Sunday, June 17, 2012

जीवन की कठोरता


जीवन की इस कठोरता में
कुरूपता में
गरीबी में
सिर्फ “सपनें” ही
अपने लगतें है
सुहाने लगतें है
जीवन “जीवन “नजर आता है
सपनों में ही
रोटी ,कपड़ा और मकान
मिल पाता है
क्योकिं वास्तविक जीवन
में तो संभव नहीं है
ये सब कुछ
सपनों में ही
इंसान “इंसान “ नजर आता है
क्योकि वास्तविक जीवन में तो
इंसान “हैवान “ नजर आता है
सपनों में ही तृप्ति मिलती है
पेट की आग से ,भूख से
क्योकि वास्तविक जीवन में तो
भूख से लड़ना
ही नियति बन गयी है
सपनों में ही
अपने “अपने “ नजर आते है
वैसे तो ये पराये नजर आतें है
इन सपनों को देखकर
लगता है कि
जी लू सिर्फ
अपनें सपनों के साथ
क्योंकि वास्तविक जीवन में तो
जिंदगी “जिंदगी “नहीं लगती 

स्वरचित -शशांक द्विवेदी 

समय


समय से
डर लगता है
अच्छे समय से भी
और बुरे समय से भी
अच्छा समय
गुजरता है ,दौड़ता है
भागता है जल्दी
और बुरा समय
रुकता है
और ठहर जाता है
इसीलिये समय से
डर लगता है
लेकिन समय किसी के
चाहनें से नहीं रुकता
बस चलता जाता है
हमारी ही द्रष्टि
उसे तेज और धीमा
बनाती है
जबकि वह तो
चलता है
निर्बाध गति से
सामान्य गति से
अपनी ही गति से
समय को बाँटती है
हमारी द्रष्टि
अच्छा समय
और बुरा समय
लेकिन समय के
रुकने का मतलब है
जीवन का
रुक जाना ,थम जाना
क्योंकि समय जुड़ा है जीवन से
और जीवन जुड़ा है समय से
दोनों पूरक है एक दूसरें के 

दिखाऊ कैसे ?


अपने प्यार को ,
अपने विश्वास को
दिखाऊ कैसे  
अपनी भावनाओँ को
 बताऊँ कैसे ,
जीवन की इन दुश्वारियों में
जिंदगी को
गलें लगाऊं कैसे
समझने को ,मानने को
जब कोई तैयार न हो ,
तो समझाऊँ कैसे
अपने मन की ,
आत्मा की
बात बताऊँ कैसे
हैवानियत के इस दौर में
इंसान को इंसान
 बनाऊ कैसे
पैसों की इस दुनियाँ में
सभी अपनें हो गयें है “पराये”  
उनको अपनाऊं कैसे
नफरत की इस दुनियाँ में
मोहब्बत दिखाऊ कैसे ?

