी वजह से मैं उस दिन 1 घंटे के ध्यान सेशन में पूरे वक्त एक ही मुद्रा में बैठा रह सका। एक बार भी टांग खेलने की जरूरत महसूस नहीं हुई। हां, यह चमत्कार बस एक दफा ही हुआ। बाद के सेशंस में फिर टांग खोलनी पड़ी, पर टांगों और गर्दन के दर्द ने बाद में ज्यादा परेशान नहीं किया। दर्द सहा तो शरीर के कुछ पार जाने लायक बन सका। यह भी सच है कि किसी-किसी सेशन में इतना आनंद आ जाता कि ब्रेक का ऐलान अखरने लगता और किसी सेशन में शरीर से इतना हैरान-परेशान कि एक-एक सेकंड काटना भारी पड़ जाता। ब्रेक की घोषणा का बेकरारी से इंतजार करता।

बागी हुआ मन भी
हर सेशन के शुरू के 30-40 मिनट तो प्रैक्टिस में मन लगता। फिर सब्र का बांध टूट जाता। मन को बेलगाम छोड़ देता। ऊलजलूल कुछ भी सोचने लगता। मन बंदर, हमारे अंदर। दीन-दुनिया के बारे में सोचने में मन को मजा आता। प्रैक्टिस भारी और ऊबाऊ जान पड़ती। बेसब्री से ब्रेक के ऐलान का इंतजार करता। लेकिन यह भी मन में आता कि फिर कभी 10 दिन निकालने आसान नहीं होंगे। अभी इतनी मेहनत की है तो इस तकनीक को अपना असर दिखाने का पूरा मौका देना चाहिए ताकि बाद में अफसोस न हो कि मुझे अनुभूति नहीं हुई तो मेरी अपनी लापरवाही और आलस के कारण। नुकसान मेरा होगा। खुद को ही धोखा दूंगा। यही सब सोचकर मन को बार-बार खींचकर प्रैक्टिस पर ले आता।

पड़ोस से परेशानी
ध्यान कक्ष में मेरे अड़ोस-पड़ोस ने मेरी सहनशीलता का काफी इम्तिहान लिया। बिलकुल पीछे वाले महाशय ऐसे कि हर सेशन में 3-4 बार मेरे आसन पर लात न जमा लें, उनका ध्यान पूरा नहीं होता था। एक और सज्जन थे जो इत्ती गर्मी में जुराबें डालकर आते थे। उनके पैर, उनकी जुराबें, मन्ने क्या। पर नाक तो मेरी थी जो उनकी जुराबों की बदबू से हलकान हुए जाती थी। यही जनाब हर सेशन में 4-5 बार जोर से डकार मारते थे। हॉल में सबसे तेज आवाज में डकार मारने का रेकॉर्ड इन्हीं के पास था। अगर बोलने की इजाजत होती तो मैं ही नहीं, बाकी कई लोग भी इन सज्जन से गुजारिश करते कि भाई साब, गले में जरा साइलेंसर लगवा लें। खर्चा हम दे देंगे। वहां 'ध्यान' में बैठे-बैठे मैं दूसरों में कमियां निकाल रहा था। हो सकता है, मेरे आसपास वाले किसी बात को लेकर मुझे बर्दाश्त कर रहे हों। 3-4 दिनों बाद इन छोटी-मोटी चीजों ने परेशान करना बंद कर दिया। जो भी हो, सामूहिक ध्यान में सहनशीलता की भी प्रैक्टिस हो जाती है।

मच्छरों की मुसीबत
ध्यान कक्ष में विचारों से जंग लड़ने के बाद रात को अपने सोने के कमरे में मच्छरों से जंग तकरीबन रोज ही लड़नी पड़ती। पता नहीं कहां से आ जाते। मच्छरों की फौज, राजेश के खून पर करेगी मौज! नहीं, ऐसा नहीं होने देना। फौज तो खैर एक जुमला था, पर 3-4 मच्छर जरूर रोज आ जाते थे। उन्हें मार सकता नहीं था क्योंकि कोर्स शुरू करने से पहले हम सबसे वचन ले लिया गया था कि कोर्स के दौरान जीव हत्या नहीं करेंगे। तल्ख हकीकत यह थी कि कमरे में एक भी मच्छर हो तो रात को ठीक से नींद नहीं आएगी। ऐसे में दिन भर ध्यान नहीं हो पाएगा। एेसे में मच्छरों के साथ पकड़म-पकड़ाई खेलता। एक-एक मच्छर को पॉलीथीन लिफाफे में बंद करके बाहर विदा करके आता। एक दिन एक मच्छर मेरे चेहरे पर बैठ गया। झट से हाथ ने अपना काम किया। अरे यह क्या, मच्छर को मार दिया। मैंने जीव हत्या न करने का इरादा किया था और बाकायदा इसका पालन भी कर रहा था। तो यह एेक्शन कहां से हुआ? तब चेतन मन, अवचेतन मन की पहेली समझ में आई। चेतन मन में रहते हैं हमारे सारे वादे, इरादे, फैसले और ज्ञान। यह सब धरे का धरा रह जाता है जब अचानक कुछ अनचाहा घट जाता है। तब हम अपनी आदतों, अनुभवों, कंडिशनिंग, मान्यताओं के मुताबिक रिएेक्ट करते हैं। यही अवचेतन मन है। मच्छर को मारनेवाला अवचेतन मन था जो चेहरे पर बैठे मच्छर को मार डालने की मेरी पुरानी आदत से परिचालित हुआ था। इसी अवचेतन मन यानी चित्त की सफाई विपश्यना का लक्ष्य है। साफ चित्त अनचाही स्थितियों में भी शांत और संतुलित बना रहता है। ऐसा चित्त बेहोशी से नहीं, होश से रिएेक्ट करता है। उस पर अतीत का कोई बोझ नहीं होता।

क्या पाया, क्या खोया
कोर्स के बाद विपश्यना की थिअरी मोटी-मोटी समझ में आ गई। 10 दिन प्रैक्टिकल करके देख लिया। तकनीक अपना काम करे, मैंने भी करीब पूरा सहयोग किया, मेहनत और नियमों को पालन करके। आचार्य, सहायक आचार्य और धम्म सेवकों की भी मेहनत में कमी नहीं थी। लेकिन 10 दिन काफी नहीं यह जवाब देने के लिए कि क्या वाकई विपश्यना की प्रैक्टिस करके हम दुखों से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति पा सकते हैं? कि क्या हम उस लेवल पर पहंच सकते हैं जहां राग-द्वेष, मान-अपमान, सुख-दुख हमारे मन की शांति और संतुलन को भंग न कर पाए? कि क्या हम हमेशा समता की स्थिति में रह सकते हैं? 10 दिन में किसी निष्कर्ष पर पहुंच पाना मुमकिन नहीं। इसलिए पक्की तरह ठोककर नहीं कह सकता कि विपश्यना सही रास्ता है।

