Tuesday, September 2, 2014

लिखना और छपना

शशांक द्विवेदी 

मै अच्छा लिखता हूँ इसलिए छपता हूँ ,,मै छपता हूँ इसलिए नहीं लिखता.....

मै पिछले कुछ सालों से देश के प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में नियमित रूप से स्तंभ लिख रहा हूँ , प्रिंट मीडिया में बिना किसी गाडफादर और सिफारिश के सिर्फ अपनी मेहनत और लगन के बूते मैंने अपना स्थान बनाया है ..(मै अच्छा लिखता हूँ इसलिए छपता हूँ ,,मै छपता हूँ इसलिए नहीं लिखता )आज से 10 साल पहले जब इंजीनियरिंग का छात्र था तब भी खूब लिखता था भले ही वो छपे या न छपे तब भी मेरे कई लेख जनसत्ता ,दैनिक जागरण ,अमर उजाला  आदि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुए थे..कुलमिलाकर लेखन शुरू से ही मेरे लिए जूनून रहा है और आज भी है और आगे भी रहेगा .पिछले दिनों एक पत्रकार ने मेरी शिकायत करते हुए कहा कि मेरा एक ही लेख देश के कई अखबारों में प्रकाशित हुआ है .मै उनकी शिकायत से पूरी तरह से सहमत हूँ (इस देश के अधिकांश बड़े नाम वाले लेखक तो घोषित तौर पर यही करते है ) और मेरा स्पष्ट मानना है कि अगर आप का लेख लखनऊ,दिल्ली ,जयपुर ,भोपाल ,पुणे ,राँची आदि अलग अलग जगह पर छप रहा है तो ये अच्छी बात है विभिन्न पाठकों तक आपकी बात पहुँच रही है .आज के समय में हिंदी के लेखकों को अखबार वाले बहुत कम पारिश्रमिक देते है (मात्र कुछ सौ रुपये ,कई अखबार तो ऐसे भी है जो इतना भी नहीं देते ).. पारिश्रमिक भी छोड़िये उसे ठीक से सम्मान तक नहीं दिया जाता ,उसका लेख प्रयोग होगा कि नहीं अधिकांश संपादक यह जवाब देना तक जरूरी नहीं समझते .कुल मिलाकर लेखक को वो टेक एज अ ग्रांट की तरह लेते है .जरुरत हुई तो लेख प्रयोग कर लिया नहीं तो लेखक भाड़ में जाए .ऐसी परिस्थितियों में लेखक क्या करे ?कुछ सालों में मैंने मीडिया इंडस्ट्री को बहुत अच्छी तरह से देखा है ,समझा है ,आप भारत जैसे देश में आर्थिक रूप से मजबूत होने पर  ही “हिंदी में “ स्वतंत्र लेखन कर सकते है अगर आप बिना किसी जाब के या बिना मजबूत आधार के  फ्रीलांसिंग कर रहें है तो निश्चित तौर पर भूखे मर जायेगें.यहाँ स्तिथि  बहुत ज्यादा भयावह है ,जो दिखता है वो है नहीं ,और भी बहुत सारी बाते है फिर कभी बताऊँगा..

