Monday, January 30, 2012

‘आधार’ पर राजनीति


‘आधार’ पर राजनीति
भारतीय विशिष्ट पहचान संख्या प्राधिकरण द्वारा भारत के नागरिकों को प्रदान की जा रही विशिष्ट पहचान संख्या ,आधार कार्ड परियोजना अन्य कई सरकारी योजनाओ की तरह अधर में लटकती हुई दिख रही रही हैं  तीन  साल पहले विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी (यूआइडीआइए) का गठन किया गया था। इसका मकसद नागरिकों की पहचान और सामाजिक योजनाओं का लाभ उन तक पहुंचाने के लिए एक सुरक्षित तकनीकी बॉयोमेट्रिक डाटाबेस मुहैया कराना था। मूल निवास प्रमाण पत्र, राशनकार्ड, मतदाता पहचान पत्र और अब आधार योजना के अंतर्गत एक विशिष्ट पहचान पत्र हरेक नागरिक को देने की योजना थी ।  आईटी दिग्गज  नंदन नीलकेणी को इसका निदेशक बनाकर पांच साल में करीब 60 करोड़ लोगों को विशिष्ट पहचान पत्र यूआइडी या आधार कार्ड देने का लक्ष्य रखा गया। यूआइडी को शुरुआती तौर पर 3,000 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया। हालांकि अब सरकार के भीतर से ही योजना के औचित्य पर सवाल उठने लगे हैं। योजना आयोग, गृह मंत्रालय के बाद वित्त मंत्रालय से संबंधित संसद की स्थायी समिति ने भी सुरक्षा जोखिम, निजता के संरक्षण के प्रावधानों की कमी और फिंगर प्रिंट और पुतलियों के स्कैन की तकनीक को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। संसदीय समिति ने नेशनल आइडेंटिफिकेशन विधेयक को खारिज कर दिया है। 
वित्तीय मामलों पर यशवंत सिन्हा की अगुवाई वाली संसदीय समिति ने नैशनल आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया बिल को उसके मौजूदा स्वरूप में अस्वीकार्य  कर दिया है। समिति ने सवाल उठाया है कि नंदन नीलकेणी के नेतृत्व में यूआईडी प्रॉजेक्ट संसद से मंजूरी लिए बिना लाखों लोगों की निजी जानकारी कैसे इकट्ठा कर रहा है। अगर एनआईए बिल पास हुआ होता तो यूआईडी प्रॉजेक्ट को कानूनी आधार मिल गया होता, लेकिन कमिटी के मुताबिक समस्या यह है कि सरकार ने क्यों यूआईडी को बिनी किसी कानूनी आधार के तकरीबन तीन साल तक काम करने दिया। इस बीच उसने नाम, पते, फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैन का बड़ा डाटाबेस तैयार कर लिया है।  यूआईडी प्रॉजेक्ट के तहत जारी किए गए आधार कार्ड गैरकानूनी प्रवासियों को भी मिल सकता है, जिससे उन्हें सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी योजनाओं का फायदा उठाने का मौका मिलेगा और ऐसे में उन्हें यहां की नागरिकता हासिल करने का रास्ता मिल सकता है। संसदीय समिति की तरफ से जारी रिपोर्ट में बायोमीट्रिक डाटा के इस्तेमाल से जुड़ी तकनीकी चिंताएं उठाई हैं। इनमें इकट्ठा किए गए डाटा की सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़ी बातें शामिल हैं। 
दूसरे सरकारी मंत्रालय भी यूआईडी को लेकर उत्साहहीन हो गए हैं, खासतौर पर गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय। गृह मंत्रालय तो नैशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) प्रॉजेक्ट के तहत नागरिकों की अपनी फेहरिस्त तैयार कर रहा है। यहां तक कि योजना आयोग ने भी सांसदों से कहा है कि यह प्रोजेक्ट अपने मूल दायरे से बाहर चला गया है। 


साल 2007-08 से 2010-11 के दौरान इस प्रॉजेक्ट पर कुल 3,474 करोड़ रुपए खर्च किए गए। साल 2011-12 में इसके लिए 4,113 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया। जनगणना के दौरान ही इस प्रॉजेक्ट के लिए नाम और पता जैसे ब्योरे लिए गए। अब सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (डीआईटी) की अगुवाई में बायोमीट्रिक डाटा जुटाने का काम अलग से शुरू किया जाएगा। 
दरअसल केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलुवालिया द्वारा बनाये गए इस चक्रब्यूह का शिकार बन रहे हैं नीलकेणी, जो पिछले वर्षों से अपने अथक प्रयास के द्वारा भारत के प्रत्येक नागरिक को उसकी अपनी एक पहचान पत्र के द्वारा भारतीय होने का अधिकार प्रदान कर रहे हैं। लेकिन यदि चल रहे हालत को माना जाय तो वह समय दूर नहीं है कि किसी दिन नंदन नीलकेणी इस चापलूस और चाटुकारों की दुनिया को त्यागकर अपनी आईटी की दुनिया में वापस चले जाएँ ।. 
