किसी ने अपनी मनोविज्ञान की किताब में लिखा है की हर आदमी की जिंदगी में एक पत्नी आती है ,,दो प्रेमिकायें आती है और तीन औरतो से वो बाजार में पैसा देकर सबंध बनाता है ।(कहीं पढ़ा )
Monday, February 24, 2014
Wednesday, February 19, 2014
शादी की पाँचवी सालगिरह..
| शशांक -प्रियंका |
आज मेरी और प्रियंका की शादी की पाँचवी सालगिरह है .ये पाँच साल हँसते –खेलते ,लड़ते –झगड़ते ,तारीफों-शिकायतों के बीच ऐसे गुजरे की पता ही नहीं चला .सालगिरह तो पाँचवी है लेकिन प्रियंका का साथ पिछले 10 साल से है .प्रेमी से पति बनने का सफर काफी रोमांचक ,मजेदार ,चुनौतीपूर्ण ,प्रेम भरा और मस्ती भरा रहा अब सोचता हूँ कि अच्छा हुआ जो इसमें 5 साल लग गये . हमारी कहानी पूरी फ़िल्मी ही थी सोचा नहीं था कि लेखन/पत्रकारिता के शौक से ही जीवनसाथी मिलेगा ,इस तरह से प्रेम –विवाह होगा. लेकिन जो होता है अच्छे के लिए ही होता है ईश्वर के पास हमारे लिए बेहतर प्लान होता है. वास्तव में पति-पत्नी का रिश्ता बहुत ही खूबसरत होता है .एक दूसरे के सहयोग से दुनियाँ बदली जा सकती है ,कुछ भी हासिल किया जा सकता है ..
ऐसा नहीं कि मुझे चाँद चाहिए
मुझको तुम्हारे प्यार में विश्वास चाहिए
न की कभी भी ख्वाहिश मैंने सितारों की
मुझे तो बस ख्वाबों में तुम्हारा दीदार चाहिए
ईश्वर करे हमारा ये रिश्ता हमेशा यू ही मजबूत बना रहें ..आप सभी मित्रों की /बड़ों के आशीर्वाद /शुभकामनायों की आकांक्षा हमेशा बनी रहेगी ...
Tuesday, February 18, 2014
कश्मीर में भारत विरोध का स्वर
शशांक द्विवेदी
पिछले हफ्ते जम्मू -कश्मीर प्रवास के दौरान
मैंने कई हिंदू -मुस्लिम युवाओं से विभिन्न मुद्दों पर लंबी बात की ,उनसे
बात करके कई बातें ऐसी आई जो मै पहली बार सुन रहा था .एक मुस्लिम नवयुवक(काफी पढ़ा
-लिखा और ३ सरकारी नौकरी छोड़कर अब एक स्कूल का मालिक ) ने बातचीत के दौरान कहा कि
कश्मीर के अधिकांश लोग अपना अलग देश चाहते है ,भारत
और यहाँ की आर्मी के बारे में उसकी राय काफी खराब थी , भारत को हिंदू बहुल देश मानने की वजह
से उसने कहा कि इस्लामिक आधार पर
पाकिस्तान हमारे दिल के ज्यादा नजदीक है..उस युवा ने बिना किसी लागलपेट के मेरे हर
सवाल का जवाब बिना कोई झूठ बोले बहुत संजीदगी से
दिया मसलन उसने कहा कि अधिकांश कश्मीरी आर्मी से बेहद नफरत करते है और
अलगाववादी आतंकवादियों का समर्थन करते है उन्हें खाना देते है ,पनाह देते है यहाँ तक कि मरने के बाद
उनसे सहानुभूति भी जताते है ,अधिकांश
कश्मीरी हमेशा पाकिस्तान से लगाव महसूस करते हुए उसे हर जगह जीतते हुए देखना चाहते
है ,उसने खुद कहा कि खेल के मैदान में भी
हम पाकिस्तान को ही जीतते देखना चाहते है .उस युवा ने अपने दिल की हर बात बहुत
ईमानदारी से रखी ,उसने ये नहीं सोचा कि मुझे उसकी बात
अच्छी लगेगी या बुरी बल्कि उसने वही कहा जो उसे सच लग रहा था .देश के नेताओं पर उसकी पसंद के बारे
में पूछने पर उसने कहा कि अरविंद केजरीवाल उसे बहुत पसंद है .मैंने चौक्तें हुए
इसका कारण पुछा तो उसने कहा कि केजरीवाल के प्रधानमंत्री बनते ही हमारा अलग देश बन
जाएगा या हम पाकिस्तान में मिल जायेगें क्योंकि उनकी पार्टी के नेता जनमत संग्रह
का समर्थन करते है .इस बात पर मैंने उससे कहा कि ऐसा नहीं है केजरीवाल ऐसा नहीं
सोचते है और ये संभव नहीं है ,ये कभी नहीं होगा तो उसने कहा कि जरुर होगा !! उसने
कहा कि अधिकांश कश्मीरी नरेंद्र मोदी से सख्त नफरत करते है क्योंकि वो हिंदू वादी
नेता है ..नवयुवकों से बातचीत के दौरान मुझे जम्मू –कश्मीर में हिंदू –मुस्लिम खाई
साफ़ तौर पर नजर आई जम्मू का लगभग हर हिंदू नरेंद्र मोदी के पक्ष में लामबंद दिख
वहीं मुस्लिम इसके जबर्दस्त विरोध में दिखे ...