इस मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने मेरी चिंताओ को साझा करते हुए लिखा है
हाल के दिनों में एक नवेले हिंदी पत्रकार ने कुछ अखबारों के संपादकीय और ऑप एड पेज प्रभारियों को कुछ स्तंभ लेखकों के एक ही लेख के कई जगह प्रकाशित होने की जानकारी दी है...इससे कुछ लेखकों के कुछ संपादकों ने लेख छापने भी कम कर दिए हैं...इस बारे में मुझे याद आता है अपना एक संस्मरण..दैनिक भास्कर के रविवारीय परिशिष्ट रसरंग में मैं 1998 में काम कर रहा था...तब दैनिक भास्कर के प्रधान संपादक कमलेश्वर थे। उस समय भास्कर सिर्फ मध्य प्रदेश और राजस्थान में ही प्रकाशित होता था। उन दिनों मृणाल पांडे एनडीटीवी छोड़ चुकी थीं। तब रविवारीय भास्कर की कुछ कवर स्टोरियां अच्युतानंद मिश्र और मृणाल पांडे जी से लिखवाई गईं। संयोग से भास्कर में प्रकाशित मृणाल जी की एक स्टोरी किसी दूसरे अखबार में भी प्रकाशित हुई। रविवारीय में कार्यरत हमारे एक साथी ने कमलेश्वर जी से इसकी शिकायत की। कमलेश्वर जी ने शिकायत सुनी...फिर साथी से सवाल पूछा- आप एक लेख का मृणाल जी जैसे लेखक को कितना पारिश्रमिक देते हैं...उन दिनों मिलने वाली रकम कुछ सौ रूपए होती थी..मित्र ने वही जवाब दिया...कमलेश्वर जी का जवाब था--पहले एक लेख का पारिश्रमिक पांच हजार देने का इंतजाम करो..तब सोचना कि मृणाल जी या दूसरे लेखक एक ही लेख दूसरी जगह छपने को ना दें...फिर उन्होंने उसे समझाया कि अगर एक ही लेख दो अलग-अलग इलाकों के दो या चार अखबारों में छपें तो हर्ज क्या है..आखिर पाठक भी तो अलग-अलग इलाकों के हैं..

Saturday, August 23, 2014

मेरे दो अनमोल रत्न (आन्या और आद्या )

शशांक द्विवेदी 
मुझे ड्राइंग /पेंटिंग/स्केच बनानी बिल्कुल नहीं आती ,बचपन से लेकर स्कूल /कॉलेज के दिनों में भी कुछ बनाने में भारी समस्या आती थी. आजकल मेरी पौने चार साल की बेटी आन्या दिन भर ड्राइंग /पेंटिंग/स्केच बनाती रहती है और मुझसे भी जबरदस्ती कुछ न कुछ बनवाती रहती है .मै बड़ी मुश्किल से कुछ बेकार सा ही बना पाता हूँ लेकिन फिर भी वो मुझे उलझाये ही रहती है .कुछ नही तो मुझसे कलर ही करवाती है स्केच में ..इसके साथ ही सोते समय 2 कहानी भी हर हाल में जबर्दस्ती सुनती है ,कहानी भी हर दिन नई होनी चाहिए रिपीट नही चलेगा ..मै कहता हूँ मम्मी से ड्राइंग बनवा लो ,कहानी सुन लो लेकिन वो सिर्फ मेरी ही रैगिंग लेती है ..दूसरी बात मेरे लैपटॉप पर भी वो अपना अधिकार समझती है ,कार्टून फिल्मे ,फोटो देखने के लिए ...मै जब भी लैपटॉप पर काम करने की कोशिश करता हूँ तो मम्मी से शिकायत करते हुए कहती है मम्मी देखो पापा फिर से फेसबुक कर रहें है !! समझा दो इन्हें ...कुलमिलाकर जबर्दस्त शैतान है लेकिन पढ़ने -लिखने में बहुत ज्यादा इंटरेस्ट है अभी से ... फिजिकल खेलकूद में भी आगे है /अडवेंचरस है..आन्या की देखादेखी आद्या (कुनू ) जो अभी पौने २ साल की है उसे भी पढाई का शौक चढ़ गया है कुछ न कुछ लिखती रहती है ...लिखना तो अभी आता नहीं इसलिए कॉपी पर आड़ी -तिरछी रेखाएं बनाती रहती है ...











