Monday, January 30, 2012

जमीन पर आकाश


जमीन पर ‘आकाश’ 
आकाश टैबलेट पर सवाल 
पिछले साल देश में मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा लांच दुनिया के  सबसे सस्ते  टैबलेट आकाश के लिए इंतजार अब और बढ़ गया है । देश में इस समय दुनिया के सबसे सस्ते टैबलेट आकाश की मांग आसमान छू रही है। इसे बनाने वाली ब्रिटेन की कंपनी डाटाविंड ने इसकी ऑनलाइन बिक्री शुरू की है। महज दो हफ्ते यानी 14 दिन के भीतर 14 लाख लोगों ने इसके लिए बुकिंग करा दी है। डाटाविंड को भी उम्मीद नहीं थी कि आकाश के लिए लोग इस कदर मांग करेंगे। 
पिछले दिनों आकाश टैबलेट पीसी की क्वॉलिटी को लेकर सामने आ रही शिकायतों के बीच सरकार ने अप्रैल में इसका अपग्रेडेड वर्जन आकाश-2 बाजार में लाने का ऐलान किया है। भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने 70 हजार आकाश का ऑर्डर रोक दिया है।   खराब क्वॉेलिटी के चलते सरकार ने आकाश का ऑर्डर रोका है। इस मसले पर सरकार और आकाश बनाने वाली कंपनी डेटाविंड के बीच विवाद बढ़ रहा है । दूसरे वेंडरों की तलाश भी शुरू कर रही है।   सरकार ने स्कूली बच्चों को बांटने के लिए एक लाख आकाश का ऑर्डर दिया था। कंपनी 30 हजार टैब्लेट की सप्लाई कर चुका है। लेकिन इसके परफॉर्मेंस को लेकर लगातार शिकायतें मिलने के बाद ऑर्डर रोक दिया गया। ज्यादातर शिकायतें कम बैटरी लाइफ और स्लोे प्रोसेसर की आईं। सरकार आकाश के लिए नए मानक बना रही है। आकाश का बेहतर वर्जन जनवरी में मिलना था, लेकिन अब लगता है कि यह अप्रैल से पहले मिलना संभव नहीं होगा। हालांकि कंपनी अभी भी इसके लिए लोगों से ऑर्डर ले रही है। 
लेकिन अब आकाश की सफलता पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या आकाश के जरिये एजुकेशन सेक्टर में नया प्रयोग इतना आसान है? विशेषज्ञ इस पर संदेह जताते हैं। विशेषज्ञों का कहना है आकाश स्टैंडर्ड टेबलेट का बिल्कुल सस्ता संस्करण है। यह सस्ता इसलिए है कि इसमें काफी कम कन्फीगरेशन है। इसमें सात इंच का स्क्रीन है। माइक्रोप्रोसेसर काफी धीमा है ( सामान्य माइक्रोप्रोसेसर 800 मेगार्ह्ट्ज से लेकर 1 गीगा हर्ट्ज तक होता है)। बैटरी लाइफ काफी कम है। (अमूमन सामान्य टेबलेट में बैटरी लाइफ आठ घंटे की होती है लेकिन यह दो-तीन घंटे ही चलता है) एंड्रॉयड सिस्टम का पुराना संस्करण है। टचस्क्रीन  भी रेजिस्टिव है।
यूके स्थित मोबाइल इंटरनेट डिवाइस की मैन्यूफैक्चरर कंपनी डाटाविंड ने मोबाइल इंटरनेट डिवाइस मसलन पॉकेटसर्फर बनाया है। इसी कंपनी ने सरकार के लिए आकाश विकसित किया है। कंपनी इसका कॉमर्शियल संस्करण को 3,000 रुपये में बेच रही है। डाटाविंड की ओर से सस्ते में इसे बनाने के पीछे राज क्या है? दरअसल कंपनी इस टेबलेट के 800 कंपोनेंट को पूरी दुनिया में अलग-अलग जगह से मंगा रही है और हैदराबाद में इसे असेंबल कर रही है। दरअसल आकाश अगर पॉपुलर होता है और इसे सफलता मिलती है तो यह हार्डवेयर का नहीं बल्कि एंड्रॉयड का कमाल होगा। एंड्रॉयड के लिए तेज माइक्रोप्रोसेसर की जरूरत होती है। इसके लिए ज्यादा मेमोरी की भी जरूरत होती है। आकाश की सीमित क्षमता की वजह से यह एंड्रॉयड आधारित कंटेंट भी ग्रहण नहीं कर सकेगा। इसके अलावा यह सवाल भी उठता है कि इसके लिए एप्लीकेशन कौन विकसित करेगा। क्योंकि आईआईटी और दूसरे तकनीकी संस्थान के पास ऐसा करने की सीमित क्षमता है। 
