Saturday, April 21, 2012

निर्मल बाबा और मीडिया


निर्मल बाबा और मीडिया 

इस समय मीडिया में खासतौर पर न्यूज चैनलों में निर्मल बाबा का हल्ला मचा हुआ है ,हर समय उनकी खबरे दिखाई जा रही है .मुझे एक बात अभी तक समझ में नहीं आई कि ये लोग तब कहाँ  थे जब इन्ही के चैनलों पर पैसा लेकर बाबा का फर्जी समागम विज्ञापन के तौर पर दिखाया जाता था .इन लोगों ने तब तो खुद को बेच दिया था और अब ड्रामा कर रहें है .सब से पहले तो इन खबरिया चैनलों की जाँच होनी चाहिए क्योंकि इन्ही की वजह वो देश विदेश में प्रसिद्द होते रहें .कहने का मतलब ये कि ये लोग पैसा लेकर किसी का,कैसा  भी विज्ञापन दिखा  सकते है .मेरी सरकार से मांग है कि पहले इन लोगों की सी बी आई से जाँच कराओ क्योंकि निर्मल बाबा भी कह रहें है न्यूज चैनलों को विज्ञापन का पैसा देने के लिए मैंने लोगों से पैसे लिए ...वास्तव में इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भी पोल खुल रही है ..