मंदिर और हम मुसलमान

मेहनाज खान 
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अगर कहीं मस्जिद का आधार था और भूलवश उसपर मंदिर बनी तो हिन्दुओं को चाहिए की वो मुसलामनों को उसका मस्ज़िद धरोहर की तरह दें और मंदिर अन्य जगह बना लें। मुसलमानों को चाहिए की हर उस मस्ज़िद को अन्यत्र बना लें जो ठीक मंदिर ऊपर बना हो। और सबसे बड़ी बात जिस 'बाबर' को पूरा हिन्दोस्तान आक्रमणकारी, आततायी, विध्वंसकारी, भारतीय सभ्यता को नष्ट करनेवाला और अपनी व्यवस्था थोपने वाला मानता हो .. हम मुसलमान कैसे फिर उसके विरासत और अवशेषों को सहेजने का काम कर सकते हैं .... ??? बाबरी का विध्वंस 'हिन्दुओं' ने किया यह बहुत ही दुखद है … यह काम तो हम मुसलमानों को ही कर देना चाहिए था।
सरकार और सुप्रीमकोर्ट
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सरकार कोई भी हो यदि इन मुद्दों से संवेदनशील कहकर बचना चाहती है तो तो शर्मनाक है साथ ही इसे ठंढे बस्ते में गुसेड़े रखना सुप्रीम कोर्ट का एक बहुत बड़ा भूल है। क्यों ? क्योंकि इसतरह वे और हम अपने आने वाले पीढ़ी को क्या दे रहे हैं --- एक विवाद ! जरा सोचिये क्या इस विवाद के रहते हमारा भारत स्थिर रह सकता है ??? क्या भाईचारे और संविधान के धार्मिक निष्पक्षता का पाठ बरक़रार रह सकता है ? जरा सोचिये …
ऐतिहासिक दृष्टिकोण
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मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, किलिमंजारो, लोथल और भी कई जगहों पर खुदाई हुई और दुनिया साक्षी है और हम मुसलमान भी मानते हैं की भारत मानवीय सभ्यता के विकास का प्रथम क्षेत्र है और साथ ही खुदाई के बाद इन जगहों से जो अवशेष मिले हैं वो हिन्दू देवी-देवताओं के ही मिले हैं। न तो कहीं इस मशीह की मूर्ती या क्रूस मिला न ही कोई इस्लामिक मजार या कब्रगाह .... इतिहास साफ कहता है भारत में मुसलमानों का आगमन ठीक उसी तरह हुआ जिसतरह पुर्तगाली और ब्रिटिस आये .... हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए हिन्दू सनातनियों का जिन्होंने हमें गले लगा लिया और हम भी हिंदुस्तानी सरजमीं में घुल गए।

Tuesday, May 6, 2014

कथित प्रगतिशील लोगों का संघ के प्रति पूर्वाग्रह !!

शशांक द्विवेदी 
अक्सर कथित प्रगतिशील लोगों को "संघी मानसिकता ",भगवा रंग से रंगे आदि शब्द कहते /लिखते सुना है परमुझे कभी समझ में नहीं आया कि "संघी मानसिकता "क्या है ?
मेरा बचपन की पूरी पढाई शिशु से लेकर अष्टम तक संघ स्वचालित सरस्वती शिशु मंदिर में हुई ..ये मेरे जीवन का वो समय था जहाँ से मैंने सब कुछ अच्छा सीखा और आज भी वही संस्कार मेरे जीवन में है ..आज भी सोकर उठनेके बाद सुबह अपने आप हाथ करबद्ध हो जाते है "कराग्रे वस्ते लक्ष्मी " कहते हुए ,खाते समय भोजन मंत्र अपने आप दिमाग में आ जाता है ऐसी और भी बहुत सी चीजें है ..12 वी में ही ABVP से जुड़ा(तहसील अध्यक्ष रहा ) और 2 साल उसके लिए जम कर काम किया उसी दरम्यान आरएसएस की शाखाओं में भी नियमित रूप से गया , वहाँ भी बहुत कुछ सीखा लेकिन आज भी मुझे एक भी नकारात्मकता,सांप्रदायिक बात याद नहीं आती जो कभी संघ की शाखाओं ,बैठकों में कही गयी हो /सिखाई गयी हो ..मै यह बात पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि संघ की किसी भी शाखा में मुस्लिमों के विरुद्ध या कोई भी सांप्रदायिक बात नहीं कही जाती ..संघ ने हमेशा राष्ट्रवाद की बात की और उसी भावना का प्रचार किया ,,बचपन से ही संघ से जुड़ाव के साथ ही मेरे मन में कभी कट्टरपंथ की भावना नहीं आयी और आगे कभी आयेगी भी नहीं ,दूसरे धर्मो के प्रति आदर हमेशा बना रहा और यही संघ की शाखाओं ने सिखाया भी गया "वसुधैव कुटुम्बकम"की भावना .,2002 गोधरा /गुजरात दंगो के दौरान मुझे बहुत दुःख हुआ था और उस समय मैंने अपने जीवन की सबसे पहली कविता भी लिखी थी ..क्योंकि मेरा मानना तब भी था और अब भी है कि दंगे हिंदू -मुस्लिम के बीच ही नहीं होते बल्कि देश की आत्मा को चोट पहुंचाते है ..
कथित धर्मनिरपेक्ष लोगों /संगठनो द्वारा संघ के बारें में 100 प्रतिशत आधारहीन बातें कही जाती है ये सिर्फ उन लोगों का पूर्वाग्रह है जो संघ को बिना जाने समझे उस पर गलत टिप्पणी करते रहते है ..यहाँ एक बात जरुर स्पष्ट कर दू कि संघ और भाजपा की कार्यशैली अलग है ..संघ से जुड़ाव के बाद भी कई बार मुझे भाजपा के कामों से असहमति हुई ,गुस्सा भी आया ..जो गलत लगा उसका विरोध भी किया और आगे भी करूँगा ..लेकिन अपने कथित प्रगतिशील मित्रों से कहना चाहूँगा कि बिना संघ को जाने हुए संघ पर विषवमन न करें क्योंकि अंध विरोध आदमी का विवेक शून्य कर देता है

