Friday, February 20, 2015

हमारी भी लड़ाई होती है ...


शशांक द्विवेदी 
कल किसी ने मेरी मैरिज एनिवर्सरी की पोस्ट पढ़ने के बाद एक सवाल किया कि क्या आपके और आपकी पत्नी के बीच भी लड़ाई होती है तो मैंने जवाब में कहा कि दुनियाँ में पति –पत्नी की शायद ही ऐसी कोई जोड़ी होती होगी जिनके बीच कभी भी लड़ाई –झगड़ा ,नोक झोंक ना होती हो .खैर मेरे और प्रिया के बीच भी कभी कभार यह सब हो जाता है . आखिर हम दोनों भी इंसान है ,आदर्श स्तिथि तो सिर्फ देवी –देवताओं में ही होती होगी .
हम दोनों के विचार बहुत भिन्न है कई मुद्दों पर मतभेद भी रहता है लेकिन विचारों की यही भिन्नता मुझे कई बार बहुत ठीक लगती है इससे किसी भी चीज के हर पहलू को समझने में मदत मिलती है .वैसे भी मेरा मानना है कि पति –पत्नी होने का मतलब यह नहीं है कि एक दूसरे की जी –हुजूरी करने लग जाएँ या गुलामी जैसा महसूस करें .सीधी सी बात है व्यक्तित्व भिन्न है तो विचार भी भिन्न ही होंगे .इसलिए बेहतर आपसी समझ बनाने की जरुरत होती है .

खाने के मामले में प्रियंका जहाँ बेहद सात्विक है मतलब वो लहसुन और प्याज बिल्कुल नहीं खाती ना ही उसके परिवार में कोई खाता वहीं मुझे ये बेहद पसंद है .प्रियंका के होते हुए घर में सभी सब्जियां बिना लहसुन और प्याज के ही बनती है ,सबसे खास बात यह है कि सब्जियां बेहद शानदार और टेस्टी बनती है और अब तो मुझे भी खूब पसंद आने लगी ..हाँ अब मै अलग से प्याज सलाद के साथ  में खा लेता हूँ . कई मामले ऐसे भी है जहाँ वो मेरी बात मानती है .करियर के मामले में जहाँ मै पूर्णकालिक तौर पर मीडिया में जाना चाहता था /चाहता हूँ लेकिन प्रियंका ने कभी जाने नहीं दिया उसने कहा पढाने के साथ लेखन करो वही ठीक है मीडिया में जाने की जरुरत नहीं है.. प्रिया ने अमर उजाला में कई साल काम किया इसलिए उसे मीडिया का अनुभव मुझसे कहीं ज्यादा है फिलहाल उसकी बात मानना ही मुझे ठीक लगा .मेरे अंदर ड्रेसिंग सेंस नहीं है प्रिया में है और आज की डेट में मेरे ८० फीसदी कपड़े प्रियंका ही खरीदती है .प्रियंका आम ठेठ भारतीय पत्नियों की तरह सिर्फ “यस मैन “ नहीं है बल्कि मेरे  अंदर या फिर मेरे किसी काम में उसे जो ठीक नहीं लगता उस पर वो बिना झिझक कर बोलती है .चाहे वो मुझे बुरा ही क्यों ना लगे ..बहुत मामलों में मेरी पहली आलोचक मेरी पत्नी ही है ..एक बात जरुर है कि मुझे कई बार शादी एक बंधन के रूप में भी दिखती है क्योंकि शादी के पहले भी मै ५ साल प्रिया के साथ रहा वहाँ मुझे बड़ी स्वतंत्रता महसूस होती थी लेकिन शादी के बाद बिना वजह बहुत सारे झंझट आ जाते है मसलन परिवार ,समाज ,रिश्तेदार..इन्हें खुश करो ,उन्हें खुश करो ...ज्यादातर नोंकझोक भी इन्ही बातों से होती है ..बेवजह के ढकोसलों से भी बहुत खीज और परेशानी होती है ...लेकिन फिर भी ये सब तो झेलना ही पड़ेगा भाई क्योंकि प्रेम विवाह की  कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है. लेकिन विचारों में थोड़ा बहुत मतभेद होते हुए भी हमारे बीच “प्रेम “ का गहरा अहसास है जो हमें हमेशा जोड़े रहता है और सच्चाई है कि सिर्फ “प्रेम “ में ही इतना सामर्थ्य है जो आपको जिंदगी भर जोड़े रख सकता है .

Thursday, February 19, 2015

तुम्हे देखा है बहुत ,फिर भी बहुत कम देखा ..

शशांक द्विवेदी 
6 year of togetherness ... आज शादी को 6 साल पूरे हो गये ,लेकिन प्रियंका से दोस्ती -प्रेम को तो 11 साल हो गये ..इतना वक्त गुजर गया पता ही नहीं चला ..आगरा आया था इंजीनियरिंग की पढाई करने उसी दौरान पहले "प्रेम" हुआ फिर "विवाह " मतलब प्रेम -विवाह हो गया...काफी मुश्किलें आई लेकिन हो गया ...वैसे मेरा स्पष्ट मानना है कि संघर्ष के ,प्रेम के ,रोमांस के वे 5 साल काफी जबर्दस्त थे...काश वो दिन फिर से वापस आ जाए ... मेरी जिंदगी की कहानी पूरी फ़िल्मी है फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ के सभी पात्र वास्तविक है ....प्रियंका के प्रेम ने ही मुझे "लेखक "भी बना दिया ..सच कहूँ तो मै पत्थर था उसने ही मुझे तराश कर किसी काम का बना दिया ...मै जो कुछ भी हूँ उसमें उसका बहुत ज्यादा योगदान है .. .अमर उजाला ,आगरा से चली ये प्रेम कहानी तो फिलहाल जबर्दस्त तरीके से चल रही है ,उम्मीद करता हूँ कि आगे भी चलती रहेगी ..क्योंकि मुझे हमेशा से यही लगता है कि सिर्फ "प्रेम "ही आपको जोड़े रख सकता है ,विवाह तो एक पड़ाव भर है ..
प्रिया के लिए तो यही पंक्तियाँ याद आ रहीं है कि 