हां, 10 दिन एक भिक्षु के तौर पर जीने का दुर्लभ मौका मिला। सच है कि तन-मन को तकलीफ खूब हुई, लेकिन अपने कम्फर्ट लेवल से बाहर जाकर ही हम कुछ हासिल कर पाते हैं। वहां मैं अपने शरीर और मन को कुछ गहराई से जान पाया। सीखने के लिहाज से विपश्यना कोर्स जिंदगी के सबसे यादगार अनुभवों में से एक है। इस कोर्स को करने के बाद जो बदलाव मेरी जिंदगी में आए, वे हैं: पहले मैं अमूमन सुबह 8-9 बजे उठता था, अब 6 बजे के आसपास अपने आप नींद खुलने लगी है। पहले रात 12-1 बजे सोता था, अब 11-12 बजे तक सो जाता हूं पहले कभी-कभी ध्यान करता था, अब तकरीबन रोज 1 घंटा करता हूं। पहले 9-10 बजे डिनर लेता था और लेट नाइट स्नैक्स भी। अब डिनर 5 से 8 बजे के बीच निपटा देता हूं और खाने-पीने की चीजों के चुनाव में ज्यादा ऐहतियात बरतने लगा हूं। वजन भी 2 किलो घट गया।

ये तो हुए बाहरी बदलाव, अब बात भीतरी बदलाव की, जो सबसे अहम है। कभी-कभी लगता है कि मन पर कुछ शांत रहने लगा है, मन पर कुछ कंट्रोल होने लगा है। पर अगली दफा ही कुछ ऐसा कर बैठता हूं कि अपने पर शर्मिंदगी होती है। इसीलिए कोर्स के आखिरी दिन कहा गया कि अब घर जाकर सुबह-शाम 1-1 घंटा विपश्यना की प्रैक्टिस करनी है। मन ने इस साधना को आजमाने का फैसला किया है।

विपश्यना कोर्स इसलिए अच्छा लगा कि इसमें प्रैक्टिकल तरीके से बताया गया है कि हम किस तरह दुखों से मुक्ति पा सकते हैं। इसमें अंधश्रद्धा पर आधारित कोई भी कर्मकांड नहीं है। विपश्यना विधि चाहे बौद्ध परंपरा से आई है, फिर भी इसमें संगठित धर्म जैसी कोई बात नहीं। यह ज्ञान का मार्ग है इसलिए तार्किक लोगों को ज्यादा अपील करता है। इसमें कोई धंधेबाजी भी नहीं। सीखना, खाना, रहना - सब फ्री। इसीलिए यहां सब कुछ सादा और सादगी भरा है। कहीं भी वैभव की चकाचौंध नहीं। कुछ ऐसे आश्रम भी देखे हैं जो फाइव स्टार होटल जैसे होते हैं। तभी वहां धंधेबाजी भी होती है। यहां बस जरूरत भर का सामान है। इसके बावजूद यहां हर चीज का लगभग परफेक्ट बंदोबस्त है। कोर्स सिखाने से लेकर रहने-खाने में कोई कमी नहीं।

बेसिक जानकारी................................

क्या है विपश्यना
विपश्यना ध्यान का एक तरीका है। करीब 2500 साल पहले गौतम बुद्ध ने इसकी खोज की थी। बीच में यह विद्या लुप्त हो गई थी। दिवंगत सत्यनारायण गोयनका सन 1969 में इसे म्यांमार से भारत लेकर आए। कोर्स के पहले तीन दिन आती-जाती सांस को लगातार देखना होता है। इसे 'आनापान ' कहते हैं। आनापान दो शब्दों आन और अपान से बना है। आन मतलब आने वाली सांस। अपान मतलब जाने वाली सांस। इसमें किसी भी आरामदायक स्थिति में बैठकर आंखें बंद की जाती हैं। कमर और गर्दन सीधी रखी जाती है। फिर अपनी नाक के दोनों छेदों पर मन को फोकस कर दिया जाता है और हर सांस को नाक में आते-जाते महसूस किया जाता है। सांस नॉर्मल तरीके से ही लेनी होती है। सांस देखते-देखते एहसास होता है कि हमारा मन कितना चंचल है। मन या तो अतीत की पुरानी बातों में या फिर भविष्य की कल्पनाओं में गोता लगाता है । मन को बार-बार खींचकर सांस पर लाना पड़ता है। पहले तीन दिन बस यही करना होता है।

चौथे दिन विपश्यना सिखाई जाती है और बाकी 7 दिन इसी की प्रैक्टिस कराई जाती है। विपश्यना शब्द का अर्थ होता है: विशिष्ट प्रकार से देखना यानी जो चीज जैसी है, उसे उसके असली रूप में देखना, न कि जैसी कि उसकी व्याख्या हमारा अवचेतन मन कर दे। विपश्यना में शरीर की संवेदनाओं पर ध्यान लगाया जाता है। हमारे शरीर के अलग-अलग हिस्सों में संवेदनाएं हर वक्त पैदा होती रहती हैं। संवेदना परेशान करने वाली भी हो सकती है जैसे कि गर्मी-सर्दी, दर्द, दबाव, खुजली आदि और संवेदना सुखद भी हो सकती है, मसलन : वाइब्रेशंस महसूस होना। न सुखद संवेदना से राग पालना है, न दुखद से द्वेष। बस साक्षी भाव से देखना है। मन में यह भाव लाना है कि संवेदना सुखद हो या दुखद, वह हमेशा नहीं बनी रहेगी। इसलिए समता में, संतुलन की स्थिति में रहना है। विपश्यना से हमें वर्तमान में रहने की प्रैक्टिस होती है और वर्तमान को समता से देखने की भी। ऐसे में मन में विकार नहीं पैदा होंगे। किसी भी व्यक्ति, वस्तु और स्थिति से न राग, न द्वेष। बाहर के हालात मन की शांति भंग नहीं कर पाते। इसी समता भाव में स्‍थित होना ही निर्वाण है। इससे इंसान सुख-दुख में भी संतुलन में रह पाता है। उसकी छोटी-मोटी बीमारियां तो यूं ही दूर हो जाती हैं।

तमाम साधनाओं की तरह इस साधना का मकसद भी दुखों से छुटकारा पाना है। हम दुखी इसलिए हैं क्योंकि हम सुखद और दुखद संवेदनाओं के प्रति बेहोशी से रिएेक्ट कर जाते हैं। विपश्यना में संवेदना के लेवल पर ही अलर्ट होने की प्रैक्टिस कराई जाती है। दरअसल बाहरी दुनिया में या मन के अंदर जब भी कुछ मनचाहा या अनचाहा घटता है तो मन में विकार जगता है, विकार यानी राग या द्वेष। इसका असर सबसे पहले सांसों पर पड़ता है। सामान्य तरीके से आ-जा रही सांस अनियमित हो जाती है। दूसरा असर पड़ता है हमारे शरीर पर। शरीर में अच्छी या बुरी संवेदना पैदा होती है। बाद में हम रिएेक्ट करते हैं। अगर हम विकार पैदा होने पर सांस और संवेदना के लेवल पर ही अलर्ट हो जाएं तो बेहोशी से, अवचेतन मन से हमारा रिएेक्ट करना रुक सकता है। इसीलिए विपश्यना कोर्स में सांस और संवेदनाओं पर ध्यान लगाया जाता है। विपश्यना में सर से पांव तक बारी-बारी से हर अंग पर कुछ देर रुककर वहां की संवेदना को महसूस किया जाता है। आम जिंदगी में दुखों से बचने के लिए हम बाहरी दुनिया को मैनेज करने में जुटे रहते हैं। यहां भीतर की दुनिया को, अपने अवचेतन मन को मैनेज करना सिखाया जाता है।