Wednesday, April 30, 2014

देश के साथ गद्दारी करने से बेहतर है अपनी कौम के साथ गद्दारी करना

मेरे एक मुस्लिम मित्र है ,बेहद सज्जन व्यक्ति है राजनीतिक विषयों पर उनसे कभी ज्यादा चर्चा नहीं हुई ,न वो करना पसंद करते लेकिन इस बार उन्होंने अपने मतदान के विषय में दिलचस्प वाकया बताया ..

उन्होंने कहा कि मतदान की पूर्व संध्या पर हमारे मुस्लिम बहुल मोहल्ले में  और घर में यह निश्चित हो गया था कि भाजपा को हराने के लिए वोट करना है ,जो प्रत्याशी भाजपा को मजबूत टक्कर दे रहा है सिर्फ उसी को वोट देना है चाहे वो किसी भी दल का हो ,मतलब हर हाल में भाजपा को हराने के लिए वोट देना है इसलिए काँग्रेस को वोट देना तय हुआ लेकिन घर /समाज के इस निर्णय से मेरे मन में पूरी रात भारी उथल पुथल रही कि हम किसी को जिताने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ भाजपा को हराने के लिए वोट करने वाले है .बचपन से यह देखता आ रहा हूँ कि मुस्लिम कौम (95  फीसदी) भाजपा के हमेशा खिलाफ रही है कभी  90 के दशक में मंदिर -मस्जिद के नाम पर मुस्लिम खौफजदा थे /या किये जा रहें थे  और अब  2002 के बाद गुजरात दंगो के नाम पर ..कुल मिलाकर दूसरी पार्टी के नेताओं ने अपनी चुनावी कैम्पेन में हमेशा मुस्लिमों को भाजपा से जम कर डराया ... खैर माहौल का असर मुझ पर भी था और मै भी भाजपा को पसंद नहीं करता था ..इन सब के बीच मतदान करने की बारी आयी तो पिछले कई घंटो से मेरे मन ने काँग्रेस को लेकर भारी उथल -पुथल भी थी ,मै "काँग्रेस "को किसी भी हालत में दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहा था ,मेरी नजर में काँग्रेस को वोट देने का मतलब अपनी आत्मा और अपने देश के साथ गद्दारी करना था क्योंकि कांग्रेस ने अपने महा भ्रष्टाचार से इस देश को लूट लिया था  ,काँग्रेस ने सिवाए वादों के हमारी कौम को भी क्या दिया है ?सभी पार्टियों ने हमें सिर एक ही चीज दी है वो है सिर्फ  भाजपा से डर /भाजपा से नफरत ,नोटा का बटन मै दबाना नहीं चाहता था ..इसी उहापोह में मैंने सोचा कि हर बार भाजपा के खिलाफ वोट देते है चलो  इस बार भाजपा को वोट दे कर देखते है ,मोदी को भी आजमा कर देखते है ,मोदी हमें देश से थोड़ी निकाल देगा ,देखते है वो क्या करता है ?क्या करेगा ..इसी बात को सोचते सोचते मैंने ईवीएम मशीन में कमल का बटन दबा दिया ..वोट देने के बाद भी सोचता रहा/समझता रहा /खुद को समझाता रहा कि क्या कर दिया लेकिन बाद में मैंने अपने आप को दृढ करते हुए सोचा कि देश के साथ गद्दारी करने से बेहतर है अपनी कौम के साथ गद्दारी करना ..मैंने तो अपना वोट दे दिया अब जिसे जो सोचना है सोचे या कहे ...vote for change