"तुमसा ना कोई हमदम देखा ,उड़ गये होश जवानी का वो आलम देखा ,तुम्हे देखकर जी भरता ही नहीं ,तुम्हे देखा है बहुत ,फिर भी बहुत कम देखा ..."

मै बहुत खुश नसीब हूँ कि मुझे प्रिया जैसी प्रेमिका और जीवन संगिनी मिली ,उसने मुझे बहुत खुशी और प्यार दिया ,हर कदम पर मेरा साथ देते हुए मेरा हौसला भी बढ़ाया ...प्रियंका को शादी की सालगिरह पर ढेरों शुभकामनाएँ.....ईश्वर से प्रार्थना है कि हमारे संबंधों की मजबूत डोर ऐसे ही बंधी रहें ...












हमारी भी लड़ाई होती है ...

कल किसी ने मेरी मैरिज एनिवर्सरी की पोस्ट पढ़ने के बाद एक सवाल किया कि क्या आपके और आपकी पत्नी के बीच भी लड़ाई होती है तो मैंने जवाब में कहा कि दुनियाँ में पति –पत्नी की शायद ही ऐसी कोई जोड़ी होती होगी जिनके बीच कभी भी लड़ाई –झगड़ा ,नोक झोंक ना होती हो .खैर मेरे और प्रिया के बीच भी कभी कभार यह सब हो जाता है . आखिर हम दोनों भी इंसान है ,आदर्श स्तिथि तो सिर्फ देवी –देवताओं में ही होती होगी .
हम दोनों के विचार बहुत भिन्न है कई मुद्दों पर मतभेद भी रहता है लेकिन विचारों की यही भिन्नता मुझे कई बार बहुत ठीक लगती है इससे किसी भी चीज के हर पहलू को समझने में मदत मिलती है .वैसे भी मेरा मानना है कि पति –पत्नी होने का मतलब यह नहीं है कि एक दूसरे की जी –हुजूरी करने लग जाएँ या गुलामी जैसा महसूस करें .सीधी सी बात है व्यक्तित्व भिन्न है तो विचार भी भिन्न ही होंगे .इसलिए बेहतर आपसी समझ बनाने की जरुरत होती है .
खाने के मामले में प्रियंका जहाँ बेहद सात्विक है मतलब वो लहसुन और प्याज बिल्कुल नहीं खाती ना ही उसके परिवार में कोई खाता वहीं मुझे ये बेहद पसंद है .प्रियंका के होते हुए घर में सभी सब्जियां बिना लहसुन और प्याज के ही बनती है ,सबसे खास बात यह है कि सब्जियां बेहद शानदार और टेस्टी बनती है और अब तो मुझे भी खूब पसंद आने लगी ..हाँ अब मै अलग से प्याज सलाद के साथ  में खा लेता हूँ . कई मामले ऐसे भी है जहाँ वो मेरी बात मानती है .करियर के मामले में जहाँ मै पूर्णकालिक तौर पर मीडिया में जाना चाहता था /चाहता हूँ लेकिन प्रियंका ने कभी जाने नहीं दिया उसने कहा पढाने के साथ लेखन करो वही ठीक है मीडिया में जाने की जरुरत नहीं है.. प्रिया ने अमर उजाला में कई साल काम किया इसलिए उसे मीडिया का अनुभव मुझसे कहीं ज्यादा है फिलहाल उसकी बात मानना ही मुझे ठीक लगा .मेरे अंदर ड्रेसिंग सेंस नहीं है प्रिया में है और आज की डेट में मेरे ८० फीसदी कपड़े प्रियंका ही खरीदती है .प्रियंका आम ठेठ भारतीय पत्नियों की तरह सिर्फ “यस मैन “ नहीं है बल्कि मेरे  अंदर या फिर मेरे किसी काम में उसे जो ठीक नहीं लगता उस पर वो बिना झिझक कर बोलती है .चाहे वो मुझे बुरा ही क्यों ना लगे ..बहुत मामलों में मेरी पहली आलोचक मेरी पत्नी ही है ..एक बात जरुर है कि मुझे कई बार शादी एक बंधन के रूप में भी दिखती है क्योंकि शादी के पहले भी मै ५ साल प्रिया के साथ रहा वहाँ मुझे बड़ी स्वतंत्रता महसूस होती थी लेकिन शादी के बाद बिना वजह बहुत सारे झंझट आ जाते है मसलन परिवार ,समाज ,रिश्तेदार..इन्हें खुश करो ,उन्हें खुश करो ...ज्यादातर नोंकझोक भी इन्ही बातों से होती है ..बेवजह के ढकोसलों से भी बहुत खीज और परेशानी होती है ...लेकिन फिर भी ये सब तो झेलना ही पड़ेगा भाई क्योंकि प्रेम विवाह की  कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ती है. लेकिन विचारों में थोड़ा बहुत मतभेद होते हुए भी हमारे बीच “प्रेम “ का गहरा अहसास है जो हमें हमेशा जोड़े रहता है और सच्चाई है कि सिर्फ “प्रेम “ में ही इतना सामर्थ्य है जो आपको जिंदगी भर जोड़े रख सकता है ...