कितने दिन का है कोर्स
विपश्यना का यह रिहायशी कोर्स कहने को 10 दिन का होता है लेकिन कुल 12 दिन लगते हैं। 10 दिन पूरे और 2 दिन अधूरे। एक दिन पहले सेंटर पहुंचना होता है। दोपहर बाद 2 से 4 बजे के बीच रजिस्ट्रेशन होता है, मोबाइल जैसी चीजें जमा हो जाती हैं और सोने का कमरा अलॉट होता है। शाम 5 बजे से रात करीब 9 बजे तक कोर्स के नियम-कायदों की जानकारी दी जाती है। साथ में ध्यान कक्ष में सीट अलॉट की जाती है। उसी पर सभी दिन बैठकर ध्यान करना होता है। कोर्स 11वें दिन सुबह 7:30 बजे खत्म होता है। हर सेंटर एक महीने में 2 कोर्स कराता है। ध्यान कैसे करना है, इस बारे में निर्देश गोयनका जी के हिंदी-अंग्रेजी में रेकॉर्डेड ऑडियो टेप के जरिए दिए जाते हैं। रोज रात को डेढ़ घंटे गोयनका जी का प्रवचन होता है जिसमें विशुद्ध धर्म और ध्यान की बारीकियां समझाई जाती हैं।

क्या-क्या होता है दिन भर
विपश्यना कोर्स में सुबह 4:30 से रात 9 बजे तक ध्यान के सेशन चलते हैं बीच में नहाने धोने, खाने पीने, आराम करने का वक्त दिया जाता है। वहां रुटीन कुछ इस तरह का है: तड़के 4 बजे उठो। फ्रेश होने के बाद 4:30 बजे ध्यान कक्ष पहुंच जाओ। वहां 6:30 तक ध्यान करो। 6:30 से 7:15 के बीच नाश्ता, फिर 8 बजे का वक्त नहाने-धोने के लिए दिया जाता है। 8 से 9 और 9 से 11 ध्यान के दो सेशन। 11 बजे लंच। उसके बाद 1 बजे तक का वक्त आराम का। 1 से 2:30, 2:30 से 3:30 और 3:30 से 5 - ध्यान के तीन सेशन। 5 से 5:30 स्नैक्स। 6 बजे तक आराम। 6 से 7 ध्यान, 7 से 8:30 गोयनका जी का वीडियो पर प्रवचन, 8:30 से 9 बजे तक ध्यान। ध्यान के हर घंटे, दो घंटे बाद 5-10 मिनट का बायो ब्रेक दिया जाता है।

रहना-खाना कैसा
रहने के 3 तरह के विकल्प हैं : सिंगल रूम, डबल शेयरिंग रूम और डोर्मिटरी। अपना सहूलियत के हिसाब से कोई भी विकल्प चुन सकते हैं। खाना सादा, सात्विक, शुद्ध शाकाहारी, मिर्ची रहित ताकि ध्यान आसानी से लगे।

क्या है फीस
विपश्यना का यह कोर्स पूरी तरह फ्री है। रहने और खाने का भी पैसा नहीं लिया जाता। शिविर का सारा खर्च पुराने साधकों के दिए गए दान से चलता है। शिविर खत्म होने पर कोई चाहे तो भविष्य के शिविरों के लिए दान दे सकता है। दान उसी से लिया जाता है जो पहले से यह कोर्स कर चुका हो।

कैसे सीखें
विपश्यना के मेन सेंटर का पूरा पता है: विपश्यना इंटरनैशनल अकैडमी, धम्मगिरि, इगतपुरी, जिला नासिक, महाराष्ट्र। सीखने के लिए इगतपुरी जाना जरूरी नहीं। देश में इसके करीब 70 सेंटर हैं और पूरी दुनिया में कुल 161 सेंटर। www.vridhamma.org विपश्यना के इगतपुरी सेंटर की वेबसाइट है। यहां विपश्यना के बारे में पूरी जानकारी है। होम पेज पर Contact Us पर जाकर सभी ट्रेनिंग सेंटर्स को ब्यौरा पा सकते हैं। www.dhamma.org पर ऑनलाइन बुकिंग भी मुमकिन है। आम तौर पर वेटिंग रहती है। इसलिए एडवांस में बुकिंग कराएं।

फल खा, फल की चिंता मत कर

फल खा, फल की चिंता मत कर...
Useful info about Mangoes, Watermelon, Muskmelon & Leechi

जब भी हम फल खाते हैं तो उसके फल की चिंता भी साथ में हो जाती है। फल यानी उसे खाने का शरीर पर कोई उलटा असर तो नहीं होगा? ऐसे ही सवालों और चिंताओं के बारे में हमने कई एक्सपर्ट से बात की। नतीजा आया कि अगर हम कुछ एहतियात बरतें तो फल खाने पर फल की चिंता करने की जरूरत नहीं रहेगी। इन्हीं एहतियातों के बारे में जानकारी दे रहे हैं राजेश भारती

आम ही खास है
आम का सीजन शुरू हो चुका है। मार्केट में कई वैरायटी के आम आ भी चुके हैं। लेकिन अभी डाल के पके आम मार्केट में काफी कम मात्रा में आ रहे हैं। दरअसल इन आमों को कच्चा ही पेड़ से तोड़ लिया जाता है और आर्टिफिशल तरीके से पकाया जाता है। अगर ये आम सही तरीके से पकाए नहीं गए हैं तो इन्हें खाने से सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है। आम को खाने से पहले उसे अच्छे से साफ करना जरूरी होता है।

आम का असली सीजन हुआ है शुरू अब
हो सकता है कि आपको मार्केट में आम कुछ समय पहले से ही दिखाई देने लगे हों, लेकिन इसका असली सीजन अब शुरू हुआ है। चाहे सफेदा आम हो या दशहरी या लंगड़ा या चौसा, ये सभी आम जून के आखिरी महीने से मार्केट में आने शुरू होंगे जो जुलाई-अगस्त तक रहेंगे। इनमें दशहरी और चौसा आम मुख्यत: यूपी से आना शुरू होगा।

डाल का पका आम होता है बेस्ट
पका हुआ बेस्ट आम डाल का ही माना जाता है। यह आम न केवल सेहत के लिए अच्छा होता है, बल्कि काफी मीठा भी होता है। ये आम पकने पर अपने-अाप डाल से टूटकर गिर जाते हैं। हालांकि इस तरह के पके हुए आम मार्केट में काफी कम मिलते हैं, क्योंकि पेड़ पर इन्हें पकने में कुछ समय लगता है।

ऐसे पकाते हैं कच्चे आमों को
कच्चे आमों को कई तरह से पकाया जा सकता है। इन्हें पकाने के लिए सबसे पहले कच्चे आम पूरी तरह परिपक्व होने चाहिए यानी वे आकार में बड़े हों और दबाने पर कड़े हों। घर पर कच्चे आमों को इस तरह पका सकते हैं:

