Monday, April 16, 2012

डिजीटल माध्यमों द्वारा हिंदी में विज्ञान संचार


28-29मार्च को इग्नू में विज्ञान प्रसार ,विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ,भारत सरकार और इग्नू द्वारा सयुक्त रूप से आयोजित डिजीटल माध्यमों द्वारा हिंदी में  विज्ञान संचार पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में मेरा व्याख्यान भी हुआ .मैंने हिंदी में विज्ञान संचार में उम्मीदों के साथ चुनौतियाँ भी विषय पर विचार रखे .यह मेरे लिए काफी सम्मान की बात थी कि मुझे यहाँ पर आमंत्रित किया गया .कार्यशाला में काफी आनंद आया ,काफी कुछ सीखने को मिला ,विद्वान लोगों से मुलाक़ात हुई .इस तरह के आयोजन विज्ञान संचार की दिशा में सकारात्मक कदम है जो नियमित तौर पर आयोजित होते रहें चाहिए . 
व्याख्यान देते हुए मेरी मुद्रा 

Sunday, April 15, 2012

जल संकट की आहट

जल संकट की आहट
जल संबंधी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए जल संसाधन मंत्रालय ने इस वर्ष से भारत जल सप्ताह को अंतरराष्ट्रीय आयोजन के रूप में मनाने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य जल संबंधी मुद्दों को वैश्विक समस्या के रूप में मंच दिलाना है। यह कार्यक्रम इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सभी संबंधित मंत्रालय जैसे कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, उद्योग मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, पर्यावरण और वन मंत्रालय तथा योजना आयोग के साथ-साथ राच्य सरकारें तथा जल संसाधन परियोजना संभालने वाले इकाइयों के प्रतिनिधि भी इसमें भाग ले रहे हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मुताबिक जल संसाधनों की योजना, विकास और प्रबंधन का बहुत महत्व है। देश में इस समय जो सांस्थानिक और वैधानिक ढांचा मौजूद है वह पर्याप्त नहीं है जिसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है पर सवाल उठता है कि ये सुधार कब और कैसे होंगे? प्रधानमंत्री ने जल संकट से संबंधित जितनी भी गंभीर समस्याए बताई उनके समाधान के लिए सरकार तत्काल क्या कदम उठाने जा रही है इस पर कोई घोषणा नहीं की गई। जल संसाधन मंत्री पवन बंसल अब कह रहें है कि राष्ट्रीय जल नीति इसी माह तैयार हो जाएगी। आखिर अभी तक देश के लिए ठोस और सार्थक जल नीति क्यों नहीं तैयार कर पाए जबकि पिछले दिनों ही जल संकट पर फ्रांस में संपन्न हुए सम्मलेन में संयुक्त राष्ट्र संघ ने गंभीर चेतावनी देते हुए कहा था कि विश्व के अनेक हिस्सों में पानी की भारी समस्या है और इसकी बर्बादी नहीं रोकी गई तो स्थिति और विकराल हो जाएगी, क्योंकि भोजन की मांग और जलवायु परिवर्तन