Sunday, May 13, 2012
पोखरण परमाणु परीक्षण की वर्षगाँठ पर विशेष
पोखरण
से मिली सीख
शशांक
द्विवेदी
वर्ष 1998 में अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्रित्व में भारत ने पोखरण में 11
मई से 13 मई तक सफलतापूर्वक 5 परमाणु परीक्षण किए थे। इस सफलता के बाद प्रधानमंत्री वाजपेई ने जय जवान,
जय किसान और जय विज्ञान का नारा दिया था। यह दिन हमारी प्रौद्योगिकी
ताकत को दर्शाता है। पिछले दिनों भारत ने अपनी उन्नत स्वदेशी प्रौद्योगिकी का
परिचय देते हुए आइसीबीएम यानी इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 और देश के पहले स्वदेश निर्मित राडार इमेजिंग उपग्रह रीसैट-1 का सफल प्रक्षेपण किया। इस तरह भारत दुनिया के छह ताकतवर देशों के समूह
में शामिल हो गया। टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ने के बाद भी भारत
दुनिया कुछ देशों से पिछड़ा हुआ है और उसे अभी बहुत से लक्ष्य तय करने हैं।
अत्याधुनिक उपग्रहों के माध्यम से दुनिया के कोने-कोने की जानकारी रखने वाला
अमेरिका भी भारत के परमाणु विस्फोट की भनक नहीं लगा पाया था। भारत आज अपने दम पर
मिसाइल रक्षा कवच विकसित करने में भी सफल हो गया है। हालांकि अमेरिका, चीन जैसा बनने के लिए अभी बहुत मेहनत करनी होगी। चीन ने राडार की पकड़ में
न आने वाला स्टील्थ विमान विकसित कर लिया है जो अब तक केवल अमेरिका के पास ही था।
भारत को विश्वशक्ति बनने के लिए दूसरों से श्रेष्ठ हथियार प्रौद्योगिकी विकसित
करनी होगी। इस दिशा में अग्नि-5 और रीसैट-1 की कामयाबी हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि
इसमें अस्सी फीसदी से अधिक स्वदेशी तकनीक और उपकरणों का प्रयोग किया गया है। अगर
सकारात्मक सोच और ठोस रणनीति के साथ हम लगातार अपनी प्रौद्योगिकी जरूरतों को पूरा
करने की दिशा में आगे कदम बढ़ाएं तो हम शीघ्र ही आत्मनिर्भर हो सकते हैं। इस
कामयाबी के साथ अब चीन और पाकिस्तान इसका जवाब देने के लिए नए हथियारों और उपकरणों
की होड़ में शामिल हो जाएंगे इसलिए हमें सतर्क रहते हुए अपने रक्षा कार्यक्रमों को
और अधिक मजबूत करना होगा। अगर हम एक विकसित देश बनने की इच्छा रखते हैं तो आंतरिक
और बाहरी चुनौतियों से निपटने के लिए हमें दूरगामी रणनीति बनानी पड़ेगी। भारत
पिछले छह दशकों में अपनी अधिकांश प्रौद्योगिकीय जरूरतों की पूर्ति दूसरे देशों से
करता आया है। वर्तमान में हमें अपनी सैन्य जरूरतों का 70 फीसदी
हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आयात करना पड़ता है। अमेरिका भारत को हथियार व उपकरण तो दे
रहा है पर उनका हमलावर इस्तेमाल न करने और इसकी जांच के लिए अपने प्रतिनिधि भेजने
की शर्मनाक शर्ते भी लगाता है। वर्तमान में भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक
देश बन रहा है। इससे मुक्त होने के लिए रक्षा मामले में आत्मनिर्भर बनने के अलावा
और कोई विकल्प नहीं है। हमारे घरेलू उद्योगों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी
जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है इसलिए देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी भारतीय