खैर बातचीत के दौरान जिसने जो भी कहा लेकिन
सबने हम जैसे टूरिस्ट को भगवान कहा ,सब लोगों ने कहा कि आप लोगों की वजह से ही हम
जिंदा है ..लगभग सभी लोगों ने तहेदिल से मेरा स्वागत किया ,अच्छे से बात की
,सम्मान किया ,यात्रा के दौरान खूब मदत की ...लेकिन जम्मू –कश्मीर यात्रा के दौरान
की गई बातचीत ने मेरे मन –मष्तिष्क में काफी गहरा असर डाला ,सोचता रहा कि क्यों
कश्मीर के लोग आज भी भारत को अपना नहीं पाए ,क्यों आज तक भारत को अपना देश नहीं
मान पायें ...
वर्जिनिटी का मुकुट
मनीषा पांडे
अगर मुझे अपने
परिवेश से इस बात के लिए भयानक गुस्सा है कि बचपन में उन्होंने मुझे एक मूर्ख, डरपोक और वर्जिनिटी का मुकुट गर्व से भरकर अपने
माथे पर सजाने वाली लड़की की तरह पालने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो मुझे थोड़ा दुख
अपने भाइयों के लिए भी मना लेना चाहिए क्योंकि उनको भी कठोर ताड़ का पेड़, प्रेमरहित ठूंठ बनाने में इस सिस्टम ने कोई
कसर नहीं छोड़ी। मुझे सिखाने की कोशिश की कि तुमको अपने जीवन की कोई जिम्मेदारी
लेनी की जरूरत नहीं। बाप पालेंगे, बियाह
कर देंगे और उसके बाद पति जिंदगी भर पालता रहेगा। तुम्हें सोचने की क्या जरूरत
कि तुम कैसे सर्वाइव करोगी। और मेरे भाइयों के दिमाग में बचपन से ठूंस दिया गया कि
शादी के बाद बीवी-बच्चों को पालना है, बुढ़ापे
में मां-बाप को पालना है। बेचारा, जिंदगी
भर सबको पालता ही रहे। मैं कमजोर और भावुक हो सकती थी, रो सकती थी, चंचल
हो सकती थी, लेकिन बेचारे मर्दानगी से भरे भाइयों को रोना
अलाउ नहीं था। वो मर्द के पट्ठे हैं। छाती तानकर लाठी भाजेंगे, खून बहाएंगे, लड़के
के सीने में सिर छुपाकर रोएंगे थोड़े न। मुझे सिखाने की कोशिश हुई कि अच्छी, चरित्रवान लड़कियों को शादी के पहले किसी मर्द
को हथेली की सबसे छोटी उंगली का पोर भी छूने की इजाजत नहीं देनी चाहिए और भाई के
लिए नो वर्जिनिटी टैग। बेचारे भाई, खून
से खत लिखते फिरते, अपनी बहनों की वर्जिनिटी को सात तालों में, सात पर्दों में रखते और खुद बेचैन फिरते कि कोई
तो मिल जाए। भाई खुद किस करना चाहते थे और बहनों को किस से वंचित रखना चाहते थे।
अब कैसे करेंगे किस क्योंकि तुम्हारी बहन पर निगाह टिकाए आदमी ने भी तो अपनी बहन
को बंद कर रखा है। कैसा दुखद कुचक्र है। बहनें किस कर नहीं पाती थीं और भाइयों को
किस करने के लिए कोई मिलती नहीं थी। वर्जिन तो रह गए दोनों ही।
नॉउ कुकिंग इज सच ए फन, बेचारे भाई जानते ही नहीं। किसी को प्यार करना, उसके लिए अपने हाथों से कुछ बनाना कितने मजे की बात है। दिल भीग-भीग जाता है प्यार से। लेकिन भाइयों को क्या मालूम, उन्हें तो सिर्फ ऑर्डर लगाना सिखाया गया। बच्चे की नैपी चेंज करना भी फन है। मुझे तो मजा आता है। "ओ लिटिल मंकी, ज्यादा कूदो मत। इतना हिलोगी तो नैपी कैसे बदलूंगी। यार प्लीज, मुझे मजा आ रहा है क्या