ग्रामीण इलाकों में बिजली की समस्या है। इसलिए आकाश की छोटी बैटरी अवधि में इसके इस्तेमाल में बड़ी बाधा बन सकती है। खासकर इसलिए कि हर छात्र-छात्रा को इसके इस्तेमाल करने के लिए हर बेंच में सॉकेट की जरूरत पड़ेगी। साथ ही टचस्क्रीन भी दिक्कत पैदा कर सकता है। लेकिन तमाम ऐसी कमजोरी के बाद आकाश को एक उल्लेखनीय उपकरण माना जा सकता है। लिहाजा आगे आकाश जैसे और इनोवेशन की गुंजाइश बनी रहेगी। कुछ लोगों का कहना है कि यह उपयोगी उपकरण हो सकता है, खासकर ई-बुक रीडिंग जैसी इंटरनेट रहित एप्लीकेशन के लिए। क्या यह 2002 में ईजाद किए गए सिंप्यूटर की राह पर तो नहीं चल पड़ेगा। 
देश में डिजिटल खाई को पाटने की दिशा में पिछले दिनों आकाश नाम के टैबलेट की लांचिंग से काफी उम्मीद बढ़ी है। कहा जा रहा है कि आकाश से देश के एजुकेशन सेक्टर में क्रांति आ जाएगी। 
लेकिन यह इस देश का दुर्भाग्य है कि सरकार लोगो को सपने तो दिखाती है लेकिन उनको पूरा करने की दिशा में ठीक ढंग से काम नहीं होता । आकाश परियोजना के शुरू होने पर ही 2 महीने पहले इस पर सवाल उठने लगे थे लेकिन सरकार ने उस समय इन बातो को अनसुना कर दिया । अगर उस समय आकाश की कमियों को अपग्रेड कर दिया गया होता तो आज नए आकाश 2 को लाँच करने की नौबत नही आती । फिलहाल मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के अनुसार आकाश की  भारी मांग को पूरा करने के लिए इसको बनाने में कई निर्माताओं को लगाया जायेगा और  आकाश के बारे में मिले फीडबैक के आधार पर इसमें सुधार कर इसे अपग्रेड करने में आईआईटी की मदत ली जा रही है । अब यहाँ पर सवाल उठता है कि ये कयावद पहले क्यों नहीं कि गयी जबकि जो शिकायते अभी आ रही है उनके बारे में विशेषज्ञों ने पहले ही आगाह कर दिया था   । असल में मंत्रालय और आकाश को बनाने वाली कंपनी डेटाविंड के बीच मतभेद पैदा हुए थे जो  अब और बढ़ गए  है । क्योकि दुनिया के सबसे सस्ते टैबलेट कंप्यूटर आकाश के लिए सरकार फिर से टेंडर निकालेगी। जिसमे  इसे बनाने वाली ब्रिटिश कंपनी डेटाविंड को भी इस टेंडर में भाग लेने का अधिकार होगा।
केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव एन के सिन्हा के अनुसार कि सरकार ने अब तक एक लाख टैबलेट खरीदे हैं जबकि उसे 22 करोड़ टैबलेट की जरूरत है। इतनी बड़ी तादाद में टैबलेट के निर्माण के लिए फिर से टेंडर निकाला जाएगा। इसमें डेटाविंड सहित अन्य कंपनियां भी भाग लेंगी। डेटाविंड ने सरकार को अभी तक 30000 टेबलेट सौंपे हैं और शेष 70000 वह थोड़े समय बाद सौंपेगी। लेकिन शिकायतों के मद्देनंजर अपना पहला संस्करण बनाना बंद कर दिया है। अब वह नए संस्करण पर काम कर रही है जिसकी कीमत थोड़ी ज्यादा होगी।