हालत यह है कि गृह मंत्री चिदम्बरम ने इस विभाग पर होने वाले खर्चों को फिजूल खर्च बताया है और इससे प्रेरित होकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने अगले वित्तीय वर्ष (2012-13) में यूआईडीए को आवंटित होने वाले कुल राशि में 50 फीसदी की कमी कर दी है। प्रधान मंत्री जो कि योजना आयोग के अध्यक्ष भी होते हैं, ने इस विषय पर किसी भी प्रकार की “दखलंदाजी” अब तक नहीं की है, लेकिन प्रधान मंत्री कार्यालय के सूत्रों के मुताबिक, वे स्वयं इस घटनाक्रम से स्तब्ध हैं। सूत्रों के मुताबिक, प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के “व्यक्तिगत अनुरोध” पर ही नंदन निलेकनी अपनी आईटी की दुनिया को छोड़ कर देश के प्रत्येक नागरिक को एक भारतीय होने का पहचान पत्र और नागरिक संख्या उपलब्ध कराने के लिए यूआईडीए का कार्यभार संभाला था। वास्तव में यह दलगत राजनीति और कुंठित मानसिकता  का परिणाम है
इस मुद्दे पर गहरी  पड़ताल की जाये  तो  ऐसा प्रतीत होता है कि गृहमंत्रालय आधार की बढती लोकप्रियता को कमजोर कर नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) को प्रमुखता देना चाहता है।  एनपीआर भी लगभग ‘आधार’ जैसा ही एक प्रयास है जो देश में लोगों कि आबादी के अतिरिक्त कुछ अन्य सूचनाओं को एकत्रित कर रहा है। चुकि इस कार्य का करता-धर्ता गृह मंत्रालय है और गृह मंत्री की देख रेख में है, इसलिए ‘आधार’ के बजट में कटौती कर उसे प्रोत्साहित किया जा सकता है। इतना ही नहीं, गृह मंत्रालय ने तो यूआईडीए की स्थापना और इसकी स्वायतत्ता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। सूत्रों के अनुसार यूआईडीए की स्थापना और इसकी स्वायत्ता तब तक मान्य नहीं है जब तक नेशनल ऑथोरिटी ऑफ़ इंडिया बिल 2010 संसद द्वारा पारित नहीं हो जाता। 
कुछ राजनीतिज्ञों के अनुसार यह कैसे संभव है कि जिस संस्था का कोई संवैधानिक आधार नहीं हो, भारत की संसद उसकी स्थापना और स्वायत्ता को क़ानूनी रूप ना दे दे, तब तक इस पर इतनी बड़ी राशि का व्यय तो तर्क संगत नहीं लगता, साथ ही, इसके द्वारा इस स्थिति में ‘आधार कार्ड’ निर्गत करना क्या क़ानूनी दस्तावेज हों सकता है?” यूआईडीए अब तक एक करोड़ आधार कार्ड बनाकर वितरित कर चुका है और आगामी 2014 तक साठ करोड़ आधार कार्ड वितरित करने का लक्ष्य है।
एक बात समझ में नहीं आती कि आधार परियोजना को शुरू किये जाने के पहले इससे सम्बंधित आपत्तियों की मसलन सुरक्षा और गोपनीयता सम्बन्धी बातों की ठीक ढंग से पड़ताल क्यों नहीं की गई ?अब जब परियोजना पर तीन साल से काम शुरू हो चुका है और इस पर अरबों रुपये खर्च किये जा चुके है तब इसे बंद करने की बात की जा रही है ,इसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है .क्या ये न्याय संगत है ?अब इस पर राजनीति भी शुरू हो गई है। इसका विरोध करने वाले अगर संजीदा थे तो तीन साल पहले प्रश्न उठाते। सच बात तो यह है कि देश में जो हालत बन रहे है उसे देख कर तो यही लगता है कि आम आदमी के लिए शुरू की गई इस परियोजना का भविष्य अधर में लटक चुका है ।
लेखक
शशांक द्विवेदी 


उर्जा संकट के प्रति दूरगामी रणनीति जरुरी


उर्जा संकट के प्रति दूरगामी रणनीति जरुरी
पिछले दिनों उर्जा क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों के प्रतिनिधियो ,मालिकों ने  प्रधानमंत्री से मिलकर इस क्षेत्र की अपनी समस्याए रखी । ये बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योकि इसमें प्रधानमंत्री के साथ साथ उर्जा मंत्री ,कोयला मंत्री ,पर्यावरण मंत्री ,योजना आयोग के उपाध्यक्ष सहित उर्जा क्षेत्र के लगभग सभी उद्योगपति थे । बीते साल उर्जा क्षेत्र के  उद्योगपतियों, कोयला मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय के बीच विभिन्न मुद्दों पर टकराव और खींचतान की खबरें थी । जिस तरह से देश में  अर्थव्यवस्था का विस्तार हो रहा है और आबादी दिनोंदिन बढ़ रही है उसे देखते हुए ऊर्जा संकट के प्रति सरकार को पहले ही आगाह होना चाहिए था।  