तुम्हारी गीली नैपी बदलने में। दो मिनट, हिलना बंद करो। अरे वाह, हो गया। अब फिर सूसू कर देना दस मिनट में।" भाई लोग ऐसे प्यार में भीगे-नहाए नन्ही परी से बात करते हुए उसकी नैपी नहीं चेंज करते। ठूंठ हो गए हैं सब, मर्दानगी में। बेचारे, जानते ही नहीं कि उनकी परवरिश ने उन्हें किन नाचुक चीजों से वंचित कर दिया। सबके सिर पर बहन-बीवी की इज्जत बचाने का बोझ लदा हुआ है। अब बहन-बीवी खुद की इतनी सक्षम हो तो उनका बोझ कम होगा। लेकिन नहीं, लादे रहो अपने सिर पर। अपनी पत्नियों-प्रेमिकाओं के साथ बिस्तर पर ऐसे अहंकारी गुंडे। अपना काम किया, कट लिए। उफ, लड़कियां थोड़ा उनके लिए भी दुख मनाएं क्योंकि बिलीव मी, दे आर डिप्राइव्ड ऑफ द जॉय ऑफ रीअल लव मेकिंग। बेचारे बहुत-बहुत वंचित हैं। नहीं जानते, सचमुच प्यार क्या होता है।
इस समाज के पुरुष भी बहुत वंचित हैं। प्यार से वंचित हैं, घर के कामों में शेयरिंग के सुख से वंचित हैं, स्त्री की दोस्ती से वंचित हैं, बच्चे का टिफिन तैयार करने के सुख से वंचित हैं।
चलो, थोड़ा दुख उनके लिए भी मनाएं।
नॉउ कुकिंग इज सच ए फन, बेचारे भाई जानते ही नहीं। किसी को प्यार करना, उसके लिए अपने हाथों से कुछ बनाना कितने मजे की बात है। दिल भीग-भीग जाता है प्यार से। लेकिन भाइयों को क्या मालूम, उन्हें तो सिर्फ ऑर्डर लगाना सिखाया गया। बच्चे की नैपी चेंज करना भी फन है। मुझे तो मजा आता है। "ओ लिटिल मंकी, ज्यादा कूदो मत। इतना हिलोगी तो नैपी कैसे बदलूंगी। यार प्लीज, मुझे मजा आ रहा है क्या तुम्हारी गीली नैपी बदलने में। दो मिनट, हिलना बंद करो। अरे वाह, हो गया। अब फिर सूसू कर देना दस मिनट में।" भाई लोग ऐसे प्यार में भीगे-नहाए नन्ही परी से बात करते हुए उसकी नैपी नहीं चेंज करते। ठूंठ हो गए हैं सब, मर्दानगी में। बेचारे, जानते ही नहीं कि उनकी परवरिश ने उन्हें किन नाचुक चीजों से वंचित कर दिया। सबके सिर पर बहन-बीवी की इज्जत बचाने का बोझ लदा हुआ है। अब बहन-बीवी खुद की इतनी सक्षम हो तो उनका बोझ कम होगा। लेकिन नहीं, लादे रहो अपने सिर पर। अपनी पत्नियों-प्रेमिकाओं के साथ बिस्तर पर ऐसे अहंकारी गुंडे। अपना काम किया, कट लिए। उफ, लड़कियां थोड़ा उनके लिए भी दुख मनाएं क्योंकि बिलीव मी, दे आर डिप्राइव्ड ऑफ द जॉय ऑफ रीअल लव मेकिंग। बेचारे बहुत-बहुत वंचित हैं। नहीं जानते, सचमुच प्यार क्या होता है।
इस समाज के पुरुष भी बहुत वंचित हैं। प्यार से वंचित हैं, घर के कामों में शेयरिंग के सुख से वंचित हैं, स्त्री की दोस्ती से वंचित हैं, बच्चे का टिफिन तैयार करने के सुख से वंचित हैं।
चलो, थोड़ा दुख उनके लिए भी मनाएं।
Tuesday, January 21, 2014
मोरल फोबिया मिटाने के नाम पर
देखते-देखते हमारा समाज ग्लोबल सेक्स
इंडस्ट्री के चक्रव्यूह में जा फंसा है
प्रभु जोशी