की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक कृषि की बढ़ती जरूरतों, खाद्यान्न उत्पादन, ऊर्जा उपभोग, प्रदूषण और जल प्रबंधन की कमजोरियों की वजह से स्वच्छ जल पर दबाव बढ़ रहा है। दुनिया में तकरीबन 20 फीसदी लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है और 40 फीसदी लोग सफाई की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। इन वंचितों में से आधे से ज्यादा लोग चीन या भारत में हैं। एक अरब 10 करोड़ लोग पीने के साफ पानी से वंचित हैं। इसके अलावा दो अरब 60 करोड़ लोगों को साफ-सफाई की मूलभूत सुविधाएं हासिल नहीं हैं। वास्तव में भूजल के अंधाधुंध दोहन से जल की उपलब्धता में भारी कमी आई है। जिसे देखते हुए मनचाहा भूजल निकालने की छूट को नियंत्रित करना होगा। विश्व की 17 प्रतिशत आबादी भारत में है, लेकिन पीने योग्य पेयजल मात्र चार प्रतिशत है। भारत में बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण ने जल की आपूर्ति और मांग के अंतर को बढ़ा दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण भी देश के जल चक्र को खतरा पैदा हो सकता है। बेंगलूरू, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई आदि में अभी से पानी की किल्लत होने लगी है। दूसरी तरफ गांवों में 90 प्रतिशत आबादी पेयजल के लिए भूजल पर आश्रित है। कृषि के लिए भूजल के बढ़ते दोहन से भी गांवों में पीने के पानी का संकट बढ़ रहा है। दुनिया के ज्यादातर इलाकों में पानी की गुणवत्ता में कमी आ रही है और साफ पानी में रहने वाले जीवों की प्रजातियों की विविधता और पारिस्थितिकी को तेजी से नुकसान पहुंच रहा है। वन क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने, नदियों-जलाशयों के प्रदूषित होने और बिगड़ते पारिस्थितिकी संतुलन को लेकर काफी समय से चिंता जताई जा रही है। कई बड़े शहरों में तालाबों के सूख जाने की स्थिति में उनके रखरखाव की पहल करने की बजाय उन पर रिहाइशी कालोनियां या व्यावसायिक परिसर बना दिए गए हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ वर्षा जल संचयन पर बल दे रहे हैं। अगर तालाबों और झीलों जैसे पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण-संवर्धन की बजाय उन पर कंक्रीट के जंगल खड़े होते गए तो इस संकट से निपटने की उम्मीद हम कैसे कर सकते हैं? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) भारत में पेयजल की गहराती समस्या पर शशांक द्विवेदी के विचार जल संकट की आहट दैनिक जागरण (राष्ट्रीय ) में 15/04/2012 को प्रकाशित 
Article link is
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-04-15&pageno=8#id=111738048571170136_49_2012-04-15