Friday, April 20, 2012

पोलियो से जीत

दैनिक भास्कर लेख
कामयाबी मिली लेकिन जिम्मेदारी बढ़ गई

दो बूँद जिंदगी की ने एक नयी जिंदगी दी
पोलियो अभियान की पंच लाइन दो बूँद जिंदगी ने वास्तव में पूरे देश को एक नयी जिंदगी दी है । इस बीमारी का सफाया होना देश के लिए बहुत गौरवशाली उपलब्द्धि है । इस बीमारी को सिर्फ सरकारी प्रयास से ही नहीं हराया जा सकता था इसके लिए सभी देश वासियो और खासतौर से पोलियो ड्राप पिलाने वाले स्वयंसेवियो का अनुकरणीय योगदान रहा है । हमारे देश की साझी विरासत से ही यह संभव हो पाया है ,इस तरह के प्रयासों से हम और भी कई गंभीर बीमारियो को हरा सकते है ।
पोलिया के खिलाफ लड़ाई में भारत को जीत हासिल हुई है । लेकिन इस जीत से जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि जीतने से ज्यादा जीत को बनाएं रखना महत्वपूर्ण है ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ, की ओर से पोलियो प्रभावित देशों की सूची से भारत का नाम हटा दिया गया है। ऐसा पिछले एक वर्ष में भारत में पोलियो का एक भी मामला सामने न आने की उपलब्धि को देखते हुए किया गया है। सूची से नाम हटने के बाद भी भारत को पोलियो मुक्त देश का दर्जा प्राप्त करने के लिए दो वर्ष तक पोलियो मुक्त रहना होगा। प्रधानमंत्री  के अनुसार वास्तव में इस कामयाबी का श्रेय उन 23 लाख स्वयंसेवकों को जाता है, जिन्होंने मुश्किल परिस्थियों में दूर-दराज क्षेत्रों में जाकर बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाया। इससे यह उम्मीद भी जगी है कि हम सिर्फ भारत से ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से पोलियो को मिटा सकते हैं। लेकिन देश में इसे पूरी तरह से मिटाने के लिए टीकाकरण जारी रखना होगा और निगरानी भी बढ़ानी होगी।
पोलियो का टीका पोलियो वायरस के लिए प्रतिरक्षा उत्पनन्नि करने और लकवा मार जाने वाले पोलियो से सुरक्षा प्रदान करने में अत्यंात प्रभावी है। पोलियो टीका पाने वाले लगभग  90 प्रतिशत या इससे अधिक व्यक्तियों  में तीनों प्रकार के पोलियो वायरस के खिलाफ सुरक्षात्मोक एंटीबॉडी दो खुराकों के बाद बन जाते हैं और कम से कम 99 प्रतिशत तीन खुराकों के बाद सुरक्षित हो जाते हैं। डॉ. एल्बसर्ट सेबिन ने 1961 में मौखिक पोलियो टीके (ओपीवी)  का विकास किया था । वर्तमान में लगभग सभी देश पोलियो उन्मूलन लक्ष्य पूरा करने के लिए ओपीवी का उपयोग करते हैं। इस टीके से व्यक्ति में हमेशा के लिए संक्रमण की रोकथाम होने के साथ अब यह व्यक्ति अन्य लोगों में पोलियो वायरस को फैलाने से भी बच जाता है। चूंकि पोलियो का वायरस मेजबान के बाहर दो सप्ताह से अधिक समय के लिए जिंदा नहीं रह सकता है अत सैद्धांतिक रूप से यह समाप्त हो जाएगा जिससे पोलियो माइलिटिस पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा।
भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन  से जुड़े 192 सदस्य देशों के साथ 1988 से  वैश्विक पोलियो उन्मूलन का लक्ष्य् पूरा करने के लिए वचनबद्ध रहा  है। भारत ने डब्यूएचओ वैश्विक पोलियो उन्मूलन प्रयास के परिणाम स्वरूप 1995 में पल्स  पोलियो टीकाकरण (पीपीआई) कार्यक्रम आरंभ किया था । इस कार्यक्रम के तहत 5 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों  को पोलियो समाप्त होने तक हर वर्ष दिसम्बर और जनवरी माह में ओरल पोलियो टीके (ओपीवी) की दो खुराकें दी जाती हैं। यह अभियान सफल सिद्ध हुआ है और भारत में पोलियो माइलिटिस की दर अब लगभग खत्म हो गयी है । देश में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का प्रयास एक वरदान सिद्ध हुआ ।