देसी तरीका: कच्चे आमों को टिश्यू पेपर या अखबार में लपेटकर 3-4 दिन के लिए किसी ऐसी जगह रख दें जो घर के बाकी हिस्सों की अपेक्षा कुछ गर्म हो। यहां ध्यान रहे कि आम रखने की जगह पर अंधेरा भी होना चाहिए। 3-4 दिन पर आम को थोड़ा दबाकर देंगे। अगर वह दब जाए तो समझ लें कि आम पक गया है।

इथरेल दवा से: इस दवा को पानी में मिलाकर उनमें कच्चे आमों को डुबोया जाता है। करीब पांच मिनट बाद आमों को निकालकर अलग किसी बड़े बर्तन में रख देते हैं। इसके बाद उन आमों को ऐसे ही करीब रातभर छोड़ दिया जाता है। सुबह आम पके हुए मिलते हैं। इस तरह से पके आमों को खाने से सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता। इथरेल की 100 ml की शीशी करीब 250 रुपये में आती है।

चीनी पुड़िया (Ethylene Ripener): अब मार्केट में एक पुड़िया आती है, जिसमें एक केमिकल पाउडर के रूप में होता है। यह चीन से आती है। इसे पानी से भिगोकर कच्चे आमों के बीच में रखा जाता है और फिर करीब 20 घंटे के लिए आमों को छोड़ दिया जाता है। इस दौरान ध्यान रहे कि आम किसी पुराने अखबार से ढके हों। इससे निकलने वाली एथिलीन गैस से आम पक जाते हैं। ये आम सेहत के लिए हानिकारक नहीं होते।
कैल्शियम कार्बाइड है खतरनाक: आमों को पेड़ से कच्चा तोड़ने के बाद उन्हें कैल्शियम कार्बाइड से भी पकाया जाता है। आम पकाने का यह तरीका सेहत के लिए काफी खतरनाक होता है। कैल्शियम कार्बाइड से आर्सेनिक जैसी घातक गैसें निकलती हैं। इस तरीके में कैल्शियम कार्बाइड को एक छोटी पुड़िया में रखकर उसे आमों के बीच में रख देते हैं। 24 घंटे बाद आम पक जाते हैं।
ऐसे करें पके आम की पहचान
- आम के ऊपर सफेद धब्बे या पाउडर न हो।
- पका हुआ आम पूरी तरह से मैच्योर नजर आएगा।
- आम के डाल वाले हिस्सा सॉफ्ट और निचला हिस्सा टाइट है तो इसका मतलब कि उसे सही तरह से पकाया नहीं गया है।
- सही तरह से पके आम का रंग एक जैसा और थोड़ा सुनहरा होता है।
- अच्छी तरह से पका आम थोड़ा सॉफ्ट होता है। अधपका आम कहीं से सॉफ्ट और कहीं से ठोस होगा जबकि कच्चा आम पूरा ही ठोस होगा।

खाने का सही तरीका
- आमों को नमक मिले गुनगुने पानी में एक-दो घंटे के लिए छोड़ दें।
- अब आम को हाथ से रगड़ें और फिर से साफ पानी से धो लें। इसके बाद साफ आम को कपड़े से पौछ लें।
- इसके बाद आम का डंठल वाला हिस्सा हल्का-सा काट कर कुछ बूदें रस निकाल दें। अब आप आम खा सकते हैं।
- कई बार हम लोग आम को छिलके समेत काट लेते हैं और फिर उसे खाते हैं। कई बार खाने के इस तरीके से आम का छिलका भी मुंह में आ जाता है। इससे बचें क्योंकि अक्सर आमों पर खतरनाक पेस्टिसाइड का छिड़काव होता है।

डायबीटीज के मरीज भी खाएं
डायबीटीज का मरीज एक दिन में 50 से 60 ग्राम आम खा सकता है। हालांकि मरीज को इस दौरान ऐसी दूसरी चीजें खाने की मात्रा कम करनी पड़ेगी। आम में पोटैशियम भी होता है। ऐसे में किडनी के मरीज डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही खाएं।
आम आदमी के लिए: अगर मान लें कि एक आम का वजन 300 से 400 ग्राम है और अगर आप बहुत ऐक्टिव नहीं हैं और एक्सरसाइज नहीं करते हैं तो दिन भर में 2 से ज्यादा आम न खाएं।

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तरबूज भी क्या खूब
तरबूज के लिए हर साल मई-जून का मौसम आदर्श माना जाता है। जिला बुलंदशहर में तरबूज और खरबूजा के उत्पादक किसान सुरेंद्र पाल सिंह के मुताबिक ज्यादा गर्मी वाला मौसम तरबूज और खरबूजा के लिए अच्छा माना जाता है, क्योंकि अधिक गर्मी से इनमें मीठापन ज्यादा आता है। यह जुलाई तक मार्केट में रहते हैं। बारिश पड़ने के बाद इनकी मिठास कम हो जाती है और फिर इनका पीक सीजन भी खत्म हो जाता है।

तरबूज के भी हैं कई रूप
मार्केट में आपको कई प्रकार के तरबूज हैं। अब ऐसे भी तरबूज आ रहे हैं जो अंदर से पीले भी निकलते हैं। तरबूज की मुख्य किस्में इस प्रकार हैं:
शुगर बेबी: यह गोलाकार और बाहर से गहरे हरे रंग का होता है। इसका आकार दूसरे तरबूजों की अपेक्षा छोटा और खाने में काफी मीठा होता है। इसी कारण इसे शुगर बेबी कहते हैं। आजकल मार्केट में ये तरबूज ही अधिक हैं। एक तरबूज का वजन 1.5 किलो से 4 किलो तक का होता है। यह थोक मार्केट में 4 से 7 रुपये प्रति किलो और रिटेल में 10 से 50 रुपये किलो तक मिल जाता है।

माधुरी: यह तरबूज आकार में लंबा होता है। इसमें बाहर की ओर हरे रंग की धारियां होती हैं। यह तरबूज खाने में काफी मीठा होता है। इस वैरायटी का एक तरबूज 6 से 15 किलो का होता है। आम परिवार छोटे हैं। इस कारण अब इसकी डिमांड काफी कम है और मार्केट में कम ही दिखाई देते हैं। इसकी कीमत करीब 20 रुपये प्रति किलो है।
अनमोल: यह तरबूज बाहर से हरा, लेकिन अंदर से हल्के पीले रंग का होता है। इसका स्वाद शहद जैसा मीठा होता है। यह मार्केट में 15 से 20 रुपये प्रति किलो की दर से मिल जाता है। हालांकि दिल्ली-एनसीआर में यह कम बेचा जाता है।
ऐसे करें सही तरबूज की पहचान
- तरबूज को उठाकर चारों ओर से देखें। अगर उसमें कोई निशान या कहीं से गला नजर आए तो न खरीदें।
- अगर तरबूज के एक हिस्से पर गहरे पीले रंग का बड़ा धब्बा है तो वह पका हुआ होता है।
- तरबूज को हाथ से बजाकर देखें। अगर भारी और किसी धातु के बजने जैसी आवाज (टन-टन) आए तो वह पका हुआ है। वहीं अगर थप-थप या डब-डब की आवाज आए तो वह ज्यादा पका हुआ होता है।
- तरबूज को उठाकर देखें। अगर वह वजन में हलका है तो उसे खरीदने से बचें।