एड्स को लगभग मृत्यु का पर्याय बताते हुए उससे बचने के लिए जिस तरह कंडोम-प्रमोशन कार्यक्रम भारत में चलाया गया, उसने भारतीय समाज में सेक्स को इतना पारदर्शी बना दिया कि यौन-उद्योग के भारत में पदार्पण की संभावनाएं खड़ी हो गईं। आज दुनिया भर में पोर्न के पंसारी फैल चुके हैं और हमारी युवा पीढ़ी में तो पोर्न क्लिप्स एक किस्म का सांस्कृतिक आदान-प्रदान बन गई हैं। यह बदलाव अचानक और अपने आप नहीं आया है। हमारे देखते-देखते विज्ञापनों में एक नया नाको-निर्मित टेलीजेनिक बाप पैदा हो गया जो अपने आधुनिक बेटे की जींस की जेब में कंडोम रखते हुए एक महान पैतृक दायित्व की पूर्णता में मुस्कुराने लगा। क्लोज शॉट में मांएं भी अपनी स्मार्ट पुत्री को सुरक्षा की सलाह देती हुई बरामद होने लगीं। युवा की छवि में जींस, गॉगल्स, मोबाइल के साथ अब कंडोम का होना भी अनिवार्य हो गया। कंडोम को काउंटर पर खरीदने में सांस्कृतिक-संकोच वाला प्रौढ़ मूर्ख सिद्ध हुआ और धड़ल्ले से बेधड़क होकर मनचाहा ब्रांड मांगने वाला युवक अग्रगामी।
कुल मिलाकर कंडोम प्रमोशन अभियान ने भारतीय परंपरागत समाज में सेक्स को इतना खुला बना दिया कि क्लासमेट सेक्समेट में बदलने लगे। युवाओं से पूछे जाने पर कि क्या वे सेक्स पर बात कर रहे हैं- 'डू यू टॉक अबाउट सेक्स'- उत्तर आया 'नो, वी डू नॉट... वी डू इट।' इस पर टेलीविजन केंद्र पर आमंत्रित युवाओं ने तालियां दीं। उनकी इन तालियों को तमाचों की तरह व्याख्यायित किया जाने लगा, जो सामाजिक निषेधों के गाल पर पड़ रहे थे। लक्ष्मण रेखा शब्द का हवाला देने वाला हवाला कांड का सा अपराधी हुआ। उसके हलक में हाथ डालकर उसकी जीभ बाहर निकालने के लिए, युवाओं में आक्रामकता भरी जाने लगी। परिवार में युवा, स्वतंत्र नहीं स्वच्छंद हुआ। वह घर का सदस्य नहीं बल्कि एक ही छत के नीचे अन्य सदस्यों के साथ रहने वाला मार्केट-फ्रेंडली इंडिविजुअल में बदल गया। उसका मोबाइल उसका टॉप उसकी जींस उसकी लिबर्टी उसकी प्रायवेसी। कुल मिलाकर निजता की मांग परिवार-विरोधी बनी।
कहना न होगा कि 'डांसिंग नेकेड इन द माइंड फील्ड' का सच अब भारतीय युवा पीढ़ी का सच है, क्योंकि कंडोम ने भारतीय सांस्कृतिक तलघर का ताला तोड़ दिया है। यह शीर्षक नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक कैरी म्युलिस की दस साल पहले आई किताब का है, जिन्होंने वायरस का परीक्षण कर पहचानने की पीसीएमआर पद्धति खोजी थी और कहा था कि एचआईवी से एड्स होना असत्यापित और गलत है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने जो प्रचारित कर दिया, वही सत्य मान लिया जाता है जबकि यह केंद्र कोई प्रयोगशाला नहीं है। एड्स के प्रकरण पर कई विश्वविख्यात वैज्ञानिकों ने अफसोस प्रकट करते हुए कहा भी कि साइंस कैन डिसीव होल वर्ल्ड ईजिली। अकादमिक स्तर पर एड्स को लेकर सैकड़ों विज्ञान-सम्मत असहमतियां प्रकट की गई लेकिन अमेरिका के औषध-व्यापार की कुटिलता ने सबको दबाकर