Tuesday, May 15, 2012

रक्षा मामले में आत्मनिर्भरता

नॅशनल दुनिया लेख

प्रियंका द्विवेदी लेख

दैनिक ट्रिब्यून » News » कानून के बावजूद जारी है कन्या-भ्रूण हत्या

भ्रूण हत्या का कलंक


भ्रूण हत्या का कलंक
प्रियंका द्विवेदी
पिछले सप्ताह आमिर खान के टीवी शो सत्यमेव जयते के प्रसारण के बाद हाशिये पर पड़ा कन्या भ्रूण हत्या का मुद्दा सुर्खियों में आ गया। अफसोस की बात है कि इतनी गंभीर समस्या पर सरकार अभी तक ठोस व कारगर कदम नहीं उठा पाई और समाज भी आंखें मूंदे रहा। सिर्फ बेटे की चाह में अनगिनत मांओं की कोख उजाडी जाती रही। लेकिन सत्यमेव जयते के प्रयास से इस मुद्दे पर पूरे देश में हलचल होने लगी है। सरकार और न्यायपालिका इस जघन्य अपराध पर सख्त होने को मजबूर हो गई हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा राज्य में हर हाल में कन्या भ्रूण हत्या रोकने के निर्देश देना, इलाहाबाद में चिकित्सा विभाग की टीम द्वारा स्टिंग ऑपरेशन करके कन्या भ्रूण हत्या करने वाले नर्सिंग होम पर छापेमारी करना, दोषी डॉक्टर को पकड़ना और पूरे देश में राजनेताओं सहित समाज के प्रबुद्ध वर्ग का आगे आना इसकी प्रतिक्रिया के साक्षी हैं। पिछले दिनों जयपुर हाईकोर्ट ने भ्रूण लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या पर सख्ती दिखाते हुए जिला न्यायालयों को तीन माह में आरोप तय करने और पुलिस को लंबित मामलों में दो माह में चार्जशीट पेश करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही दोषी डॉक्टरों और जांच केंद्रों पर कार्रवाई करने को कहा है। चलिए सुखद स्थिति है कि राजस्थान में कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए कड़े कदम उठाए गए हैं, लेकिन इस दिशा में सार्थक परिणाम तब तक हासिल नहीं होगा, जब तक सभी सरकारें एकजुट होकर भ्रूण हत्या पर अंकुश न लगाएं। पिछले कुछ दशकों से गर्भ में लिंग जांच और कन्या भ्रूण हत्या का चलन तेजी से बढ़ा है। अनुमान है कि पिछले दो दशकों में भारत में करीब सवा करोड़ बच्चियों की भ्रूण हत्या की गई है। कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला तब शुरू हुआ जब देश में अल्ट्रासाउंड मशीन का उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों के पेट के रोगों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया गया था। किंतु इस मशीन का सदुपयोग से अधिक लिंग परीक्षण के रूप में दुरुपयोग होने लगा। लिंग अनुपात गड़बड़ाने के खतरनाक नतीजे आ रहे हैं। जितनी संख्या में कन्याओं की भ्रूण हत्या की जा रही है, उतनी ही संख्या अविवाहित युवकों की बढ़ रही है। इस कारण महिलाओं के प्रति अपराधों में भारी वृद्धि हो रही है। भारत सरकार ने 17 साल पहले ही एक कानून पारित किया था, जिसके मुताबिक पैदा होने से पहले बच्चे का लिंग मालूम करना गैरकानूनी है। लेकिन राष्ट्रीय जनसंख्या स्थिरता कोष की पूर्व कार्यकारी निदेशक शैलजा चंद्रा के मुताबिक इस कानून को लागू करना बेहद मुश्किल है। चंद्रा कहती हैं कि कानून को लागू करने वाले जिला स्वास्थ्य अधिकारी के लिए लिंग जांच करने वाले डॉक्टर पर नकेल कसना बहुत मुश्किल है, क्योंकि डॉक्टरों के पास नवीनतम तकनीक उपलब्ध है। लोगों में पुत्र की बढ़ती लालसा और खतरनाक गति से लगातार घटता स्त्री-पुरुष अनुपात समाजशास्ति्रयों, जनसंख्या विशेषज्ञों और योजनाकारों के लिए चिंता का विषय बन गया है। यूनिसेफ के अनुसार दुनिया से दस प्रतिशत महिलाएं लुप्त हो चुकी हैं। स्ति्रयों के इस विलोपन के पीछे कन्या भ्रूण हत्या ही मुख्य कारण है। भ्रूण हत्या का कारण है कि हमारे समाज में व्याप्त रूढि़वादिता और संकीर्ण सोच। लोग बेटा-बेटी में भेद करते हैं। प्रचलित रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्था के कारण भी बेटा और बेटी के प्रति लोगों की सोच विकृत हुई है। ज्यादातर मां-बाप सोचते हैं कि बेटा तो जीवन पर्यंत उनके साथ रहेगा और बुढ़ापे में उनका सहारा बनेगा। समाज में वंश परंपरा का पोषक लड़कों को ही माना जाता है। इस पुत्र कामना के चलते ही लोग अपने घर में बेटी के जन्म की कामना नहीं करते और उसके जन्म लेने पर शोक मनाते हैं। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) कन्या भ्रूण हत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर प्रियंका द्विवेदी की टिप्पणी भ्रूण हत्या का कलंक
दैनिक जागरण (राष्ट्रीय ) में 15/05/2012 को प्रकाशित
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Sunday, May 13, 2012