सस्ती व सतत ऊर्जा की आपूर्ति किसी भी देश की तरक्की के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। देश में उर्जा के दो प्रमुख माध्यम बिजली और पेट्रोलियम पदार्थाे की कमी होने से वैज्ञानिकों का ध्यान पुनः ऊर्जा के अन्य स्रोतों की ओर गया है। किसी भी देश क लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्त्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन । इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि। भारत में इसके लिए पर्याप्त  संसाधन उपलब्ध हैं, और वैकल्पिक ऊर्जा के तरीके ग्राम स्वराज्य या स्थानीय स्तर पर स्वावलंबन के सपने से भी अनुकूल हैं, इसलिए देश में इन्हे बड़े पैमाने पर अपनाने की जरूरत है । जिससे देश में उर्जा के क्षेत्र में बढती  मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को कम किया जा सके । हमें न केवल वैकल्पिक ऊर्जा बनाने के लिए पर्याप्त इंतजाम करना होगा, बल्कि सांस्थानिक परिवर्तन भी करना होगा जिससे कि लोगों के लिए स्थायी और स्थानीय ऊर्जा के संसाधनों से स्थानीय ऊर्जा की जरुरत पूरी हो सके।
जब से लोगों को विश्व-स्तर पर यह समझ में आ रहा है कि तेल तीव्रता से समाप्त हो रहा है, ऊर्जा का मुद्दा नीति-चर्चाओं में प्रमुख जगह लिए हुए है ।  पारंपरिक तौर पर ऊर्जा के रूप में बिजली प्रायः तेल, कोयला, जल या परमाणु ऊर्जा से प्राप्त की जाती है । गांव में ऊर्जा की आपूर्ति पर्याप्त नहीं है जिसके कारण लोग रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करते हैं । शहरों में बिजली की आपूर्ति के कारण वहां उद्योग विकसित हो रहे है जिसके कारण गांव की अपेक्षा शहरों में भीड़ बढ़ती जा रही है । ऊर्जा आपूर्ति के लिए गैर नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे कोयला, कच्चा तेल आदि पर निर्भरता इतनी बढ़ रही है कि इन स्रोतों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है । विशेषज्ञों का कहना है कि अगले 40 वर्षों में इन स्रोतों के खत्म होने की संभावना है । ऐसे में विश्वभर के सामने ऊर्जा आपूर्ति के लिए अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बिजली प्राप्त करने का विकल्प रह जाएगा । अक्षय ऊर्जा नवीकरणीय होने के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल भी है । हालांकि यह भी सत्य है कि देश की 80 प्रतिशत विद्युत आपूर्ति गैर नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पूरी हो रही है । जिसके लिए भारी मात्रा में कोयले का आयात किया जाता है । वर्तमान में देश की विद्युत आपूर्ति में 64 प्रतिशत योगदान कोयले से बनाई जाने वाली ऊर्जातापीय ऊर्जा का है । ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति और अन्य कार्यों के लिए कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का भी आयात किया जाता है जिसके कारण भारत की मुद्रा विदेशी हाथों में जाती है । अर्थशास्त्रियों के अनुसार यदि एक बैरल कच्चे तेल की कीमत में एक डालर की वृद्धि होती है तो भारत के तेल आयात बिल में 425 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त व्यय जुड़ जाता है अर्थात तेल की कीमतों में वृध्दि का सीधा असर हमारे मुद्रा भण्डार पर पड़ता है। इन दिनों तेल कीमतों में उफान जारी और जल्दी ही सार्वकालिक उचाईयो पर पहुचने की संभावना हैं,तेल की ये कीमतें हमारे घरेलू और बाहरी दोनों मोर्चाे को बुरी तरह से प्रभावित करेंगी। कीमतों का ये असर अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला है जिसे कम किए जाने की जरूरत है ।। वर्तमान में देश की विद्युत आपूर्ति में 64 प्रतिशत योगदान कोयले से बनाई जाने वाली ऊर्जातापीय ऊर्जा का है । ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति और अन्य कार्यों के लिए कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का भी आयात किया जाता है जिसके कारण भारत की मुद्रा विदेशी हाथों में जाती है । आंकड़ों पर गौर किया जाए तो वर्ष 2010-11, 2009-10 में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का कुल सकल आयात क्रमशः 4,18,475 करोड़, 4,22,105 करोड़ था जबकि इसकी तुलना में निर्यात क्रमशः 1,44,037 करोड़, 1,21,086 करोड़ था । अतः आयात और निर्यात के बीच इतना बड़ा अंतर अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला है जिसे कम किए जाने की जरूरत है । 