रख दिया। जाहिर है, एड्स नियंत्रण में मुक्त यौनिक जीवन शैली को प्रश्नांकित किए बगैर केवल कंडोम प्रमोशन' कार्यक्रम पर जोर देना, एक किस्म का 'मोरली डिस्ट्रक्टिव फ्रॉड' है। हकीकत यह है कि इस मुहिम का इस्तेमाल ' सेक्सोनोमिक्स ' ( यौन अर्थव्यवस्था ) को आगे बढ़ाने में किया जारहा है , जिसकी रुचि फिलहाल सबसे ज्यादा स्त्री समलैंगिकता में है। क्रिस्टीन ल्यूकर की पुस्तक ' इंडस्ट्रियलवैजाइना - अ पॉलिटिकल इकॉनमी ' के पन्ने पलटें तो हमें इस बात का अंदाज आसानी से लगेगा कि जितनीविदेशी मुद्रा के लिए हमने अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोले , उसकी तुलना में कई गुना हम केवल सेक्स -टॉयज के उत्पादन से अर्जित कर सकते हैं। इसलिए शिकागो स्कूल के शातिर अपनी वित्त बुद्धि से भारत मेंयौनिकता के खुले खेल का मैदान तैयार कर रहे हैं। इसीलिए हमारे कई ' यौनानंदी ' चिंतक समलैंगिकता कोवरेण्य बनाने के लिए तर्कों का बारीक जाल बुना रहे हैं। वे लेस्बियनिज्म को बहनापा जैसे सम्मानजनक नाम सेपुकारते रहे हैं , ताकि एक निर्विघ्न यौन - उद्योग भारत में अपनी पकड़ बना सके।
कंडोम क्रांति ने निश्चय ही सेक्स व्यापार के लिए दरवाजा बनाया। संसद और सत्ता उसे सिंहद्वार में बदलने कीप्रतिज्ञा प्रकट कर रही है। पोर्न की सर्वांग नग्नता अब युवा पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बना दी गई है। नैतिकता अबमोरल - फोबिया जैसे नाम से अभिषिक्त होकर किसी रोग का दर्जा हासिल कर चुकी है। वे ठीक ही कहते हैं कि 'इंडियन सोसाइटी इज विक्टिम ऑफ मोरल फोबिया ' । बेशक , इस भारतीय नैतिक - व्याधि या कि इसपरंपरागत - रोग से निवृत्ति में कंडोम - प्रमोशन कार्यक्रम ने एकमात्र अचूक औषधि का काम किया है। उसकेप्रचार - प्रसार की प्रविधि और दृष्टि ने विवाह को फक - फेस्ट की तरह व्याख्यायित करना शुरू कर दिया है तोनिश्चय ही समलैंगिक - विवाह को भी वैधता मिल ही जाएगी। ' नाज ' उनके पास है , जिसके पास अमेरिकी पूंजीका परनाला है। लेकिन , ' जिन्हें नाज है हिंद पर ' वे गूंगों की जमात में शामिल हो चुके हैं। समलैंगिकता केसवाल पर उनकी घिग्घी बंध चुकी है , गले में जा फंसी जीभ को पक्षाघात हो चुका है। जिनके पास शक्ति औरसत्ता है वे अपना मकसद पूरा करने के लिए न्यायालय को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रहे हैं , उनका हाथपकड़ने वाला कोई नहीं है।
एड्स को लगभग मृत्यु का पर्याय बताते हुए उससे बचने के लिए जिस तरह कंडोम-प्रमोशन कार्यक्रम भारत में चलाया गया, उसने भारतीय समाज में सेक्स को इतना पारदर्शी बना दिया कि यौन-उद्योग के भारत में पदार्पण की संभावनाएं खड़ी हो गईं। आज दुनिया भर में पोर्न के पंसारी फैल चुके हैं और हमारी युवा पीढ़ी में तो पोर्न क्लिप्स एक किस्म का सांस्कृतिक आदान-प्रदान बन गई हैं। यह बदलाव अचानक और अपने