Friday, April 27, 2012

जीवन पर

जीवन के एक पहलू पर मेरी एक स्वरचित कविता 


"जीवन "
न खुद को जान सका
न पहचान सका
बस बहता ही रहा
जीवन की इस अविरल धारा में
जीवन को देखा बहुत
समझा बहुत
पर बदल न सका
अपने आप को
बहता ही रहा
पर किनारा न मिला
पर मिलता भी कैसे ?
जब कोई किनारा ही न था
बहते हुए भी
सँभल न सका
बस डूबता ही गया
जीवन के इस अंतर्मन में
पर ,जब डूबा तो ऐसा डूबा
इस अंतर्मन में
इस चेतना में कि
फिर लगा कि
डूबना ही जीवन है
क्योंकि फिर कोई ,
आस नहीं ,साँस नहीं
बस जीवन ही जीवन
जो अनंत है
अविकार है
वहाँ न तुम हो
न "मैं "हूँ
सब एक है ....

लेखक -शशांक द्विवेदी 

1 comment:

  1. पर मिलता भी कैसे ?
    जब कोई किनारा ही न था

    bahut khoob shashankji! jeevan ka sara rahsya samete hue yatharth ko darshati kavita ko prastut karne ke lie aapko hardik badhai.

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