कैसे और कहां रखें
तरबूज को कटा हुआ या टुकड़ों में काटकर न छोड़ें। अगर मजबूरी में कटा हुआ छोड़ना पड़े तो उन्हें एयरटाइट ढक्कन वाले कंटेनर या पॉलीथीन से ढककर फ्रिज में रख दें। यहां ध्यान रहे कि कटे हुए तरबूज को दो घंटे से ज्यादा समय तक फ्रिज में न रखें। काटकर ठंडा करने के लिए फ्रिज में रखने से बेहतर है कि जब खाना हो, साबुत ही दो घंटे पहले फ्रिज में रख दें। अगर तरबूज कटा हुआ भी है तो उसे फ्रिज में रखने के बजाय सामान्य तापमान पर ही घर में छांव में रखें।

कब और कितना खाएं
- 300 से 400 ग्राम रोजाना
- इन्हें खाने का कोई निश्चित समय नहीं है।
- तरबूज में नमक (काला या सफेद) मिलाकर खाने से शरीर को कुछ एक्स्ट्रा मिनरल्स मिल जाते हैं।

तरबूज की तासीर-
92% पानी
8% शुगर और कार्ब्स
न्यूट्रिशन भी कम नहीं-
विटामिन: A, B, B1, B6, C, D आदि
मिनरल: आयरन, कैल्शियम, कॉपर, बायोटिन, पोटेशियम और मैग्नेशियम।
एसिड: पैंटोथेनिक और अमीनो एसिड।
फैक्ट (100 ग्राम तरबूज में)-
कैलरी: 30
पानी: 92%
प्रोटीन: 0.6 ग्राम
कार्ब्स: 7.6 ग्राम
शुगर: 6.2 ग्राम
फाइबर: 0.4 ग्राम
फैट: 0.2 ग्राम
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खरबूजा-सा ना कोई दूजा
खरबूजे के लिए भी अधिक गर्मी का मौसम आदर्श माना जाता है। जितनी ज्यादा गर्मी पड़ती है, बेल पर लगे खरबूजे उतने ही मीठे होते हैं। बारिश पड़ने के बाद इनकी भी मिठास कम हो जाती है और धीरे-धीरे पीक सीजन खत्म हो जाता है। खरबूजा अभी मार्केट में कुछ दिन और मिलेगा। खरबूजे को खाने के कई तरीके हैं। इसे सीमित मात्रा में खाया जाए तो यह सेहत के लिए काफी लाभदायक होता है।

खरबूजा एक, रंग अनेक
वैसे तो मार्केट में कई किस्म के खरबूजे मौजूद हैं, लेकिन कुछ प्रमुख वैराइटी इस प्रकार हैं:
नामधारी: यह खरबूजा मुख्यत: पंजाब से आता है। यह मई-जून तक मार्केट में मिलता है। इसका छिलका सफेद सा और खुरदरा होता है। वहीं यह अंदर से संतरी रंग का और काफी मीठा होता है।
कीमत-
थोक मार्केट: 5-7 रु. प्रति किलो
रिटेलर: 20-30 रु. प्रति किलो

लाल परी: यह खरबूजा मुख्यत: राजस्थान और यूपी से आता है। इसका सीजन भी मई-जून तक रहता है। यह बाहर से दिखने में ईंट जैसा गहरा लाल होता है। वहीं इसमें बीच-बीच में पीली और हरी धारियां होती हैं।
कीमत-
थोक मार्केट: 15-17 रु. प्रति किलो
रिटेलर: 40-20 रु. प्रति किलो

मधुरस: यह खरबूजा मुख्यत: यूपी से आता है। इसका सीजन भी मई से जून तक रहता है। इसका ऊपरी हिस्सा चिकना और हरे-सफेद रंग का होता है। साथ ही इसमें इसमें बीच-बीच में हरे रंग की धारियां होती हैं।
कीमत-
थोक मार्केट: 15-20 रु. प्रति किलो
रिटेलर: 40-50 रु. प्रति किलो
नोट: तरबूज और खरबूजे की कीमतों में कमी-बेशी मुमकिन
ऐसे करें सही खरबूजे की पहचान
- खरबूजे को उठाकर हर तरफ से चेक करें। अगर कहीं से गला दिखाई दे तो उसे न खरीदें।
- अगर खरबूजा दबाने पर मुलायम लग रहा है तो उसे खरीदने से बचें। हो सकता है कि दुकानदार आपको ऐसे खरबूजा को अधिक पका या कुछ और बहाना लगाकर बेचने की कोशिश करे, लेकिन दुकानदार को ना कह दें।
- खरबूजा सूंघें। उसमें से मीठी-मीठी खुशबू आए तो वह पका हुआ और मीठा होता है।

कैसे और कहां रखें
खरबूजा उतना ही काटें, जितने आप एक बार में खा सकें। अगर खरबूजा बच जाए तो उसे एयरटाइट ढक्कन वाले कंटेनर या पॉलीथीन से ढककर फ्रिज में रख दें। खरबूजा दो घंटे से ज्यादा समय तक फ्रिज में न रखें। बिना काटे गर्मी के मौसम में दो दिन तक घर में रख सकते हैं। ध्यान रखें कि इस दौरान खरबूजा छांव और ठंडी जगह में रखा हो।

कब और कितना खाएं
- 150 से 200 ग्राम रोजाना
- खरबूजा खाने का कोई निश्चित समय नहीं है।
- खाना खाने से पहले खाएं तो बेहतर है।

खरबूजे के गुण
90% पानी
10% शुगर और कार्ब्स
न्यूट्रिशन भी कम नहीं-
विटामिन: A, B1, B3, B6, C, K आदि
मिनरल: आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नेशियम, फाॅस्फोरस, जिंक, कॉपर।
एसिड: पैंटोथेनिक, फैटी और अमीनो एसिड।
फैक्ट (150 ग्राम तरबूज में)-
कैलरी: 53
पानी: 90%
प्रोटीन: 0.9 ग्राम
कार्ब्स: 12.8 ग्राम
शुगर: 12 ग्राम
फाइबर: 1.9 ग्राम
फैट: 0.3 ग्राम

पेस्टिसाइड का प्रयोग
तरबूज और खरबूजे के बीज की बुवाई के समय खतरनाक पेस्टिसाइड का प्रयोग किया जाता है। यही नहीं, तरबूज और खरबूजे की बेल की ग्रोथ के लिए काफी जगह ड्रिप इरिगेशन का प्रयोग करते हैं, लेकिन इसके लिए पेस्टिसाइड मिले पानी का प्रयोग होता है। जब तरबूज और खरबूजा बड़े होते जाते हैं तो पेस्टिसाइड का काफी हिस्सा इनमें चला जाता है और ऐसे तरबूज/खरबूजा खाने से सेहत पर भी बुरा असर पड़ सकता है।