Sunday, February 8, 2015

अब तो बहाना ही पड़ेगी उल्टी गंगा!!

अनुराधा बेनीवाल
उत्तर भारत में एक गाँव था. कहने को तो गाँव में काफी खुशहाली थी लेकिन कुछ समय से वहां एक विचित्र समस्या घर कर गयी थी. वहां दिन ढलने के बाद लड़को का निकलना मुश्किल हो गया था. हर गली नुक्कड़ पे आवारा लड़कियाँ खड़ी रहती, आते जाते लड़को पर फब्तियाँ कसती, उन्हें भद्दे इशारे करती, और मौक़ा लगने पर चोंटी तक काट लेती. गांव के बस स्टॉप, पान कि दुकान, चाय कि दुकान, पंसारी यहाँ तक के पंचयात तक में उन्होंने अपना कब्ज़ा जमा लिया था. जब देखो, जहाँ देखो लड़कियां ही खड़ी दिखती. एक-आध लड़का भूले-बिसरे वहां से चल गुजरता तो बस, सब उसपर लपक पड़ती.
लड़को ने अकेले घर से निकलना तक बंद कर दिया था. खासकर के शाम के वक़्त तो हर जगह सिर्फ लड़कियां ही लड़कियां दिखाई पड़ती. जब लड़को का पूरा समय अंदर बैठ कर दम घुटने लगा तो कुछ हिम्मत वाले लड़को बाहर जाने की कोशिश की. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, लड़कियों ने लड़को को ऐसा सबक सिखाया कि लड़के और भी भयभीत हो गए. आख़िरकार लड़को के माँ-बाप और कुछ शुभचिंतको ने पंचायत के सामने अपनी समस्या रखी, लेकिन ये क्या, पंचायत (जिसमे सब लड़कियां ही थी) ने लड़को का मोबाइल और टी-वी बंद करा दिया.
गांव में एक ही कॉलेज था, उस कॉलेज के गेट पर लड़कियां सुबह सुबह दादी बन के खड़ी हो जाती, और आते जाते लड़को को परेशान करती. लड़को का गेट पे खड़े रहना तो दूर, कॉलेज के अंदर जाना तक दुर्भर हो गया था. लड़को के टाइट कपड़े देख लड़कियां और भी उत्तेजित हो जाती, और उनकी फिगर तो लेकर भद्दी बाते कहती थी. जब लड़को ने कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन से शिकायत की तो, लड़को को ढंग के कपड़े पहनने के लिए कहा गया और एक ड्रेस कोड जरुरी कर दिया. अब कोई लड़का गर्मियों में छोटी बाजू का टी-शर्ट पहन के आता तो उसे वापस घर भेज दिया जाता. बात भी सही थी, माहौल ही इतना ख़राब था, सोच समझ के कपड़े पहनने चाहिए.
लड़को के माँ-बाप ने उन्हें सख्त हिदायत दे रखी थी कि वो आँखे नीची कर के सीधा कॉलेज जाए और वापस घर आएं. कैंटीन में मस्ती करने की, खाली गेट पे तफरी करने की या दोस्ती-यारी में जोर से हंसने या खिलखिलाने की उन्हें बिलकुल मनाई थी. जोर से हंसता या गाना गाता लड़का लड़कियों को आकर्षित कर सकता था, और फिर तो आप सब जानते ही हैं के जमाना ख़राब हो चला था. जो लड़का इन बातो को नहीं मानता उसे तेज और बुरे करैक्टर के सर्टिफिकेट दिए जाने लगे.
अब हर तरफ लड़को कि इज़्ज़त को खतरा था. और चूँकि घर की इज़्ज़त लड़को के हाथ में होती है, लड़को के घरवालों ने अपनी नाक की खातिर लड़को को घर में रखना शुरू कर दिया. यहाँ तक कि शादी तक जल्दी कराने लगे. लड़को को सिखाया जाने लगा कि लड़के खुली तिज़ोरी कि तरह होते हैं, अगर अपने को ढक के नही रखेंगे तो चोर की तो नज़र तो खराब होगी ही, जमाने को सुधारने से अच्छा है खुद को सुधारो. लड़के या आदमी को अपना शरीर ढक कर रखना चाहिए अगर इस हवसी दुनिया से बचना है. और भी ऐसी अनेको बाते लड़को को समझाई जाने लगी, और सख्त नियम बनाये जाने लगे, कि कैसे लड़कियों का शिकार होने से बचा जाए. शायद लड़कियों को समझाने का किसी ने सोचा ही नहीं, और छोटी लड़कियां बड़ो के देखा देखी में उन्ही जैसे बनने कि कोशिश करती.