उद्योग के कौशल संसाधनों एवं प्रतिभाओं का उपयोग जरूरी है। सुरक्षा मामलों में देश
को आत्मनिर्भर बनाने में सरकार और अकेडमिक संस्थाओं की भी सहभागिता जरूरी है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारा वैज्ञानिक व प्रौद्योगिकी ढांचा न तो विकसित
देशों जैसा मजबूत था और न ही संगठित। इसके बावजूद प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में
हमने काफी कम समय में बड़ी उपलब्धियां हासिल की है। स्वतंत्रता के बाद भारत का
प्रयास रहा है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन
भी लाया जाए ताकि देश के जीवनस्तर में संरचनात्मक सुधार हो सके। अर्थव्यवस्था के
भूमंडलीकरण और उदारीकरण के कारण आज प्रौद्योगिकी की आवश्यकता बढ़ गई है। वास्तव
में प्रौद्योगिकीय गतिविधियों को बनाए रखने तथा सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना
करने के लिए जनमानस में वैज्ञानिक चेतना का विकास जरूरी है। (लेखक स्वतंत्र
टिप्पणीकार हैं) रक्षा मामले में आत्मनिर्भरता पर शशांक द्विवेदी के विचार
दैनिक जागरण (राष्ट्रीय ) में 14/05/2012 प्रकाशित
Article link
Sunday, May 6, 2012
पदोन्नति में आरक्षण
एक ही बार दीजिए आरक्षण
सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों ने बताया है कि पदोन्नतियों में आरक्षण
इसलिए भी उचित नहीं है कि वह योग्यता को मारता है। उस महकमे की आम मेधाविता को
कुंद करता है। अंतत: यह उत्पादकता को प्रभावित करता है, जिसकी परिणति एक राज्य
की प्रतिगामिता में दिखती है
पदोन्नति
में भी आरक्षण पर आमादा राजनीति की गरम प्रतिक्रिया अनपेक्षित नहीं कही जाएगी।
सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश की सरकारी सेवा में प्रोमोशन में रिजव्रेशन को
जैसे ही खारिज किया। तभी लखनऊ और नई दिल्ली के सियासतदां के साथ-साथ अवाम को पता
चल गया था कि आरक्षण पर इसे अंतिम शब्द कतई नहीं बनने दिया जाएगा। बिल्कुल अपेक्षा
के मुताबिक ही मायावती ने राज्यसभा में संविधान में संशोधन की मांग करते हुए
कांग्रेस को दलित विरोधी बताया और सदन से निकल आई। ठीक इसी समय लोकसभा में
कांग्रेस सांसद और अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया ने संविधान में
संशोधन की मांग उठाई। दलित विरोधी होने का ठप्पा और समाजवादी पार्टी को छोड़
वाम-दक्षिण पंथी विपक्ष का विरोध कांग्रेस को बर्दाश्त नहीं। सरकार तुरंत हरकत में
आई और कार्मिक मंत्री वी. कुमारस्वामी के हवाले से सदन को बता दिया गया कि
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को मामले की चिंता है और इस पर विचार के लिए सर्वदलीय
बैठक बुलाई जाएगी। इस बाबत विधेयक के लंबित प्रारूप को भी अंतिम रूप देकर संसद में
पेश किया जाएगा ताकि बार- बार न्यायालय की मिलने वाली नसीहतों का स्थायी निदान
निकाला जा सके। यह केंद्र और संसद का परिदृश्य है। उधर, उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार भी अपने तरीके से कुछ कर रही
है। वह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुपालन के लिए एक अध्यादेश लाने वाली है।