दावा और सचाई
दावा किया जाता है कि तरबूज और खरबूजे में उनका आकार बढ़ाने, मिठास लाने और पकाने के लिए इंजेक्शन के जरिए कुछ दवा का प्रयोग किया जाता है। इन दावों के बीच हमने भी तरबूज और खरबूजा पर एक एक्सपेरिमेंट किया। हमने दोनों फलों में इंजेक्शन की एक खाली नीडल डाली और करीब 10 सेकंड बाद निकाल ली। फिर हमने दोनों फलों को कमरे के सामान्य तापमान पर छोड़ दिया। तीन दिन बाद जब हमने देखा तो खरबूजा का न केवल रंग बदल गया था, बल्कि वह बहुत ज्यादा सॉफ्ट हो गया था। जब उसे काटा गया, तो अंदर से भी खराब निकला। वहीं तरबूज के जिस जगह नीडल डाली गई थी, वह हिस्सा अंदर से गल गया था। तरबूज का बाकी हिस्सा भी खाने लायक नहीं बचा था। इससे पता चलता है कि अगर इन फलों में किसी भी प्रकार का इंजेक्शन लगाया जाता है, तो वह दो-तीन दिन में ही खराब हो जाएगा।

शुगर पेशंट क्या करें
डायबीटीज के मरीज को तरबूज या खरबूजा खाने में कोई परेशानी नहीं है। इन दोनों फलों को 100 ग्राम तक डायबीटीज के मरीज खा सकते हैं। वहीं किडनी के मरीजों को तरबूज या खरबूजा खाने को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है। चूंकि दोनों फलों में पोटैशियम होता है। ऐसे में किडनी के मरीज इन दोनों फलों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही खाएं।
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लीची खाएं, लेकिन ध्यान से
बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार यानी एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एसईएस) से करीब 128 बच्चों की मौत हो गई है। वहीं इसकी वजह से बड़ी तादाद में बच्चे बीमार हो गए हैं। इन मौतों की वजह हाइपोग्लाइसीमिया और अन्य अज्ञात बीमारी है। कुछ रिपोर्ट में इन मौतों की वजह को लीची भी बताया गया है। रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि लीची में पाए जाने वाले एक जहरीले तत्व की वजह से ये मौतें हो रही हैं। अगर आप खुद या बच्चे को लीची खिला रहे हैं तो इन बातों का ध्यान रखें:

कुपोषित बच्चों को लीची न खाने दें
चमकी बुखार का असर 10 साल तक के कुपोषित बच्चों पर ही पड़ रहा है। एक्सपर्ट के मुताबिक इन बच्चों को ठीक ढंग से खाना और जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाता है। इस कारण इन बच्चों के शरीर की इम्युनिटी कम होती है। सुबह को ये बच्चे खाली पेट ही लीची को बिना ढंग से साफ किए खा लेते हैं। इसके बाद बच्चों के शरीर में शुगर का लेवल गिरना शुरू हो जाता है और बच्चा बीमार पड़ जाता है।

कुपोषित बच्चों की पहचान
- बच्चा पतला-दुबला होता है और उसकी हड्डियां दिखाई देती रहती हैं।
- बच्चे का शरीर पतला और पेट बाहर की ओर निकला रहता है।
- बच्चे के बाल कुछ सुनहरी हो जाते हैं।
- बच्चा शारीरिक रूप से ऐक्टिव नहीं होता है और अधिकतर समय एक ही जगह बैठा-बैठा रोता रहता है।
- उम्र के अनुसार बच्चे की लंबाई और वजन का अनुपात सही नहीं होता है।
- घाव भरने में अधिक समय लगता है।
- बच्चे को सांस लेने में परेशानी होती है और वह चिड़चिड़ा रहता है।

अधपकी या कच्ची लीची न खाएं
लीची कभी भी अधपकी या कच्ची और खाली पेट नहीं खानी चाहिए। पकी और बिना कीड़े वाली लीची को पहले छील लें। अब उसके खाने वाले हिस्से (गूदा) को उसकी गुठली से अलग कर लें। गूदा को भी गौर से देखें कि कहीं उसमें भी कीड़े तो नहीं हैं। अगर गूदा में कीड़े नहीं हैं तो उसे किसी बर्तन में इकट्ठे कर लें। इकट्ठे उतने ही करें जितना आप खा सकें। इसके बाद गूदा को फिर से साफ पीने वाले पानी से दो बार धोएं। अब इस गूदे को खा सकते हैं। यह तरीका आपको लंबा जरूर लग सकता है, लेकिन सेहत के लिए जरूरी है।

कीड़ों का रखें ध्यान
इस फल में कीड़े मिलने की भी आशंका ज्यादा होती है। लीची का वह हिस्सा जो डंठल से लगा होता है, वहां कीड़े अधिक मिलते हैं। इन कीड़ों का रंग लीची के रंग जैसा होता है, इसलिए ये कई बार दिखाई भी नहीं देते। लीची खाते समय अगर कीड़े दिखाई दें तो उस लीची को फेंक दें।

एक्सपर्ट पैनल
- डॉ. आर. आर. शर्मा
चीफ साइंटिस्ट
पूसा इंस्टिट्यूट

- डॉ. अशोक झिंगन
डायबीटीज एक्सपर्ट

- डॉ. स्कंद शुक्ल
सीनियर फिजिशन

- इशी खोसला
न्यूट्रिशनिस्ट ऐंड डाइट एक्सपर्ट

- नीलांजना सिंह
सीनियर डाइटिशन

- एस. सी. शुक्ला
आम उत्पादक, लखनऊ

- संजय वत्नानी
प्रमुख आम व्यापारी

- राम गोपाल मिश्रा
प्रमुख फल व्यापारी


Sunday, July 28, 2019

सेहत का लिवर , लिवर के बारें में पूरी जानकारी

सेहत का लिवर
Health Guide For Liver on Hepatitis Day Today

हेपटाइटिस का नाम लेते कुछ डर-सा लगता है, लेकिन सच यह है कि अगर हम होशियार रहें तो यह उतना खतरनाक नहीं है। विशेषज्ञों से बात कर जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

क्या है हेपटाइटिस
सामान्य शब्दों में इसे लिवर में हेपटाइटिस वाइरस (HBV) का इन्फेक्शन कह सकते हैं। यह वाइरस खून, असुरक्षित सेक्स, दूसरों के इस्तेमाल की गई सूई से फैलता है और हां, मां से उसके नवजात बच्चे में भी। चूंकि यह वाइरस सीधे लिवर पर हमला करता है और इस वजह से लिवर में सूजन आ जाती है, इसलिए बीमारी को हेपटाइटिस नाम दिया गया।

कितनी तरह का हेपेटाइटिस
-A, B, C, D, E और G
-इनमें A और B सबसे कॉमन हैं।
-A और E ज्यादा खतरनाक नहीं होते।
-B और C सबसे खतरनाक होते हैं और इन्हें क्रॉनिक हेपटाइटिस माना जाता है।
-D कभी भी अकेला नहीं रहता। यह हमेशा B के साथ ही ऐक्टिव होता है।
- हेपटाइटिस A और B के लिए वैक्सीन उपलब्ध है, लेकिन हेपटाइटिस C के लिए नहीं।
-हेपटाइटिस E और G के मामले बहुत कम होते हैं।

