Monday, January 30, 2012

ला नीना का प्रभाव


ला नीना की वजह से बिगड़ा मौसम का मिजाज
दुनिया भर के देशों की जलवायु और मौसम में परिवर्तन हो रहा है। जापान में आई सुनामी, बैंकाक में बाढ़ ,अमेरिका में तूफान, बर्फबारी और अब भारत सहित पूरे एशिया में भारी ठंड इसके उदाहरण हैं। एशियाई देशों पर बदलते मौसम का खतरा गहराता जा रहा है। बेमौसम बरसात और अब भारी ठंड ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार बहुत बड़ी मात्रा में हिम प्रखण्ड  दक्षिणी ध्रुव की ओर से धीरे-धीरे सरक रहा है। फलस्वरूप पूरे विश्व का तापक्रम गिर रहा है और उत्तरार्द्ध गोलार्द्ध में बर्फ का जमाव अधिक हो रहा है । इस तरह दक्षिणी एवं उत्तरी ध्रुव प्रदेशों के तापक्रम में अप्रत्याशित रूप से हुआ हेर-फेर सारे विश्व के वातावरण को प्रभावित कर रहा है। वर्ल्ड क्लाइमेट कांफ्रेस डिक्लेरेशन एण्ड सपोर्टिंग डॉक्युमेण्ट्स के अनुसार प्रौद्योगिकी के व्यापक विस्तार के कारण हवा में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ रही है ।
मकर संक्रांति बीतने के बाद भी ठंड छक्के छुड़ा रही है। पूरा उत्तर भारत ठंड की चपेट में है। इस जबरदस्त ठंड का कारण ला नीना के सक्रिय होने और पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बर्फवारी है। पहाडों पर हो रही बर्फबारी का असर मैदानी इलाकों में भी है। पहाड़ी क्षेत्रों की ओर से चलने वाली सर्द हवाएं अपनी रफ्तार से सूरज को भी सहमा दे रहीं हैं। बर्फीली हवाओं की गति छह से दस किमी तक है। उधर लानीना इफेक्ट भी अपना असर दिखा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार लानीना का असर जब भी आता है, उस साल ठंड अधिक पड़ती है। लानीना का असर दो से चार साल के अंतराल में अधिक सक्रिय होता है। जिसके कारण ठंड बढ़ती है।
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रशांत महासागर में ला-नीना की स्थिति बनने की वजह से ही देश  में ज़बरदस्त ठंड पड़ रही है। प्रशांत महासागर में सूरज अगर किसी वजह से भूमध्यरेखा के आसपास के इलाके के पानी को गर्म नहीं कर पातीं और पानी का तापमान औसत 27 डिग्री से नीचे रहता है, तो ऐसी स्थिति में एल निनो नहीं बन पाता। जिसे ला-निना कहते हैं। प्रशांत में एल निनो का नहीं बनना मौसम की बड़ी चेतावनी समझा जाता है। एल-निनो के न बनने पर सामने आने वाली ला-निना की स्थिति मौसम की कई असामान्य हलचलों को जन्म देता है।
एल-निनो की स्थिति में मानसून असामान्य हो उठता है, पश्चिमी विक्षोभ की घटनाएँ बढ़ जाती हैं। अगर ऐसा सर्दियों में होता है तो पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी बढ़ जाती है और मैदानी इलाकों में असामान्य ठंड पड़ती है. वहीं गर्मियों में ला-निना की स्थिति बनने पर भारी बारिश हो सकती है. मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक देश  में जारी कड़ाके की ठंड की वजह पश्चिमी विक्षोभ है। पश्चिमी विक्षोभ, पश्चिम के ठंडे-बर्फीले इलाकों से उठने वाली उन ठंडी हवाओं को कहते हैं जो कैस्पियन सागर के उस पार से उठकर पूरब में हमारे देश की ओर आती हैं। एक के बाद एक उठती तरंगों जैसी पश्चिम से आने वाली इन ठंडी हवाओं ने हमारे देश में जारी सर्दियों के मौसम की ठिठुरन बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रशांत महासागर के ला-निना ने इस बार पश्चिमी विक्षोभ को असामान्य कर दिया है, जिससे इस बार की सर्दियों में दिन का तापमान गिर रहा है और कड़ाके की ठंड पड़ रही है।
ला नीना और अगले दो महीनों में भारत में गिरते पारे की संभावना के बीच सीधा रिश्ता है। पुणे स्थित मौसम विभाग के निदेशक डीएस पाई के मुताबिक, ला नीना और ठंड के बीच संबंध बहुत सामान्य नहीं है, लेकिन ला नीना की वजह से ठंड बढ़ने के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। ला नीना की स्थिति मार्च तक रहेगी। ला नीना का स्पेनिश भाषा में मतलब लड़की होता है। दक्षिण प्रशांत महासागर के समुद्री सतह पर तापमान के सामान्य से नीचे गिरने को ही ला नीना कहते हैं।  