देश में बिजली की आपूर्ति कम पड़ रही है। 10वीं पंचवर्षीय योजना में 41,000 मेगावाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन लक्ष्य के मुकाबले मात्र 21,200 मेगावाट उत्पादन ही हो पाया। 11वीं योजना में 78,577 मेगावाट अतिरिक्त उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था जिसे संशोधित कर 62,375 मेगावाट कर दिया गया। कुल मिलाकर देश में 1,60,000 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता है जबकि खपत दिनप्रतिदिन बढ़ती जा रही है ।
विकास का जो माँडल हम अपनाते जा रहे है उस दृष्टि से अगली प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में हमे उर्जा उत्पादन को लगभग दुगुना करते जाना होगा । हमारी उर्जा खपत बढ़ती जा रही है । इस प्रकार उर्जा की मांग व पूर्ति में जो अतंर है वह कभी कम होगा ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता।
किसी आधारभूत उत्पाद या तकनीक के सन्दर्भ में दूसरों पर आश्रित रहना किसी देश के अर्थ तंत्र के लिए कितना भारी पड़ता है इसका ज्वलंत और पीड़ाकारी  प्रमाण है देश में उर्जा और पेट्रोलियम उत्पादों की कमी । ऊर्जा की बढ़ती मांग के हिसाब से उत्पादन में  कमी है । जहां सन् 2000-01 में भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत 374 किलोवाट प्रतिवर्ष थी वहीं वर्तमान में 602 किलोवाट हो गयी है। हमारे योजनाकार वर्ष 2012 तक प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत 1000 किलोवाट का अनुमान लगा रहे हैं तथा इस हिसाब से ऊर्जा उत्पादन को बढ़ाने वाली परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। विकसित देशों में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष लगभग 10000 किलोवाट ऊर्जा खपत है। 
देश मे प्रति व्यक्ति औसत उर्जा खपत वहाँ के जीवन स्तर की सूचक होती है। इस दृष्टि से दुनियाँ के देशों मे भारत का स्थान काफ़ी नीचे है । देश की आबादी बढ़ रही है । बढ़ती आबादी के उपयोग के लिए और विकास को गति देने के लिए हमारी उर्जा की मांग भी बढ़ रही है द्रुतगाति से देश के विकास के लिए औद्योगीकरण, परिवहन और कृषि के विकास पर ध्यान देना होगा. इसके लिए उर्जा की आवश्यकता है । दुर्भाग्यवश उर्जा के हमारे प्राकृतिक संसाधन बहुत ही सीमित है। खनिज तेल पेट्रोलियम, गैस, उत्तम गुणवत्ता के कोयले के हमारे प्राकृतिक संसाधन बहुत ही सीमित हैं। हमें बहुत सा पेट्रोलियम आयात करना पड़ता है । हमारी विद्युत की माँग उपलब्धता से कही बहुत ज़्यादा है । आवश्यकता के अनुरुप विद्युत का उत्पादन नहीं हो पा रहा है।
ऊर्जा क्षेत्र के विषय  में देश के उद्योगपतियों को प्रधानमंत्री द्वारा एक महीने के भीतर वर्तमान समस्या का समाधान कर लिए जाने का आश्वासन मिलना और इसके लिए समिति का गठन किया जाना सकारात्मक है, लेकिन ऐसा होने के बावजूद पूरी समस्या के सिर्फ एक पहलू का ही समाधान होगा, जबकि आज जरूरत ऊर्जा संकट पर संपूर्णता में विचार करने का है। हमें घरेलू, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र में जरूरी ऊर्जा की मांग को पूरा करने के लिए दूसरे वैकल्पिक उपायों पर भी विचार करने की आवश्यकता है। यह अक्षय ऊर्जा के प्रयोग से ही संभव है । भारत में अक्षय ऊर्जा के कई स्रोत उपलब्ध है ।  सुदृढ़ नीतियों द्वारा इन स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है ।
लेखक
शशांक द्विवेदी 


ला नीना का प्रभाव


ला नीना की वजह से बिगड़ा मौसम का मिजाज