चूंकि वहां विधानसभा का अभी सत्र चल नहीं रहा है। आरक्षित संवर्ग सरकार की तेजी को
अपने विरुद्ध जबर्दस्ती का राजधर्म मान रहा है। उसका कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय
में पुनर्विचार के लिए विशेष अवकाश याचिका के स्वीकृत होने और इस पर फैसला आने तक
सरकार का वेटिंग मोड में रहना ही बेहतर होगा। इस सलाह में भी कोई बुराई नहीं है।
न्यायिक/वैधानिक प्रक्रिया के दायरे में यह राय है। हो सकता है, तब तक केंद्र की तरफ से ही कोई सर्वमान्य हल निकल आए। समाजवादी
पार्टी की अखिलेश सरकार इसलिए तब तक इंतजार नहीं कर सकती क्योंकि उसे पदोन्नति में
एससी/एसटी के कोटे का विरोध करने के लिए जनादेश मिला है। उसने अपने चुनावी घोषणा
पत्र में यह वादा किया था कि सत्ता में आने पर बसपा सरकार के इस फैसले को पलट
देगी। सर्वोच्च अदालत के फैसले ने उस पर मुहर लगाकर उसके वादे को न्यायोचित और
वैधानिक बना दिया है। एक सरकार के लिए यही तो दिशासूचक/मार्गदर्शक सिद्धांत होते
हैं। इसलिए भी लोकसभा में सपा के वरिष्ठ सांसद रामगोपाल यादव कहते हैं कि नौकरी
में आरक्षण पर पार्टी और सरकार को ऐतराज नहीं है लेकिन पदोन्नति में आरक्षण की
व्यवस्था पर घोर आपत्ति है। यह ‘उत्तर
प्रदेश सरकारी सेवक वरिष्ठता नियम-1991’
के मूल स्वरूप से पुष्ट नहीं है। दरअसल, यह सारा मामला मायावती सरकार के समय का है। उत्तर प्रदेश में
भले वह नई सामाजिक इंजीनियरिंग, सवर्ण-दलित
गठजोड़-की बदौलत सत्ता में आई लेकिन उसने सरकारी सेवा में एससी/एसटी को ही
पदोन्नति देने के नियम में संशोधन किया। इसका लाभ पाकर कोई पौने दो लाख लोग
विभिन्न सरकारी महकमों में वरिष्ठता पा गए। इसके विरुद्ध सामान्य और ओबीसी संवर्ग
की ‘सर्वजन हिताय संरक्षण समिति’ ने
इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट दायर की। जनवरी, 2011 में दिए गए
फैसले में संशोधन 8अ को खारिज
कर दिया। हालांकि दो न्यायमूर्ति इसके विरुद्ध थे। बौखलाई मायावती सरकार सर्वोच्च
अदालत गई, जहां 29 अप्रैल को
उसने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बहाल रखा। इसके बावजूद, प्रदेश सरकार के व्यवहार में एक संतुलन दिखाई देता है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस पक्ष में हैं कि जो हो गया, उसे रहने दिया जाए किंतु आगे की पदोन्नतियों में आरक्षण को
अदालत की इच्छा के मुताबिक ही न माना जाए। यह बात सर्वजन हिताय संरक्षण समिति को
मान्य नहीं है तो उसका वैधानिक आधार है। दरअसल, अदालत का
फैसला नियम आठ-अ को निरस्त कर देता है। जब नियम ही गलत है तो उसके आधार पर दिया
गया लाभ भी अनुचित ही होगा। यह सही अनुपालना नहीं होगा। इसलिए वे सभी पदोन्नतियां
निरस्त हों और जैसा कि अदालत ने कहा है कि एक ही सूची बने और वही वरिष्ठता के लाभ
दिलाने का आधार बने। इसका अनुपालन न हुआ तो समिति की यह आशंका सच निकलेगी कि अगले
पांच सालों तक सामान्य/ओबीसी का कोई कर्मचारी/अधिकारी वरिष्ठता का लाभ पाने से
वंचित रह जाएगा। इससे जुड़ी दूसरी बात यह है कि एससी/एसटी के सरकारी सेवकों को
आरक्षण का दोहरा लाभ मिलेगा। यह आरक्षण के वास्तविक अभिप्राय से मेल नहीं खाता है।