स्वरचित -शशांक द्विवेदी 

Friday, June 8, 2012

कोटा नहीं, काबिलियत को दें मौका

जोगिन्दर सिंह
गांधी जी ने अपनी किताब ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखा है, ‘सरकारी महकमों में जहां तक कोटे की बात है, अगर हमने उसमें सांप्रदायिक भावना का समावेश किया तो यह एक अच्छी सरकार के लिए घातक हो गा लेकिन मतदाताओं को लुभाने की चाल के चलते अब जातिवाद और धर्म आधारित राजनीति, अपवाद के बजाय कायदा हो गई है। गुर्ज र और जाटों के आरक्षण के लिए हालिया आंदोलन इसके साक्ष्य हैं
राजनीतिकों की सार्वजनिक और आधिकारिक याददाश्त बहुत छोटी होती है। वह किसी भी तरह हुकूमत में बने रहने या इसे पाने के लिए हरेक तरह के वादे करते हैं। दरअसल, नौबत यहां तक आ पहुंची है कि जनता को देने से कोई चीज नहीं छूटी। अब तो राजनीतिक दल अपने मतदाताओं को लैपटॉप, मिक्सी, आटा, दाल, नि:शुल्क शिक्षा, अवास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन, वरिष्ठ नागरिकों को पेंशन, कन्या के विवाह पर नकदी सहायता और खाली बैठों को दान और कम दाम पर उपहार तक दे डाल रहे हैं। भारतीय संविधान निस्वार्थी नेताओं द्वारा बनाया गया था, उन लोगों को तब इसका अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि एक ऐसी स्थिति आएगी जब सरकारी नौकरियों में 50 फीसद आरक्षण जाति और धर्म के आधार पर दे दिया जाएगा। उपरोक्त प्रावधान वाली ये योजनाएं देश की मेधा को मटियामेट कर दे रही हैं। उदाहरण के लिए सर्वशिक्षा अभियान को लें, सरकार ने इसके तहत आवश्यक बना दिया है कि बोर्ड परीक्षा तक किसी भी छात्र-छात्रा को फेल न किया जाए। चाहे वे कक्षा में आएं या न आएं। किसी सबूत की जरूरत हो तो केंद्रीय विधि मंत्री द्वारा 2012 में विधानसभा चुनावों के पहले अल्पसंख्यकों के लिए नौ फीसद कोटे की घोषणा को देखना चाहिए। सलमान खुर्शीद ने उत्तर प्रदेश में ऐलान किया था कि उनकी पार्टी यहां की सत्ता में लौटी तो अल्पसंख्यकों को नौ फीसद आरक्षण दिया जाएगा। उन्होंने इसे सीधे- सीधे मुसलमानों के लिए कोटा कहने के बजाए अल्पसंख्यकों के लिए बताया। यह जाना-माना तथ्य है कि केवल अल्पसंख्यक किसी भी पार्टी का भाग्य बदल सकते हैं और उनमें सबसे ज्यादा मुसलमान। इसलिए सभी पार्टियां मुसलमानों को चांद दिलाने के वादे के साथ एक दूसरे से होड़ करती रहती हैं, संविधान या कानून चाहे भाड़ में जाएं। निर्वाचन आयोग ने तब विधि मंत्री की इस घोषणा को सांप्रदायिकता के आधार पर मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास मानते हुए इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना। गौरतलब है कि आचार संहिता कानून नहीं है, यह सर्वदलीय सर्वसम्मति है। लिहाजा, इस बाबत चेतावनी देने या प्रतिबंधित करने के अलावा कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती है। हमारे संविधान का अनुच्छेद-16 सभी को समान अधिकार देता है। यहां तक कि संविधान के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर भी सदा के लिए आरक्षण जारी रखने के पक्ष में नहीं थे। अगस्त, 1949 में अनुसूचित जाति के लिए 10 साल तक आरक्षण जारी रखने के विधेयक का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा था, ‘अनुसूचित जनजातियों के लिए तो मैं बहुत लंबे समय तक यह सुविधा देने के लिए तैयार हूं लेकिन अनुसूचित जाति या जनजाति के आरक्षण पर अपने विचार रखने वाले सभी वक्ताओं ने बहुत सावधान हो कर कहा है कि इस व्यवस्था को 10 साल बाद खत्म हो जाना चाहिए।’ न केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू बल्कि डॉ. अंबेडकर समेत दलित हितों की राजनीति करने वाले अन्य नेताओं ने भी उनके (अंबेडकर) जीवन के अंतिम काल के कुछ ही पहले कहा था कि आरक्षण को 1960-61 के बाद तक जारी नहीं रखना चाहिए। उनका विास था, ‘आरक्षण की नीति कुछेक अपवादों को छोड़ कर पिछड़ापन, अकुशलता और आत्मविास के अभाव को बढ़ावा देगी।’