पीपीआई की शुरुआत ओपीवी के तहत शत प्रतिशत कवरेज प्राप्त करने के उद्देश्य से की गई थी। जिसकी वजह से  पोलियो वायरस लगभग गायब हो चुका है और इससे देश की  जनता का  उच्च मनोबल बना हुआ है । वर्ष 1995 से देश में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय पोलियो वायरस को समाप्त  करने के लिए  सघन टीकाकरण और निगरानी गतिविधियों का आयोजन करता रहा है। सरकार को तकनीकी और रसद संबंधी सहायता प्रदान करने के लिए 1997में राष्ट्रीय पोलियो निगरानी परियोजना  आरंभ की गई और अब यह राज्ये सरकारों के साथ समन्वय से कार्य करती है और देश में पोलियो उन्मूलन का लक्ष्य पूरा करने के लिए भागीदारी एजेंसियों की एक बड़ी श्रृंखला इसमें संलग्न है। देश में  डब्यूएचओ के समर्थन के साथ राज्य सरकार के नेतृत्वो में यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एण्ड प्रीवेंशन , यूनिसेफ और  बिल एण्डम मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने पोलियो उन्मूलन में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
2009 के दौरान भारत में विश्व  के पोलियो के मामलों का उच्चहतम भार (741) था।, यहां तीन अन्ये महामारियों से पीडित देशों की संख्या से अधिक मामले थे। यह टीका बच्चों तक पहुंचाने के असाधारण उपाय अपनाने से भारत में पश्चिम बंगाल राज्य  की एक दो वर्षीय बालिका के अलावा कोई अन्य मामला नहीं देखा गया जिसे 13 जनवरी 2011 को लकवा हो गया था। आज भारत ने पोलियो के खिलाफ अपने संघर्ष में एक महत्वबपूर्ण पड़ाव प्राप्ता किया है, चूंकि अब पोलियो का अन्य कोई केन्द्र नहीं है।
देश में पोलियो से जुड़ा  आखिरी मामला 13 जनवरी, 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में रुखसार खातून के रूप में सामने आया था। वर्ष  1999 में भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में पोलियो वायरस-दो  पाया गया था जिसकी चर्चा पूरी दुनिया में  हुई थी।
भारत में 13 जनवरी 2011 के बाद से सीवेज के नमूनों में कोई पोलियो वायरस का मामला दर्ज नहीं किया गया है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, नवंबर, 2010 के बाद भारत में पहली बार हवा में पोलियो वायरस की मौजूदगी के बारे में पर्यावरण से लिए गए अधिकांश नमूनों की जांच रिपोर्ट नकारात्मक आई है।
देश में 1988 से पोलियो के मामलों में 100 प्रतिशत की कमी आई है, जब महामारी से पीडित 125 देशों में इनकी संख्याम 350000से कम होकर 2010 में 1349 बताई गई। 2011 में दुनिया के तीन देशों के कुछ हिस्सेै रोग से प्रभावित रहे  यह इतिहास का सबसे छोटा भौगोलिक क्षेत्र रहा और यहां वन्यु प्रकार के पोलियो वायरस टाइप 3 के मामलों की संख्या  अब तक के अल्पतम स्तर पर बताई गई है।
समकालीन रूप से पोलियो केवल तीन देशों में महामारी बना हुआ है अफगानिस्तान, नाइजीरिया और पाकिस्तान - जिसके साथ चार देशों में पोलियो वायरस के फैलने की शंका (अंगोला, चाड और कोंगो लोक तांत्रिका गणतंत्र) या जिसके दोबारा फैलने की शंका (सूडान) है। अन्यल अनेक देशों में पोलियो वायरस के आने के कारण 2010 में इसका प्रकोप हुआ था।
वास्तव में पोलियो के खिलाफ यह असाधारण उपलब्धि लाखों टीका लगाने वालों, स्वयंसेवकों, सामाजिक प्रेरणादायी व्यीक्तियों, अभिनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और धार्मिक नेताओं के साथ सरकार द्वारा लगाई गई ऊर्जा, समर्पण और कठोर प्रयास का परिणाम है। वास्तव में अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और प्राथमिकताये निश्चित हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती । पोलियो जैसी भयंकर बीमारी से देश  को मुक्ति मिलने जा रही है, तो यह समाज के सभी वर्गों की कोशिशों का ही नतीजा है।
लेकिन इस कामयाबी से जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ गयी है क्योंकि दुनिया के  कुछ  देशों में पोलियो  अभी खत्म  नहीं किया जा सका है, अभी  ऐसे केवल तीन देश ही बचे हैं, जहां पोलियो वायरस मूल रूप से पनपा है। इनमें नाइजीरिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल हैं। इन देशों से पोलियो के वायरस का फिर भारत पहुंचने का खतरा है। इसलिए अभी इस पर ध्यान देने की जरूरत है । अब जरुरत है इस कामयाबी को बनाये रखने कि जिससे पोलियो हमारे देश में सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो जाये ।
लेखक शशांक द्विवेदी (दैनिक भास्कर में 29/02/12 को प्रकाशित )