यहाँ तक कि फिल्मों और नाटको में ऐसी ही लड़की को हीरोइन बताया जाने लगा, जो लड़के के पीछे पड़ जाए, सीटी बजाये, आँख मारे, भद्दे कमेंट करे, और उसकी ना में भी हाँ ही सुने. और लड़के ऐसे ही अच्छे बताए जाने लगे जो अपने काम-से-काम रखें, आँख नीची कर के चले और आख़िरकार अपने घरवालों की नाक की खातिर अग्नि-परीक्षा दे डाले. अब छोटी लड़कियां टीवी पर ही अपने आइडियलस ढूंढ़ती और उनकी नक़ल करती, और क्यूंकि सीधे-सीधे लड़को से बात करना समाज ने बैन कर रखा था, वो फिल्मों से ही लड़को के बारे में जानकारी पाती.
जब भी कोई लड़की किसी लड़के को तंग करती या उठा ले जाती और उसके साथ बतमीज़ी करती तो लड़को पर ही लड़कियों को अट्रेक्ट करने का इलज़ाम लगाया जाता. पुलिस (जोकि लड़कियां ही थी) उनसे भद्दे सवाल पूछती और अकेले शाम को उनके निकलने के मकसद पर सवाल करती. मीडिया लड़को के चेहरे को ब्लर कर के बार बार उनके अकेले घर से निकलने के कारण पूछती. अब लड़के खुद भी समझने लगे थे, अब उन्होंने खुद ही बाहर जाना बंद कर दिया था, अब वो सोच समझ कर कपड़े पहनते और अपने दोस्तों को भी समझाते.
लेकिन जब छोटे लड़को को भी परेशान किया जाने लगा और दो-तीन साल के लड़को के साथ भी कुकर्म होने लगे तब पानी सर से गुजर गया. और उन्हें पूरे सिस्टम पर शक होने लगा. जब ऐसी ऐसी घटनाएँ सामने आने लगी कि सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो जाते, तब लड़को ने एक जुट हो धरने करने का फैंसला किया. अब एक दो घटनाएँ नहीं पूरा सिस्टम ही गड़बड़ लगने लगा था. अब वो और नहीं सह सकते थे और सड़को पे उतर आये.
अब उन्हें अपनी इज़्ज़त से प्यारी आज़ादी थी. एक बार रात को अकेले घूमने का सुख देखा तो उन्हें भी लड़कियों के जैसे आज़ादी का मन करने लगा था. अब वो भी अकेले रात को बाइक चलाना चाहते थे. अब उन्हें भी रात को खेत की ठंडी हवा में घूमना था. अब उन्हें पता चल गया था, कि खुद कैसे ही कपड़े पहन लें, जब तक लड़कियाँ उन्हें अपने बराबर का इंसान नहीं समझेंगी, उन्हें अकेले देख हमेशा झपट ही पड़ेंगी. और अपने बराबर तब तक नहीं समझेंगी, जब तक उन्हें हर तरफ उतनी ही गिनती में लड़के नहीं दिखाई देंगे जितनी के लड़कियां. जब ड्रेस कोड सिर्फ लड़को पर नहीं लगाया जायेगा. जब मोबाइल फ़ोन की गलती ना बता लड़कियों की गलती बताई जायेगी. जब इलज़ाम चाउमिन पर नहीं सीधे सीधे गुनहगार को दिया जाएगा. जब वो घर की इज़्ज़त का टोकरा ढोना बंद कर देंगे. जब घरवाले लड़को को घर में बंद ना कर, लड़कियों को लड़को कि इज़्ज़त करना सिखाएंगे. अब वो सब समझ गयी थी, लेकिन समस्या समाज की नसों में फ़ैल गयी थी और उन्हें पता था कि अब तो उलट-फेर ही उपाय है. एक-दो टहनियाँ नहीं अब तो जड़ो को काटना था.
और जब जड़े कटती हैं तो कुछ घोंसले भी टूटते हैं, और बेगुनाह पंछी भी बेघर होते हैं. लेकिन बदलाव तो लाना था, क्यूंकि और कोई चारा बचा ही नहीं था. गौर करें सब लड़कियां बुरी नहीं थी, कुछ लड़कियां तो लड़को के साथ उनकी लड़ाई तक में खड़ी थी. लेकिन सदियों से परेशान होते लड़को को लड़की जात पे ही शक होने लगा था. एक लड़के पर अत्याचार होता तो गालियां पूरे लड़की समाज को पड़ती. अब लड़ाई बड़ी थी तो इक्की दुक्की शरीफ लड़कियां भी लपेट में आई. लेकिन लड़ाई तो जायज़ थी और जारी रहेगी.
(ref -palpalindia.com)

