Monday, December 17, 2012

अस्तित्व से जूझता आदमी



कभी कभी अपने अस्तित्व
से जूझता है आदमी ,
वो खुद से ही लड़ता है ,
खुद के ही सवालों में रहता है ,
और कई बार हारता है अपने आप से
कई बार गिरता है ,
अपनी ही नजरों के सामनें ,
उसका अंतर्मन कचोटता है ,
धिक्कारता है ,कई बार
वो कटघरे में खड़ा होता है
खुद के ,
लेकिन निकल नहीं पाता
इस परिस्थिति से
कई बार जानबूझकर कर
और कई बार मजबूरी में भी ,
इस दौरान
उसका अंतर्मन कई मौके देता है
बाहर निकलने के लिए ,
खुद से लड़ने के जज्बे के लिए ,
लेकिन फिर भी वो गिरा ही रहता है
अपनी नजरों के सामनें .
कब उठेगा वो
शायद वो खुद भी नहीं जनता !!

शशांक द्विवेदी

Sunday, December 9, 2012

दलित चिंतकों का पाखंड

हमारे देश में आजकल कुछ तथाकथित दलित चिंतक हो गए है जिनका दलितों से कोई सारोकार नहीं है ..वास्तव में ये दलित चिन्तक शब्द ही सबसे बड़ा छलावा है दलितों के साथ ...आप देख लीजिए ना देश के एक प्रमुख तथाकथित दलित चिन्तक दिलीप मंडल जी इंडिया टूडे में बैठकर सेक्स सर्वे छाप रहें है ....उसका कवर पेज ऐसा है कि वो खुद भी या कोई भी अपने घर में माँ ,बहनों को नहीं दिखा सकता ...ये उपलब्धि है इन दलित चिंतकों की ..प
हले कारपोरेट मीडिया को गाली देते थे अब उसी की गोद में बैठकर सेक्स सर्वे करा रहें है ...वाह रे वाह ...ये है इस देश के दलित चिन्तक ....ये क्या दिशा देंगे दलितों को जो ए सी आफिस में बैठकर सेक्स सर्वे "उभार की सनक "और छोटे शहर बने देश के काम क्षेत्र " छाप रहें है ...इन लोगों की रूचि अब सिर्फ" काम" रह गई है ..अब इन्हें दलितों के कामों से कोई मतलब नहीं है ...वो तो बस मन बहलाने और बेवकूफ बनाने के लिए है ...

Sunday, December 2, 2012

“बाजारू मर्द “ क्यों नहीं ..

कल जनसंदेश टाइम्स में एड्स के इलाज से सम्बंधित प्रकाशित मेरे लेख पर यू पी के कई जिलों (बनारस ,आजमगढ़,गोरखपुर,लखनऊ ..इत्यादि )से मेरे पास फोन आये ..आजमगढ़ से एक व्यक्ति ने फोन पर कहा कि मैंने एक "बाजारू औरत " से मैंने सम्बंध बनाये , ........कुछ और भी बातें ...इस फोन के बाद एक शब्द मेरे दिमाग में तैरता रहा "बाजारू औरत "..मैंने सोचा कि औरत को ही बाजारू क्यों कहा जाता है ..क्या आपने कभी “बाजारू मर्द “ स
ुना है ?क्या वो आदमी बाजारू नहीं था ?जबकि मेरा मानना है कि अधिकांशतया मर्द ही बाजारू होता है ..हममें से अधिकतर लोग लड़कियों,औरतों को देखकर लार टपकाते रहते है और थोड़ा भी मौका मिलने पर उनके साथ कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते है..उस समय उनकी सभी चारित्रिक नैतिकता ताक पर होती है . 80 प्रतिशत लड़के /आदमी ही फ्लर्ट या पहल करते है फिर भी बाजारू औरत ही होती है ..मर्द नहीं ,यही हम सब का असली चेहरा है जिसे हम ढके रखना चाहते है .. क्या ये बात सही नहीं है ?..

Friday, October 19, 2012

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा लेख - इंजीनियरिंग से मोहभंग

आज के दैनिक जागरण (सभी संस्करण ) के संपादकीय पेज पर
प्रकाशित मेरा विशेष लेख 

इंजीनियरिंग से मोहभंग 9770936


बाबा जी को भावभीनी श्रधांजली.....