आगामी दिनों में न्यूनतम तापमान में और गिरावट दर्ज की गई तो फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं। वहीं अब औंस भी फसलों के लिए नुकसानदायक साबित हो रही है। उत्तर भारत में हो रही बर्फबारी का असर साफ देखने को मिल रहा है।
दुनिया भर में पर्यावरण सरंक्षण को लेकर काफी बातें, सम्मेलन, सेमिनार आदि हो रही है परन्तु वास्तविक धरातल पर उसकी परिणिति होती दिखाई नहीं दे रही है । जिस तरह क्लामेट चेंज दुनिया में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएगीं कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे । यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहॉं कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है । पर्यावरण का सवाल जब तक तापमान में बढोत्तरी से मानवता के भविष्य पर आने वाले खतरों तक सीमित रहा, तब तक विकासशील देशों का इसकी ओर उतना ध्यान नहीं गया । परन्तु अब जलवायु चक्र का खतरा खाद्यान्न उत्पादन पर पड रहा है, किसान यह तय नहीं कर पा रहे है कब बुवाई करे और कब फसल काटें । 
दुनिया भर में मौसम का मिजाज बिगडा हुआ हैं। औद्योगिक क्रांति का दुष्परिणाम है कि दुनिया भर के लोग प्रकति का कहर झेलने को मजबूर हैं। हजारों की संख्या में लोग काल के ग्रास मंे समां रहे हैं।  पिछले दिनों जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के मुद्दे पर डरबन में आयोजित वार्ता सम्मेलन समाप्त हो चुका है। यह 17वां मौका था, जब दुनिया के देश कार्बन उत्सर्जन पर चर्चा के लिए जुटे थे। मुद्दा वही था कि कैसे जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम किया जाए। अगर हम अतीत को देखें तो करीब 20 साल पहले 1992 में यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज बना था और तभी से जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों पर चर्चा शुरू हुई, लेकिन 20 साल का समय अब खत्म होने की कगार पर है। इस दौरान जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए डरबन वार्ता को लेकर अब तक 17 बैठकें भी चलीं, लेकिन अभी तक हम इन खतरों से निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति पर क्रियान्वयन शुरू नहीं कर पाए हैं। जो कार्य अभी तक हुआ भी है तो वह केवल नीतिगत स्तर पर हुआ है। उसका जमीन धरातल पर उतरना अभी बाकी है। अनुसंधानकत्ताओं ने आगाह किया कि वायु में बढ़ती हुई कार्बन डाईऑक्साइड तथा परमाणु विस्फोटों से होने वाले विकिरण के उच्चतम तापक्रम की रोकथाम की व्यवस्था शीघ्रातिशीघ्र होनी चाहिए । 
वास्तव में सिर्फ जनसख्या वृद्वि ही पर्यावरण असंतुलन के लिए जिम्मेदार नही है बल्कि हमारी उपभोगवादी संस्कृति इसके लिए प्रमुख जिम्मेदार है । दुनिया पूंजीवाद के पीछे इस समय इस तरह से भाग रही है कि उसे तथाकथित विकास के अलावा कुछ और दिख नही रहा है वास्तव में जिसे विकास समझा जा रहा है वह विकास है ही नही । क्या सिर्फ औद्योगिक उत्पादन में बढोत्तरी कर देने को विकास माना जा सकता है ? जबकि एक बडी आबादी को अपनी जिंदगी बीमारी और पलायन में गुजारनी पडे। आदमी पैसे के दम पर अपनी हैसियत बढा- चढाकर दिखाने की कोशिश में जल,उर्जा,जमीन,जंगल,जैसे प्राकृतिक संसाधनो का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है। सबसे बडा संकट यह है कि इस इस्तेमाल का जरूरत से लेना देना नही है बल्कि यह नष्ट करने और बर्बाद करने जैसा ही होता है ।  
देश में भीषण ठंड हो या भयंकर गर्मी ये सब पर्यावरण असंतुलन के कारण है । वास्तव में इन सबके जिम्मेदार तो हमी  लोग है । जब समस्या हम लोगो ने ही पैदा की है तो समाधान भी हम लोगो को ही करना पड़ेगा ,नहीं तो पर्यावरण असंतुलन के हर झटके को झेलना पड़ेगा । चाहे ला नीना  हो या अल नीना सबका प्रभाव हमें झेलना ही पड़ेगा । इसलिए अभी भी समय है कि हम लोग कथित विकास की बेहोशी से जग जाये और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम करे ।
लेखक
शशांक द्विवेदी 


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