आईएनएस-चक्र

DNA article on INS chakra http://www.dailynewsactivist.com/Details.aspx?id=18625&boxid=28264680&eddate=4/20/2012

विकास का वर्तमान माँडल


विकास का वर्तमान माँडल बेकार है
 पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक वृद्धि एक नया मंत्र बनकर उभरा है। हम लोगों को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) दर ही आर्थिक वृद्धि और विकास की कसौटी है। इसके पीछे तर्क दिया गया कि जीडीपी की दर जितनी अधिक होगी, गरीबी और भुखमरी उतनी ही कम होगी। इसीलिए आर्थिक विशेषज्ञ और नियोजक औद्योगिक गतिविधियों के लिए योजनाएं बनाने और निवेश करने में लग गए ताकि रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकें, साथ ही देश की आर्थिक वृद्धि भी हो। इस सोच का आर्थिक नुस्खा यह था कि जीडीपी की वृद्धि दर को यदि नौ प्रतिशत से भी ऊपर रखा जाए तो तमाम चुनौतियों से निपटा जा सकता है।

इस कहानी की शुरुआत 1991 में मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने के बाद शुरू होती है। उन्होंने आर्थिक उदारीकरण का नारा दिया। सारा ध्यान तीव्र औद्योगीकरण पर केंद्रित कर दिया गया। विनिर्माण और उद्योग सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द बन गए। निजीकरण, वैश्वीकरण और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आर्थिक विकास के नए रास्ते बन गए। शहरी केंद्रों का पुर्ननिर्माण हुआ और सुपरमॉल, शानदार रेस्टोरेंट, नई मॉडलों की कारें और रीयल इस्टेट की धूम मच गई।
हालांकि इस बीच गरीबी और भुखमरी कम होने के बजाए बढ़ती गई। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1990 के दशक में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोग 26 फीसदी थे जिसे वर्तमान में खुद योजना आयोग ने बढ़ाकर 37.2 फीसदी कर दिया है। एक तरफ समाज के उच्च वर्ग की आय में लगातार इजाफा होता जा रहा है लेकिन साथ ही हर साल लाखों लोग गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में जा रहे हैं। अमीर और गरीब के बीच की खाई हर गुजरते साल के साथ बढ़ती जा रही है।

हम लोगों को यह यकीन दिलाया जा रहा है कि देश से गरीबी और भुखमरी खत्म करने के लिए आर्थिक वृद्धि ही एकमात्र रास्ता है।

जबकि इसके ठीक उलट संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून का मानना है कि जलवायु परिवर्तन इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि विकास का पुराना मॉडल बेकार हो चुका है।

विनाश: अपने प्राकृतिक संसाधनों के साथ धरती हमारे लिए एक ऐसा वरदान थी जिसके सहारे मानव सभ्यता पुष्पित-पल्लवित होती रही। इसने हमें रहने के लिए आसरा दिया। पीने के लिए पानी दिया। खाने के लिए भोजन सुलभ कराया। यही नहीं सांस लेने के लिए अपने शुद्ध पर्यावरण की विशुद्ध ऑक्सीजन भी हमारे लिए सुलभ किया। युगों तक यह संतुलित रिश्ता दोनों के बीच बना रहा। एक दिन वह भी आया जब प्राकृतिक संसाधनों के जरूरत भर उपयोग से हमारा जी उकता गया। हमारे अंदर लालच घर कर गया। हम बड़ी जरूरत का हवाला देकर धरती का दोहन करने लगे। लिहाजा हमारा पर्यावरण दूषित होता गया और धरती के संसाधनों की न केवल मात्रा कम होती गई, उनकी गुणवत्ता में भी विकार आ गया।

विकास: 
आर्थिक विकास से ही सभी को बेहतर जीवन उपलब्ध कराया जा सकता है। अत: हमारे जैसे विकासशील देश तेज विकास की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। हमारी इस कोशिश पर पश्चिमी देश भले ही ग्र्रीन हाउस गैसों के ज्यादा उत्सर्जन का आरोप लगाएं लेकिन अभी तक हुए पर्यावरण नुकसान के लिए ज्यादा जिम्मेदार वही लोग हैं। बहरहाल सृष्टि की भलाई के लिए पर्यावरण का संरक्षण अब गंभीर मसला बन चुका है। इसके लिए पूरी दुनिया को एक साथ आना होगा। हमें विकास का ऐसा मॉडल अपनाना होगा जिसमें हमारी मूलभूत जरूरतें भी पूरी होती रहें और हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। आर्थिक विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन और सामंजस्य स्थापित करना अब अहम मुद्दा बन चुका है।
विश्व पर्यावरण दिवस के इस मौके पर ऐसी निर्वहनीय योजनाएं बनाने का संकल्प लिया जाना चाहिए जो इस धरती को नष्ट होने से बचाने में मददगार हों।