Friday, December 12, 2014

मोदी का पतन उनके सहयोगियों की वजह से होगा

नरेंद्र मोदी को "प्रधानमंत्री मोदी" बनाने का पूरा श्रेय उनके विरोधियों को जाता है ,पार्टी में एक सामान्य सी हैसियत से लेकर मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री बनने तक विरोधी लगातार मुकर रहें ...लोग विरोध करते रहें और वो आगे बढ़ते गये ,विरोधियो ने रात दिन हर समय ,हर जगह इतना विरोध किया कि वो आम लोगों की नजर में हीरों बनाते चले गये कुलमिलाकर मोदी के उत्थान में विरोधियों का हाँथ रहा लेकिन अब पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ कि मोदी के सहयोगी ,भाजपा के लोग ,सांसद उलजुलूल काम कर रहें है ,उटपटांग बातें कर रहें है ,बेवजह बयान दे रहें है जिससे मोदी की छवि खराब हो रही है ,काँग्रेस में तो ऐसे बयान देने वाला दिग्विजय सिंह जैसे एक दो ही लोग थे लेकिन भाजपा में तो ऐसे लोग बहुत ज्यादा है जो मोदी की विकास यात्रा के सबसे बड़े शत्रु है ..लोगों ने मोदी को "विकास " के नाम पर वोट दिया था ...गोडसे ,हरामजादे ,धर्मान्तरण ,मंदिर ,गीता ,हिन्दुराष्ट्र के लिए नहीं दिया ..लोगों को रोटी और रोजगार चाहिए ,ये सब ड्रामा नहीं चाहिए जो आजकल देश में चल रहा है ,जो देश में दिख रहा है ... कहने का सीधा मतलब ये कि मोदी का उत्थान उनके विरोधियों की वजह से हुआ था लेकिन मोदी का पतन उनके सहयोगियों की वजह से होगा ..आप ये बात अपनी डायरी में लिख लीजिए ..बाद में आपको मेरी बात याद आयेगी