आप नहीं आया है। हमारे देखते-देखते विज्ञापनों में एक नया नाको-निर्मित टेलीजेनिक बाप पैदा हो गया जो अपने आधुनिक बेटे की जींस की जेब में कंडोम रखते हुए एक महान पैतृक दायित्व की पूर्णता में मुस्कुराने लगा। क्लोज शॉट में मांएं भी अपनी स्मार्ट पुत्री को सुरक्षा की सलाह देती हुई बरामद होने लगीं। युवा की छवि में जींस, गॉगल्स, मोबाइल के साथ अब कंडोम का होना भी अनिवार्य हो गया। कंडोम को काउंटर पर खरीदने में सांस्कृतिक-संकोच वाला प्रौढ़ मूर्ख सिद्ध हुआ और धड़ल्ले से बेधड़क होकर मनचाहा ब्रांड मांगने वाला युवक अग्रगामी।
कुल मिलाकर कंडोम प्रमोशन अभियान ने भारतीय परंपरागत समाज में सेक्स को इतना खुला बना दिया कि क्लासमेट सेक्समेट में बदलने लगे। युवाओं से पूछे जाने पर कि क्या वे सेक्स पर बात कर रहे हैं- 'डू यू टॉक अबाउट सेक्स'- उत्तर आया 'नो, वी डू नॉट... वी डू इट।' इस पर टेलीविजन केंद्र पर आमंत्रित युवाओं ने तालियां दीं। उनकी इन तालियों को तमाचों की तरह व्याख्यायित किया जाने लगा, जो सामाजिक निषेधों के गाल पर पड़ रहे थे। लक्ष्मण रेखा शब्द का हवाला देने वाला हवाला कांड का सा अपराधी हुआ। उसके हलक में हाथ डालकर उसकी जीभ बाहर निकालने के लिए, युवाओं में आक्रामकता भरी जाने लगी। परिवार में युवा, स्वतंत्र नहीं स्वच्छंद हुआ। वह घर का सदस्य नहीं बल्कि एक ही छत के नीचे अन्य सदस्यों के साथ रहने वाला मार्केट-फ्रेंडली इंडिविजुअल में बदल गया। उसका मोबाइल उसका टॉप उसकी जींस उसकी लिबर्टी उसकी प्रायवेसी। कुल मिलाकर निजता की मांग परिवार-विरोधी बनी।
कहना न होगा कि 'डांसिंग नेकेड इन द माइंड फील्ड' का सच अब भारतीय युवा पीढ़ी का सच है, क्योंकि कंडोम ने भारतीय सांस्कृतिक तलघर का ताला तोड़ दिया है। यह शीर्षक नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक कैरी म्युलिस की दस साल पहले आई किताब का है, जिन्होंने वायरस का परीक्षण कर पहचानने की पीसीएमआर पद्धति खोजी थी और कहा था कि एचआईवी से एड्स होना असत्यापित और गलत है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने जो प्रचारित कर दिया, वही सत्य मान लिया जाता है जबकि यह केंद्र कोई प्रयोगशाला नहीं है। एड्स के प्रकरण पर कई विश्वविख्यात वैज्ञानिकों ने अफसोस प्रकट करते हुए कहा भी कि साइंस कैन डिसीव होल वर्ल्ड ईजिली। अकादमिक स्तर पर एड्स को लेकर सैकड़ों विज्ञान-सम्मत असहमतियां प्रकट की गई लेकिन अमेरिका के औषध-व्यापार की कुटिलता ने सबको दबाकर रख दिया। जाहिर है, एड्स नियंत्रण में मुक्त यौनिक जीवन शैली को प्रश्नांकित किए बगैर केवल कंडोम प्रमोशन' कार्यक्रम पर जोर देना, एक किस्म का 'मोरली डिस्ट्रक्टिव फ्रॉड' है। हकीकत यह है कि इस मुहिम का इस्तेमाल ' सेक्सोनोमिक्स ' ( यौन अर्थव्यवस्था ) को आगे बढ़ाने में किया जारहा है , जिसकी रुचि फिलहाल सबसे ज्यादा स्त्री