जैव-विविधता, मृदा का पुनर्पोषण, सिकुड़ते जल संसाधनों का संरक्षण, दूषित पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने जैसी निर्वहनीय नीतियों को अपनाकर विकास एवं आर्थिक वृद्धि के पथ को प्रशस्त कर एक बेहतर जीवन जिया जा सकता है।


-बान की मून, संयुक्त राष्ट्र महासचिव (2011 में दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच में दिया गया बयान): विश्व का वर्तमान आर्थिक मॉडल पर्यावरणीय आत्महत्या है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को निर्वहनीय (सस्टेनेबल) बनाने के लिए क्रांति की जरूरत है।

निर्वहनीय विकास और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन स्थापित कर ग्लोबल वार्मिंग और उससे उत्पन्न होने वाले खतरे से निजात पाई जा सकती है। इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए हमें कुछ कदमों को तत्काल उठाने की जरूरत है जिससे शांति और प्रसन्नता हासिल की जा सके.

वैश्वीकरण से स्थानीयकरण: वैश्विक व्यापार के बढ़ने का मतलब है कि जीवाश्म ईंधनों का अधिक दहन होना। नतीजतन, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी। यह बहुत तर्कसंगत नहीं लगता कि सेब का आयात चिली और न्यूजीलैंड से किया जाए। औसतन खाद्य पदार्थ 1500 मील की यात्रा करने के बाद हमारी टेबल तक पहुंचते हैं। यह वैश्विक कमोडिटी बाजार को नुकसान पहुंचाता है। साथ ही यह कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए और अधिक रसायन को इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करता है। इसका नतीजा यह होता है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, भू-जल को प्रदूषित करने के साथ मृदा को संक्रमित कर पूरी खाद्य श्रृंखला पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

सट्टेबाजी पर रोक: सोना और चांदी की कीमतें आसमान छू रहीं हैं। पेट्रोल के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। खाद्य पदार्थों की कमी के कारण वर्ष 2007-08 में 37 देशों में दंगे हो चुके हैं। कीमतों में बढ़ोतरी की मुख्य वजह सट्टेबाजी और कमोडिटी ट्रेडिंग है। स्टॉक बाजार से कुछ निवेशकों को फायदा होता है और इसकी कीमत अन्य लोगों को चुकानी पड़ती है। कमोडिटी ट्रेडिंग में सट्टेबाजी के कारण प्राकृतिक संसाधनों का निर्मम दोहन किया जाता है। कृषि क्षेत्र में सट्टेबाजी को खत्म करते हुए इसके अंत की शुरुआत की जानी चाहिए।

शहरीकरण को हतोत्साहन: अधिकांश औद्योगिक इकाइयां शहरी केंद्रों में होने से निवेश भी यहीं किया जाता है। नतीजतन, गांव एवं कस्बों से शहरों की ओर रोजगार के लिए आबादी का पलायन होता है। अनुमान है कि 2030 तक करीब 65-70 प्रतिशत देश की आबादी शहरों में रहने लगेगी। ऐसे में गांव आबादी के लिहाज से खाली होते जाएंगे और शहर बढ़ती आबादी का बोझ सहने में असमर्थ होते जाएंगे। इस प्रवृत्ति को बदलने की जरूरत है। गांवों का विकास इस तरह किया जाना चाहिए ताकि वे आर्थिक विकास के स्रोत बन कर लोगों की जीविका स्रोत भी बन सकें। इससे गांव और शहरों के बीच एक प्रकार का संतुलन स्थापित होगा।

खुशहाली सूचकांक का विकास: यदि उच्च जीडीपी से मापा जा रहा वर्तमान आर्थिक मॉडल निर्वहनीय होता तो दुनिया को आर्थिक मंदी की मार न झेलनी पड़ती। इससे धरती का भविष्य भी अंधकारमय देखा गया। वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए 2008-09 में करीब 20 ट्रिलियन डॉलर झोंका गया। इसके बजाए यदि केवल पांच ट्रिलियन डॉलर का निवेश गरीबी, भुखमरी और बीमारियों से लड़ने में किया जाता तो इन समस्याओं को खत्म किया जा सकता था। ऐसे में इस बात की सख्त आवश्यकता है कि वर्तमान आर्थिक मॉडल की जगह वैश्विक खुशहाली सूचकांक को अपनाया जाए। लेखक -देविंदर