my DNA artilce on garib ki kaun...

DNA -Article

गरीब की आवाज कौन सुनेगा ?

हरिभूमि लेख 

पोखरण परमाणु परीक्षण की वर्षगाँठ पर विशेष


पोखरण से मिली सीख
शशांक द्विवेदी
वर्ष 1998 में अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्रित्व में भारत ने पोखरण में 11 मई से 13 मई तक सफलतापूर्वक 5 परमाणु परीक्षण किए थे। इस सफलता के बाद प्रधानमंत्री वाजपेई ने जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान का नारा दिया था। यह दिन हमारी प्रौद्योगिकी ताकत को दर्शाता है। पिछले दिनों भारत ने अपनी उन्नत स्वदेशी प्रौद्योगिकी का परिचय देते हुए आइसीबीएम यानी इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 और देश के पहले स्वदेश निर्मित राडार इमेजिंग उपग्रह रीसैट-1 का सफल प्रक्षेपण किया। इस तरह भारत दुनिया के छह ताकतवर देशों के समूह में शामिल हो गया। टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ने के बाद भी भारत दुनिया कुछ देशों से पिछड़ा हुआ है और उसे अभी बहुत से लक्ष्य तय करने हैं। अत्याधुनिक उपग्रहों के माध्यम से दुनिया के कोने-कोने की जानकारी रखने वाला अमेरिका भी भारत के परमाणु विस्फोट की भनक नहीं लगा पाया था। भारत आज अपने दम पर मिसाइल रक्षा कवच विकसित करने में भी सफल हो गया है। हालांकि अमेरिका, चीन जैसा बनने के लिए अभी बहुत मेहनत करनी होगी। चीन ने राडार की पकड़ में न आने वाला स्टील्थ विमान विकसित कर लिया है जो अब तक केवल अमेरिका के पास ही था। भारत को विश्वशक्ति बनने के लिए दूसरों से श्रेष्ठ हथियार प्रौद्योगिकी विकसित करनी होगी। इस दिशा में अग्नि-5 और रीसैट-1 की कामयाबी हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें अस्सी फीसदी से अधिक स्वदेशी तकनीक और उपकरणों का प्रयोग किया गया है। अगर सकारात्मक सोच और ठोस रणनीति के साथ हम लगातार अपनी प्रौद्योगिकी जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे कदम बढ़ाएं तो हम शीघ्र ही आत्मनिर्भर हो सकते हैं। इस कामयाबी के साथ अब चीन और पाकिस्तान इसका जवाब देने के लिए नए हथियारों और उपकरणों की होड़ में शामिल हो जाएंगे इसलिए हमें सतर्क रहते हुए अपने रक्षा कार्यक्रमों को और अधिक मजबूत करना होगा। अगर हम एक विकसित देश बनने की इच्छा रखते हैं तो आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने के लिए हमें दूरगामी रणनीति बनानी पड़ेगी। भारत पिछले छह दशकों में अपनी अधिकांश प्रौद्योगिकीय जरूरतों की पूर्ति दूसरे देशों से करता आया है। वर्तमान में हमें अपनी सैन्य जरूरतों का 70 फीसदी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आयात करना पड़ता है। अमेरिका भारत को हथियार व उपकरण तो दे रहा है पर उनका हमलावर इस्तेमाल न करने और इसकी जांच के लिए अपने प्रतिनिधि भेजने की शर्मनाक शर्ते भी लगाता है। वर्तमान में भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बन रहा है। इससे मुक्त होने के लिए रक्षा मामले में आत्मनिर्भर बनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। हमारे घरेलू उद्योगों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है इसलिए देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी भारतीय उद्योग के कौशल संसाधनों एवं प्रतिभाओं का उपयोग जरूरी है। सुरक्षा मामलों में देश को आत्मनिर्भर बनाने में सरकार और अकेडमिक संस्थाओं की भी सहभागिता जरूरी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारा वैज्ञानिक व प्रौद्योगिकी ढांचा न तो विकसित देशों जैसा मजबूत था और न ही संगठित। इसके बावजूद प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमने काफी कम समय में बड़ी उपलब्धियां हासिल की है। स्वतंत्रता के बाद भारत का प्रयास रहा है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन भी लाया जाए ताकि देश के जीवनस्तर में संरचनात्मक सुधार हो सके। अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण और उदारीकरण के कारण आज प्रौद्योगिकी की आवश्यकता बढ़ गई है। वास्तव में प्रौद्योगिकीय गतिविधियों को बनाए रखने तथा सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए जनमानस में वैज्ञानिक चेतना का विकास जरूरी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) रक्षा मामले में आत्मनिर्भरता पर शशांक द्विवेदी के विचार
दैनिक जागरण (राष्ट्रीय ) में 14/05/2012 प्रकाशित
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Sunday, May 6, 2012