Monday, April 9, 2012

अर्थ आवर


पृथ्वी को बचाने का संकल्प

अर्थ ऑवर यानी दुनिया में पृथ्वी को बचाने की एक छोटी-सी कोशिश, जिसमें लगभग 100 देश और 6000 शहर जुड़ चुके हैं। 2007 में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर से अर्थ ऑवर की शुरुआत हुई। कुछ लोगों को ख्याल आया कि कम से कम एक घंटे के लिए ही हम ऊर्जा की बेतहाशा खपत पर लगाम लगाएं। कुछ लोगों की यह कोशिश आज पूरे विश्व में एक सकारात्मक अभियान का हिस्सा है। पहली बार 2007 में 22 लाख घरों और उद्योगों ने एक घंटे के लिए अपनी लाइटें बंद कर दीं। जब हम घरों की बत्ती बुझाते हैं तो हम समाज और दुनिया को बेहतर बनाने के आंदोलन का अहम हिस्सा बन जाते हैं। व‌र्ल्डवाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) द्वारा शुरू किए गए अर्थ ऑवर अभियान में दुनिया के पांच करोड़ से ज्यादा लोग पर्यावरण के प्रति चिंता जाहिर करते हुए एक घंटे के लिए इसका हिस्सा बन रहे हैं। तबसे हर साल मार्च के आखिरी शनिवार को अर्थ ऑवर मनाया जाता है। एक शहर से शुरू हुई इस अनोखी पहल में शनिवार को दुनिया के सैकड़ों शहर शामिल होंगे। एक घंटे के लिए ये शहर इस उम्मीद में अंधेरे में डूब जाते हैं कि आने वाली पीढि़यों को उर्जा संकट और ग्लोबल वार्मिंग का कहर न झेलना पड़े। अपने देश को पूर्ण रूप से विकसित करने के लिए हमें विकसित देशों से सीख लेने की आवश्योकता है। उर्जा बचत में हम सबका सहयोग अत्यंत आवश्यरक है? यदि उर्जा का उपयोग सोचसमझ कर नहीं किया गया तो इसका भंडार जल्द ही समाप्त हो सकता है। अपना भविष्य उज्जवल बनाए रखने के लिए वर्तमान परिस्थितियों में सभी तरह की ऊर्जाओं तथा ईंधन की बचत बेहद आवश्यक है, क्योंकि आज हम बचत करेंगे तो ही भविष्य सुविधाजनक रह पाएगा। बचत चाहे छोटे स्तर पर क्यों न हो, जरूर कारगर होगी क्योंकि बूंद-बूंद से ही सागर भरता है। आज हम संभल कर ऊर्जा के साधनों का इस्तेमाल करेंगे तो ही इनके भंडार भविष्य में बचे रह पाएंगे। वैश्वीकरण के दौर में आज हमारी जीवनशैली में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। ये बदलाव हम इस रूप में भी देख सकते हैं कि जो काम दिन के उजाले में सरलता से हो सकता है, उसे भी हम देर रात तक करते हैं। उदाहरण के लिए क्रिकेट का खेल, विभिन्न सामाजिक समारोह आदि। नियमित व संतुलित दिनचर्या छोड़कर हम ऐसा जीवन जीने के आदी होते जा रहे हैं जो हमें अस्पताल, एक्सरे, ईसीजी, आइसीयू के माध्यम से भयंकर ऊर्जा व्यय में उलझा रहा है। हमारी दिनचर्या दिन प्रतिदिन अधिकाधिक ऊर्जा की मांग करती जा रही है। विकास का जो मॉडल हम अपनाते जा रहे हैं उस दृष्टि से अगली प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में हमें ऊर्जा उत्पादन को लगभग दोगुना करते जाना होगा। पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधन निश्चित हैं। आज प्रकृति के मिट्टी, पत्थर, पानी, खनिज, धातु को भौतिक सुख साधनों में बदलकर उससे विकसित होने का सपना देखा जा रहा है, जिससे अंधाधुंध ऊर्जा खपत बढ़ रही है। इस कथित विकास में इस बात की अनदेखी हो रही है कि प्रकृति में पदार्थ की मात्रा निश्चित है, जो बढ़ाई नहीं जा सकती। फिर भी पदार्थ का रूप बदलकर, सुख साधनों में परिवर्तन करके, खपत बढ़ाकर विकास का रंगीन सपना देखा जा रहा है। इस विकास के चलते संसाधनों का संकट, प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिंग, पानी की कमी, ऊर्जा की व्यापक कमी आदि मुश्किलें सिर पर मंडरा रही हैं। प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है उतना ही हमारी भावी पीढि़यों का भी। जब हम अपने पूर्वजों के लगाए वृक्षों के फल खाते हैं, उनकी संजोई धरोहर का उपभोग करते हैं तो हमारा नैतिक दायित्व है कि हम भविष्य के लिए भी नैसर्गिक संसाधनो को सुरक्षित छोड़ जाएं, अन्यथा भावी पीढ़ी और प्रकृति हमें कभी माफ नहीं करेंगी। इस लिए आज ही और इसी वक्त संकल्प लें कि पृथ्वी को संरक्षण देने के लिए जो हम कर सकेंगे करेंगे और जो नहीं जानते उन्हें इससे अवगत कराएंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) अर्थ ऑवर के प्रयोजन पर शशांक द्विवेदी की टिप्पणी पृथ्वी को बचाने का संकल्प,दैनिक जागरण (राष्ट्रीय ) में 31/03/2012 को प्रकाशित 