मोटे होते ग्लेशियर


मोटे होते ग्लेशियर
पहले की तुलना में आज ये ग्लेशियर ज्यादा मोटे हो गए हैं। अभी तक सुनते आए हैं कि ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं ।
एशिया के कुछ ग्लेशियर मोटे हो चले हैं, खासकर कराकोरम की पहाड़ियों के। ग्लेशियर हमारे पेयजल के भंडार होते हैं। फ्रांस के वैज्ञानिकों ने उपग्रह के जरिए जो जानकारी एकत्रित की है, उससे ये सुखद संकेत मिले हैं। फ्रांस के नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च तथा ग्रेनोबल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कराकोरम पहाड़ियों की सतह के उभार के दस साल के अंतराल में लिए गए चित्रों का जब तुलनात्मक अध्ययन किया, तो पाया कि पहले की तुलना में आज ये ग्लेशियर ज्यादा मोटे हो गए हैं। अभी तक हम यह सुनते आए हैं कि ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं अर्थात दुबले हो रहे हैं। ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। फलस्वरुप धरती के तटवर्ती इलाके जलमग्न हो जाएँगे। मालदीव और बांग्लादेश जैसे देश सबसे पहले चपेट में आएँगे क्योंकि वह सबसे निचली सतह पर हैं।

दरअसल वैज्ञानिकों की किस बात पर भरोसा करें? जलवायु परिवर्तन को लेकर २००७ में अंतर सरकारी पैनल ने तो यह कह दिया था कि हिमालय के कई इलाकों से २०३५ तक बर्फ नदारद हो जाएगी। बाद में इस भ्रमपूर्ण दावे के लिए वैज्ञानिकों को क्षमा भी माँगना पड़ी। सही बात तो यह है कि ग्लेशियरों पर वैज्ञानिक शोध-अध्ययन कम ही हुआ है। यह सच है कि औद्योगिक क्रांति के बाद से आज तक वातावरण में कार्बन उत्सर्जन बढ़ा है। पिछले सौ सालों के उपलब्ध रेकार्ड के अनुसार २० वीं सदी के अंतिम दस वर्ष सर्वाधिक गर्म वर्षों में शुमार थे। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ध्रुवीय बर्फ दूसरी बार अपने स्तर से काफी नीचे चली गई है। दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार देशों से बार-बार कहा जा रहा है कि वे अपनी कार गुजारियों पर लगाम कसें। मौसमी आपदाएँ संकेत दे रहीं हैं कि जलवायु परिवर्तन का दौर शुरू हो चुका है। अस्तित्व दांव पर लगा है और बाजी हाथ से निकली जा रही है। 
कनाडा के पास एल्समीयर द्वीप पर सदी से पहले तक ९ हजार वर्ग किमी क्षेत्र में फैली बर्फ सिमट कर वर्तमान में मात्र १ हजार वर्ग किमी रह गई है। म्यांमार में चक्रवात "नर्गिस" ८० हजार लोगों को लील चुका है। कैरेबियन सागर में हरीकेन करोड़ों की क्षति पहुँचा चुके हैं। भारत, बांग्लादेश बाढ़ का तांडव भुगत चुके हैं। मौसम के मिजाज बदलते जा रहे हैं। ठंड में गर्मी का अनुभव और जल स्त्रोतों का सिकु ड़ना या कभी वर्षा जैसे हालात बन जाना, फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। यही सिलसिला जारी रहा तो निर्बाध विकास की अवधारणा ध्वस्त हो जाएगी। विकासशील देशों की अर्थ व्यवस्था संकट में चली जाएगी। 