समलैंगिकता में है। क्रिस्टीन ल्यूकर की पुस्तक ' इंडस्ट्रियलवैजाइना - अ पॉलिटिकल इकॉनमी ' के पन्ने पलटें तो हमें इस बात का अंदाज आसानी से लगेगा कि जितनीविदेशी मुद्रा के लिए हमने अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोले , उसकी तुलना में कई गुना हम केवल सेक्स -टॉयज के उत्पादन से अर्जित कर सकते हैं। इसलिए शिकागो स्कूल के शातिर अपनी वित्त बुद्धि से भारत मेंयौनिकता के खुले खेल का मैदान तैयार कर रहे हैं। इसीलिए हमारे कई ' यौनानंदी ' चिंतक समलैंगिकता कोवरेण्य बनाने के लिए तर्कों का बारीक जाल बुना रहे हैं। वे लेस्बियनिज्म को बहनापा जैसे सम्मानजनक नाम सेपुकारते रहे हैं , ताकि एक निर्विघ्न यौन - उद्योग भारत में अपनी पकड़ बना सके।
कंडोम क्रांति ने निश्चय ही सेक्स व्यापार के लिए दरवाजा बनाया। संसद और सत्ता उसे सिंहद्वार में बदलने कीप्रतिज्ञा प्रकट कर रही है। पोर्न की सर्वांग नग्नता अब युवा पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बना दी गई है। नैतिकता अबमोरल - फोबिया जैसे नाम से अभिषिक्त होकर किसी रोग का दर्जा हासिल कर चुकी है। वे ठीक ही कहते हैं कि 'इंडियन सोसाइटी इज विक्टिम ऑफ मोरल फोबिया ' । बेशक , इस भारतीय नैतिक - व्याधि या कि इसपरंपरागत - रोग से निवृत्ति में कंडोम - प्रमोशन कार्यक्रम ने एकमात्र अचूक औषधि का काम किया है। उसकेप्रचार - प्रसार की प्रविधि और दृष्टि ने विवाह को फक - फेस्ट की तरह व्याख्यायित करना शुरू कर दिया है तोनिश्चय ही समलैंगिक - विवाह को भी वैधता मिल ही जाएगी। ' नाज ' उनके पास है , जिसके पास अमेरिकी पूंजीका परनाला है। लेकिन , ' जिन्हें नाज है हिंद पर ' वे गूंगों की जमात में शामिल हो चुके हैं। समलैंगिकता केसवाल पर उनकी घिग्घी बंध चुकी है , गले में जा फंसी जीभ को पक्षाघात हो चुका है। जिनके पास शक्ति औरसत्ता है वे अपना मकसद पूरा करने के लिए न्यायालय को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रहे हैं , उनका हाथपकड़ने वाला कोई नहीं है।
किसके साथ जाए "आप " या भाजपा -एक धर्मसंकट
मै कांग्रेस का कट्टर विरोधी हूँ या यू कहिये
कि जन्मजात विरोधी हूँ .."आप " और केजरीवाल मुझे बहुत पसंद है लेकिन
आजकल एक धर्मसंकट से गुजर रहा हू कि "केजरीवाल " के अभ्युदय से "ठाकुर तो गयो "(मोदी
) वाली स्तिथि हो गयी है जिसका सीधा -सीधा
फायदा कांग्रेस को मिलता दिख रहा है .."आप "से लाखों लोग जुड रहें है और
लोकसभा में भले ही "आप " कोई बड़ा कमाल ना दिखा पाए लेकिन बीजेपी का खेल
३० -४० सीटों में तो बिगाड़ ही सकती है जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को ही मिलेगा
..हो सकता है फिर से कांग्रेस की सरकार केंद्र में फिर बन जाए जो मै किसी भी कीमत पर नहीं चाहता ...एक
तरफ केजरीवाल के प्रति मेरा मोह है वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रति कट्टर विरोध