मंडल कमीशन के समय यही सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि आरक्षण का लाभ एक
बार ही दिया जा सकता है। उसने फिर कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार का 2008 में किया गया संशोधन संविधान का उल्लंघन करता है। आरक्षण के
पक्ष में यह आम दलील है कि चूंकि भारतीय समाज असमानता पर आधारित है, लिहाजा उसके सभी अंगों में समता के जरिये संतुलन लाने तक
आरक्षण को बनाए रखना लाजिमी है। अनुच्छेद-16 के
उपबंध-दो के इस स्पष्ट प्रावधान के बावजूद कि ‘किसी
नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान, जहां वे रहते हैं के साथ किसी भी स्तर पर कोई भेदभाव नहीं होगा।
उनके साथ किसी भी राज्य के अंतर्गत रोजगार पाने और दफ्तर में कोई अंतर नहीं किया
जाएगा।’ राजनीतिकों ने इस प्रावधान में ‘केवल’ शब्द को आरक्षण के प्रावधान के लिए अयोग्यता के रूप में देखते
हुए अनुच्छेद-16 के ही अनुबंध-4 का उपयोग किया, जिसमें कहा
गया था कि किसी राज्य को आरक्षण का प्रावधान करने से नहीं रोका जाएगा, अगर वह पाता है कि किसी जाति का उस राज्य की सरकारी सेवा में
समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है। अपनी सामाजिक संरचना में वंचितों के एक व्यापक तबके
की वास्तविकता को देखते हुए बनी सहमति की भी एक समय सीमा थी। लेकिन वह समय-समय पर
बढ़ाई जाती रही। आरक्षण के जारी रहने से संबद्ध वगरे में एक क्रीमी क्लास उभरा है।
देखा गया है कि जिस आरक्षण को अंतिम आदमी के लिए समानता के अवसर के तौर पर देखा
गया था, उससे एक बड़ा वर्ग वंचित रह गया है और खास-खास लोगों की
पीढ़ियां ही संपन्न हो रही हैं। यह खुशहाली चार-चार पीढ़ियों तक फैली है जबकि
व्यापक समाज अवसरों के लिए कतार में ही रह गया है। इसकी समीक्षा की जरूरत शिद्दत
से है। इससे कतराते जाने से सामाजिक असंतोष की बड़ी समस्या से हमें रू-ब-रू होना
पड़ेगा। लेकिन जिस तरह से आरक्षण के मसले को वोट के चश्मे से देखा जा रहा है, उसे देखते हुए ऐसी नियति सामने आती लगती है। सर्वोच्च न्यायालय
के कई फैसलों ने बताया है कि पदोन्नतियों में आरक्षण इसलिए भी उचित नहीं है कि वह
योग्यता को मारता है। उस महकमे की आम मेधाविता को कुंद करता है। अंतत: यह
उत्पादकता को प्रभावित करता है, जिसकी
परिणति एक राज्य की प्रतिगामिता में दिखती है। खुद कांशीराम भी जातीय आधार पर
आरक्षण के विरोधी थे। अलबत्ता, वह दलितों
को वित्तीय और राजनीतिक अवसर के पक्षधर थे। यह पता नहीं कि अब भी उनका स्टैंड यही
रहता या बदल जाता। मौजूदा परिस्थितियों में उप्र सरकार के लिए यही उचित होगा कि वह
जनादेश का पालन करते हुए न्यायालय के आदेश को अधूरा नहीं पूरा लागू करे। पदोन्नति
पाने वालों के वास्तविक आधार तय करे। वहीं केंद्र सरकार अगर सर्वदलीय बैठक बुलाती
है तो बेहतर होगा कि वह उन स्वरों को सुनें, जो केवल
राजनीतिक जुबान नहीं देश-समाज हित की जवाबदेही और समझदारी से बोलते हैं। आरक्षण पर
अंतिम हल निकलना चाहिए क्योंकि देश को कई मुकाम पाने अभी बाकी हैं। लेखक रणविजय सिंह ,(साभार -राष्ट्रीय सहारा)
गरीब की कौन सुनेगा ?
