Monday, December 17, 2012

अस्तित्व के लिए



आदमी गिरता है
कई बार ,
टूटता है कई बार
पर संभल नहीं पाता
या संभालना ही नहीं चाहता
वो जानता है कि यहाँ
दलदल है
वो मानता है कि
रास्ता गलत है
लेकिन फिर भी
आदमी चलता है
उसी रास्ते पर
क्योंकि
सही रास्ते ने
उसे कुछ नहीं दिया
ईमानदारी ने उसे
दी है सिर्फ
‘ठोकरें’
जिंदगी की ,समाज की ,परिवार की ,
ये ठोकरें
उसे लगती है दिल में ,
कभी कभी ये ठोकरें
चुनौती देती है
“अस्तित्व” को 
तब वह सोचता है
रास्ता बदलनें की
जीवन को बदलनें की
तब वह जिंदगी के रास्ते  बदलता है
जिंदगी के आयाम बदलता है
अच्छाई से बुराई पर चलता है
सच से झूठ को पकड़ता है
ईमानदार से बेईमान बनता है
सही से गलत होता है
ये सब वो करता है
अपने जीवन को बचाने के लिए
अपने अस्तित्व को बचाने के लिए

 शशांक द्विवेदी

सुरक्षाचक्र



कुछ करने से पहले
आदमी चाहता है
एक “सुरक्षाचक्र”,
जो उसे सुरक्षित करे
आर्थिक और सामाजिक रूप से ,
“सुरक्षाचक्र” के कवच
के बाद ही
वह कुछ सार्थक करना
चाहता है समाज के लिए
देश के लिए
जब उसका पेट भरा है
तभी वह निकलता है
घर से भूखों के लिए
आंदोलन के लिए
अनशन के लिए ,
वो सही है या गलत
इसका फैसला चाहे जो करे
चाहे जैसे करे ,
लेकिन सच तो यह है कि
आज भूखे पेट
कोई भी आंदोलन नहीं होता
कोई भी लेखन नहीं होता !!

शशांक द्विवेदी

आदमी पाना चाहता है !!



आदमी हमेशा 
वो क्यों पाना चाहता है
जो उसने दिया ही नहीं ,
आदमी सम्मान चाहता है ,
प्यार चाहता है
अपने बच्चों से
लेकिन
उसने तो कभी
प्यार दिया ही नहीं बच्चों को
अपनेपन का एहसास
कराया ही नहीं
इस खोखली और आभासी दुनियाँ में
उन्हें छोड़ दिया
“मशीनों के हवाले “
और सिर्फ
“मशीनों के सहारे “
उन्हें सब कुछ दिया
लेकिन ‘वक्त’ नहीं दिया
अब जब तुमने ही
‘वक्त ‘ नहीं दिया
तो बच्चे  तुम्हे
‘ वक्त ‘ कैसे देंगे ,
शायद हम भूल गए
प्रकृति का ये सिद्धांत
जो हम दूसरों को देते है
वही हमें मिलता है ...

शशांक द्विवेदी

अस्तित्व से जूझता आदमी



कभी कभी अपने अस्तित्व
से जूझता है आदमी ,
वो खुद से ही लड़ता है ,
खुद के ही सवालों में रहता है ,
और कई बार हारता है अपने आप से
कई बार गिरता है ,
अपनी ही नजरों के सामनें ,
उसका अंतर्मन कचोटता है ,
धिक्कारता है ,कई बार
वो कटघरे में खड़ा होता है
खुद के ,
लेकिन निकल नहीं पाता
इस परिस्थिति से
कई बार जानबूझकर कर
और कई बार मजबूरी में भी ,
इस दौरान
उसका अंतर्मन कई मौके देता है
बाहर निकलने के लिए ,
खुद से लड़ने के जज्बे के लिए ,
लेकिन फिर भी वो गिरा ही रहता है
अपनी नजरों के सामनें .
कब उठेगा वो
शायद वो खुद भी नहीं जनता !!

शशांक द्विवेदी