गांधी जी ने अपनी किताब ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखा है, ‘सरकारी महकमों में जहां तक कोटे की बात है, अगर हमने उसमें सांप्रदायिक भावना का समावेश किया तो यह एक अच्छी सरकार के लिए घातक होगा। मैं समझता हूं कि सक्षम प्रशासन के लिए, उसे आवश्यक रूप से हमेशा योग्य हाथों में होना चाहिए। निश्चित ही वहां भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।’..‘पदों का वितरण हरेक समुदाय के सदस्यों के अनुपात में नहीं होना चाहिए। जो सरकारी सेवाओं में जवाबदेही के पदों को पाने की लालसा रखते हैं, वे इसके लिए जरूरी परीक्षा पास करने पर ही उन पर काबिज हो सकते हैं।’
पंडित नेहरू ने 27 जून 1961 को मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में कहा था, ‘ऊपर मैंने सक्षमता का उल्लेख किया है और लीक पीटने की हमारी परंपरा से बाहर आने का जिक्र किया है। हमें आरक्षण की पुरानी आदत और इस जाति या उस समूह को दी गई खास तरह की रियायतों से बाहर आने की आवश्यकता है। यह सच है कि अनुसूचित जाति/जनजाति को मदद करने के प्रसंग में हम कुछ नियम-कायदों और बाध्यताओं से बंधे हैं। वह मदद के पात्र हैं लेकिन इसके बावजूद मैं किसी भी तरह के कोटे के खिलाफ हूं, खासकर सरकारी सेवाओं में। मैं किसी भी तरह की अक्षमता और दोयम दज्रेपन के सर्वथा विरुद्ध हूं। मैं चाहता हूं कि मेरा देश हरेक क्षेत्र में अव्वल देश बने। जिस घड़ी हम दोयम दज्रे को बढ़ावा देगें, हम मोर्चा हार जाएंगे।’
मतदाताओं को लुभाने की चाल के चलते अब जातिवाद और धर्म आधारित राजनीति, अपवाद के बजाय कायदा हो गई है। गुर्जर और जाटों के आरक्षण के लिए हालिया आंदोलन इसके साक्ष्य हैं। सही ही कहा गया है कि जो इतिहास से सबक लेना चाहते हैं कि वे उसके दोहराव के निंदक होते हैं। जातिवाद को बढ़ावा देना और सरकारी नौकरियों में धर्म आधारित आरक्षण देश को विखंडित करने की दिशा में बड़ा कदम है। मैं अल्पसंख्यक समेत समाज के सभी वगरे के निर्धनतमों के जीवनस्तर सुधार के विरुद्ध नहीं हूं। लेकिन जब केक का आकार छोटा हो तो कब तक हम एक दूसरे पर झपटते रहेंगे। अल्पसंख्यकों की काबिलियत बढ़ाने के लिए सकारात्मक कार्यक्रम की जरूरत है ताकि वे शिक्षा और नौकरी में सवरेत्तम के साथ अपनी बराबरी कर सकें। जैसे कि कश्मीर के मुस्लिम युवक ने बिना किसी सिफारिश या कोटे के 1960 के दशक में भारतीय प्रशासनिक सेवा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। भारत के अल्पसंख्यकों को कमतर आंकना सरकार की गलती है क्योंकि वे किसी से भी दोयम नहीं हैं। उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत उचित वातावरण की है। मैं एक ऐसी लड़की को जानता हूं जो जिस परीक्षा में शामिल हुई, अव्वल ही आई है। उसका पिता दिहाड़ी मजदूर है और किताबें- कपड़े शायद ही खरीद सकता है। वह लड़की अपने दोस्त से किताबें मांग कर लाती, रात में स्ट्रीट लाइट की रोशनी में पढ़ती और अपने दोस्त के जगने से पहले उसे उसकी किताब लौटा देती। वह घर के कामकाज में अपनी मां की भी मदद करती। जब यह लड़की सिविल सेवा की परीक्षा में सर्वप्रथम आई तो सभी उससे अपनी दोस्ती के दावे करने लगे। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने धर्म पर आधारित आरक्षण को संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर धब्बा और इससे अपरोक्षत: योग्यता पर आंच आने की बात कही है। निश्चित रूप से किसी भी व्यक्ति के लिए आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता कड़ी मेहनत है। जाति, लालच और सिफारिश, आरक्षण या धर्म की आड़ लेकर यह नहीं हो सकता। होरस ने सदियों पहले बिल्कुल सही कहा था, ‘मनुष्य की जिंदगी बिना कड़ी मेहनत के कुछ भी नहीं देती।’
(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं)(rashtriya sahara me 8jun12 ko prakashit)