Monday, April 21, 2014

एक औरत के दिल छू देने वाले प्रश्न -एक शानदार कविता

देह मेरी ,
हल्दी तुम्हारे नाम की ।
हथेली मेरी ,
मेहंदी तुम्हारे नाम की ।
सिर मेरा ,
चुनरी तुम्हारे नाम की ।
मांग मेरी ,
सिन्दूर तुम्हारे नाम का ।
माथा मेरा ,
बिंदिया तुम्हारे नाम की ।
नाक मेरी ,
नथनी तुम्हारे नाम की ।
गला मेरा ,
मंगलसूत्र तुम्हारे नाम का ।
कलाई मेरी ,
चूड़ियाँ तुम्हारे नाम की ।
पाँव मेरे ,
महावर तुम्हारे नाम की ।
उंगलियाँ मेरी ,
बिछुए तुम्हारे नाम के ।
बड़ों की चरण-वंदना
मै करूँ ,
और 'सदा-सुहागन' का आशीष
तुम्हारे नाम का ।
और तो और -
करवाचौथ/बड़मावस के व्रत भी
तुम्हारे नाम के ।
यहाँ तक कि
कोख मेरी/ खून मेरा/ दूध मेरा,
और बच्चा ?
बच्चा तुम्हारे नाम का ।
घर के दरवाज़े पर लगी
'नेम-प्लेट' तुम्हारे नाम की ।
और तो और -
मेरे अपने नाम के सम्मुख
लिखा गोत्र भी मेरा नहीं,
तुम्हारे नाम का ।
सब कुछ तो
तुम्हारे नाम का... नम्रता से पूछती हूँ :
आखिर तुम्हारे पास...
क्या है मेरे नाम का?
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देव भारती

सुंदरता का कोई रंग नहीं होता


(28 फरवरी 2014 को ऑस्कर नोमिनेशन के बाद लुपिता योंगओ द्वारा दिए गए ‘ब्लैक ब्यूटी’ वक्तव्य का एक अंश)

मैं इस अवसर पर सुंदरता के बारे में कुछ कहना चाहूंगी. मुख्यतः ब्लैक ब्यूटी पर. अवार्ड मिलने से ठीक पहले मुझे एक मेल मिला है जिसकी कुछ पंक्तियां मैं आप सबसे शेयर कर रही हूं. ‘डीयर लुपिता, हॉलीवुड में रातोंरात सफलतम स्टार बन जाने वाली तुम एक ब्लैक लकी हो. मैं अपनी काली त्वचा को सुंदर बनाने के लिए गोरेपन वाली एक क्रीम खरीदने ही जा रही थी कि तभी तुम्हारे नाम की घोषणा हुई और तुमने मुझे कालेपन की हीनता से बचा लिया.’ इसे पढ़ते ही मेरा मन लहूलुहान हो गया. मैनें कभी नहीं सोचा था कि स्कूल की बाहरी दुनिया में किया गया मेरा पहला काम इतना प्रभावी होगा, जिसकी छवि न सिर्फ मेरे लिए बल्कि उन सभी स्त्रियों के लिए उम्मीद की किरण बन जाएगी जो मेरी तरह काली हैं.