विज्ञान और अनुसंधान


                              
विज्ञान की उपेक्षा

मनमोहन सिंह ने 99वें भारतीय विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन अवसर पर कहा था कि विज्ञान को मजबूत बनाना होगा और इसके लिए सरकार शोध और विकास कार्य पर खर्च बढ़ाएगी। इसके लिए अनुसंधान कार्यो पर जीडीपी का दो प्रतिशत खर्च करने का वायदा किया गया, जो फिलहाल 0.9 प्रतिशत है। पिछले दिनों वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा पेश किए गए केंद्रीय बजट में पुरस्कारों सहित वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए 200 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है जो उम्मीद से काफी कम है। पिछले कुछ दशकों में विज्ञान के क्षेत्र में भारत की स्थिति में लगातार गिरावट आई है और चीन जैसे देश आगे निकल रहे हैं। चीन लगातार विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में बजट बढ़ाता रहा है जबकि हमारे यहां सरकार केवल घोषणाओं तक सीमित है। हमारे देश में विज्ञान और अनुसंधान पर चर्चा तभी होती है जब कोई नेता, मंत्री या प्रधानमंत्री उसकी बदहाली पर बोलते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा सालों से होता आ रहा है। विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में आज तक कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बन पाई है। सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए अब इस क्षेत्र को भी निजी क्षेत्र के हवाले करने की सोच रही है, जहां मुनाफाखोरी ही एकमात्र सिद्धांत है। ऐसे में आप विज्ञान और शोध में कितने गुणात्मक सुधार की उम्मीद कर सकते है। देश में वैज्ञानिक अनुसंधान और शोध की दशा व दिशा ठीक नहीं है। आजादी के बाद ऐसा कोई बुनियादी ढांचा विकसित नहीं हो पाया जिससे देश में बड़े पैमाने पर अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जा सके। अधिकांश युवा शोध और अनुसंधान की बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों में जाना चाहते हैं, क्योंकि वहां ज्यादा पैसा मिलता है। स्थिति यह है कि देश में विज्ञान में पीएचडी करने वाली दो हजार महिलाओं में से 60 फीसदी बेरोजगार हैं। इसका परिणाम है कि विज्ञान संकाय के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिले में 80 फीसदी तक की कमी आई है। पिछले 50 सालों में देश एक भी ऐसा वैज्ञानिक पैदा नहीं कर पाया जिसकी पूरी दुनिया में पहचान हो। 82 साल पहले सीवी रमन को वर्ष 1930 में भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार मिला था। तब से हम भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों द्वारा अर्जित नोबेल पर ही खुशी मनाते आए हैं। यहां पर एक और प्रश्न महत्वपूर्ण है कि आजादी के समय जब देश में संसाधन कम थे तब हमारे यहां जगदीश चंद्र बोस, नोबल पुरस्कार विजेता सर सीवी रमन, मेघनाद साहा, सत्येंद्र बोस जैसे महान वैज्ञानिक हुए, लेकिन आज जब संसाधनों की कमी नहीं है तो हमारे देश में विज्ञान की स्थिति दयनीय बनी हुई है। देश में जन्मे वैज्ञानिक डॉ. हरगोबिंद खुराना , एस. चंद्रशेखर, अम‌र्त्य सेन और डॉ. वेंकटरामन रामकृष्णन विदेशों में जाकर उत्कृष्ट कार्य के लिए नोबल पुरस्कार प्राप्त करते हैं, लेकिन यहां रहकर नहीं। यहां पर उन्हें बुनियादी सुविधाए उपलब्ध नहीं कराई गई जिस कारण उन्हें बाहर जाना पड़ता है। सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संविदा या लेक्चर के हिसाब से एक पीएचडीधारी शिक्षक को काफी कम वेतन में काम करने को मजबूर होना पड़ता है। शोध छात्रों को सेमीनारों में जाने के लिए छुट्टी या आर्थिक सहायता शायद ही मिल पाती है जिस कारण अंतत: वह अपनी पीएचडी थीसिस बंद करने को मजबूर होते हैं। चढ्ढा कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार कर केंद्र और राज्य सरकारों ने शिक्षकों के वेतन में भारी वृद्धि की है, लेकिन अपने उच्च शिक्षा संस्थानों में कार्यरत गेस्ट शिक्षकों के शोषण को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया। वास्तव में एक युवा पीएचडी का रास्ता या तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जाने के लिए चुनता है या फिर शोध संस्थानों में प्रवेश के लिए। अगर ये दोनों ही रास्ते बंद हों तो फिर शोध की संभावनाएं कैसे बनेंगी? एक तरफ तो हम अपने योग्य शोधार्थियों को लगभग दुत्कार रहे हैं, उनका शोषण कर रहे हैं तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री इसका रोना रो रहे हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) देश में विज्ञान की दयनीय होती स्थिति पर शशांक द्विवेदी के विचार दैनिक जागरण (राष्ट्रीय ) में 8/04/2012 प्रकाशित 

DNA

This is my article which is published today(9april12) in DNA on Black Money
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