दुनिया भर के देशों की जलवायु और मौसम में परिवर्तन हो रहा है। जापान में आई सुनामी, बैंकाक में बाढ़ ,अमेरिका में तूफान, बर्फबारी और अब भारत सहित पूरे एशिया में भारी ठंड इसके उदाहरण हैं। एशियाई देशों पर बदलते मौसम का खतरा गहराता जा रहा है। बेमौसम बरसात और अब भारी ठंड ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार बहुत बड़ी मात्रा में हिम प्रखण्ड  दक्षिणी ध्रुव की ओर से धीरे-धीरे सरक रहा है। फलस्वरूप पूरे विश्व का तापक्रम गिर रहा है और उत्तरार्द्ध गोलार्द्ध में बर्फ का जमाव अधिक हो रहा है । इस तरह दक्षिणी एवं उत्तरी ध्रुव प्रदेशों के तापक्रम में अप्रत्याशित रूप से हुआ हेर-फेर सारे विश्व के वातावरण को प्रभावित कर रहा है। वर्ल्ड क्लाइमेट कांफ्रेस डिक्लेरेशन एण्ड सपोर्टिंग डॉक्युमेण्ट्स के अनुसार प्रौद्योगिकी के व्यापक विस्तार के कारण हवा में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ रही है ।
मकर संक्रांति बीतने के बाद भी ठंड छक्के छुड़ा रही है। पूरा उत्तर भारत ठंड की चपेट में है। इस जबरदस्त ठंड का कारण ला नीना के सक्रिय होने और पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बर्फवारी है। पहाडों पर हो रही बर्फबारी का असर मैदानी इलाकों में भी है। पहाड़ी क्षेत्रों की ओर से चलने वाली सर्द हवाएं अपनी रफ्तार से सूरज को भी सहमा दे रहीं हैं। बर्फीली हवाओं की गति छह से दस किमी तक है। उधर लानीना इफेक्ट भी अपना असर दिखा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार लानीना का असर जब भी आता है, उस साल ठंड अधिक पड़ती है। लानीना का असर दो से चार साल के अंतराल में अधिक सक्रिय होता है। जिसके कारण ठंड बढ़ती है।
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रशांत महासागर में ला-नीना की स्थिति बनने की वजह से ही देश  में ज़बरदस्त ठंड पड़ रही है। प्रशांत महासागर में सूरज अगर किसी वजह से भूमध्यरेखा के आसपास के इलाके के पानी को गर्म नहीं कर पातीं और पानी का तापमान औसत 27 डिग्री से नीचे रहता है, तो ऐसी स्थिति में एल निनो नहीं बन पाता। जिसे ला-निना कहते हैं। प्रशांत में एल निनो का नहीं बनना मौसम की बड़ी चेतावनी समझा जाता है। एल-निनो के न बनने पर सामने आने वाली ला-निना की स्थिति मौसम की कई असामान्य हलचलों को जन्म देता है।
एल-निनो की स्थिति में मानसून असामान्य हो उठता है, पश्चिमी विक्षोभ की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। अगर ऐसा सर्दियों में होता है तो पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी बढ़ जाती है और मैदानी इलाकों में असामान्य ठंड पड़ती है. वहीं गर्मियों में ला-निना की स्थिति बनने पर भारी बारिश हो सकती है. मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक देश  में जारी कड़ाके की ठंड की वजह पश्चिमी विक्षोभ है। पश्चिमी विक्षोभ, पश्चिम के ठंडे-बर्फीले इलाकों से उठने वाली उन ठंडी हवाओं को कहते हैं जो कैस्पियन सागर के उस पार से उठकर पूरब में हमारे देश की ओर आती हैं। एक के बाद एक उठती तरंगों जैसी पश्चिम से आने वाली इन ठंडी हवाओं ने हमारे देश में जारी सर्दियों के मौसम की ठिठुरन बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रशांत महासागर के ला-निना ने इस बार पश्चिमी विक्षोभ को असामान्य कर दिया है, जिससे इस बार की सर्दियों में दिन का तापमान गिर रहा है और कड़ाके की ठंड पड़ रही है।
ला नीना और अगले दो महीनों में भारत में गिरते पारे की संभावना के बीच सीधा रिश्ता है। पुणे स्थित मौसम विभाग के निदेशक डीएस पाई के मुताबिक, ला नीना और ठंड के बीच संबंध बहुत सामान्य नहीं है, लेकिन ला नीना की वजह से ठंड बढ़ने के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। ला नीना की स्थिति मार्च तक रहेगी। ला नीना का स्पेनिश भाषा में मतलब लड़की होता है। दक्षिण प्रशांत महासागर के समुद्री सतह पर तापमान के सामान्य से नीचे गिरने को ही ला नीना कहते हैं।  
आगामी दिनों में न्यूनतम तापमान में और गिरावट दर्ज की गई तो फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं। वहीं अब औंस भी फसलों के लिए नुकसानदायक साबित हो रही है। उत्तर भारत में हो रही बर्फबारी का असर साफ देखने को मिल रहा है।