Tuesday, December 9, 2014

पुरुष वेश्यावृत्ति का बढ़ता चलन

शशांक द्विवेदी 
देश में इस समय पुरुष वेश्यावृत्ति का चलन तेजी से बढ़ रहा है पिछले दिनों राजस्थान राज्य महिला आयोग ने भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगते जैसलमेर जिले में बढ़ती पुरुष वेश्यावृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि विदेशी पर्यटकों की वजह से ये हालात पैदा हो रहे हैं। राजस्थान में तेजी से पनप रही सेक्स टूरिज्म इंडस्ट्री विकसित हो रही  है जिसका टर्न ओवर करोडों रुपयों का है । इसकी मुख्य वजह रास्थान में बढ़ रहा औधोगिकरण, टेक्सटाइल और मार्बल का व्यवसाय है। देशभर से व्यापार के लिए लोग यहां आ रहे हैं। होटलों में उनके लिए व्यवस्था की जा रही है। पुरुष वेश्यावृत्ति के कारोबार से जैसलमेर स्थित किले के ऊपरी क्षेत्र में रहने वाले एक समुदाय के पुरुष लंबे समय से जुड़े हुए हैं। इनका देह-शोषण करने वालों में विदेशी पर्यटकों की संख्या बहुत ज्यादा है।
जैसलमेर के धौरों में एक समुदाय से ताल्लुक रखने वाले पुरुष और महिलाएं वेश्यावृत्ति के धंधे में लिप्त हैं। महिलाओं के साथ-साथ पुरुष वेश्यावृत्ति भी इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है। जोधपुर, उदयपुर, जैसलमेर के कुछ होटल और इनके कमरे वेश्यावृत्ति (महिला और पुरुष) के लिए चिन्हित हैं। महिला आयोग के अनुसार प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे पर्यटन, भूमि कारोबार, खान, उद्योग की वजह से महिला वेश्यावृत्ति में काफी बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन इसके साथ-साथ पुरुष वेश्यावृत्ति का बढ़ना चिंता का विषय है। पाकिस्तान के साथ सीमावर्ती इलाके के अलावा जयपुर  से लगते फागी में भी एक समाज के कुछ परिवारों के पुरुष इस काम में लगे हुए हैं, महिलाएं तो पहले से ही इस धंधे में लिप्त हैं। साथ ही प्रदेश में जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, उदयपुर, पाली, अजमेर, किशनगढ़, सिरोही, बांसवाड़ा और टोंक में यह काराबोर तेजी से बढ़ रहा है। वेश्यावृत्ति के हालात जानने के लिए जैसलमेर पहुंची महिला आयोग की टीम को उस समय यह सुनकर आश्चर्य हुआ जब बारहवीं कक्षा में पढने वाले एक छात्र ने खुद का लम्बे समय से देहशोषण होने की जानकारी दी। पुरुष वेश्यावृत्ति के इस नए धंधे में पुरुष अप्राकृतिक यौन सम्बंध बनाता है या स्त्रियों के काम सुख के लिए पुरुष वेश्या या जिगोलो  बनकर उसे यौन संतुष्ट करता है ।
वेश्यावृत्ति संसार के सबसे पुराने व्यवसायों में से एक है। स्त्रियां इस धंधे में वह खिलौना होती हैं जिनके साथ जब तक मन होता है खेला जाता है और फिर वासना खत्म होने पर धन देकर छोड देते हैं। लेकिन आधुनिकता, अराजकता और पश्चिमी सभ्यता में वासना की पूर्ति के लिए शायद महिलाएं काफी नही। और इनका कहना है कि यह कहां का अन्याय है कि मर्द जब चाहे तब अपनी वासना की पूर्ति के लिए वेश्याओं का सहारा ले और स्त्री अपना मन मार कर रह जाए, इसीलिए एक नए व्यवसाय का सृजन हुआ जिगोलो या पुरुष वेश्याएं. “पुरुष वेश्याएं” सुनकर काफी अटपटा लगेगा लेकिन यह सच है कि आज यह लोग हमारे बीच काफी अधिक मात्रा में मौजूद हैं। जिगोलो का उपयोग महिलाएं अपनी वासना पूर्ति के लिए करती हैं। जब महिलाएं वेश्या बन कर आराम से धन कमा सकती हैं तो पुरुषों में भी यह काम काफी लोकप्रिय हो गया। लेकिन जब कड़वी सच्चाई सामने आती है तो पैरों तले जमीन खिसक जाती है। कई लोगों से शारीरिक संबंध बनाने के चक्कर में एड्स और अन्य एसटीडी (यौन संक्रमित रोग) इन्हें हो जाता है। पुरुष वेश्याओं का समाज में ज्यादा प्रयोग महिलाओं द्वारा किया जाता है खासकर उम्रदराज महिलाओं और विधवाओं द्वारा। कामकाजी महिलाएं जिन्हें घर पर अपने पति से सुख नहीं मिलता वह इन जिगोलो की सर्विस का उपयोग करती है।
लेकिन सबसे अहम सवाल कि रोजगार के इतने साधन होने के बाद भी युवा वर्ग इस दलदल भरे काम को करता क्यों है? सबसे पहले तो यह जिगोलो प्रणाली भारत में अन्य सामाजिक प्रदूषण की तरह पश्चिमी सभ्यता से आई जहां नंगापन सभ्यता का हिस्सा है। पश्चिमी सभ्यता के कदमों पर चलते हुए भारत में भी युवा वर्ग इस काम को करने लगा क्योंकि उसे इस काम में मेहनत ज्यादा नहीं है और कमाई खूब है ।
भारत जहां गरीबी काफी ज्यादा है और रोजगार के साधन सीमित हैं, वहां अच्छे जीवन-शैली की तो छोड़ दीजिए अगर आम जिंदगी भी जीनी है तो काफी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसे में बहकते युवा वर्ग को यह काम पैसा कमाने का नया और आसान तरीका लगता है।
भारत एक ऐसी जगह है जहां आपको पानी से लेकर देह सब बिकता नजर आएगा। साथ ही पश्चिमी देशों की नकल करना तो अब भारतीयों की पहली पसंद होती जा रही है। वेश्याओं का भोग करते मर्दों को देखकर उन्मुक्त हो चुकी महिलाओं को अपनी वासना की पूर्ति के लिए जिगोलो के रुप में साधन मिला। और युवाओं के लिए जब पैसा जिंदगी से बढ़कर हो तो कोई काम गंदा या बुरा नहीं मानते। लेकिन जब भी युवा वर्ग इस तरह का कोई नया काम करता है तो हमेशा इसका सही चेहरा ही उसे दिखता है। उसे इस काम में छुपा दूसरा पहलू नजर ही नहीं आता।  जिगोलो का काम कितना बुरा होता है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें पुरुष वेश्या कहा जाता है। महिलाएं पुरुषों को उसी तरह इस्तेमाल करती हैं जैसे वह महिलाओं को करते हैं।
इन सब में सबसे अहम बात छुपी रह जाती है कि भारतीय समाज में यह चीज हमारे संस्कारों और सभ्यता के लिए दीमक की भांति है। जिस युवा पीढ़ी पर जमाने भर का बोझ होता है वह चन्द मुश्किलों के आगे झुक कर इस दलदल में फंस जाता है और अपने भविष्य के साथ मजाक कर लेता है।अगर कानूनी नजर से देखा जाए तो यह बिलकुल मान्य नहीं है। पुरुष वेश्यावृत्ति को भी वेश्यावृत्ति की तरह देखा जाता है और इसे गैर-कानूनी माना जाता है। भारत में वेश्यावृत्ति के खिलाफ कई कानून हैं लेकिन  पुरुष वेश्यावृत्ति के खिलाफ कोई ठोस कानून नहीं है । हालांकि इसके बावजूद भी भारतीय कानून इसे वेश्यावृत्ति ही मानता है। जबकि विश्व स्तर पर इसे मनुष्य के स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ कर देखा जाता है।
कई बार पुरुष वेश्यावृत्ति को छुपाने के लिए लिव इन रिलेशनशिप का भी सहारा लिया जाता है। ऐसे में महिलाएं साथी के साथ रहती हैं और किसी कानूनी लफड़े से भी बच जाती हैं। जिंदगी को व्यापार बनाकर देखने वाले मानव स्वतंत्रता का उद्घोष करते नजर आते हैं और इस आड़ में अपने छुपे अनैतिक मंतव्यों को पूर्ण करने की ख्वाहिश रखते हैं। क्या भारतीय संस्कृति इतनी लाचार और कमजोर है जो ऐसे दुराचारियों के दबाव में आकर परंपराओं और संस्कृति को तोड़ देगी?कुलमिलाकर राजस्थान सहित पूरे देश में पुरुष वेश्यावृत्ति के बढ़ते चलन को लेकर सरकार को संजीदा होना चाहिए क्योंकि ये काम युवाओं के भविष्य को बर्बाद कर रहा है ।

