Friday, June 8, 2012

कोटा नहीं, काबिलियत को दें मौका

जोगिन्दर सिंह
गांधी जी ने अपनी किताब ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखा है, ‘सरकारी महकमों में जहां तक कोटे की बात है, अगर हमने उसमें सांप्रदायिक भावना का समावेश किया तो यह एक अच्छी सरकार के लिए घातक हो गा लेकिन मतदाताओं को लुभाने की चाल के चलते अब जातिवाद और धर्म आधारित राजनीति, अपवाद के बजाय कायदा हो गई है। गुर्ज र और जाटों के आरक्षण के लिए हालिया आंदोलन इसके साक्ष्य हैं
राजनीतिकों की सार्वजनिक और आधिकारिक याददाश्त बहुत छोटी होती है। वह किसी भी तरह हुकूमत में बने रहने या इसे पाने के लिए हरेक तरह के वादे करते हैं। दरअसल, नौबत यहां तक आ पहुंची है कि जनता को देने से कोई चीज नहीं छूटी। अब तो राजनीतिक दल अपने मतदाताओं को लैपटॉप, मिक्सी, आटा, दाल, नि:शुल्क शिक्षा, अवास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन, वरिष्ठ नागरिकों को पेंशन, कन्या के विवाह पर नकदी सहायता और खाली बैठों को दान और कम दाम पर उपहार तक दे डाल रहे हैं। भारतीय संविधान निस्वार्थी नेताओं द्वारा बनाया गया था, उन लोगों को तब इसका अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि एक ऐसी स्थिति आएगी जब सरकारी नौकरियों में 50 फीसद आरक्षण जाति और धर्म के आधार पर दे दिया जाएगा। उपरोक्त प्रावधान वाली ये योजनाएं देश की मेधा को मटियामेट कर दे रही हैं। उदाहरण के लिए सर्वशिक्षा अभियान को लें, सरकार ने इसके तहत आवश्यक बना दिया है कि बोर्ड परीक्षा तक किसी भी छात्र-छात्रा को फेल न किया जाए। चाहे वे कक्षा में आएं या न आएं। किसी सबूत की जरूरत हो तो केंद्रीय विधि मंत्री द्वारा 2012 में विधानसभा चुनावों के पहले अल्पसंख्यकों के लिए नौ फीसद कोटे की घोषणा को देखना चाहिए। सलमान खुर्शीद ने उत्तर प्रदेश में ऐलान किया था कि उनकी पार्टी यहां की सत्ता में लौटी तो अल्पसंख्यकों को नौ फीसद आरक्षण दिया जाएगा। उन्होंने इसे सीधे- सीधे मुसलमानों के लिए कोटा कहने के बजाए अल्पसंख्यकों के लिए बताया। यह जाना-माना तथ्य है कि केवल अल्पसंख्यक किसी भी पार्टी का भाग्य बदल सकते हैं और उनमें सबसे ज्यादा मुसलमान। इसलिए सभी पार्टियां मुसलमानों को चांद दिलाने के वादे के साथ एक दूसरे से होड़ करती रहती हैं, संविधान या कानून चाहे भाड़ में जाएं। निर्वाचन आयोग ने तब विधि मंत्री की इस घोषणा को सांप्रदायिकता के आधार पर मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास मानते हुए इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना। गौरतलब है कि आचार संहिता कानून नहीं है, यह सर्वदलीय सर्वसम्मति है। लिहाजा, इस बाबत चेतावनी देने या प्रतिबंधित करने के अलावा कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती है। हमारे संविधान का अनुच्छेद-16 सभी को समान अधिकार देता है। यहां तक कि संविधान के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर भी सदा के लिए आरक्षण जारी रखने के पक्ष में नहीं थे। अगस्त, 1949 में अनुसूचित जाति के लिए 10 साल तक आरक्षण जारी रखने के विधेयक का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा था, ‘अनुसूचित जनजातियों के लिए तो मैं बहुत लंबे समय तक यह सुविधा देने के लिए तैयार हूं लेकिन अनुसूचित जाति या जनजाति के आरक्षण पर अपने विचार रखने वाले सभी वक्ताओं ने बहुत सावधान हो कर कहा है कि इस व्यवस्था को 10 साल बाद खत्म हो जाना चाहिए।’ न केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू बल्कि डॉ. अंबेडकर समेत दलित हितों की राजनीति करने वाले अन्य नेताओं ने भी उनके (अंबेडकर) जीवन के अंतिम काल के कुछ ही पहले कहा था कि आरक्षण को 1960-61 के बाद तक जारी नहीं रखना चाहिए। उनका विास था, ‘आरक्षण की नीति कुछेक अपवादों को छोड़ कर पिछड़ापन, अकुशलता और आत्मविास के अभाव को बढ़ावा देगी।’
