Sunday, June 17, 2012

जीवन की कठोरता


जीवन की इस कठोरता में
कुरूपता में
गरीबी में
सिर्फ “सपनें” ही
अपने लगतें है
सुहाने लगतें है
जीवन “जीवन “नजर आता है
सपनों में ही
रोटी ,कपड़ा और मकान
मिल पाता है
क्योकिं वास्तविक जीवन
में तो संभव नहीं है
ये सब कुछ
सपनों में ही
इंसान “इंसान “ नजर आता है
क्योकि वास्तविक जीवन में तो
इंसान “हैवान “ नजर आता है
सपनों में ही तृप्ति मिलती है
पेट की आग से ,भूख से
क्योकि वास्तविक जीवन में तो
भूख से लड़ना
ही नियति बन गयी है
सपनों में ही
अपने “अपने “ नजर आते है
वैसे तो ये पराये नजर आतें है
इन सपनों को देखकर
लगता है कि
जी लू सिर्फ
अपनें सपनों के साथ
क्योंकि वास्तविक जीवन में तो
जिंदगी “जिंदगी “नहीं लगती 

स्वरचित -शशांक द्विवेदी 

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