Tuesday, May 22, 2012

काले धन पर श्वेत पत्र

काले धन पर पर्दा

केंद्र सरकार को पता नहीं है कि देश में कितना काला धन है। काले धन पर सरकार का बहु प्रतीक्षित श्वेत पत्र सूचनाओं, रणनीतियों और साहस में खोखला निकला है। ज्यादा छिपाने और कम बताने वाले इस श्वेत पत्र में वित्त मंत्रालय ने देश में काले धन के जो अंदाज दिए भी हैं वह आंकड़े आठवें दशक के हैं। जबकि तब से देश की अर्थव्यवस्था का आकार काफी बढ़ चुका है। यह पुराने आंकड़े भी सरकार के अपने नहीं बल्कि स्वतंत्र विशेषज्ञों के हैं।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा में सोमवार को काले धन पर श्वेत पत्र पेश किया। श्वेत पत्र सरकार की तरफ से किसी विशेष मुद्दे पर आधिकारिक तौर पर जारी किया गया नीतिगत पत्र होता है। इसे सरकार स्वेच्छा से भी जारी करती है। कभी-कभी किसी मुद्दे पर अस्पष्टता की स्थिति में सांसदों की मांग को ध्यान में रखते हुए जारी किया जाता है। इसका उद्देश्य सरकार की नीतियों को जनता के सामने लाना और उस मसले की स्थिति को पेश करना होता है। पिछला श्वेत पत्र पूर्व केंद्रीय रेलमंत्री ममता बनर्जी बतौर रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के पांच वर्षो के कार्यकाल के दौरान वित्तीय हालात को स्पष्ट करने के लिए लाई थीं।
काले धन पर पेश इस श्वेत पत्र में सरकार ने जो जानकारियां उपलब्ध कराई हैं वो कई तथ्य उपलब्ध कराने की सरकार की नीयत पर ही सवाल खड़े कर रही है। सरकार ने लोकपाल और लोकायुक्त का गठन कर काले धन की समस्या से निपटने का जो भरोसा दिया उसकी कलई भी सोमवार को संसद में खुल गई। श्वेत पत्र आने के चार-पांच घंटे के भीतर ही सरकार ने लोकपाल कानून को संसद की प्रवर समिति के पास भेज कर इसे लंबे समय के लिए टाल दिया है।
विदेश में जमा काली कमाई के जो आंकड़े सरकार ने श्वेत पत्र में दिखाए हैं उससे ज्यादा जानकारी तो अंतरराष्ट्रीय रिसर्च एजेंसियों के पास उपलब्ध है। श्वेत पत्र के इस आंकड़े पर भरोसा करना मुश्किल होगा कि 2010 में विदेशी बैंकों खासतौर पर स्विस बैंकों में भारतीयों के सिर्फ 9295 करोड़ रुपये ही जमा है। सरकार कह रही है कि यह राशि 2006 में 23,373 करोड़ रुपये थी यानी कि टैक्स हैवेन को भारत से पैसा भेजने में कमी आई है?
भारत से टैक्स हैवेन जाने वाले पैसे के मामले यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष [आइएमएफ] और ग्लोबल इंटीग्रिटी फाउंडेशन [जीआइएफ] के सर्वविदित आंकडे़ दोहराती है। इस मामले में भी सरकार ने अपनी तरफ से कोई जानकारी जुटाने की कोशिश नहीं की है। इन आंकड़ों के मुताबिक 2001 में 88 अरब डालर की काली कमाई देश से बाहर गई। सरकार ने माना है कि दोहरे कर से बचने वाली संधियां ही काले धन के सृजन का मुख्य स्त्रोत बन रहीं हैं।
बताया कम छिपाया ज्यादा:-
-विदेशी बैंकों में खाता रखने वालों का नाम नदारद
-काले धन पर आठवें दशक के एनआइपीएफपी रिपोर्ट का ब्योरा
-काले धन का सृजन रोकने वाले कानूनों का उल्लेख
-रीयल एस्टेट, सार्वजनिक खरीद, वित्तीय बाजार और बुलियन काला धन सृजन के प्रमुख स्त्रोत
छद्म नामों से हो रहा देश में निवेश
सरकार के श्वेत पत्र ने देश में होने वाले विदेशी निवेश की भी कलई खोल दी है। सरकार ने एक तरह से स्वीकार कर लिया है कि दोहरे कराधान से बचने के लिए किए जाने वाले समझौते [डीटीएए] की आड़ में भारत में काला धन निवेश किया जा रहा है। इस समझौते का ही असर है कि पिछले 12 वर्षो में भारत में होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश [एफडीआइ] का बड़ा हिस्सा सिंगापुर और मॉरीशस के जरिये आ रहा है। सरकार को इस बात की आशंका है कि भारतीय ही इन देशों के रास्ते काला धन एफडीआइ के रुप में देश में भेज रहे हैं।