...समझ में नहीं आ रहा कि ऐसी परिस्थितियों में किसका समर्थन किया जाए ..क्योंकि
हर हाल में "कांग्रेस मुक्त भारत का सपना" काफी दिनों से देख रहा हूँ
..जो धर्मसंकट मेरे सामने है लगभग वही बहुत सारे "आप " समर्थकों में भी
है (योगेन्द्र यादव के एक सर्वे के अनुसार भी )..क्या किया जाए कुछ आप लोग सुझाव
दे(लोकसभा चुनाव के लिए ) "विकल्पहीनता की स्तिथि में भाजपा का समर्थन"
या फिर "आप " के साथ
Monday, January 6, 2014
पंखुड़ी मिश्रा की गजलें
ख़ुश्क था जो पेड उस पर पत्तियाँ अच्छी लगी,
तेरे होठों पर लरज़ती सिसकियाँ अच्छी लगी !
हर सहूलत थी मयस्सर लेकिन इसके बावजूद,
माँ के हाथों की पकाई रोटियाँ अच्छी लगी !
जिसने आज़ादी के क़िस्से भी सुने हों क़ैद में,
उस परिन्दे को क़फ़स की तीलियाँ अच्छी लगी !
हाथ उठा कर वक़्ते-रुख़्सत जब दुआएं उसने दीं,
उसके हाथों की खनकती चूडियाँ अच्छी लगी !
हम बहुत थक-हार कर लौटे थे लेकिन जाने क्यों,
रेंगती, बढती, सरकती चींटियाँ अच्छी लगी
सियासत में
झूट की होती है बोहतात सियासत में, सच्चाई खाती है मात सियासत में !
दिन होता है अक्सर रात सियासत में, गूँगे कर लेते हैं बात सियासत में !
और ही होते हैं हालात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !!
सभी उसूलों वाले आदर्शों वाले, जोशीले और जज़्बाती नरों वाले !
मर्दाना तेवर वाली मूँछों वाले, सच्चाई के बड़े बड़े दावों वाले !
बिक जाते हैं रातों रात सियासत में, जायज़ होती है हरबात सियासत में !!
दिये तेल बिन जगमग जगमग जलते हैं, सूखे पेड़ भी बे मौसम ही फलते हैं !
खोटे सिक्के खरे दाम में चलते हैं, लंगड़े लूले भी बल्लियों उछलते हैं !
लम्बे हो जाते हैं हात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !!
वोटों के गुल जब कुर्सी पर महकेंगे, नोटों के बुलबुल हर जानिब चहकेंगे !
बर्फ़ के तोदे अंगारों से दहकेंगे, ख़ाली पैमाने झूमेंगे बहकेंगे !
होगी बिन बादल बरसात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !!
इंसाँ कहना पड़ता है शैतानों को, दाना कहना पड़ता है नादानों को !
ख़्वाहिशात को, ख़्वाबों को, अरमानों को, रोकना पड़ता है उमड़े तूफ़ानों को !
काम नहीं आते जज़्बात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !!
जितने रहज़न हैं रहबर हो जाते हैं, पस मंज़र सारे मंज़र हो जाते हैं !
पैर हैं जितने भी वो सर हो जाते हैं, बोने सारे क़द आवर हो जाते हैं !
बढ़ते हैं सब के दरजात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !!
जब हालात की सख़्ती से घबरा जाऊँ, ख़ुशहाली की मंज़िल मैं भी पा जाऊँ !
सच्चे रस्ते से मैं भी कतरा जाऊँ, जी करता है राही मैं भी आ जाऊँ !
मार के सच्चाई को लात सियासत में, जायज़ होती है हर बात सियासत में !!
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