गांधी जी ने अपनी किताब ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखा है, ‘सरकारी महकमों में जहां तक कोटे की बात है, अगर हमने उसमें सांप्रदायिक भावना का समावेश किया तो यह एक अच्छी सरकार के लिए घातक होगा। मैं समझता हूं कि सक्षम प्रशासन के लिए, उसे आवश्यक रूप से हमेशा योग्य हाथों में होना चाहिए। निश्चित ही वहां भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।’..‘पदों का वितरण हरेक समुदाय के सदस्यों के अनुपात में नहीं होना चाहिए। जो सरकारी सेवाओं में जवाबदेही के पदों को पाने की लालसा रखते हैं, वे इसके लिए जरूरी परीक्षा पास करने पर ही उन पर काबिज हो सकते हैं।’
पंडित नेहरू ने 27 जून 1961 को मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में कहा था, ‘ऊपर मैंने सक्षमता का उल्लेख किया है और लीक पीटने की हमारी परंपरा से बाहर आने का जिक्र किया है। हमें आरक्षण की पुरानी आदत और इस जाति या उस समूह को दी गई खास तरह की रियायतों से बाहर आने की आवश्यकता है। यह सच है कि अनुसूचित जाति/जनजाति को मदद करने के प्रसंग में हम कुछ नियम-कायदों और बाध्यताओं से बंधे हैं। वह मदद के पात्र हैं लेकिन इसके बावजूद मैं किसी भी तरह के कोटे के खिलाफ हूं, खासकर सरकारी सेवाओं में। मैं किसी भी तरह की अक्षमता और दोयम दज्रेपन के सर्वथा विरुद्ध हूं। मैं चाहता हूं कि मेरा देश हरेक क्षेत्र में अव्वल देश बने। जिस घड़ी हम दोयम दज्रे को बढ़ावा देगें, हम मोर्चा हार जाएंगे।’
मतदाताओं को लुभाने की चाल के चलते अब जातिवाद और धर्म आधारित राजनीति, अपवाद के बजाय कायदा हो गई है। गुर्जर और जाटों के आरक्षण के लिए हालिया आंदोलन इसके साक्ष्य हैं। सही ही कहा गया है कि जो इतिहास से सबक लेना चाहते हैं कि वे उसके दोहराव के निंदक होते हैं। जातिवाद को बढ़ावा देना और सरकारी नौकरियों में धर्म आधारित आरक्षण देश को विखंडित करने की दिशा में बड़ा कदम है। मैं अल्पसंख्यक समेत समाज के सभी वगरे के निर्धनतमों के जीवनस्तर सुधार के विरुद्ध नहीं हूं। लेकिन जब केक का आकार छोटा हो तो कब तक हम एक दूसरे पर झपटते रहेंगे। अल्पसंख्यकों की काबिलियत बढ़ाने के लिए सकारात्मक कार्यक्रम की जरूरत है ताकि वे शिक्षा और नौकरी में सवरेत्तम के साथ अपनी बराबरी कर सकें। जैसे कि कश्मीर के मुस्लिम युवक ने बिना किसी सिफारिश या कोटे के 1960 के दशक में भारतीय प्रशासनिक सेवा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। भारत के अल्पसंख्यकों को कमतर आंकना सरकार की गलती है क्योंकि वे किसी से भी दोयम नहीं हैं। उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत उचित वातावरण की है। मैं एक ऐसी लड़की को जानता हूं जो जिस परीक्षा में शामिल हुई, अव्वल ही आई है। उसका पिता दिहाड़ी मजदूर है और किताबें- कपड़े शायद ही खरीद सकता है। वह लड़की अपने दोस्त से किताबें मांग कर लाती, रात में स्ट्रीट लाइट की रोशनी में पढ़ती और अपने दोस्त के जगने से पहले उसे उसकी किताब लौटा देती। वह घर के कामकाज में अपनी मां की भी मदद करती। जब यह लड़की सिविल सेवा की परीक्षा में सर्वप्रथम आई तो सभी उससे अपनी दोस्ती के दावे करने लगे। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने धर्म पर आधारित आरक्षण को संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर धब्बा और इससे अपरोक्षत: योग्यता पर आंच आने की बात कही है। निश्चित रूप से किसी भी व्यक्ति के लिए आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता कड़ी मेहनत है। जाति, लालच और सिफारिश, आरक्षण या धर्म की आड़ लेकर यह नहीं हो सकता। होरस ने सदियों पहले बिल्कुल सही कहा था, ‘मनुष्य की जिंदगी बिना कड़ी मेहनत के कुछ भी नहीं देती।’
(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं)(rashtriya sahara me 8jun12 ko prakashit)

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