पदोन्नति में आरक्षण


एक ही बार दीजिए आरक्षण
सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों ने बताया है कि पदोन्नतियों में आरक्षण इसलिए भी उचित नहीं है कि वह योग्यता को मारता है। उस महकमे की आम मेधाविता को कुंद करता है। अंतत: यह उत्पादकता को प्रभावित करता है, जिसकी परिणति एक राज्य की प्रतिगामिता में दिखती है
पदोन्नति में भी आरक्षण पर आमादा राजनीति की गरम प्रतिक्रिया अनपेक्षित नहीं कही जाएगी। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश की सरकारी सेवा में प्रोमोशन में रिजव्रेशन को जैसे ही खारिज किया। तभी लखनऊ और नई दिल्ली के सियासतदां के साथ-साथ अवाम को पता चल गया था कि आरक्षण पर इसे अंतिम शब्द कतई नहीं बनने दिया जाएगा। बिल्कुल अपेक्षा के मुताबिक ही मायावती ने राज्यसभा में संविधान में संशोधन की मांग करते हुए कांग्रेस को दलित विरोधी बताया और सदन से निकल आई। ठीक इसी समय लोकसभा में कांग्रेस सांसद और अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने संविधान में संशोधन की मांग उठाई। दलित विरोधी होने का ठप्पा और समाजवादी पार्टी को छोड़ वाम-दक्षिण पंथी विपक्ष का विरोध कांग्रेस को बर्दाश्त नहीं। सरकार तुरंत हरकत में आई और कार्मिक मंत्री वी. कुमारस्वामी के हवाले से सदन को बता दिया गया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मामले की चिंता है और इस पर विचार के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी। इस बाबत विधेयक के लंबित प्रारूप को भी अंतिम रूप देकर संसद में पेश किया जाएगा ताकि बार- बार न्यायालय की मिलने वाली नसीहतों का स्थायी निदान निकाला जा सके। यह केंद्र और संसद का परिदृश्य है। उधर, उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार भी अपने तरीके से कुछ कर रही है। वह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुपालन के लिए एक अध्यादेश लाने वाली है। चूंकि वहां विधानसभा का अभी सत्र चल नहीं रहा है। आरक्षित संवर्ग सरकार की तेजी को अपने विरुद्ध जबर्दस्ती का राजधर्म मान रहा है। उसका कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार के लिए विशेष अवकाश याचिका के स्वीकृत होने और इस पर फैसला आने तक सरकार का वेटिंग मोड में रहना ही बेहतर होगा। इस सलाह में भी कोई बुराई नहीं है। न्यायिक/वैधानिक प्रक्रिया के दायरे में यह राय है। हो सकता है, तब तक केंद्र की तरफ से ही कोई सर्वमान्य हल निकल आए। समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार इसलिए तब तक इंतजार नहीं कर सकती क्योंकि उसे पदोन्नति में एससी/एसटी के कोटे का विरोध करने के लिए जनादेश मिला है। उसने अपने चुनावी घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि सत्ता में