Sunday, May 6, 2012

गरीब की कौन सुनेगा ?


गरीबों की बढ़ती संख्या
शशांक द्विवेदी ,दैनिक जागरण में 6/05/12 को प्रकाशित
राष्ट्रीय नमूना सर्वे संगठन की ताजा रिपोर्ट ने देश के कथित विकास पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। वास्तव में इस देश में विकास कौन कर रहा है? अमीर और अमीर होते जा रहें है जबकि महंगाई ने तो गरीब की कमर ही तोड़ दी है। इस वजह से उसके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मुश्किल हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में आठ करोड़ लोग रोजाना पंद्रह रुपये या उससे कम पर गुजारा करने को मजबूर हैं। देश की 60 फीसद ग्रामीण आबादी महज 35 रुपये रोजाना पर, जबकि 60 फीसद शहरी आबादी 66 रुपये रोजाना पर गुजारा कर रही है। सरकार और योजना आयोग किन कागजी आंकड़ों के जरिये विकास के दावे करता है यह तो वही जानें, लेकिन असल तस्वीर कुछ और ही है। देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद एक तबके का जबर्दस्त विकास हुआ है, जबकि दूसरा तबका पिछड़ता गया। पहले देश में गिने-चुने ही करोड़पति होते थे, लेकिन अब आंकड़ों की मानें तो एक लाख 53 हजार लोग करोड़पति हैं। देश का सारा पैसा और संसाधन अब इन्हीं लोगों के कब्जे में है, जबकि बाकी लोग किसी तरह अपनी जिंदगी गुजार पा रहें हैं। सबसे खास बात यह है कि यही पैसे वाले लोग इस देश के नीति नियंता हैं। देश और समाज के नीतियों के निर्धारण में गरीबों का कोई योगदान नहीं है। गरीब सिर्फ आंकड़े बनाने या बनने के लिए ही हैं। देश की सड़कों पर नई दौड़ती कारें, लगातार खुलते मॉल और ऐसी ही दूसरी गतिविधियां निश्चित तौर पर विकास की सूचक हैं। पर यह भी सच है कि एक बड़े वर्ग के लिए लिए दो जून की रोटी जुटा पाना अब भी उसके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है। गरीबों और गरीबी का मजाक तो सदियों से उड़ाया जाता रहा है, लेकिन बाकायदा तर्क देकर गरीबी का मजाक उड़ाना तो कोई इस सरकार से सीखे। सरकार के अनुसार देश में गरीबी कम हो रही है। पिछले दिनों योजना आयोग ने इससे संबंधित नए आंकड़े भी जारी किए, जिसके मुताबिक रोजाना 28.65 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है और साल 2009-10 में देश में गरीबी का अनुपात घटकर 29.8 प्रतिशत हो गया है। व्यावहारिक तो यही होगा कि इस तरह की रिपोर्ट बनाने वाले सभी योजना आयोग के सदस्यों को 860 रुपये देकर कहा जाए कि आप सब लोग इन रुपयों पर कम से कम एक महीना गुजर-बसर करके दिखाएं। अगर संभव हो तो इस रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष को भी ऐसा करने को कहा जाए। तब इन लोगों को समझ में आएगा कि रिपोर्ट बनाना और वास्तविक जीवन जीने में कितना फर्क है। इस पर क्यों कोई आयोग रिपोर्ट नहीं देता कि हमारे देश का कितना काला धन देश के बाहर है और उसे कैसे देश में लाएं? सिर्फ गरीब और गरीबी के आंकड़ो के लिए ही क्यों इस तरह के आयोग बनते हैं जो सही रिपोर्ट तक नहीं देते। आज भारत विश्व की चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था है जो लगभग हर क्षेत्र में तरक्की कर रहा है। हमारी क्षमता का लोहा सारी दुनिया मान रही है, लेकिन इसके बावजूद भारत गरीब देशों में शुमार है। भारत जैसे विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है कि इसका उन्मूलन किया जाए। देश की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस गंभीर समस्या की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित हो। विश्व की कई संस्थाएं, विश्व बैंक आदि भी निर्धनता दूर करने के लिए काफी मदद करती हैं, लेकिन वह मदद भ्रष्टाचार के कारण गरीबों तक नहीं पहुंचती। भारत के लिए गरीबी एक अभिशाप बनकर उभरी है इसलिए राष्ट्रहित में यह आवश्यक है कि इसका उन्मूलन किया जाए
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) राष्ट्रीय नमूना सर्वे की रिपोर्ट पर शशांक द्विवेदी की टिप्पणी
article link-

No comments:

Post a Comment