Friday, September 26, 2014

“मेक इन इंडिया” का सपना

विकसित भारत के सपने के लिए “मेक इन इंडिया”
शशांक द्विवेदी 
भारत को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने के सपने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना “मेक इन इंडिया” अभियान को  लॉन्च किया। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में ये एक बड़ा कदम है .ये कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में पड़ोसी देश चीन का दबदबा बढता ही जा रहा है .भारत में चाइनीज उत्पादों की संख्या बढ़ती ही जा रही है , भारतीय बाजार चाइनीज उत्पादों से भरे पड़े है .ऐसे में “मेड इन इंडिया” की अवधारणा को मजबूत करना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हो गया था .इस अभियान का मकसद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देना है। अभियान का फोकस ऑटो, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल समेत 25 सेक्टर को बढ़ाने पर रहेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिए बगैर देश का विकास नहीं हो सकता है। सरकार इंडस्ट्री के रास्ते से सारी अड़चने दूर करना चाहती है। एफडीआई की उन्होंने नई परिभाषा दे दी। उनकी नजर में भारतीयों के लिए एफडीआई का मतलब होना चाहिए फर्स्ट डेवलप इंडिया। मेक इन इंडिया इकोनॉमी के लिए महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। साथ ही इसकी मदद से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार बढ़ेगा।
भारत के “मेक इन इंडिया” के लाँच के बाद  चीन ने एक बार फिर  मेड इन चाइना का नारा दिया है .ऐसे में भारत को चीन की मैन्युफैक्चरिंग को भी समझना होगा कि क्यों चीन इस क्षेत्र में दुनियाँ में सबसे आगे है .
चीन इंटरनेट और ई-कॉमर्स के जरिए अपनी इकोनॉमी को जोरदार रफ्तार देने का प्लान बना रहा है। चीन की तेज इकोनॉमिक ग्रोथ में स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एसएमई) अहम भूमिका निभा रहे हैं। दरअसल, चीन के छोटे उद्यमियों ने नई तकनीकी को अपनाकर न सिर्फ प्रोडक्टिविटी बढ़ाई, बल्कि पूरी दुनिया के लिए मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया। शायद यही देखकर पिछले दिनों चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान भारत ने चीन को टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग में भागीदार बनने के लिए आमंत्रित किया है। भारत के ज्यादातर स्मॉल एंटरप्राइजेज अभी भी तकनीकी से दूर हैं। चीन दुनिया का सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमी और सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है। माइनिंग एंड ओर प्रोसेसिंग के अलावा चीन कोल, मशीनरी, टेक्सटाइल्स एंड अपैरल, पेट्रोलियम, सीमेंट, फर्टिलाइजर, फूड प्रोसेसिंग, ऑटोमोबाइल्स, ट्रान्सपोर्टेशन इक्विपमेंट, शिप्स एंड एयरक्राफ्ट, फुटवियर, ट्वायज, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकम्युनिकेशंस और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का एक्सपोर्ट करता है। ग्लोबल रिसर्च फर्म मैकेंजी का मानना है कि वहां के एसएमई अब “माइक्रो-मल्टीनेशनल” बन रहे हैं। पिछले 30 सालों में जोरदार इंडस्ट्रियलाइजेशन के दम पर चीन दुनिया की फैक्ट्री बन गया है। चीन की खासियत में बड़ी संख्या में लेबर, सस्ती लागत और तुलनात्मक रूप से बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर शामिल है। चीन ने सिर्फ तेज रफ्तार से मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान दिया, बल्कि टेक्नोलॉजी इनोवेशन पर भी ध्यान दिया। मैकेंजी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के 21 फीसदी स्मॉल एंटरप्राइजेज क्लाउड तकनीकी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि इंटरनेट एडॉप्शन रेशियो 25 फीसदी तक है।जबकि भारत में ये बहुत कम है .

चीन ने न सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस किया, बल्कि टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन पर भी खासा ध्यान दिया। इसमें नई तरह और बेहतरीन प्रोडक्टिविटी वाली मशीनों, लो कार्बन टेक्नोलॉजी, एनर्जी जैसे सेगमेंट शामिल हैं। इंटरनेट के जरिए चीन की एसएमई एक्सपोर्ट के मोर्चे पर भी मजबूत हो रहे हैं। अलीबाबा या ग्लोबल सोर्सेज जैसे बी2बी मार्केटप्लेसेज के जरिए वे विदेशी कस्टमर्स को प्रोडक्ट बेच रहे हैं। वहां के एसएमई अब “माइक्रो-मल्टीनेशनल” बन रहे हैं. जबकि  भारतीय एसएमई को खासकर सर्विस से जुड़े एंटरप्राइजेज सरकार की तरफ से मिलने वाले फायदे या इन्सेन्टिव नहीं मिल पाते।
  भारत  की एसएमई के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से अलग-अलग स्कीमें तो चलाई जाती हैं, लेकिन जानकारी की कमी के चलते वे उनका फायदा नहीं उठा पाते या भ्रष्टाचार के चलते ये फायदे उन तक पहुंच नहीं पाते।  एसएमई को कर्ज मिलने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, अब बैंकों ने एसएमई लोन पर फोकस करना शुरू कर दिया है। लेकिन यहां, एसएमई के लिए बैंक के अलावा कोई वैकल्पिक व्यवस्था को कोई ठोस प्लान नहीं है। हाल में रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने भी बैंकों से एसएमई को आसान कर्ज मुहैया करवाने की बात कही है। फ्लिपकार्ट, शॉपक्ल्यूज, स्नैपडील जैसी कई ई-कॉमर्स कंपनियों ने एसएमई के लिए मार्केट प्लेस बनाए हैं, लेकिन उनकी छोटे कारोबारियों तक पहुंच धीमी रफ्तार से बढ़ रही है। इसके अलावा सरकार की तरफ से एसएमई को ई-रिटेलर्स के साथ जोड़ने का कोई सटीक प्लान नहीं है। इसके अलावा एसएमई को टेक्नोलॉजी और इंटरनेट के जरिए ग्रोथ को रफ्तार देने का बढ़ावा देना चाहिए। उन्हें पर्याप्त पूंजी और प्रोडक्ट बेचने का डिजिटल जरिया मिलने जैसे प्रयास होने चाहिए।