पिछले सौ सालों में धरती के औसत सतही तापमान में दशमलव ७४ डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है, जो शताब्दी के अंत तक डेढ़ से साढ़े चार डिग्री तक पहुँचेगा। यह स्पष्ट हो चुका है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए साठ प्रतिशत जिम्मेदार कार्बन डॉई ऑक्साइड है, जिसकी सांद्रता २९० प्रति दस लाख भाग से बढ़कर ३७०-३८० पीपीएम (पार्ट्‌स पर मिलियन) जा पहुँची है। अगर यही क्रम जारी रहा तो शताब्दी अंत तक यह ६००-७०० को पार कर जाएगी। करीब २५ करोड़ लोग पानी के लिए तरस जाएँगे और ३० प्रतिशत प्रजातियाँ विलुप्त हो जाएँगीं।
(साभार -नई दुनिया )


अलविदा डिस्कवरी

बीते मंगलवार की सुबह वाशिंगटन का ट्रैफिक थम गया। लोग टकटकी लगाए अंतरिक्ष यान डिस्कवरी को देखते रहे। दरअसल, इस पुराने यान को बोइंग 747 पर लादकर संग्रहालय में लाया जा रहा था। यकीनन, अमेरिकी गौरव के इस प्रतीक की यह उपयुक्त विदाई रही। कुछ साल पहले संयुक्त राज्य अमेरिका ने यह दावा किया था कि वह इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने में सक्षम है। ऐसे में, अंतरिक्ष यान के बेड़े ही वे प्राथमिक साधन थे, जिनके द्वारा इंसानों को अंतरिक्ष की कक्षाओं में भेजने का सिलसिला शुरू हुआ। इस दौरान बार-बार इस पर भी विचार-विमर्श किया गया कि यूएस एयरफोर्स का नाम बदलकर एयरोस्पेस फोर्स कर दिया जाए। लेकिन बीते जुलाई महीने में यह बहस समाप्त हो गई, जब अंतरिक्ष यान अटलांटिस ने अपना आखिरी मिशन पूरा किया। अब अगर किसी अमेरिकी को अंतरिक्ष में जाने की इच्छा होगी, तो वह दूसरे देशों के यात्रियों के साथ ही जा पाएंगे। और यह भी सच है कि ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड की वायुसेना खुद को एयरोस्पेस फोर्स बताती है। एक वक्त था, जब अंतरिक्ष कार्यक्रम अमेरिकी उपलब्धियों का प्रतीक था। यह युवा पीढ़ी के लिए गर्व व प्रेरणा का स्त्रोत था। लेकिन अब वे दिन लद गए हैं। 2011 के बजट में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नासा की नक्षत्र परियोजना को रद्द कर दिया। यहां तक कि पुराने अंतरिक्ष यान की जगह नए को लाने की इजाजत भी नहीं दी गई। वैसे व्हाइट हाउस की तरफ से अंतरिक्ष अन्वेषण और मंगल ग्रह पर अमेरिकियों को उतारने का भरोसा दिया जाता रहा। दो साल पहले ओबामा ने कहा था, ‘उम्मीद है कि 2030 तक हम मंगल पर कदम रख देंगे।’ लेकिन अपने हालिया बजट में उन्होंने मंगल मिशन से जुड़ी योजनाएं खत्म कर दीं। वहीं, चीन के कदम मंगल की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। खैर, हवा में शटल को चक्कर काटते देखकर वाशिंगटन के बाशिंदे खड़े के खड़े रह गए। कारें रुक गईं। लोग इमारतों से बाहर निकल आए। वे यान को देखकर खुशी के मारे चीखने-चिल्लाने लगे। कुछ लोग तो रोने भी लगे। जाहिर है, उनमें उत्तेजना थी, पर कुछ खोने का गम भी था।
द वाशिंगटन पोस्ट, अमेरिका

Thursday, April 19, 2012

शोध और अनुसंधान

हिन्दुस्तान लेख 


वैज्ञानिक अनुसंधान की जरूरत ही किसे है
शशांक द्विवेदी, असिस्टेंट प्रोफेसर, सेंट मार्गरेट इंजीनियरिंग कॉलेज