दुनिया भर में पर्यावरण सरंक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणिति होती दिखाई नहीं दे रही है । जिस तरह क्लामेट चेंज दुनिया में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएगीं कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे । यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहॉं कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है । पर्यावरण का सवाल जब तक तापमान में बढोत्तरी से मानवता के भविष्य पर आने वाले खतरों तक सीमित रहा, तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर उतना ध्यान नहीं गया । परन्तु अब जलवायु चक्र का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे है कब बुवाई करे और कब फसल काटें । 
दुनिया भर में मौसम का मिजाज बिगडा हुआ हैं। औद्योगिक क्रांति का दुष्परिणाम है कि दुनिया भर के लोग प्रकति का कहर झेलने को मजबूर हैं। हजारों की संख्या में लोग काल के ग्रास मंे समां रहे हैं।  पिछले दिनों जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के मुद्दे पर डरबन में आयोजित वार्ता सम्मेलन समाप्त हो चुका है। यह 17वां मौका था, जब दुनिया के देश कार्बन उत्सर्जन पर चर्चा के लिए जुटे थे। मुद्दा वही था कि कैसे जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम किया जाए। अगर हम अतीत को देखें तो करीब 20 साल पहले 1992 में यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज बना था और तभी से जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों पर चर्चा शुरू हुई, लेकिन 20 साल का समय अब खत्म होने की कगार पर है। इस दौरान जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए डरबन वार्ता को लेकर अब तक 17 बैठकें भी चलीं, लेकिन अभी तक हम इन खतरों से निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति पर क्रियान्वयन शुरू नहीं कर पाए हैं। जो कार्य अभी तक हुआ भी है तो वह केवल नीतिगत स्तर पर हुआ है। उसका जमीन धरातल पर उतरना अभी बाकी है। अनुसंधानकत्ताओं ने आगाह किया कि वायु में बढ़ती हुई कार्बन डाईऑक्साइड तथा परमाणु विस्फोटों से होने वाले विकिरण के उच्चतम तापक्रम की रोकथाम की व्यवस्था शीघ्रातिशीघ्र होनी चाहिए । 
वास्तव में सिर्फ जनसख्या वृद्वि ही पर्यावरण असंतुलन के लिए जिम्मेदार नही है बल्कि हमारी उपभोगवादी संस्कृति इसके लिए प्रमुख जिम्मेदार है । दुनिया पूंजीवाद के पीछे इस समय इस तरह से भाग रही है कि उसे तथाकथित विकास के अलावा कुछ और दिख नही रहा है वास्तव में जिसे विकास समझा जा रहा है वह विकास है ही नही । क्या सिर्फ औद्योगिक उत्पादन में बढोत्तरी कर देने को विकास माना जा सकता है ? जबकि एक बडी आबादी को अपनी जिंदगी बीमारी और पलायन में गुजारनी पडे। आदमी पैसे के दम पर अपनी हैसियत बढा- चढाकर दिखाने की कोशिश में जल,उर्जा,जमीन,जंगल,जैसे प्राकृतिक संसाधनो का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है। सबसे बडा संकट यह है कि इस इस्तेमाल का जरूरत से लेना देना नही है बल्कि यह नष्ट करने और बर्बाद करने जैसा ही होता है ।  
देश में भीषण ठंड हो या भयंकर गर्मी ये सब पर्यावरण असंतुलन के कारण है । वास्तव में इन सबके जिम्मेदार तो हमी  लोग है । जब समस्या हम लोगो ने ही पैदा की है तो समाधान भी हम लोगो को ही करना पड़ेगा ,नहीं तो पर्यावरण असंतुलन के हर झटके को झेलना पड़ेगा । चाहे ला नीना  हो या अल नीना सबका प्रभाव हमें झेलना ही पड़ेगा । इसलिए अभी भी समय है कि हम लोग कथित विकास की बेहोशी से जग जाये और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम करे ।
लेखक
शशांक द्विवेदी 


जमीन पर आकाश


जमीन पर ‘आकाश’ 
आकाश टैबलेट पर सवाल 
पिछले साल देश में मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा लांच दुनिया के  सबसे सस्ते  टैबलेट आकाश के लिए इंतजार अब और बढ़ गया है । देश में इस समय दुनिया के सबसे सस्ते टैबलेट आकाश की मांग आसमान छू रही है। इसे बनाने वाली ब्रिटेन की कंपनी डाटाविंड ने इसकी ऑनलाइन बिक्री शुरू की है। महज दो हफ्ते यानी 14 दिन के भीतर 14 लाख लोगों ने इसके लिए बुकिंग करा दी है। डाटाविंड को भी उम्मीद नहीं थी कि आकाश के लिए लोग इस कदर मांग करेंगे। 