आने पर बसपा सरकार के इस फैसले को पलट देगी। सर्वोच्च अदालत के फैसले ने उस पर मुहर लगाकर उसके वादे को न्यायोचित और वैधानिक बना दिया है। एक सरकार के लिए यही तो दिशासूचक/मार्गदर्शक सिद्धांत होते हैं। इसलिए भी लोकसभा में सपा के वरिष्ठ सांसद रामगोपाल यादव कहते हैं कि नौकरी में आरक्षण पर पार्टी और सरकार को ऐतराज नहीं है लेकिन पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था पर घोर आपत्ति है। यह उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक वरिष्ठता नियम-1991’
के मूल स्वरूप से पुष्ट नहीं है। दरअसल, यह सारा मामला मायावती सरकार के समय का है। उत्तर प्रदेश में भले वह नई सामाजिक इंजीनियरिंग, सवर्ण-दलित गठजोड़-की बदौलत सत्ता में आई लेकिन उसने सरकारी सेवा में एससी/एसटी को ही पदोन्नति देने के नियम में संशोधन किया। इसका लाभ पाकर कोई पौने दो लाख लोग विभिन्न सरकारी महकमों में वरिष्ठता पा गए। इसके विरुद्ध सामान्य और ओबीसी संवर्ग की सर्वजन हिताय संरक्षण समितिने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट दायर की। जनवरी, 2011 में दिए गए फैसले में संशोधन 8अ को खारिज कर दिया। हालांकि दो न्यायमूर्ति इसके विरुद्ध थे। बौखलाई मायावती सरकार सर्वोच्च अदालत गई, जहां 29 अप्रैल को उसने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बहाल रखा। इसके बावजूद, प्रदेश सरकार के व्यवहार में एक संतुलन दिखाई देता है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस पक्ष में हैं कि जो हो गया, उसे रहने दिया जाए किंतु आगे की पदोन्नतियों में आरक्षण को अदालत की इच्छा के मुताबिक ही न माना जाए। यह बात सर्वजन हिताय संरक्षण समिति को मान्य नहीं है तो उसका वैधानिक आधार है। दरअसल, अदालत का फैसला नियम आठ-अ को निरस्त कर देता है। जब नियम ही गलत है तो उसके आधार पर दिया गया लाभ भी अनुचित ही होगा। यह सही अनुपालना नहीं होगा। इसलिए वे सभी पदोन्नतियां निरस्त हों और जैसा कि अदालत ने कहा है कि एक ही सूची बने और वही वरिष्ठता के लाभ दिलाने का आधार बने। इसका अनुपालन न हुआ तो समिति की यह आशंका सच निकलेगी कि अगले पांच सालों तक सामान्य/ओबीसी का कोई कर्मचारी/अधिकारी वरिष्ठता का लाभ पाने से वंचित रह जाएगा। इससे जुड़ी दूसरी बात यह है कि एससी/एसटी के सरकारी सेवकों को आरक्षण का दोहरा लाभ मिलेगा। यह आरक्षण के वास्तविक अभिप्राय से मेल नहीं खाता है। मंडल कमीशन के समय यही सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि आरक्षण का लाभ एक बार ही दिया जा सकता है। उसने फिर कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार का 2008 में किया गया संशोधन संविधान का उल्लंघन करता है। आरक्षण के पक्ष में यह आम दलील है कि चूंकि भारतीय समाज