हेपटाइटिस के लक्षण
-जोड़ों और पेट में दर्द, उलटी और कमजोरी
-हमेशा थकान रहना
-बुखार आ जाना और यूरिन का रंग गाढ़ा होना
-भूख कम लगना
-त्वचा पीली पड़ना और आंखों का सफेद हिस्सा भी पीला पड़ना
-पेशाब का रंग पीला होना

नोट: सामान्य फीवर और हेपटाइटिस के लक्षणों में कुछ खास फर्क होता है। मसलन, सामान्य बुखार में पेट दर्द, पेशाब का पीला होना जैसे लक्षण नहीं आते जबकि हेपेटाइटिस में ये खास लक्षण होते हैं। ऐसे लक्षण किसी दूसरी बीमारी में भी हो सकते हैं, इसलिए डॉक्टर से जरूर सलाह लें।

हेपटाइटिस के टेस्ट
अगर ऊपर के लक्षण हैं तो सबसे पहले लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT) करवाया जाता है। इससे यह पता चलता है कि लिवर सही ढंग से काम कर रहा है या नहीं। अगर लिवर फंक्शन में कोई समस्या दिखती है तो फिर वाइरस की पहचान के लिए टेस्ट करवाया जाता है।
LFT का खर्च 500-1200 रुपये
रिपोर्ट: ब्लड सैंपल सुबह देने पर शाम तक या दूसरे दिन रिपोर्ट मिल जाती है।

इतना खतरनाक क्यों
इसकी सबसे बड़ी वजह है कि इसका इन्फेक्शन साइलेंट होता है। कई बार लोगों को इन्फेक्शन होता है, लेकिन उन्हें साल, दो साल तक पता नहीं चलता। इस वाइरस की वजह से कभी-कभी लिवर कैंसर भी हो सकता है।

कितनी तरह के हेपटाइटिस B
1. एक्यूट हेपटाइटिस बी: इसका इन्फेक्शन 6 महीने तक रह सकता है। हेपटाइटिस B पैनल टेस्ट से इसके बारे में पता चल जाता है।
2. क्रॉनिक हेपटाइटिस B: अगर ब्लड में हेपटाइटिस बी का वाइरस 6 महीने से ज्यादा समय से हो तो उसका इलाज क्रॉनिक हेपटाइटिस बी के रूप में किया जाता है। यह ज्यादा खतरनाक है।

कैसे फैलता है
-संक्रमित ब्लड दूसरे शख्स के शरीर के ब्लड से संपर्क होने पर
-संक्रमित शख्स के साथ असुरक्षित सहवास करने से
-सूई जैसी चीजें जिन पर खून लगने का अंदेशा हो, उसे दोबारा इस्तेमाल करने पर अगर पहला शख्स संक्रमित हो
-मां से उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को
-ऐसे हॉस्पिटल या ब्लड बैंक से ही खून लें, जहां तरीके से चेक करने के बाद ही खून लिया जाता हो
-टैटू लगवाने के दौरान
-दांत का इलाज कराने के दौरान इन्फेक्टेड इक्वेपमेंट्स इस्तेमाल करने से
नोट: यह छूने से नहीं फैलता और न ही हवा, छींकने से, खांसी या टॉयलेट की सीट इस्तेमाल करने से।

वैक्सीन लगाने की जरूरत
-वैक्सीन सभी बड़ों को लगवाने की जरूरत नहीं, हालांकि कुछ डॉक्टर सभी को वैक्सीन लगाने की सलाह देते हैं।
-सभी नवजात (1 साल तक के बच्चे) को लगवाना जरूरी
-मेडिकल फील्ड और पब्लिक सेफ्टी के लिए काम करने वाले लोगों को
-जिनकी किडनी खराब हो और डाइलिसिस होता हो
-जिन्हें बार-बार अपना खून बदलवाना पड़ता हो
-शरीर पर टैटू बनवाने वाले लोग असुरक्षित सेक्स किया हो तो
-जिनकी फैमिली में हेपटाइटिस बी किसी को पहले या अभी हुआ हो
-अगर किसी को यह वैक्सीन पहले लग चुका है तो उसे नहीं लगवाना चाहिए।

कितना सुरक्षित है वैक्सीन
हेपटाइटिस B वैक्सीन असरदार है। दरअसल, यह वैक्सीन कैंसररोधी है। यह बीमार शख्स में लिवर कैंसर होने से रोकता है। दुनिया में 80 फीसदी से ज्यादा लिवर कैंसर के मामले हेपटाइटिस B की वजह से ही होते हैं।

नोट: अगर किसी को पहले यह वैक्सीन लग चुका है, लेकिन उसे ठीक से याद नहीं तो सबसे पहले उसे डॉक्टर की सलाह से ब्लड टेस्ट (anti-HBs) करवाना चाहिए। वैसे दोबारा लेने से कोई नुकसान नहीं होता।

हेपटाइटिस A
हेपटाइटिस A क्रॉनिक (जो बीमारी लंबे समय तक रहे) नहीं, एक्यूट (ऐसी बीमारी जो कम समय तक रहे यानी कम खतरनाक) है। यह लिवर को अमूमन नुकसान नहीं पहुंचाता।
वैक्सीन
बच्चों में: 18 से 20 महीने की उम्र में
खर्च: ₹2000 से 2500 (पेनलेस), सामान्य: ₹400 से 600

बड़ों में: शरीर में हेपेटाइटिस A के लिए एंटीबॉडी कम होने पर डॉक्टर के कहने पर। खर्च: ₹2000 से 2500 (पेनलेस), सामान्य: ₹400 से 600

टेस्ट : Hepatitis A IgM  खर्च: ₹200-300

बचाव:  हेपटाइटिस A गंदे खानपान से फैलता है, इसलिए साफ खानपान जरूरी है।

हेपटाइटिस C
सी वायरस का इन्फेक्शन होने के करीब डेढ़ से दो महीने बाद लक्षण नजर आते हैं। जिन मामलों में एक महीने से चार महीने में लक्षण नजर आ जाते हैं, उन्हें एक्यूट कहा जाता है। इन्फेक्शन को छह महीने से ज्यादा हो जाए तो वह क्रॉनिक कहलाता है। ऐसा होने पर मरीज के पूरी तरह ठीक होने के आसार कम हो जाते हैं। हालांकि क्रॉनिक के मामले कम ही होते हैं। जिनको बचपन में यह इन्फेक्शन होता है, ज्यादातर उन्हीं में बड़े होने पर क्रॉनिक हेपटाइटिस होता है।
टेस्ट: HCV RNA खर्च: ₹5000-6000
नोट: हेपटाइटिस सी का वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।
( खर्च में कमी-बेशी मुमकिन है।)

प्रेग्नेंसी और हेपटाइटिस
मां को अगर हेपटाइटिस है तो बच्चे के भी इससे पीड़ित होने की आशंका रहती है। प्रेग्नेंसी के दौरान सही इलाज न हो तो महिला को ब्लीडिंग हो सकती है और बच्चे व महिला, दोनों की जान जा सकती है। अगर मां को पहले से मालूम है कि उसे हेपटाइटिस है तो उसे डॉक्टर को जरूर बताना चाहिए। जिन महिलाओं को हेपटाइटिस बी का टीका लगा है, उन्हें भी प्रेग्नेंसी के दौरान जांच करानी चाहिए। जन्म के बाद भी बच्चे को टीका लगाकर बीमारी से बचाया जा सकता है।