पिछले दिनों आकाश टैबलेट पीसी की क्वॉलिटी को लेकर सामने आ रही शिकायतों के बीच सरकार ने अप्रैल में इसका अपग्रेडेड वर्जन आकाश-2 बाजार में लाने का ऐलान किया है। भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने 70 हजार आकाश का ऑर्डर रोक दिया है।   खराब क्वॉेलिटी के चलते सरकार ने आकाश का ऑर्डर रोका है। इस मसले पर सरकार और आकाश बनाने वाली कंपनी डेटाविंड के बीच विवाद बढ़ रहा है । दूसरे वेंडरों की तलाश भी शुरू कर रही है।   सरकार ने स्कूली बच्चों को बांटने के लिए एक लाख आकाश का ऑर्डर दिया था। कंपनी 30 हजार टैब्लेट की सप्लाई कर चुका है। लेकिन इसके परफॉर्मेंस को लेकर लगातार शिकायतें मिलने के बाद ऑर्डर रोक दिया गया। ज्यादातर शिकायतें कम बैटरी लाइफ और स्लोे प्रोसेसर की आईं। सरकार आकाश के लिए नए मानक बना रही है। आकाश का बेहतर वर्जन जनवरी में मिलना था, लेकिन अब लगता है कि यह अप्रैल से पहले मिलना संभव नहीं होगा। हालांकि कंपनी अभी भी इसके लिए लोगों से ऑर्डर ले रही है। 
लेकिन अब आकाश की सफलता पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या आकाश के जरिये एजुकेशन सेक्टर में नया प्रयोग इतना आसान है? विशेषज्ञ इस पर संदेह जताते हैं। विशेषज्ञों का कहना है आकाश स्टैंडर्ड टेबलेट का बिल्कुल सस्ता संस्करण है। यह सस्ता इसलिए है कि इसमें काफी कम कन्फीगरेशन है। इसमें सात इंच का स्क्रीन है। माइक्रोप्रोसेसर काफी धीमा है ( सामान्य माइक्रोप्रोसेसर 800 मेगार्ह्ट्ज से लेकर 1 गीगा हर्ट्ज तक होता है)। बैटरी लाइफ काफी कम है। (अमूमन सामान्य टेबलेट में बैटरी लाइफ आठ घंटे की होती है लेकिन यह दो-तीन घंटे ही चलता है) एंड्रॉयड सिस्टम का पुराना संस्करण है। टचस्क्रीन  भी रेजिस्टिव है।
यूके स्थित मोबाइल इंटरनेट डिवाइस की मैन्यूफैक्चरर कंपनी डाटाविंड ने मोबाइल इंटरनेट डिवाइस मसलन पॉकेटसर्फर बनाया है। इसी कंपनी ने सरकार के लिए आकाश विकसित किया है। कंपनी इसका कॉमर्शियल संस्करण को 3,000 रुपये में बेच रही है। डाटाविंड की ओर से सस्ते में इसे बनाने के पीछे राज क्या है? दरअसल कंपनी इस टेबलेट के 800 कंपोनेंट को पूरी दुनिया में अलग-अलग जगह से मंगा रही है और हैदराबाद में इसे असेंबल कर रही है। दरअसल आकाश अगर पॉपुलर होता है और इसे सफलता मिलती है तो यह हार्डवेयर का नहीं बल्कि एंड्रॉयड का कमाल होगा। एंड्रॉयड के लिए तेज माइक्रोप्रोसेसर की जरूरत होती है। इसके लिए ज्यादा मेमोरी की भी जरूरत होती है। आकाश की सीमित क्षमता की वजह से यह एंड्रॉयड आधारित कंटेंट भी ग्रहण नहीं कर सकेगा। इसके अलावा यह सवाल भी उठता है कि इसके लिए एप्लीकेशन कौन विकसित करेगा। क्योंकि आईआईटी और दूसरे तकनीकी संस्थान के पास ऐसा करने की सीमित क्षमता है। 
ग्रामीण इलाकों में बिजली की समस्या है। इसलिए आकाश की छोटी बैटरी अवधि में इसके इस्तेमाल में बड़ी बाधा बन सकती है। खासकर इसलिए कि हर छात्र-छात्रा को इसके इस्तेमाल करने के लिए हर बेंच में सॉकेट की जरूरत पड़ेगी। साथ ही टचस्क्रीन भी दिक्कत पैदा कर सकता है। लेकिन तमाम ऐसी कमजोरी के बाद आकाश को एक उल्लेखनीय उपकरण माना जा सकता है। लिहाजा आगे आकाश जैसे और इनोवेशन की गुंजाइश बनी रहेगी। कुछ लोगों का कहना है कि यह उपयोगी उपकरण हो सकता है, खासकर ई-बुक रीडिंग जैसी इंटरनेट रहित एप्लीकेशन के लिए। क्या यह 2002 में ईजाद किए गए सिंप्यूटर की राह पर तो नहीं चल पड़ेगा। 
देश में डिजिटल खाई को पाटने की दिशा में पिछले दिनों आकाश नाम के टैबलेट की लांचिंग से काफी उम्मीद बढ़ी है। कहा जा रहा है कि आकाश से देश के एजुकेशन सेक्टर में क्रांति आ जाएगी। 