आज मेरे बाबा जी (दादा जी ) स्वर्गीय श्री गोरेलाल द्विवेदी की पुण्यतिथि है ,मै आज जो कुछ भी सिर्फ उनकी वजह से हू ,मेरी वैचारिक प्रतिभा ,लेखन ,सफलता ,जीवन मूल्यों को समझने की द्रष्टि सब कुछ उन्ही का दिया हुआ है (हमेशा लगता है  कि वो नहीं होते तो मै जिंदगी में कुछ नहीं कर पाता)..मेरे जीवन का हर हिस्सा उनके बगैर अधूरा है . वो एक बात कहते थे बबलू बड़ा आदमी  नहीं बनना है सिर्फ आदमी बनना है ,इंसान बनना है (यही उनके जीवन मूल्य थे ).एक सामान्य गांव /कसबे में और बहुत ज्यादा पढ़े लिखे न होकर भी बचपन से उन्होंने मुझे बनाया ,खड़ा किया ,विचार दिए,जीवन मूल्य दिए ,दिन में भी सपने देखना सिखाया . उस समय मेरे परिवार में  शिक्षा /लेखन /साहित्य का कोई माहौल नहीं था जबकि मुझे बचपन से ही लिखने और बोलने से बहुत लगाव था.इसको जानकार उन्होंने मुझे हर कदम पर प्रोत्साहित किया . इंजीनियरिंग करने के बाद मैंने घर पर कहा कि मै पत्रकार बनना चाहता हूँ .घर में सब लोगों ने विरोध किया लेकिन मेरे बाबा मेरे साथ थे बोले जो दिल कहे वही करो (उस  समय अमर उजाला और टेक्नीकल टूडे पत्रिका  से जुड़ा था ).उन्होंने मुझे सपने देखना और उनको जीना सिखाया . जीवन की विषम परिस्तिथियों में भी धैर्य रखना और हँसना सिखाया . मुझे इस बात का बहुत ज्यादा दुःख है कि वो बहुत जल्दी हमें छोड़ कर चले गए ,जब मैंने वास्तव में लिखना/बोलना शुरू किया तो वो उसे देख नहीं पाए . उन्होंने मुझे जो कुछ दिया है उसका ऋण मै इस जन्म तो क्या कई जन्मो तक नहीं चुका पाउँगा .आज वो मेरे पास नहीं है लेकिन उनका एहसास हर समय मेरे पास है .ऐसी महान विभूति को जिसने मरा जीवन सुन्दर बनाया ,को मेरी तरफ से भावभीनी और विनम्र श्रधांजली....

उनको समर्पित यह कविता 


बाबाकहते थे 

बाबा ने बड़ा किया
बाबा ने ही खड़ा किया
बाबा ने ही विचार दिए
बाबा ने ही जीवन दृष्टी दी
बाबाकहते थे  ‘बबलू
बड़ा आदमी नहीं बनना है
सिर्फ साधारण आदमी बनना है
जो दूसरों के काम आयें
ऐसा आदमी बनना है
जो पाया है ,उससे ज्यादा
देना है परिवार को
समाज को और इस देश को
उनको हमेशा रिश्ते
सहेजते देखा है
रिश्तों को रिश्ता
समझते देखा है
दूसरों के लिए सर्वस्व
अर्पित करते हुए भी देखा है
अहिंसा ,दया और सहनशक्ति
के साथ जीते देखा है
जिंदगी के हर पहलू में
हमेशा इन्ही को
आजमाते देखा है
कहते थे बबलू सपने देखों
सपने ही सच होते है
आगे बढ़ो ,रुको नहीं
ईश्वर सदा साथ है आदमी के
ऐसा ही विश्वास करते देखा है
कहते थे बबलू
सहारे न लो
सिर्फ सहारा बनों
ग़मों के सायों में
दुखों के भूचाल
में भी उन्हें
सदा मुस्कराते देखा है
सिर्फ रिश्तों के लिए
परिवार के लिए
उनको रोते देखा है
पुराने जमाने में भी
उन्हें आधुनिक होते हुए देखा है
परम्परा के साथ नयें विचारों
के संगम को देखा है
गृहस्थ के रूप में भी
संत को देखा है .

स्वरचित शशांक द्विवेदी