श्वेत पत्र डीटीएए को लेकर सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े करता है। खासतौर पर जब सरकार यह समझती है कि डीटीएए की खामियों को दूर करने में गार [कर चोरी रोकने के सामान्य नियम] काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं फिर उसे क्यों लंबित किया जा रहा है? वित्त मंत्री ने वित्त विधेयक 2012-13 में इसे प्रस्तावित किया था लेकिन बाद में हटा दिया था। यह श्वेत पत्र इस तथ्य को भी सामने लाता है कि कर चोरी और काले धन के संबंध में विदेश से सूचनाएं तो खूब आ रही हैं लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई करने को लेकर सरकार सुस्ती दिखा रही है। यह भी स्पष्ट है कि देश की जनता भारत में अर्जित धन को विदेश में छिपाने वाले लोगों के नाम कभी नहीं जान सकेगी। विदेशी सरकारों के साथ होने वाले समझौते की वजह से सरकार ऐसा नहीं कर सकेगी।
श्वेत पत्र के मुताबिक अप्रैल, 2000 से मार्च, 2011 के बीच भारत ने जितना एफडीआइ आकर्षित किया उसका 51 फीसद से ज्यादा हिस्सा मॉरीशस और सिंगापुर में पंजीकृत कंपनियों ने किया। इन दोनों देशों के साथ भारत का पुराना समझौता है जो दोहरे कराधान की समस्या से कंपनियों को राहत देता है। सरकार को अंदेशा है कि भारत में काली कमाई की जाती है और उसे किसी न किसी तरीके से इन देशों के रास्ते फिर भारत में लगाकर 'सफेद' कर लिया जाता है। इस बारे में बाहरी एजेंसियां तो काफी कुछ कह चुकी हैं। यह पहला मौका है जब सरकार इसे स्वीकार कर रही है। सरकार ने कहा है कि इस खामी को दूर करने के लिए इन दोनों देशों के साथ नए सिरे से डीटीएए करने की तैयारी है।सबसे ज्यादा काली कमाई कंपनियों ने बनाई
देश में कितना काला धन छिपा है, इसका आकलन सरकार तो सही-सही अभी तक नहीं लगा पाई है लेकिन उसने जो आंकड़े दिए हैं उससे स्पष्ट है कि यह आम अनुमान से काफी ज्यादा है। सिर्फ पिछले पांच वर्षो में ही आयकर विभाग की विभिन्न एजेंसियों ने देश-विदेश में मोटे तौर पर दो लाख करोड़ रुपये के काले धन का पता लगाया है। विदेशों में कारोबार फैला रहा भारतीय कारपोरेट उद्योग हो या देश के छोटे व्यापारी या आम कर दाता, काला धन बनाने में सब एक से बढ़ कर एक हैं।
काले धन पर सरकार की तरफ से पेश श्वेत पत्र में पहली बार आयकर विभाग के छापों और इसमें उजागर होने वाले धन के बारे में विस्तार से जानकारी उपलब्ध कराई गई है। अमूमन ये आंकड़े पिछले छह वित्त वर्षो के हैं, जो अपने आप ही बता रहे हैं कि काले धन की समस्या कितनी विकराल हो गई है। मसलन, आयकर विभाग कानून के तहत मारे जाने वाले छापों में पकड़े जाने वाली राशि इन वर्षो में तीन गुनी हो चुकी है। 2006-07 में 3612.89 करोड़ के काले धन का पता चला था जबकि 2011-12 में आंकड़ा 9289.43 करोड़ रुपये का हो गया।
छोटी व मझोली औद्योगिक इकाइयां भी पीछे नहीं। गत छह वर्षो में इनके बीच किये गये सर्वे से 26,579 करोड़ के काले धन का पता चला है। रिपोर्ट से यह भी साफ होता है कि कारपोरेट सेक्टर में भी काले धन के मामले काफी तेजी से बढ़े हैं। चाहे विदेशों में कारोबार फैला रही देशी कंपनियां हो या भारत में कार्यरत विदेशी कंपनियां, सही तरीके से कर अदा करने में इन सब की भूमिका संदेहास्पद है। अंतरराष्ट्रीय कराधान निदेशालय को इनसे सही आय व कर वसूलने में नाकों चने चबाना पड़ता है। पिछले एक दशक के दौरान उन भारतीय कंपनियों के एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर वसूला गया जो सही सूचना नहीं दे रही थी।
श्वेत पत्र के मुताबिक, गत दो वर्षो के दौरान भारतीय कंपनियों ने विदेशी सहयोगी कंपनियों की मिलीभगत से 67,768 करोड़ का कर बचाने की कोशिश की है। यह पूरा खेल ट्रांसफर प्राइसिंग है जिसमें ये कंपनियां एक उत्पाद या सेवा का भारत में तो कुछ और मूल्य दिखाती हैं लेकिन विदेशों में ज्यादा राजस्व प्राप्त करती हैं।
आयकर विभाग के छापे में जब्त धन
09-10-301--132.2----8101
10-11-440--184.15--10,649
11-12-499--271------9289