आरक्षण लेकिन कब तक ....कोई तो समय सीमा होनी
चाहिए ,आरक्षण के बाद अब प्रमोशन में भी आरक्षण ..कांग्रेस अपने घटियापन से
कभी समझौता नहीं करती ,हमेशा घटिया से घटिया फैसले लेती है लेकिन इस बार
बीजेपी ने भी प्रमोशन में आरक्षण बिल का समर्थन करके ये साबित कर दिया कि
इस पार्टी कि न कोई दशा है न कोई दिशा ...मैंने कई मुद्दों पर बीजेपी का
समर्थन किया लेकिन आज मुझे बहुत ठेस पहुँची है ...वास्तव में बीजेपी और कांग्रेस
में सबसे घटिया पार्टी बनने की होड है ...दोनों एक ही है बस सिर्फ नाम का
फर्क है ..सत्ता पाने के बाद दोनों का चरित्र एक जैसा ही हो जाता है ..सच
पुछा जाए तो इस बिल के पारित होने से भाजपा को तो कुछ भी हासिल नहीं होगा
,फायदा सिर्फ मायावती को होगा ...जिन मतदाताओं के सहारे बीजेपी राजनीति कर
रही है उसने उन्ही लोगों के साथ विश्वासघात किया है ..ये फैसला बीजेपी की
ताबूत में आख़िरी कील जरुर साबित होगा ...
Friday, December 21, 2012
समाज पर कलंक
दिल्ली गैंगरेप की घटना हमारे समाज पर कलंक है
,इस घटना के बारे में सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते है ..सोच कर स्तब्ध हूँ
कि देश की राजधानी ही सुरक्षित नहीं है ..लगता है सरकारें और पुलिस
बेशर्म हो गयी है . लेकिन हमारा समाज और हम सब भी कही न कही जिम्मेदार है
इन घटनाओं के बढ़ने के लिए ....जघन्यतम कृत्य की शिकार उस लड़की के प्रति
मेरी गहरी सवेदना है ,ईश्वर उसको जल्द ठीक करे और साहस दे ...मै सिर्फ इतना
कहना चाहता हूँ कि इस घटना के आरोपियों को हर हाल में मौत की सजा होनी
चाहिए ...अच्छा तो यह होता जब उन्हें इस जघन्यतम कृत्य के लिए भरे चौराहे
पर गोली मार दी जाये ...जिनमे मनुष्यता नहीं है उन्हें भी मनुष्यों के बीच
रहने का अधिकार नहीं है ...
इंडिया टूडे की नंगई
इंडिया टूडे के कार्यकारी संपादक आजकल अच्छा
महसूस कर रहें होगे .. पिछले दिनों ही २ सेक्स सर्वेक्षण “उभार की सनक “और
“छोटे शहर बने कामक्षेत्र “छापा था वो भी पूरे नंगे कवर पेज के साथ ..बहुत
तेजी से उनकी नंगई समाज में असर कर रही है ..इनकी देखादेखी में लगभग सभी
प्रमुख पत्रिकाए सेक्स सर्वेक्षणों पर ध्यान दे रही है और जम कर छाप भी रही
है ,दिल्ली गैंग रेप के दोषियों को तो देर सबेर सजा मिल ही जायेगी लेकिन
इन लोगों का क्या करें जो खुलेआम समाज में मीडिया के माध्यम सेक्स परोस
रहें है और नंगई फैला रहें है ...
Tuesday, December 18, 2012
तुष्टीकरण की राजनीति
पिछले दिनों पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक की भारत यात्रा के
दौरान भी भारत सरकार ने पाकिस्तान में
ध्वस्त हुए 100 साल पुराने मंदिर और 40 हिंदू परिवार के पलायन का मुद्दा नहीं उठाया .जबकि वहाँ पर हिंदू आबादी 75 लाख से घटाकर 18 लाख हो
गयी है और लगभग सभी प्रमुख मंदिर ध्वस्त कर दिए गए . रहमान मलिक मुंबई हमले की
तुलना बाबरी मस्जिद कर गए और अबू जिंदाल को रा का ही एजेंट बता दिया .उन्होंने
भारत में खूब विवादास्पद बयांन दिए .लेकिन भारत बैकफुट पर ही रहा .पाकिस्तान में
ध्वस्त मंदिर के मुद्दे पर विहिप ,संघ और
भाजपा के कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तानी हाई कमीशन और अजमेर में पाकिस्तान के संसदीय
प्रतिनिधिमंडल को रोक कर ज्ञापन दिया .मै यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या ये
मुद्दा विहिप ,संघ या भाजपा का है ?क्या इस मुद्दे पर भारत की केंद्रीय
सरकार को कोई राजनयिक पहल नहीं करनी चाहिए ?आज देश में ऐसे हालात हो गए है कि जो हिंदुओं की बात करता है उसे सांप्रदायिक समझा
जाता है .यही वजह है कि पाकिस्तानी हिंदुओं से जुड़े इस मुद्दे को केंद्र सरकार
गंभीरता से नहीं ले रही है. क्या ये तुष्टीकरण की राजनीति नहीं है ? क्या
पाकिस्तानी हिन्दुओ को उनके हाल पर ही छोड़ देना चाहिए ?ये कुछ ऐसे सवाल है जिनका
जवाब देश चाहता है .
Monday, December 17, 2012
अस्तित्व के लिए
आदमी गिरता है
कई बार ,
टूटता है कई बार
पर संभल नहीं पाता
या संभालना ही नहीं
चाहता
वो जानता है कि यहाँ
दलदल है
वो मानता है कि
रास्ता गलत है
लेकिन फिर भी
आदमी चलता है
उसी रास्ते पर
क्योंकि
सही रास्ते ने
उसे कुछ नहीं दिया
ईमानदारी ने उसे
दी है सिर्फ
‘ठोकरें’
जिंदगी की ,समाज की
,परिवार की ,
ये ठोकरें
उसे लगती है दिल में
,
कभी कभी ये ठोकरें
चुनौती देती है
“अस्तित्व” को
तब वह सोचता है
रास्ता बदलनें की
जीवन को बदलनें की
तब वह जिंदगी के
रास्ते बदलता है
जिंदगी के आयाम
बदलता है
अच्छाई से बुराई पर
चलता है
सच से झूठ को पकड़ता
है
ईमानदार से बेईमान
बनता है
सही से गलत होता है
ये सब वो करता है
अपने जीवन को बचाने
के लिए
अपने अस्तित्व को
बचाने के लिए
शशांक द्विवेदी
सुरक्षाचक्र
कुछ करने से पहले
आदमी चाहता है
एक “सुरक्षाचक्र”,
जो उसे सुरक्षित करे
आर्थिक और सामाजिक
रूप से ,
“सुरक्षाचक्र” के
कवच
के बाद ही
वह कुछ सार्थक करना
चाहता है समाज के
लिए
देश के लिए
जब उसका पेट भरा है
तभी वह निकलता है
घर से भूखों के लिए
आंदोलन के लिए
अनशन के लिए ,
वो सही है या गलत
इसका फैसला चाहे जो
करे
चाहे जैसे करे ,
लेकिन सच तो यह है
कि
आज भूखे पेट
कोई भी आंदोलन नहीं
होता
कोई भी लेखन नहीं
होता !!
शशांक द्विवेदी
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