असमानता पर आधारित है, लिहाजा उसके सभी अंगों में समता के जरिये संतुलन लाने तक आरक्षण को बनाए रखना लाजिमी है। अनुच्छेद-16 के उपबंध-दो के इस स्पष्ट प्रावधान के बावजूद कि किसी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान, जहां वे रहते हैं के साथ किसी भी स्तर पर कोई भेदभाव नहीं होगा। उनके साथ किसी भी राज्य के अंतर्गत रोजगार पाने और दफ्तर में कोई अंतर नहीं किया जाएगा।राजनीतिकों ने इस प्रावधान में केवलशब्द को आरक्षण के प्रावधान के लिए अयोग्यता के रूप में देखते हुए अनुच्छेद-16 के ही अनुबंध-4 का उपयोग किया, जिसमें कहा गया था कि किसी राज्य को आरक्षण का प्रावधान करने से नहीं रोका जाएगा, अगर वह पाता है कि किसी जाति का उस राज्य की सरकारी सेवा में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है। अपनी सामाजिक संरचना में वंचितों के एक व्यापक तबके की वास्तविकता को देखते हुए बनी सहमति की भी एक समय सीमा थी। लेकिन वह समय-समय पर बढ़ाई जाती रही। आरक्षण के जारी रहने से संबद्ध वगरे में एक क्रीमी क्लास उभरा है। देखा गया है कि जिस आरक्षण को अंतिम आदमी के लिए समानता के अवसर के तौर पर देखा गया था, उससे एक बड़ा वर्ग वंचित रह गया है और खास-खास लोगों की पीढ़ियां ही संपन्न हो रही हैं। यह खुशहाली चार-चार पीढ़ियों तक फैली है जबकि व्यापक समाज अवसरों के लिए कतार में ही रह गया है। इसकी समीक्षा की जरूरत शिद्दत से है। इससे कतराते जाने से सामाजिक असंतोष की बड़ी समस्या से हमें रू-ब-रू होना पड़ेगा। लेकिन जिस तरह से आरक्षण के मसले को वोट के चश्मे से देखा जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसी नियति सामने आती लगती है। सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों ने बताया है कि पदोन्नतियों में आरक्षण इसलिए भी उचित नहीं है कि वह योग्यता को मारता है। उस महकमे की आम मेधाविता को कुंद करता है। अंतत: यह उत्पादकता को प्रभावित करता है, जिसकी परिणति एक राज्य की प्रतिगामिता में दिखती है। खुद कांशीराम भी जातीय आधार पर आरक्षण के विरोधी थे। अलबत्ता, वह दलितों को वित्तीय और राजनीतिक अवसर के पक्षधर थे। यह पता नहीं कि अब भी उनका स्टैंड यही रहता या बदल जाता। मौजूदा परिस्थितियों में उप्र सरकार के लिए यही उचित होगा कि वह जनादेश का पालन करते हुए न्यायालय के आदेश को अधूरा नहीं पूरा लागू करे। पदोन्नति पाने वालों के वास्तविक आधार तय करे। वहीं केंद्र सरकार अगर सर्वदलीय बैठक बुलाती है तो बेहतर होगा कि वह उन स्वरों को सुनें, जो केवल राजनीतिक जुबान नहीं देश-समाज हित की जवाबदेही और समझदारी से बोलते हैं। आरक्षण पर अंतिम हल निकलना चाहिए क्योंकि देश को कई मुकाम पाने अभी बाकी हैं। लेखक रणविजय सिंह ,(साभार -राष्ट्रीय सहारा)