सरकार के अनुसार  आकाश टेबलेट लाने का मुख्य मकसद   कंप्यूटिंग और इंटरनेट एक्सेस के लिए प्राइस बैरियर को तोडऩा। आईआईटी राजस्थान और एनएमई-आईसीटी के साथ काम करते हुए हम ऐसा उत्पादन लाने में कामयाब हुए हैं जो भारत में किफायती कंप्यूटिंग और इंटरनेट एक्सेस आम जन को मुहैया कराएगा। वीडियो कॉन्फेंसिंग एक अहम फीचर है जो बच्चो को सामूहिक रूप से इंटरनेट के जरिये शिक्षा देना संभव बनाएगा। हालांकि यह निरूशुल्क उपलब्ध लाइनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम पर आधारित है फिर भी इतने कम दाम में इतनी सारी चीजें समाहित करना कोई आसान काम नहीं है। अगर इस परियोजना के संचालक देश भर से उभरने वाली विशाल मांग को पूरा कर पाते हैं और यह परियोजना जमीनी स्तर पर सही ढंग से लागू की जाती है तो आने वाले वर्षाे में कंप्यूटर शिक्षा और साक्षरता दोनों ही मोर्चाे पर बड़ी उपलब्धियां अर्जित की जा सकती हैं ।
इस समय टैबलेट की हलचल भारत में भी महसूस की जा रही है। ज्यादा से ज्यादा भारतीय उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए कम्पनियां एक के बाद एक कम कीमत के उत्पाद ला रही हैं । भारत में इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीते महीने आकाश की ऑनलाइन बिक्री शुरू हुई और कंपनी को रोजाना करीब एक लाख ऑर्डर मिले। 
महत्वपूर्ण बात यह है कि दुनिया के सबसे सस्ते टेबलेट आकाश के विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत से जुड़ना चाहती हैं। उनकी भागीदारी से कम कीमत का यह टेबलेट पूरी दुनिया के बच्चों के लिए उपलब्ध हो सकेगा। वास्तव में आकाश ने अंतरराष्ट्रीय नेताओं और कंपनियों का ध्यान आकर्षित किया है। आइबीएम और इंटेल जैसी कंपनियां बिना इसकी कीमत बढ़ाए आकाश की क्षमता बढ़ाने के लिए भारत के साथ भागीदारी करना चाहती हैं। इतने कम दाम में इस समय बाजार में आपको इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले सस्ते फोन भी नहीं मिलेंगे, ऐसे में इसे टचस्क्रीन और टैबलेट एक्सपीरियंस के लिए बहुत बढ़िया एंट्री लेवल प्रॉडक्ट माना जा सकता है। 
तमाम सवालो को देखते हुए भी अगर इस परियोजना को देश भर के शैक्षणिक संस्थानों और छात्रों में ठीक ढंग से लागू किया गया तो  आकाश टेबलेट का प्रयोग देश में आई टी शिक्षा के लिए दूरगामी सिद्ध होगा । देश में परियोजनाएँ तो अच्छी सोच के साथ बनाई जाती है लेकिन उनका क्रियान्वयन ठीक ढंग से नहीं हो पता । देश में आकाश की बढती मांगो को देखते हुए आपूर्ति के साथ साथ गुणवत्ता बनाये रखना सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है । ये आगे आने वाला वक्त ही बताएगा कि सरकार इन चुनौतियो का सामना ठीक ढंग से करती है या अन्य परियोजनाओ की तरह इसे भी सिर्फ निजी कंपनियों के भरोसे छोंड दिया जायेगा ।
लेखक 
शशांक द्विवेदी 

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