इसमें कोई नई बात नहीं हुई। हमेशा की तरह इस बार भी विज्ञान कांग्रेस में चिंता का विषय यही रहा कि हमारे यहां विज्ञान पर शोध ज्यादा नहीं हो रहा है। चीन हमसे काफी आगे निकल गया है, वगैरह-वगैरह। यही बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्घाटन के समय कही और इसी की गूंज पूरे सम्मेलन में सुनाई देती रही। वैज्ञानिक शोध पर होने वाले खर्च को बढ़ाना, जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना, छात्रों को इसके लिए प्रोत्साहन देना, समाज में वैज्ञानिकों को महत्व दिया जाना, ये तमाम बातें इस संदर्भ में अक्सर कही जाती हैं, लेकिन बात कभी इससे आगे नहीं बढ़ती।
हमारे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान कम हो रहे हैं, इससे ज्यादा चिंता की बात है कि वे लगातार घटते जा रहे हैं। कभी दुनिया भर में होने वाले शोधकार्यों में भारत का नौ फीसदी योगदान था, आज यह घटकर महज 2.3 फीसदी रह गया है। यह भी सच है कि वैज्ञानिक अनुसंधान की जरूरत ही किसे महसूस हो रही है। देश में इस्तेमाल की जाने वाली ज्यादातर तकनीक पूरी तरह से आयातित है। इनमें 55 फीसदी तो बिना किसी बदलाव के ज्यों की त्यों इस्तेमाल होती है और 45 फीसदी थोड़ा-बहुत परिवर्तन के साथ इस्तेमाल होती है। विकसित तकनीक के लिए आयात पर निर्भरता के कारण उद्योग जगत की भी देसी अनुसंधानों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उद्योग जगत ऐसे अनुसंधानों में न तो कोई दिलचस्पी रखता है और न ही इसमें निवेश करना चाहता है। यही वजह है कि भारतीय प्रतिभाएं व वैज्ञानिक विदशों में जाकर शोध करना ही बेहतर मानते हैं।
जब हम वैज्ञानिक शोध की बात करते हैं, तो हमें एक नजर उच्च शिक्षा पर भी डाल लेनी चाहिए। देश की आबादी का मात्र 10-11 फीसदी हिस्सा ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाता है। इसके विपरीत जापान में 70-80 प्रतिशत, यूरोप में 45-50 फीसदी, कनाडा और अमेरिका में 80-90 प्रतिशत लोग उच्च शिक्षा लेते हैं। हमारे देश की हर 10 लाख आबादी पर सिर्फ 112 लोग वैज्ञानिक शोध में लगे हुए हैं। इस संख्या को बढ़ाने के लिए उच्च शिक्षा और उसकी गुणवत्ता को बढ़ाना सबसे जरूरी काम है। इसके अलावा दुनिया के ज्यादातर विकसित देश वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के लिए अपने रिसर्च फंड का 30 फीसदी तक हिस्सा विश्वविद्यालयों को देते हैं, मगर अपने देश में यह अंश सिर्फ छह प्रतिशत है। ज्यादातर विश्वविद्यालयों के अंदरूनी हालात ऐसे हो गए हैं कि वहां शोध के लिए स्पेस काफी कम रह गया है। पिछले कुछ समय में शिक्षा पर हमने काफी काम किया है, लेकिन यह काम मूल रूप से व्यावसायिक शिक्षा तक ही सीमित है। आईआईटी जैसे संस्थानों की दुनिया भर में ख्याति व्यावसायिक कारणों से ही है। यही हालांकि चीन में भी हुआ है,पर चीन ने फंडामेंटल रिसर्च को नजरअंदाज नहीं किया है। दरअसल, अब इसी पर ध्यान देने का समय है।  हिन्दुस्तान में 10/01/12 को प्रकाशित 
लेख लिंक
http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-211014.html