लेकिन यह इस देश का दुर्भाग्य है कि सरकार लोगो को सपने तो दिखाती है लेकिन उनको पूरा करने की दिशा में ठीक ढंग से काम नहीं होता । आकाश परियोजना के शुरू होने पर ही 2 महीने पहले इस पर सवाल उठने लगे थे लेकिन सरकार ने उस समय इन बातो को अनसुना कर दिया । अगर उस समय आकाश की कमियों को अपग्रेड कर दिया गया होता तो आज नए आकाश 2 को लाँच करने की नौबत नही आती । फिलहाल मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के अनुसार आकाश की  भारी मांग को पूरा करने के लिए इसको बनाने में कई निर्माताओं को लगाया जायेगा और  आकाश के बारे में मिले फीडबैक के आधार पर इसमें सुधार कर इसे अपग्रेड करने में आईआईटी की मदत ली जा रही है । अब यहाँ पर सवाल उठता है कि ये कयावद पहले क्यों नहीं कि गयी जबकि जो शिकायते अभी आ रही है उनके बारे में विशेषज्ञों ने पहले ही आगाह कर दिया था   । असल में मंत्रालय और आकाश को बनाने वाली कंपनी डेटाविंड के बीच मतभेद पैदा हुए थे जो  अब और बढ़ गए  है । क्योकि दुनिया के सबसे सस्ते टैबलेट कंप्यूटर आकाश के लिए सरकार फिर से टेंडर निकालेगी। जिसमे  इसे बनाने वाली ब्रिटिश कंपनी डेटाविंड को भी इस टेंडर में भाग लेने का अधिकार होगा।
केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव एन के सिन्हा के अनुसार कि सरकार ने अब तक एक लाख टैबलेट खरीदे हैं जबकि उसे 22 करोड़ टैबलेट की जरूरत है। इतनी बड़ी तादाद में टैबलेट के निर्माण के लिए फिर से टेंडर निकाला जाएगा। इसमें डेटाविंड सहित अन्य कंपनियां भी भाग लेंगी। डेटाविंड ने सरकार को अभी तक 30000 टेबलेट सौंपे हैं और शेष 70000 वह थोड़े समय बाद सौंपेगी। लेकिन शिकायतों के मद्देनंजर अपना पहला संस्करण बनाना बंद कर दिया है। अब वह नए संस्करण पर काम कर रही है जिसकी कीमत थोड़ी ज्यादा होगी।
सरकार के अनुसार  आकाश टेबलेट लाने का मुख्य मकसद   कंप्यूटिंग और इंटरनेट एक्सेस के लिए प्राइस बैरियर को तोडऩा। आईआईटी राजस्थान और एनएमई-आईसीटी के साथ काम करते हुए हम ऐसा उत्पादन लाने में कामयाब हुए हैं जो भारत में किफायती कंप्यूटिंग और इंटरनेट एक्सेस आम जन को मुहैया कराएगा। वीडियो कॉन्फेंसिंग एक अहम फीचर है जो बच्चो को सामूहिक रूप से इंटरनेट के जरिये शिक्षा देना संभव बनाएगा। हालांकि यह निरूशुल्क उपलब्ध लाइनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम पर आधारित है फिर भी इतने कम दाम में इतनी सारी चीजें समाहित करना कोई आसान काम नहीं है। अगर इस परियोजना के संचालक देश भर से उभरने वाली विशाल मांग को पूरा कर पाते हैं और यह परियोजना जमीनी स्तर पर सही ढंग से लागू की जाती है तो आने वाले वर्षाे में कंप्यूटर शिक्षा और साक्षरता दोनों ही मोर्चाे पर बड़ी उपलब्धियां अर्जित की जा सकती हैं ।
इस समय टैबलेट की हलचल भारत में भी महसूस की जा रही है। ज्यादा से ज्यादा भारतीय उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए कम्पनियां एक के बाद एक कम कीमत के उत्पाद ला रही हैं । भारत में इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीते महीने आकाश की ऑनलाइन बिक्री शुरू हुई और कंपनी को रोजाना करीब एक लाख ऑर्डर मिले। 
महत्वपूर्ण बात यह है कि दुनिया के सबसे सस्ते टेबलेट आकाश के विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत से जुड़ना चाहती हैं। उनकी भागीदारी से कम कीमत का यह टेबलेट पूरी दुनिया के बच्चों के लिए उपलब्ध हो सकेगा। वास्तव में आकाश ने अंतरराष्ट्रीय नेताओं और कंपनियों का ध्यान आकर्षित किया है। आइबीएम और इंटेल जैसी कंपनियां बिना इसकी कीमत बढ़ाए आकाश की क्षमता बढ़ाने के लिए भारत के साथ भागीदारी करना चाहती हैं। इतने कम दाम में इस समय बाजार में आपको इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले सस्ते फोन भी नहीं मिलेंगे, ऐसे में इसे टचस्क्रीन और टैबलेट एक्सपीरियंस के लिए बहुत बढ़िया एंट्री लेवल प्रॉडक्ट माना जा सकता है। 
तमाम सवालो को देखते हुए भी अगर इस परियोजना को देश भर के शैक्षणिक संस्थानों और छात्रों में ठीक ढंग से लागू किया गया तो  आकाश टेबलेट का प्रयोग देश में आई टी शिक्षा के लिए दूरगामी सिद्ध होगा । देश में परियोजनाएँ तो अच्छी सोच के साथ बनाई जाती है लेकिन उनका क्रियान्वयन ठीक ढंग से नहीं हो पता । देश में आकाश की बढती मांगो को देखते हुए आपूर्ति के साथ साथ गुणवत्ता बनाये रखना सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है । ये आगे आने वाला वक्त ही बताएगा कि सरकार इन चुनौतियो का सामना ठीक ढंग से करती है या अन्य परियोजनाओ की तरह इसे भी सिर्फ निजी कंपनियों के भरोसे छोंड दिया जायेगा ।
लेखक 
शशांक द्विवेदी