मेक इन इंडिया अभियान का मकसद विदेशी कंपनियों को भारत में फैक्ट्री लगाने और भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करने के लिए आकर्षित करना है। अभियान के तहत निवेशकों की हर उलझन को दूर करने के लिए मेकइनइंडिया डॉट कॉम  नाम से एक वेब पोर्टल शुरू किया गया है। इस पोर्टल पर निवेशकों को अपने सभी सवालों का जवाब सिर्फ 72 घंटों में मिलेगा । इस अभियान के जरिए सरकार रेगुलेटरी प्रोसेस को आसान कर निवेश को प्रोत्साहित करेगी। नीति और नियमों के नाम पर जो अड़चनें आती हैं, सरकार ने इन्हें दूर करने के लिए इंवेस्ट इंडिया नाम का एक सेल भी बनाया है, जो उद्योग लगाने से लेकर रेगुलेटरी मंजूरी तक सभी मामलों में विदेशी निवेशकों की मदद करेगी। अभी तक नई कंपनी या नए व्यापार के लिए सरकारी लालफीताशाही आड़े आती थी मंजूरी के लिए फ़ाइल एक दफ्तर से दूसरें में घुमती रहती थी .काफी वक्त लगता था किसी भी काम को शुरू करने में लेकिन अब इन सब मुश्किलों को दूर करने की दिशा में ये एक बेहतर कदम उठाया गया है . प्रधानमंत्री के मुताबिक इंडस्ट्री का सरकार से भरोसा उठ गया था लेकिन अब माहौल बदल रहा है। नरेंद्र मोदी ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी की बजाय कॉरपोरेट गवर्नमेंट रिस्पॉन्सिबिलिटी पर जोर देने की बात कही है . मेक इंडिया इंडिया का मकसद देश में रोजगार के मौके भी पैदा करना है ताकि 100 करोड़ भारतीयों के लिए नई नौकरियों के अवसर खुलें।
सच बात तो यह है कि भारत में मेक इन इंडिया अभियान बरसों पहले ही शुरू किया जाना चाहिए था लेकिन अब भी देर नहीं हुई है क्योंकि देर आये पर  दुरुस्त आये. निवेश के लिए भारत काफी आकर्षक है क्योंकि भारत में लोकतंत्र, आबादी और मांग सबकुछ मौजूद है। कारोबारी माहौल सुधारने की सबसे ज्यादा जरुरत है ,देश में कारोबार और मैन्युफैक्चरिंग का माहौल बनते ही भारत विकसित राष्ट्र का अपना सपना जरुर पूरा कर पायेगा .






Thursday, September 18, 2014

शशांक को सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान


  देश के विभिन्न अखबारों में शशांक द्विवेदी को सर्वश्रेष्ठ ब्लाँगर सम्मान दिए जाने पर ख़बरें प्रकाशित हुई
 
जनसंदेश टाइम्स
राजस्थान पत्रिका 
अमर उजाला आगरा से अपने एक कॉलम “साइबर बाइट्स “ से तकनीकी लेखन की शुरुआत करने वाले शशांक द्विवेदी को हिन्दी दिवस पर नई दिल्ली में एबीपी न्यूज  के एक खास कार्यक्रम में विज्ञान और तकनीकी लेखन के क्षेत्र में उनकी प्रसिद्ध वेबसाइट विज्ञानपीडिया के लिए के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का पुरस्कार दिया गया . शशांक द्विवेदी सेंट मार्गरेट इंजीनियरिंग कॉलेज,नीमराना में प्रोफ़ेसर और प्रसिद्ध वेबसाइट विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संपादक है .एबीपी न्यूज़ ने एक भव्य कार्यक्रम में देश भर के चुनिंदा 10 ब्लॉगरों को  सम्मानित किया. पुरस्कार के लिए ब्लॉगरों का चयन प्रसिद्ध साहित्यकार और आलोचक सुधीश पचौरी, कवि डॉ. कुमार विश्वास, गीतकार प्रसून जोशी और नीलेश मिश्र ने किया.
दैनिक जागरण 
विज्ञानपीडिया डॉट कॉम (विज्ञान और तकनीक की दुनियाँ ) आम आदमी 
,छात्रों और प्रोफेशनल्स को हिंदी में विज्ञान और तकनीक से सम्बंधित नवीनतम जानकारी ,खोज ,लेख उपलब्ध कराती है .इस वेबसाईट के संपादक शशांक द्विवेदी के अनुसार आम आदमी और छात्रों की विज्ञान में रूचि बढानें के उद्देश्य से दो साल पहले इसकी शुरुवात की गई थी जो काफी सफल रही .हिंदी में विज्ञान और तकनीक से सम्बंधित गुणवत्तापूर्ण कंटेंट की काफी कमी है .जबकि ग्रामीण इलाकों के बच्चों को उनकी  भाषा में ही विज्ञान कंटेंट देकर उनकी रूचि बढ़ाई जा सकती है .इस समस्या को ध्यान में रखते हुए ही विज्ञानपीडिया .कॉम जैसा प्रयोग किया गया ,जिसको आशातीत सफलता मिल रही है .
दैनिक जागरण ,चित्रकूट 
द सी एक्सप्रेस 
दुनियाँ के कई देशों से इस साईट को देखा जा रहा है और इसकी सामग्री पर हजारों हिट्स मिल रहें है ,वर्ड वाइड अब तक वेबसाईट के 64200 पेज व्यू हो चुके है. विज्ञानपीडिया अपनी विशिष्ट सामग्री  की वजह  से  युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है. इसमें अंतरिक्ष उर्जा संकट ,जल संकट ,ग्लोबल वार्मिग ,उच्च शिक्षा ,तकनीकी शिक्षा ,मंगल अभियान पर कई विशेष लेख है . वेबसाइट के संपादक शशांक द्विवेदी देश के प्रमुख हिन्दी अख़बारों के लिए विज्ञान और तकनीकी विषयों पर नियमित स्तंभ लिखते है . विज्ञान संचार  से जुडी   देश की कई संस्थाओं द्वारा उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है . अख़बारों में उनके प्रकाशितअधिकांश लेख आपको यहीं मिल जायेंगे .इस वेबसाइट का उद्देश्य आम आदमी को विज्ञान और तकनीक से जोड़ना है .इस वेबसाइट पर विज्ञान और तकनीक से सम्बंधित अच्छी से अच्छी जानकारी  उपलब्ध है .नियमित अपडेट होने से यह पाठकों को नई जानकारी उपलब्ध कराती है.
द सी एक्सप्रेस