क्या है पीलिया
मां को अगर हेपटाइटिस है तो बच्चे के भी इससे पीड़ित होने की आशंका रहती है। प्रेग्नेंसी के दौरान सही इलाज न हो तो महिला को ब्लीडिंग हो सकती है और बच्चे व महिला, दोनों की जान जा सकती है। अगर मां को पहले से मालूम है कि उसे हेपटाइटिस है तो उसे डॉक्टर को जरूर बताना चाहिए। जिन महिलाओं को हेपटाइटिस बी का टीका लगा है, उन्हें भी प्रेग्नेंसी के दौरान जांच करानी चाहिए। जन्म के बाद भी बच्चे को टीका लगाकर बीमारी से बचाया जा सकता है।

टैटू से कैसे फैलता है हेपटाइटिस
टैटू बनवाते समय पतली नीडल से इंक स्किन के अंदर डाली जाती है। वह ब्लड के संपर्क में आती है। अगर वह नीडल पहले से ही किसी हेपेटाइटिस इन्फेक्टेड शख्स की स्किन के अंदर पहुंचकर उसके ब्लड के संपर्क में आ चुकी है तो उसके आगे जो लोग टैटू गुदवाएंगे, उन्हें हेपटाइटिस बी या सी के इन्फेक्शन का खतरा बहुत ज्यादा रहेगा। इससे एचआईवी का खतरा भी है।

कैसे बचें टैटू वाले इन्फेक्शन से
-अगर कोई टैटू बनाने वाला आर्टिस्ट नीडल को नहीं बदलता या सही तरीके से साफ नहीं करता तो यह सेफ्टी के खिलाफ है।
-ऐसे किसी भी पार्लर से टैटू नहीं गुदवाएं, जिसे लाइसेंस न मिला हो। सड़क किनारे गुदवाने में यह खतरा बढ़ जाता है।
-वैसे तो ज्यादातर आर्टिस्ट्स ग्ल्वस पहनते हैं। सिर्फ ग्लव्स पहनना काफी नहीं है। उसे ग्लव्स पहनने से पहले हाथ को अच्छी तरह साफ करना चाहिए। यह भी ध्यान रहे कि आर्टिस्ट हर बार नए ग्लव्स पहनकर ही टैटू गोदे।
-सिर्फ टैटू मशीन को साफ करने से काम नहीं चलेगा। मशीन को हर बार स्टरलाइज करना भी जरूरी है। कई बार किसी टॉवेल से पोंछकर मशीन को साफ कर दिया जाता है। यह हेपटाइटिस से बचने के लिए पर्याप्त सफाई नहीं है।
-स्टरलाइजेशन प्रक्रिया में केमिकल के इस्तेमाल से या गर्मी से बैक्टीरिया या वाइरस को मारा जाता है।
-जहां पर टैटू गुदवाना हो, शरीर के उस हिस्से की सफाई भी जरूरी है। उसे भी केमकिल की मदद से स्टरलाइज किया जाना चाहिए।

हेल्दी लिवर के 7 टिप्स
-सुबह एक गिलास गुनगुना पानी और दिन में कम से कम 2 लीटर गुनगुना या सामान्य साफ पानी पिएं।
-शराब न पिएं। सेल्फ मेडिकेशन (डॉक्टर से बिना पूछे, खुद से दवाई लेना) न करें।
-नीबू, ग्रीन टी, फलों का जूस (स्ट्रॉबेरी, ब्लैकबेरी) आदि पिएं।
-सात या पंद्रह दिनों पर किसी दिन जूस उपवास रखने से लिवर को फायदा होगा।
-प्रोसेस्ड फूड जिनमें बहुत ज्यादा प्रिजर्वेटिव, फैट्स और कॉलेस्ट्रॉल हों, खाने से बचें। मसलन, फास्ट फूड, डीप फ्राइड फूड आदि न खाएं।
-हरी साग-सब्जियां (करेला, सरसों का साग, पालक) आदि को खाने में शामिल करें।
-लहसुन और अखरोट को भी डाइट में शामिल करें।

एक्सपर्ट पैनल
-डॉ. एस. के. सरीन डायरेक्टर, द इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलयरी साइंस
-डॉ. के. एन. सिंगला, एचओडी एंड सीनियर कंसल्टेंट, गेस्ट्रोइंटेरॉलजी, मैक्स
-डॉ. (कर्नल) वी. के. गुप्ता, स्पेशलिस्ट, गेस्ट्रोइंटेरॉलजी एंड हेपटॉलजी
डॉ. संदीप गर्ग, डायरेक्टर, डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज

साभार नवभारत टाइम्स 

Friday, July 26, 2019

सेंधा नमक के ये हैं बड़े गुण

*सेंधा नमक के ये गुण शर्तिया आपको नहीं पता होंगे, जरूर पढ़ें*
 शशांक द्विवेदी
1 सेंधा नमक में लगभग 65 प्रकार के खनिज लवण पाए जाते हैं, जो कई तरह की बीमारियों से बचाने में मददगार होते हैं। वहीं इसका एक बढ़ि‍या फायदा यह है कि यह पाचन के लिए फायदेमंद है। चूंकि यह पाचक रसों का निर्माण करता है, इसलिए कब्ज भी दूर करने में सहायक है।
2 यह कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक है, जिससे दिल के दौरे की संभावना को भी कम करता है। इसके अलावा हाई ब्लडप्रेशर को कंट्रोल करने में भी सेंधा नमक फायदेमंद होता है।
3 तनाव अधिक होने पर सेंधा नमक का सेवन करना लाभकारी होगा, यह सेरोटोनिन और मेलाटोनिन हार्मोन्स का स्तर शरीर में बनाए रखता है, जो तनाव से लड़ने में आपकी मदद करते हैं।
4 मांसपेशियों में दर्द या ऐंठन हो, या फिर हड्ड‍ियों से जुड़ी कोई समस्या, सेंधा नमक का सेवन करने से आपकी यह समस्या धीरे-धीरे पूरी तरह से समाप्त हो जाएंगी।
5 पथरी यानि स्टोन हो जाने पर, सेंधा नमक और नींबू को पानी में मिलाकर पीने से कुछ ही दिनों में पथरी गलने लगती है। वहीं साइनस के दर्द को कम करने में ही सेंधा नमक फायदेमंद है।
6 डाइबिटीज और अस्थमा व आर्थराइटिस के मरीजों के लिए सेंधा नमक का सेवन काफी लाभदायक होता है। यह शरीर में शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने में भी फायदेमंद है।
7 अनिद्रा होने पर सेंधा नमक असरकारी है, वहीं त्वचा रोगों एवं दंत रोगों में भी इसका प्रयोग किया जाता है। मोटापा कम करने के लिए भी सेंधा नमक का प्रयोग करना बेहतर तरीका है।