गरीबों की बढ़ती संख्या
शशांक द्विवेदी ,दैनिक जागरण में 6/05/12 को प्रकाशित
राष्ट्रीय नमूना सर्वे संगठन की ताजा रिपोर्ट ने देश के कथित विकास
पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। वास्तव में इस देश में विकास कौन कर रहा है? अमीर और अमीर होते जा रहें है जबकि महंगाई ने तो
गरीब की कमर ही तोड़ दी है। इस वजह से उसके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना
मुश्किल हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में आठ करोड़ लोग रोजाना पंद्रह रुपये
या उससे कम पर गुजारा करने को मजबूर हैं। देश की 60 फीसद
ग्रामीण आबादी महज 35 रुपये रोजाना पर, जबकि 60 फीसद शहरी आबादी 66 रुपये
रोजाना पर गुजारा कर रही है। सरकार और योजना आयोग किन कागजी आंकड़ों के जरिये
विकास के दावे करता है यह तो वही जानें, लेकिन असल तस्वीर
कुछ और ही है। देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद एक तबके का जबर्दस्त विकास हुआ है,
जबकि दूसरा तबका पिछड़ता गया। पहले देश में गिने-चुने ही करोड़पति
होते थे, लेकिन अब आंकड़ों की मानें तो एक लाख 53 हजार लोग करोड़पति हैं। देश का सारा पैसा और संसाधन अब इन्हीं लोगों के
कब्जे में है, जबकि बाकी लोग किसी तरह अपनी जिंदगी गुजार पा
रहें हैं। सबसे खास बात यह है कि यही पैसे वाले लोग इस देश के नीति नियंता हैं।
देश और समाज के नीतियों के निर्धारण में गरीबों का कोई योगदान नहीं है। गरीब सिर्फ
आंकड़े बनाने या बनने के लिए ही हैं। देश की सड़कों पर नई दौड़ती कारें, लगातार खुलते मॉल और ऐसी ही दूसरी गतिविधियां निश्चित तौर पर विकास की
सूचक हैं। पर यह भी सच है कि एक बड़े वर्ग के लिए लिए दो जून की रोटी जुटा पाना अब
भी उसके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है। गरीबों और गरीबी का मजाक तो सदियों से
उड़ाया जाता रहा है, लेकिन बाकायदा तर्क देकर गरीबी का मजाक
उड़ाना तो कोई इस सरकार से सीखे। सरकार के अनुसार देश में गरीबी कम हो रही है।
पिछले दिनों योजना आयोग ने इससे संबंधित नए आंकड़े भी जारी किए, जिसके मुताबिक रोजाना 28.65 रुपये खर्च करने वाला
व्यक्ति गरीब नहीं है और साल 2009-10 में देश में गरीबी का
अनुपात घटकर 29.8 प्रतिशत हो गया है। व्यावहारिक तो यही होगा
कि इस तरह की रिपोर्ट बनाने वाले सभी योजना आयोग के सदस्यों को 860 रुपये देकर कहा जाए कि आप सब लोग इन रुपयों पर कम से कम एक महीना गुजर-बसर
करके दिखाएं। अगर संभव हो तो इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले योजना आयोग के
उपाध्यक्ष और अध्यक्ष को भी ऐसा करने को कहा जाए। तब इन लोगों को समझ में आएगा कि
रिपोर्ट बनाना और वास्तविक जीवन जीने में कितना फर्क है। इस पर क्यों कोई आयोग
रिपोर्ट नहीं देता कि हमारे देश का कितना काला धन देश के बाहर है और उसे कैसे देश
में लाएं? सिर्फ गरीब और गरीबी के आंकड़ो के लिए ही क्यों इस
तरह के आयोग बनते हैं जो सही रिपोर्ट तक नहीं देते। आज भारत विश्व की चौथे नंबर की
अर्थव्यवस्था है जो लगभग हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा है। हमारी क्षमता का लोहा
सारी दुनिया मान रही है, लेकिन इसके बावजूद भारत गरीब देशों
में शुमार है। भारत जैसे विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी
है इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है कि इसका उन्मूलन किया जाए। देश की आधी से
ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस
गंभीर समस्या की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित हो। विश्व की कई संस्थाएं, विश्व बैंक आदि भी निर्धनता दूर करने के लिए काफी मदद करती हैं, लेकिन वह मदद भ्रष्टाचार के कारण गरीबों तक नहीं पहुंचती। भारत के लिए
गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है कि इसका उन्मूलन
किया जाए
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) राष्ट्रीय नमूना सर्वे की रिपोर्ट पर
शशांक द्विवेदी की टिप्पणी
article link-
Tuesday, May 1, 2012
तकनीकी शिक्षा
तकनीकी शिक्षा के लक्ष्य का क्या होगा
यह पहला मौका है, जब देश के 14
राज्यों के 143 तकनीकी शिक्षण संस्थानों ने
अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी एआईसीटीई से अपने पाठय़क्रम बंद करने की
इजाजत मांगी है। इस बार देश में तकनीकी शिक्षा के मौजूदा सत्र में कॉलेजों में
बड़े पैमाने पर सीटें खाली रह गई थीं। जहां कुछ साल पहले तक तकनीकी शिक्षण संस्थान
खोलने की होड़-सी मची थी, वहीं अब इन्हें बंद करने की इजाजत
मांगने वालों की लाइन लगी हुई है। शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान रखे बगैर जिस तरह
से पूरे देश में तकनीकी कॉलेजों की बाढ़-सी आ गई थी, ऐसे में
एक दिन यह तो होना ही था।
देश
में यह पहली बार हो रहा है कि एक तरफ तो सरकार उच्च शिक्षा के व्यापारीकरण पर जुटी
है, वहीं दूसरी तरफ,
लोगों का रुझान इस ओर कम हो रहा है। पिछले दिनों इस पर योजना आयोग
ने अपना दृष्टिकोण-पत्र जारी किया था। उस दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक आयोग चाहता है
कि ऐसे उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना के लिए अनुमति दी जाए, जिनका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो। दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक, 12वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा, खासकर
तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने की
जरूरत है। यह सुझाव पिछले वर्षों के दौरान उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में चली
चर्चा के अनुरूप ही है, क्योंकि विदेशी विश्वविद्यालयों को
भारत में अपनी शाखा खोलने की इजाजत के साथ भी यह बात जुड़ी हुई है कि वे मुनाफे की
संभावना दिखने पर ही यहां आएंगे।
शिक्षा
के अधिकार के बाद से सरकार और उसके संसाधनों पर प्राथमिक शिक्षा के लिए दबाव बढ़ा
है, इसीलिए न सिर्फ
केंद्र सरकार, बल्कि राज्यों की सरकारें भी उच्च शिक्षा के
निजीकरण की बातें करने लगी हैं। यह उम्मीद की जाती रही है कि निजीकरण के बाद
गुणवत्ता नियामक संगठन इन संस्थानों की गुणवत्ता पर नजर रखेंगे। एआईसीटीई जैसे
संगठन इसी सोच के साथ बने थे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मेडिकल कौंसिल ऑफ
इंडिया जैसे कई संगठन तभी से यह काम कर रहे थे, जब उच्च
शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थान आए भी नहीं थे। निजीकरण के बाद ज्यादातर कॉलेज
और ये संगठन उम्मीद पर खरे नहीं उतर सके। मोटी फीस लेकर तरह-तरह की तकनीकी शिक्षा
देने वाले कॉलेजों की बाढ़ आ गई। देश भर में इनकी रंगी-पुती भव्य इमारतें तो दिखने
लगीं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता कहीं नजर नहीं आई। पोल खुलने
के बाद अब ये कॉलेज पाठय़क्रम बंद करना चाहते हैं।
अगर ये पाठय़क्रम बंद होते हैं, तो तकनीकी शिक्षा
के हमारे लक्ष्य का क्या होगा? सरकार निजीकरण तो चाहती है,
लेकिन जो व्यवस्था बनी है, उसमें भारी खर्च के
बावजूद गुणवत्ता वाली शिक्षा लोगों को मिल सके, इसकी कोई
गारंटी नहीं है। पर हमारा लक्ष्य तो यही है।
हिन्दुस्तान में 01/05/2012 को प्रकाशित
article link"http://www.livehindustan.com/
Subscribe to:
Posts (Atom)